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“हरे कृष्ण” के परिणाम

57 भजन · 127 पद भजन के शब्दों में

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2 पद भजन में 3

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    पखि ना जानि कोन् अपराधे
    मुखे हरे कृष्ण नाम् बोलो ना
  • पद 3भजन
    पखि सकल् नाम् बोल्ते परो
    केनो हरे कृष्ण नाम् बोलो न
    केनो हरे कृष्ण नाम् हरि बोले मनो प्राण् काँदे ना
4 पद भजन में

जीव गोस्वामी · गोपाल-चम्पू

  • पद 1भजन
    रध-रक-शशधर मुरली-कर गोकुल-पति-कुल-पल जय जय कृष्ण हरे
    रध-बध-मोचन मुख-रोचन विदलित-गोकुल-कल जय जय कृष्ण हरे
  • पद 2भजन
    रध-परिकर-पुण्यद नैपुण्यद गोकुल-रुचिषु विशल जय जय कृष्ण हरे
    रध-सुकृत-वशी-कृत मङ्गल-भृत-तिलकित-गोकुल-भल जय जय कृष्ण हरे
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  • पद 3भजन
    रध-निज-गति-धर्मद पुरु-शर्मद हत-गोकुल-रिपु-जल जय जय कृष्ण हरे
    रध-जीवन-जीवन गो-व्रज-धन गोकुल-सरसि-मरल जय जय कृष्ण हरे
  • पद 4भजन
    रध-मोद-रसकर सरसिज-वर गोकुल-मण्डल-नल जय जय कृष्ण हरे
    रध-भुषण भुषण गत-दुषण गोकुल-हृदिल-भु-पल जय जय कृष्ण हरे
1 पद भजन में

गोविन्द दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 5भजन
    एहेन गौराङ्ग-गुण न करिनु श्रबण
    हय हय करि ह हुताश
    हरे-कृष्ण महा-मन्त्र मुख भरि ना ल-इलाम
    जीबन्-मृत गोबिन्द-दास
5 पद भजन में 13

श्रीनिवास आचार्य · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
    धीराधीर-जन-प्रियौ प्रिय-करौ निर्मत्सरौ पूजितौ
    श्री-चैतन्य-कृपा-भरौ भुवि भुवो भारावहन्तारकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
  • पद 2भजन
    नाना-शास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद्-धर्म-संस्थापकौ
    लोकानां हित-कारिणौ त्रि-भुवने मान्यौ शरण्याकरौ
    राधा-कृष्ण-पदारविन्द-भजनानन्देन मत्तालिकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
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  • पद 5भजन
    कूजत्-कोकिल-हंस-सारस-गणाकीर्णे मयूराकुले
    नाना-रत्न-निबद्ध-मूल-विटप-श्री-युक्त-वृन्दावने
    राधा-कृष्णम् अहर्-निशं प्रभजतौ जीवार्थदौ यौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
  • पद 6भजन
    सङ्ख्या-पूर्वक-नाम-गान-नतिभिः कालावसानी-कृतौ
    निद्राहार-विहारकादि-विजितौ चात्यन्त-दीनौ च यौ
    राधा-कृष्ण-गुण-स्मृतेर् मधुरिमानन्देन सम्मोहितौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
  • पद 7भजन
    राधा-कुण्ड-तटे कलिन्द-तनया-तीरे च वंशीवटे
    प्रेमोन्माद-वशाद् अशेष-दशया ग्रस्तौ प्रमत्तौ सदा
    गायन्तौ च कदा हरेर् गुण-वरं भावाभिभूतौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
6 पद भजन में

भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 1भजन
    कृष्ण-नाम धरे कोतो बल्
    विषय-वासनानले, मोर चित्त सदा ज्वले,
    रवि-तप्त मरु-भूमि-सम्
    कर्न-रन्ध्र-पथ दिया, हृदि माझे प्रवेशिया, …
  • पद 4भजन
    कोरि' एतो उपद्रव, चित्ते वर्षे सुधा-द्रव,
    मोरे डारे प्रेमेर सागरे
    किछु ना बुझिते दिलो, मोरे तो’ बातुल कोइलो,
    मोर चित्त-वित्त सब हरे
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  • पद 5भजन
    लोइनु आश्रोय जा’र्, हेनो व्यवहार ता’र्,
    वर्निते ना पारि ए सकल्
    कृष्ण-नाम इच्छा-मोय्, जाहे जाहे सुखी होय्,
    सेइ मोर सुखेर सम्बल्
  • पद 6भजन
    प्रेमेर कलिका नाम्, अद्भुत रसेर धाम्,
    हेनो बल करये प्रकाश्
    ईषत् विकशि’ पुनः, देखाय् निज-रूप-गुन,
    चित्त हरि’ लोय कृष्ण-पाश्
  • पद 7भजन
    पूर्न विकशित होइया, ब्रजे मोरे जाय लोइया,
    देखाय् मोरे स्वरूप-विलास्
    मोरे सिद्ध-देह दिया, कृष्ण-पाशे राखे गिया,
    ए देहेर कोरे सर्व-नाश्
  • पद 8भजन
    कृष्ण-नाम-चिन्तामणि, अखिल रसेर खनि,
    नित्य-मुक्त शुद्ध-रस-मोय्
    नामेर बालाइ जत, सब लो’ये होइ हत,
    तबे मोर सुखेर उदोय्
1 पद भजन में

