श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने से बहुत पहले, श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) पर कृष्ण के नामों का जप करने के लिए मुकदमा चलाया गया। उनका जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था, इसलिए उनके ज़िले के काज़ी ने शासक से उनकी शिकायत की। जब उन्होंने पवित्र नाम छोड़ने से इनकार किया, तो उन्हें दण्ड सुनाया गया कि बाईस बाज़ारों में उन्हें तब तक बेंतों से पीटा जाए, जब तक उनके प्राण न निकल जाएँ। लेकिन वे बच गए। उन्होंने उन्हीं लोगों के लिए प्रार्थना की, जो उन्हें पीट रहे थे, और अन्त में उनके न्यायाधीशों ने भी उन्हें प्रणाम किया। वृन्दावन दास ठाकुर चैतन्य-भागवत के आदि-खण्ड के सोलहवें अध्याय में यह पूरी कथा बताते हैं, और कृष्णदास कविराज गोस्वामी ये लीलाएँ उन्हीं के वर्णन पर छोड़ देते हैं (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.47)। श्रील प्रभुपाद हर पाठक को उसी अध्याय की ओर भेजते हैं: "चैतन्य-भागवत के आदि-खण्ड के सोलहवें अध्याय में एक मुस्लिम न्यायाधीश द्वारा उन्हें दिए गए दण्ड का जो वर्णन है, उससे हम समझ सकते हैं कि हरिदास ठाकुर कितने विनम्र और दीन थे, और उन्होंने भगवान की अहैतुकी कृपा कैसे प्राप्त की" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43 का तात्पर्य)।
काज़ी ने शिकायत क्यों की #
फुलिया में हरिदास प्रतिदिन गंगा में स्नान करते थे। फिर वे ऊँचे स्वर में हरि के नाम पुकारते हुए घूमते रहते थे (चैतन्य-भागवत आदि 16.35)। वहाँ का काज़ी, यानी मुस्लिम न्यायाधीश, यह सहन नहीं कर सका कि उसके अपने समुदाय का एक व्यक्ति दूसरे धर्म की रीति पर चल रहा है। उसे यह डर भी था कि दूसरे लोग भी हरिदास के पीछे चल पड़ेंगे। इसलिए वह ज़िले के शासक के पास गया और माँग की कि हरिदास पर मुकदमा चलाया जाए। शासक ने उन्हें तुरन्त बुलवा लिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.36-38)। श्रील प्रभुपाद एक ही पंक्ति में पूरा आरोप बता देते हैं: "हरिदास ठाकुर, जो जन्म से मुसलमान थे, एक बहुत महान भक्त थे और सदा हरे कृष्ण का जप करते रहते थे। बस यही उनका एकमात्र दोष था।" (भगवान कपिल की शिक्षाएँ 11)
कृष्ण की कृपा से हरिदास को शासकों का, यहाँ तक कि मृत्यु का भी, कोई डर नहीं था। वे "कृष्ण, कृष्ण" कहते हुए तुरन्त चल पड़े। वहाँ के भले लोग उनका साहस देखकर प्रसन्न हुए, लेकिन उन्हें उनके प्राणों की चिन्ता भी होने लगी (चैतन्य-भागवत आदि 16.39-41)। किसने क्या किया, इस बारे में वृत्तान्तों में थोड़ा अन्तर है। चैतन्य-भागवत शासक को बंगाल का राजा कहता है (चैतन्य-भागवत आदि 16.36, भूमिपति दास के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)। श्रील प्रभुपाद यह कथा संक्षेप में सुनाते हैं, और पूछताछ और दण्ड, दोनों काज़ी के नाम करते हैं। चैतन्य-भागवत में शासक हरिदास से प्रश्न करता है, और काज़ी दण्ड का सुझाव देता है।
बन्दियों के लिए एक आशीर्वाद #
