“निताई” के परिणाम
74 भजन · 0 पद भजन के शब्दों में · 153 पद अर्थ में
2 पद अर्थ में
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- पद 1अर्थभगवान बलराम ही अब महिमामय निताई प्रभु बने हैं, वे निताई प्रभु जो करोड़ों कामदेवों का सारा गर्व हर लेते हैं। वे पालकी में सवार हैं। उनकी छवि जगमगा रही है। अपने विवाह के लिए उन्होंने कितने ही सुंदर वस्त्र पहने हैं! उनके शरीर पर अनेक आभूषण चमकते हैं। उनके नेत्र…
- पद 2अर्थ…वाले) प्रभु का निर्मल यश बार-बार गाते हैं। स्त्री-पुरुष अपने घर छोड़कर दौड़ पड़ते हैं। वे निताई प्रभु के चरणों में प्रणाम करते हैं। अपलक नेत्रों से वे निताई प्रभु को निहारते हैं। अब वे आनंद के अमृत में तैरने लगते हैं।…
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- पद 1अर्थदयामय निताई प्रभु के जय-जय स्वरों से सारा संसार गूंज उठता है। वे अपने ही गुण से सबका भव-भय हर लेते हैं। पतित और भटके हुए जीवों को वे निरन्तर प्रेम का दान देकर उन्मत्त कर देते हैं।
- पद 4अर्थप्रेम में विभोर होकर वे थर-थर काँपते हैं। नरहरि दास कब उस प्रेम को समझ पाएँगे? निताई प्रभु को देखकर संसार के सभी चर और अचर जीव दुःख के भारी बोझ से छूट जाते हैं। अब सब आनन्द में तैरते हैं।
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- पद 4अर्थहा गौर-निताई! तुम दोनों भाई पतितजनों के बन्धु हो। मैं बहुत पतित और पापी हूँ। मुझ पर कृपा करो, मुझे अपनी कृपा के सागर में तैरने दो।
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- पद 1अर्थहाय हाय, गौर-निताई ये दो भाई कब इस पतित जन पर महान कृपा करके अपना दर्शन देंगे?
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- पद 4अर्थअरे! कृष्ण की नकल में नाटकीय वेश और आभूषण धारण करना छोड़कर उनके पवित्र नाम के जप में अनुरक्त हो जाओ। निताई चाँद के सच्चे अनुयायी बनो और सारी बुरी लालसाएँ त्याग दो।
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- पद 1अर्थप्रेमोन्माद में डूबे प्रभु निताई चलते हैं। उनके चरणों के भार से पृथ्वी डोलने लगती है। दिशाएं कंपित हो जाती हैं। उनके मुख से अधूरे शब्द निकलते हैं। उनके पार्षद उनकी महिमा का गान करते हैं।
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- पद 2अर्थप्रभु निताई की महिमा सुनकर मेरे हृदय में अब क्या भाव उठता है? हे भाई, मैं इसे कैसे बताऊं? मैं प्रार्थना करता हूं कि मुझे लाखों-लाखों मुख मिलें। तब मेरा हृदय प्रसन्न होगा। तब मैं प्रभु निताईचंद्र की महिमा गा सकूंगा।
1 पद अर्थ में
- पद 1अर्थहे मेरे भाई, देखो! उनका रूप एक बलशाली मल्ल का रूप है। उनका नाम निताई है। वे अपने भाई-भक्तों को पुकारते हैं। मुझमें उनकी लीलाओं को समझने की शक्ति नहीं है।
1 पद अर्थ में
- पद 1अर्थहे मेरे भाइयो, मेरे प्रभु निताई दया की चरम सीमा हैं। पतित जीवों पर करुणा करके वे जगह-जगह घूमते रहे, और सदा लोगों से विनती करते रहे कि वे प्रेम का महान् धन स्वीकार करें।
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- पद 4अर्थवे आगम और निगम की पहुँच से भी परे हैं। वे वेदों के विधि-विधानों की दृष्टि से भी परे हैं। वे पतित जीवों को महान् दान देते हैं। आत्माराम दास कहते हैं, मैं पत्थर के समान कठोर हूँ। केवल मुझे ही निताई की कृपा का एक अंश भी नहीं मिला।
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- पद 2अर्थप्रेमभाव से अभिभूत होकर भगवान गौर का पग डगमगा जाता है। उनका सुवर्ण शरीर भूमि पर गिर जाता है। उनके पीछे भगवान निताईचन्द्र मुड़कर नृत्य करते हैं।
1 पद अर्थ में
- पद 1अर्थअद्वैत आचार्य, निताई प्रभु, गदाधर, श्रीवास तथा अन्य अनेक सहचरों से घिरे हुए शची के पुत्र आनंदपूर्वक नृत्य करते हैं।
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- पद 3अर्थ…पर लोटते हुए वे भगवान् गौर के चरणों में गिर पड़ते हैं।' कोई और कहता है, 'देखो! भगवान् निताईचन्द्र को देखकर उन्हें कितनी व्यथा होती है! वे उनके चरण छूते हैं। वे अपने आँसुओं से उनके चरणों को नहला देते हैं।'…
1 पद अर्थ में
- पद 4अर्थचैतन्य महाप्रभु और निताई की कृपा के एक कण से ही, उत्तम से लेकर अधम तक, सभी को अब प्रेम के महान धन का अधिकार मिल गया है। प्रभु को इस प्रकार सभी शत्रुओं पर विजयी होते देखकर भी कृष्ण दास अब भी दुःखी हैं। हाय! कृष्ण दास को प्रेम का वह धन नहीं मिल सका।
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- पद 4अर्थनिताई प्रभु दया के ठाकुर हैं। दुखों से पीड़ित लोगों को देखकर वे उनके लिए हरिनाम की माला गूँथते हैं। एक-एक व्यक्ति को वे वह माला प्रदान करते हैं।
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- पद 5अर्थपतित जीवों को वे सावधानी से चैतन्य-प्रेम का रत्न प्रदान करते हैं। इस प्रकार वे प्रभु को अत्यंत प्रसन्न करते हैं। वृन्दावन दास कहते हैं, अपने ही पूर्वकर्मों के दोष से मैं अब तक निताई के चरण-युगल की भक्ति नहीं कर पाया।