प्रानेश्वर्! कोहोबुँ कि सरम कि बात्
हे प्राणेश्वर! मैं अपनी लज्जा की क्या बात कहूँ? हे नाथ! ऐसा कोई पाप नहीं जो मैंने हजारों-हजारों बार न किया हो।
उन पापकर्मों के फल इस संसार में मुझ पर टूट पड़ते हैं। अब मैं किसे दोष दूँ? पहले मैंने परिणामों की चिंता नहीं की, पर अब मैं उनसे मुक्त होना चाहता हूँ।
मेरे पापों को तोलकर आप मुझे दंड देंगे, और मैं संसार का यह भोग सहूँगा। परन्तु जन्म-मृत्यु के इस चक्र में आते-जाते हुए भी, आपके भक्तों की संगति में मेरा चित्त आपके चरणों में ही लगा रहे।
अपनी बुद्धि मैंने आपके चरणों में सौंप दी है, और मेरे हृदय का अभिमान दूर हो गया है। आप दीनों पर दया करने वाले हैं, और आपकी निर्मल कृपा ही भक्तिविनोद की आशा बन गई है।
इस भजन के बारे में
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- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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