शासक के सामने ले जाने से पहले हरिदास को शासक के कारागार के बन्दियों के बीच लाया गया। उनमें से कुछ अच्छे परिवारों के लोग थे। जब उन्होंने सुना कि हरिदास आए हैं, तो वे प्रसन्न हुए। उन्हें आशा थी कि ऐसे महान वैष्णव के दर्शन से उनका कष्ट दूर हो जाएगा। उन्होंने पहरेदारों को मनाकर उनसे मिलने की अनुमति ली, और उनके चरणों में प्रणाम किया (चैतन्य-भागवत आदि 16.42-48)। हरिदास ने प्रेम से मुस्कुराकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे जैसे हैं, वैसे ही बने रहें। यह सुनकर बन्दी बहुत दुखी हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि हरिदास चाहते हैं कि वे बेड़ियों में ही पड़े रहें। तब हरिदास ने समझाया कि उनका अर्थ क्या था (चैतन्य-भागवत आदि 16.49-64)। श्रील प्रभुपाद एक शिष्य को लिखे पत्र में कथा का यह भाग बताते हैं:
"हरिदास ठाकुर को कारागार ले जाया गया, और उन्होंने वहाँ के बन्दियों से कहा, अरे, तुम कितने भाग्यशाली हो कि तुम्हें बाहरी संसार की माया के विघ्नों के बिना बैठकर पवित्र नामों का जप करने का यह अवसर मिला है! इसलिए तुम्हें भी ऐसा ही सोचना चाहिए, और कारागार में अपने समय का आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिए।" (श्रील प्रभुपाद, उपेन्द्र को पत्र, 5 फ़रवरी 1968)
उन्होंने बन्दियों को बताया कि कारागार में, व्यापार और परिवार से दूर, उनका मन कृष्ण की ओर मुड़ गया है। लेकिन बाहर जाते ही पुरानी आसक्तियाँ उन्हें जल्दी ही फिर से खींच लेंगी। उन्होंने यह वचन भी दिया कि दो-तीन दिनों में वे छूट जाएँगे (चैतन्य-भागवत आदि 16.55-67)। अपने ही मुकदमे के लिए जाते हुए भी हरिदास दूसरों के भले के बारे में सोच रहे थे। एक प्रातः-भ्रमण में श्रील प्रभुपाद ने इस आशीर्वाद से एक और शिक्षा निकाली। बन्दियों ने एक वैष्णव को प्रणाम किया था, और "'इसी अवस्था में रहो' का अर्थ है वैष्णव को सम्मान देने का तुम्हारा यह भाव। यही आशय था ... यह नहीं कि 'तुम कारागार में ही रहो'" (श्रील प्रभुपाद, प्रातः-भ्रमण, लॉस एंजेलिस, 10 जून 1976)।
शासक के सामने: "ईश्वर एक है" #
शासक ने हरिदास के मुख पर उज्ज्वल तेज देखा। इसलिए उसने उन्हें बैठने के लिए आसन दिया और लगभग कोमलता से उनसे प्रश्न किया। उसने कहा कि बड़े सौभाग्य से हरिदास का जन्म मुसलमान के रूप में हुआ है। फिर वे दूसरे धर्म की रीतियाँ अपनाकर अपने को नीचा क्यों कर रहे हैं? यदि वे कलिमा पढ़ लें, तो अनजाने में किया गया उनका हर दोष मिट जाएगा (चैतन्य-भागवत आदि 16.69-74)। माया की शक्ति देखकर हरिदास धीरे से हँसे, और फिर बहुत मधुरता से उत्तर दिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.75-76)। उन्होंने शासक से कहा कि सबके परमेश्वर एक ही हैं, उनके समान दूसरा कोई नहीं, और लोग बस उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारते हैं (चैतन्य-भागवत आदि 16.76-77)। फिर उन्होंने कहा: "वे शुद्ध, नित्य, अद्वय और अक्षय भगवान सबके हृदय में विराजमान हैं। वही भगवान हर किसी को किसी विशेष ढंग से कर्म करने की प्रेरणा देते हैं, और सारा संसार उसी के अनुसार कर्म करता है।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.78-79, भूमिपति दास के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)
