छोडतो पुरुष अभिमान्
पुरुष-भोक्ता के अभिमान को त्यागकर, हे कान्ह! आज मैं तुम्हारी दासी बन गई हूँ।
हे राधानाथ! व्रज के वनों में राधा की सखियों की संगति में, मैं सेवा में लगी रहूँगी।
मैं फूलों की माला गूँथूँगी, जिनके बीच तुलसी की मंजरियाँ रत्नों जैसी सजी होंगी।
मैं उन मालाओं को सावधानी से राधा की एक सखी के हाथों में दूँगी, और वह सखी उन्हें प्रेमपूर्वक अपने हाथों में ले लेगी।
वह सखी उन मालाओं को तुम दोनों के गले में पहना देगी, और मैं दूर से यह दृश्य कौतुक से देखती रहूँगी।
राधा की वह सखी मुझसे कहेगी, 'सुनो सुंदरी! तुम इस वन-कुंज में मेरी दासी बनकर रहो।
प्रतिदिन ऐसी मनोहर मालाएँ गूँथना, जो राधा-कृष्ण को सदा मोहित कर लें।
तुम्हारे पालन-पोषण का सारा भार मैं लूँगी। मेरी यह कुंज-कुटिया अब तुम्हारी है।
जब मैं राधा-माधव की सेवा करूँगी, तब तुम मेरे पीछे ही रहना।
पान सजाकर, कपूर के साथ लाकर, तुम मुझे अपना ही समझकर दोगी।'
यह बात सुनकर भक्तिविनोद ने सखी के चरणों में प्रणाम किया।