स्तवामृत-लहरी

  • पद 8भजन
    माथुरं विकुण्ठतो ‘पि जन्म-धाम दुर्लभं
    वासकाननं ततो ऽपि पाणिना धृतो गिरिः
    श्री-हरेस् ततो ऽपि यत् परं सरो ऽति-पावनं
    तत्र कृष्ण-कुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः
12 पद भजन में 9

जयदेव गोस्वामी · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    प्रलय-पयोधि-जले धृतवान् असि वेदं
    विहित-वहित्र-चरित्रम् अखेदम्
    केशव धृत-मीन-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 2भजन
    क्षितिर् इह विपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे
    धरणि-धरण-किण-चक्र-गरिष्ठे
    केशव धृत-कूर्म-शरीर जय जगदीश हरे
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  • पद 3भजन
    वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना
    शशिनि कलङ्क-कलेव निमग्ना
    केशव धृत-शूकर-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 4भजन
    तव कर-कमल-वरे नखम् अद्भुत-शृङ्गं
    दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृङ्गम्
    केशव धृत-नरहरि-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 5भजन
    छलयसि विक्रमणे बलिम् अद्भुत-वामन
    पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन
    केशव धृत-वामन-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 6भजन
    क्षत्रिय-रुधिर-मये जगद्-अपगत-पापम्
    स्नपयसि पयसि शमित-भव-तापम्
    केशव धृत-भृगुपति-रूप जय जगदिश हरे
  • पद 7भजन
    वितरसि दिक्षु रणे दिक्-पति-कमनीयं
    दश-मुख-मौलि-बलिम् रमणीयम्
    केशव धृत-राम-शरीर जय जगदिश हरे
  • पद 8भजन
    वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभं
    हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभम्
    केशव धृत-हलधर-रूप जय जगदिश हरे
  • पद 9भजन
    निन्दासी यज्ञ-विधेर् अहह श्रुति-जातं
    सदय-हृदय दर्शित-पशु-घातम्
    केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 10भजन
    म्लेच्छ-निवह-निधने कलयसि करवालं
    धूमकेतुम् इव किम् अपि करालम्
    केशव धृत-कल्कि-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 11भजन
    श्री-जयेदेव-कवेर् इदम् उदितम् उदारं
    शृणु सुख-दं शुभ-दं भव-सारम्
    केशव धृत-दश-विध-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 12भजन
    वेदान् उद्धरते जगन्ति वहते भू-गोलम् उद्बिभ्रते
    दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्र-क्षयं कुर्वते
    पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यम् आतन्वते
    म्लेच्छान् मूर्छयते दशकृति-कृते कृष्णाय तुभ्यं नमः
1 पद भजन में 13

वासुदेव घोष · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 4भजन
    श्री-राधार् भावे एबे गोरा अवतार्
    हरे कृष्ण नाम् गौर करिल प्रचार्
    ए-बार् प्रचार् जेइ करिल हरे कृष्ण महा-मन्त्र
    प्रचार् जेइ करिल हरे कृष्ण महा-मन्त्र …
12 पद भजन में

जयदेव गोस्वामी

  • पद 1भजन
    प्रलय-पयोधि-जले धृतवान् असि वेदं विहित-वहित्र-चरित्रम् अखेदम्
    केशव धृत-मीन-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 2भजन
    क्षितिर् इह विपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे
    धरणि-धरण-किण-चक्र-गरिष्ठे
    केशव धृत-कूर्म-शरीर जय जगदीश हरे
इस भजन में 10 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना
    शशिनि कलङ्क-कलेव निमग्ना
    केशव धृत-शूकर-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 4भजन
    तव कर-कमल-वरे नखम् अद्भुत-शृङ्गं
    दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृङ्गम्
    केशव धृत-नरहरि-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 5भजन
    छलयसि विक्रमणे बलिम् अद्भुत-वामन
    पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन
    केशव धृत-वामन-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 6भजन
    क्षत्रिय-रुधिर-मये जगद्-अपगत-पापं
    स्नपयसि पयसि शमित-भव-तापम्
    केशव धृत-भृगुपति-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 7भजन
    वितरसि दिक्षु रणे दिक्-पति-कमनीयं
    दश-मुख-मौलि-बलिं रमणीयम्
    केशव धृत-राम-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 8भजन
    वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभं
    हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभम्
    केशव धृत-हलधर-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 9भजन
    निन्दसि यज्ञ-विधेर् अहह श्रुति-जातं
    सदय-हृदय दर्शित-पशु-घातम्
    केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 10भजन
    म्लेच्छ-निवह-निधने कलयसि करवालं
    धूमकेतुम् इव किम् अपि करालम्
    केशव धृत-कल्कि-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 11भजन
    श्री-जयदेव-कवेर् इदम् उदितम् उदारं
    शृणु सुख-दं शुभ-दं भव-सारम्
    केशव धृत-दश-विध-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 12भजन
    वेदान् उद्धरते जगन्ति वहते भू-गोलम् उद्बिभ्रते
    दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्र-क्षयं कुर्वते
    पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यम् आतन्वते
    म्लेच्छान् मूर्छयते दशाकृति-कृते कृष्णाय तुभ्यं नमः