'गौराङ्ग' बोलिते हबे
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
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70 भजन · पृष्ठ 1 / 2
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
अक्रोध परमानन्द नित्यानन्द राय्
अनादि' करम-फले, पडि' भवार्णर जले,
आमार जीवन, सदा पापे रत,
(आमि) जमुना-पुलिने, कदम्ब-कानने,
ईश्वरः परमः कृष्णः
उदिलो अरुण पूरब-भागे,
एइ-बारो करुणा कोरो वैष्णव गोसाइ
एखोन बुझिनु प्रभु! तोमार चरण
(प्रभु हे!)
ओहे!
कबे गौर-बने, सुरधुनी-तटे,
कबे ह'बे बोलो से-दिन आमार्
कलि-कुक्कुर्-कदन् जदि चाओ (हे)
कुङ्कुमाक्त-काञ्चनाब्ज-गर्व-हारि-गौरभा
यद् अपि समाधिषु विधिर् अपि पश्यति
कृष्ण होइते चतुर्-मुख, होय् कृष्ण-सेवोन्मुख,
कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
केशव! तुवा जगत विचित्र
गुरुदेव्!
गौरा पहु ना भजिया गोइनु
गौराङ्ग तुमि मोरे दया ना छाडिह
गौराङ्गेर दुटि पद, जार् धन सम्पद,
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं
(किब) जय जय गोराचान्देर् आरतिको शोभा
जय जय जगन्नाथ शचीर नन्दन्
जय राधा गिरि-वर धारि
(जय) राधा-माधव (जय) कुञ्ज-बिहारी
जय राधे, जय कृष्ण, जय वृन्दावन्
गोप्य ऊचुः
जीव् जागो, जीव् जागो, गौरचान्द बोले
जे आनिलो प्रेम-धन कोरुणा प्रचुर्
तुमि सर्वेश्वरेश्वर, ब्रजेन्द्र-कुमार!
दुर्लभ मानब-जन्म लभिया सोंसारे
दोयाल् निताइ चैतन्य बोले नाच रे आमार मन
धन मोर नित्यानन्द पति मोर गौरचन्द्र
नदीया-गोद्रुमे नित्यानन्द महाजन
नमो नमः तुलसी कृष्ण-प्रेयसि नमो नमः
नव गौर-वरं नव-पुष्प-शरं
नारद मुनि, बाजाय् वीणा
निज-पति-भुज-दण्डच्-छत्र-भावं प्रपद्य
निताइ गुण-मणि आमार् निताइ गुण-मणि
निताइ-पद-कमल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल
परम कोरुण, पहू दुइ जन
प्रलय-पयोधि-जले धृतवान् असि वेदं
बोरो सुखेर् खबोर् गाइ
भजहू रे मन श्री-नन्द-नन्दन
भुलिया तोमारे, संसारे आसिया,