'गौराङ्ग' बोलिते हबे
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
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65 भजन · पृष्ठ 1 / 2
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
'राधा-कृष्ण' बोल् बोल् बोलो रे सोबाइ
साधन निताइ भजन निताइ निताइ नयन
(आमि) जमुना-पुलिने, कदम्ब-कानने,
मन दुह्खे काँदे एका कमलिनि राइ गो
आसलो कथा बोल्ते कि
आहे नीळ शैल प्रबळ मत्त वारण
ए दुष्ट हृदये काम आदि रिपु छ्हय
एइ-बारो करुणा कोरो वैष्णव गोसाइ
ओहे, प्रेमेर ठाकुर गोरा
कबे कृष्ण-धन पाब हियार माझारे थोब
करारविन्देन पदारविन्दं
कलि-कुक्कुर्-कदन् जदि चाओ (हे)
कलि-युगे श्री-चैतन्य अबनी करिला धन्य
कुङ्कुमाक्त-काञ्चनाब्ज-गर्व-हारि-गौरभा
कृष्ण जिनका नाम है, गोकुल जिनका धाम है
कृष्ण-प्रसादेन समस्त-शैल
के जाबि के जाबि भाइ भव-सिन्धु-पार
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
गुरुदेव्!
गोउराङ्ग सुन्दर, प्रेम जलधर तप्त काञ्चन काय
गोपीनाथ मम निबेदन शुनो
गौरा पहु ना भजिया गोइनु
गौराङ्गेर दुटि पद, जार् धन सम्पद,
जय जगन्नाथ, जय जगन्नाथ, जय जगन्नाथ, जय जगन्नाथ
(जय) राधा-माधव (जय) कुञ्ज-बिहारी
जय राधा-माधव राधा-माधव राधे
जे आनिलो प्रेम-धन कोरुणा प्रचुर्
सतां निन्दा नाम्नः परमम् अपराधं वितनुते
दिशि दिशि रचयन्तीं सञ्चरन्-नेत्र-लक्ष्मी
नदीया-गोद्रुमे नित्यानन्द महाजन
नमस् ते नरसिंहाय
नमामीश्वरं सच्-चिद्-आनन्द-रूपं
नमो नमः तुलसि महाराणी,
नमो नमस् ते त्रिदशेश्वराय
नारद मुनि, बाजाय् वीणा
ओम् हरिर् विदध्यान् मम सर्व-रक्षां
निताइ कि नाम एनेछे रे
निताइ-पद-कमल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल
निताइ मोर जीबन धन निताइ मोर जाति
नृसिंह-कवचं वक्ष्ये
पान्त्वस्मान् पुरुहूतवैरि-बलवन्-मातङ्ग माद्यद्घटा
मध्वमानसपद्मभानुसमं स्मरप्रतिमं स्मर
बन्धु-सङ्गे यदि तव रङ्ग परिहास, थाके अभिलाष (थाके अभिलाष)
ब्रह्म बोले चतुर् मुख कृष्ण कृष्ण हरे हरे
भज भकत-वत्सल श्री-गौरहरि
भज रे भज रे आमार मन अति मन्द
मन रे! कह ना गौर कथा