- पद 1भजनयुगल चरणे प्रीति, परम आनन्द ताथि,
रति प्रेम-मय परबन्धे
कृष्ण नाम राधा-नाम, उपाय कोरो रस धाम,
चरणे पोड़िया परानन्दे - पद 7भजनकृष्ण-मुख-द्विज-राजे सरल-बंशी-बिराजे
जार ध्वनि भुबन माताय
श्रबणे पथ दिया हृदये प्रबेश हञा
प्राण आदि आकर्षि आनाय - पद 1अर्थयुगल चरणों में प्रीति ही परम आनंद है। परम बंधु के प्रति प्रेममय अनुराग हो। कृष्ण-नाम और राधा-नाम को रस-धाम पाने का साधन बनाओ, और परम आनंद से उनके चरणों में गिर जाओ।
- पद 7अर्थकृष्ण के चंद्र-समान मुख पर सीधी-सादी बाँसुरी सुशोभित है, जिसकी ध्वनि सारे विश्व को उन्मत्त कर देती है। कानों के मार्ग से प्रवेश कर वह हृदय में उतर जाती है, और प्राणों तक को खींच ले जाती है।
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- पद 12भजनकृष्ण प्रभु एक-बार करिबेन अङ्गीकार
जेन मन ए सत्य बचन
धन्य लीला बृन्दाबन राधा-कृष्ण-श्री-चरण
धन्य सखी मञ्जीरिर गान - पद 17भजनअन्येर परश येनो, नहे कदाचित हेनो,
इहाते होइबो साबधान
राधा-कृष्ण नाम गान, एइ से परम ध्यान,
आर ना कोरिहो परमाण - पद 20भजनराधा कृष्ण सेवन, एकान्त कोरिया मन,
चरण कमल बोलि याओ
दोँहार नाम गुण शुनि, भक्त मुखे पुनि पुनि,
परम आनन्द सुख पाउ - पद 12अर्थप्रभु कृष्ण किसी दिन हमें अवश्य स्वीकार करेंगे, हे मन, इसे सत्य वचन जान। धन्य हैं वृन्दावन की लीलाएँ, धन्य हैं राधा-कृष्ण के दिव्य चरण, धन्य है सखियों के नूपुरों की ध्वनि।
- पद 17अर्थमेरा संपर्क कभी अन्य किसी से न हो, इसमें मैं सावधान रहूँगा। राधा-कृष्ण का नाम-कीर्तन ही परम ध्यान है, इसके सिवा और किसी को प्रमाण मत मान।
- पद 20अर्थराधा-कृष्ण की सेवा में मन को एकाग्र करके, उनके चरण-कमलों की चर्चा करते रहो। दोनों के नाम और गुणों को भक्तों के मुख से बार-बार सुनकर मुझे परम आनंद का सुख मिलता है।