तुवा भक्ति अनुकूल जे जे कार्य होय्
आपकी भक्ति के अनुकूल जो भी कार्य हैं, उन्हें मैं बड़ी सावधानी से अवश्य करूँगा।
संसार में जो भी वस्तुएँ भक्ति के अनुकूल हैं, उनमें मैं अपनी इन्द्रियों द्वारा रस लूँगा।
आपकी चर्चा को मैं ध्यान से सुनूँगा। आपके धाम को देखकर मैं अपने नेत्रों को तृप्त करूँगा।
आपके प्रसाद से ही मैं अपने शरीर का पोषण करूँगा। आपको चढ़ाई गई तुलसी की पत्तियों और मंजरियों की सुगंध का आनंद लूँगा।
अपने हाथों से मैं सदा आपकी सेवा करूँगा। जहाँ आप निवास करते हैं, वहीं मैं भी सदा निवास करूँगा।
अपनी सारी इच्छाओं को मैं आपकी सेवा में लगा दूँगा। जो आपके विरोधी हैं, उनके प्रति मैं क्रोध दिखाऊँगा।
इस प्रकार मेरी सारी वृत्तियाँ और भाव आपके अनुकूल बनकर महिमा को प्राप्त हों।
आपके भक्तों के अनुकूल मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसे मैं आपकी भक्ति के अनुकूल ही मानता हूँ।
भक्तिविनोद न धर्म जानता है न अधर्म। उसके सभी कर्म भक्ति के अनुकूल हों।