भ्रातुर् अन्तकस्य पत्तने
भ्रातुर् अन्तकस्य पत्तने ’भिपत्ति-हारिणी
श्रीमान जय शचीनन्दन प्रभु (01) की 70 रिकॉर्डिंग। ऑडियो इस्कॉन डिज़ायर ट्री के सौजन्य से चलता है।
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भ्रातुर् अन्तकस्य पत्तने ’भिपत्ति-हारिणी
मधुरं मधुरेभ्यो 'पि
मानस, देहो, गेहो, जो किछु मोर्
यदि गौर ना होइतो, तबे कि होइतो,
यशोमती-नन्दन, ब्रज-बरो-नागर,
राधा-कुन्ड-तट-कुञ्ज-कुटीर्
राधे जय जय माधव-दयिते
विद्यार विलासे, काटाइनु काल,
विभावरी शेष, आलोक-प्रवेश,
वृन्दावन रम्य-स्थान दिव्य-चिँतामणि-धाम
वृन्दावन-वासी जत वैष्णवेर गण
व्रजे प्रसिद्धं नवनीत-चौरं
भाइ-रे!
शुद्ध-भकत-चरण-रेणु,
श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु दोया कोरो मोरे
श्री-गुरु-चरण-पद्म, केवल-भकति-सद्म,
श्री-रूप-मञ्जरी-पद, सेइ मोर सम्पद,
सर्वस्व तोमार्, चरणे संपिया,
संसार-दावानल-लीढ-लोक
हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः
हरि हरि! बिफले जनम गोँआइनु
हे गोविन्द हे गोपाल