`अहं मम’ शब्द अर्थे जाहा किछु होय्
हे दयामय प्रभु! 'मैं' और 'मेरा' इन शब्दों का जो भी अर्थ होता है, वह सब मैंने आपके चरणों में समर्पित कर दिया है।
हे नाथ! अब मैं 'अपना' नहीं रहा। अब मैं पूर्णतः आपका ही हो गया हूँ।
मैंने समझ लिया है कि 'मैं' शब्द का अर्थ है वह जीव जो इस शरीर में स्थित रहकर उसे चेतना देता है, इसलिए मैंने मिथ्या अहंकार को त्याग दिया है। आज मेरे हृदय में 'आपका अपना' होने का अभिमान प्रवेश कर गया है।
मेरी सारी संपत्ति यही है: यह शरीर, घर, सेवक, भाई, मित्र और सम्बन्धी, पत्नी, संतान, धन-सामान, द्वार और भवन।
वह सब कुछ अब आपका हो गया है, और मैं आपका सेवक बन गया हूँ। अब मैं आपके ही घर में निवास करता हूँ।
इस घर के स्वामी आप हैं, और मैं आपका सेवक हूँ। अब मेरे सारे प्रयास केवल आपकी प्रसन्नता के लिए हैं।
मेरे स्थूल और सूक्ष्म शरीर से जो भी पुण्य या पाप कर्म होते हैं, वे अब मेरे नहीं रहे, हे प्रभु! मैं तो मुक्त हूँ।
मेरी इच्छा आपकी इच्छा में मिल गई है। आज भक्तिविनोद स्वयं को भूल गया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- 8