विषय विमूढ आर् मायावादी जन्
विषय में मोहित मनुष्य और मायावादी, दोनों ही भक्ति से रहित होकर व्यर्थ अपना जीवन बिताते हैं।
हे नाथ! आपके चरणों में मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि इन दोनों प्रकार के अपराधियों की संगति मुझे कभी न मिले।
इन दोनों में विषयी लोग फिर भी कुछ ठीक हैं। मायावादियों की संगति मैं कभी नहीं चाहता।
जब विषयी मनुष्यों का हृदय साधुओं की संगति पाता है, तो उन भक्तों की कृपा से वे सहज ही भक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
परन्तु जिस किसी के हृदय में मायावाद का दोष प्रवेश कर जाता है, कुतर्क के प्रभाव से उसका हृदय वज्र के समान कठोर हो जाता है।
मायावादी कहते हैं कि भगवान, उनके भक्त और भक्ति, ये सब अनित्य हैं, और इसलिए मिथ्या हैं।
उनकी कृष्ण-सेवा, श्रवण और कीर्तन के दिखावे पर धिक्कार है! उनकी स्तुतियाँ कृष्ण के दिव्य शरीर पर वज्र बनकर गिरती हैं।
भक्ति के लिए मायावाद जैसा प्रतिकूल और कुछ नहीं है। इसलिए मैं मायावादियों की संगति कभी नहीं चाहता।
मायावाद को दूर रखते हुए भक्तिविनोद वैष्णवों की संगति में रहता है और नाम की शरण लेता है।