हरिदास ने समझाया कि अन्तर केवल उन नामों में है, जिनसे लोग उसे पुकारते हैं: "वही ईश्वर हर एक जीव के हृदय में बैठा है, और वह हर जीव को अलग-अलग ढंग से अपनी सेवा में लगाता है। वह जिसे जैसी पूजा करने में लगाता है, वह वैसी ही पूजा करता है।" उन्होंने बताया कि ब्राह्मण के रूप में जन्मे कुछ लोग इस्लाम अपना लेते हैं। उसी प्रकार उनका जन्म तो मुसलमान के रूप में हुआ, लेकिन भगवान ने उन्हें कृष्ण के नामों के जप में लगा दिया है। अन्त में उन्होंने बिना किसी विद्रोह के, नम्रता से कहा: "ऐसी बातों में जीव स्वतंत्र नहीं होता। यदि यह दोष है, तो कृपया मुझे दण्ड दीजिए।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.76-85)
हृदय में बैठे भगवान के बारे में उनके वचन वही हैं, जो भगवद्गीता में स्वयं कृष्ण सिखाते हैं:
ईश्वरः सर्वभूतानां
हृद्देशे ऽर्जुन तिष्ठति
भ्रामयन्सर्वभूतानि
यन्त्रारूढानि मायया
"हे अर्जुन, परमेश्वर सबके हृदय में स्थित हैं, और भौतिक शक्ति से बने यन्त्र पर मानो बैठे हुए सभी जीवों के भ्रमण का निर्देशन कर रहे हैं।" (भगवद्गीता 18.61)
"मैं पवित्र नाम कभी नहीं छोड़ूँगा" #
वहाँ उपस्थित मुसलमान इस उत्तर से सन्तुष्ट हो गए, लेकिन काज़ी सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने शासक पर दबाव डाला कि दूसरों को चेतावनी देने के लिए हरिदास को दण्ड दिया जाए, या कम से कम उनसे ज़बरदस्ती कलिमा पढ़वाया जाए। उसने कहा कि नहीं तो हरिदास दूसरों को भी भटका देंगे (चैतन्य-भागवत आदि 16.86-89)। तब हरिदास से कहा गया कि वे केवल अपने धर्म के नाम लें, नहीं तो भयंकर दण्ड भुगतें। उनका उत्तर तब से भक्तों को बहुत प्रिय रहा है:
खण्ड खण्ड है देह याय यदि प्राण
तबु आमि वदने ना छाडि हरि-नाम
"चाहे मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँ और मेरे प्राण भी चले जाएँ, फिर भी मैं भगवान के पवित्र नाम का जप कभी नहीं छोड़ूँगा।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.94; कुछ दूसरे संस्करणों में यह श्लोक 16.91 है, भूमिपति दास के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)
कृष्णदास कविराज गोस्वामी प्रभु के पार्षदों की सूची में इस पूरे मुकदमे के लिए बस एक पंक्ति लिखते हैं, और वह पंक्ति हरिदास के मन की स्थिति दिखाती है:
प्रह्लाद-समान ताँर गुणेर तरङ्ग
यवन-ताडनेओ याँर नाहिक भ्रू-भङ्ग
"उनके सद्गुणों की लहरें प्रह्लाद महाराज के गुणों जैसी थीं। जब मुसलमान शासक ने उन्हें सताया, तब उन्होंने ज़रा-सी भौंह भी नहीं चढ़ाई।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 10.45)
बाईस बाज़ारों का दण्ड #
शासक ने काज़ी की ओर मुड़कर पूछा कि अब क्या किया जाए। काज़ी का उत्तर वास्तव में मृत्यु-दण्ड था, भले ही उसने उसे परीक्षा कहा। उसने कहा कि हरिदास को बाईस बाज़ारों में पीटा जाए। यदि उसके बाद भी वे जीवित रहे, तो यह प्रमाणित हो जाएगा कि वे सच बोल रहे थे (चैतन्य-भागवत आदि 16.95-97)। काज़ी ने पहरेदारों से कहा कि उसे तब तक पीटो, जब तक वह मर न जाए, और शासक ने आदेश दे दिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.98-100)।
श्रील प्रभुपाद समझाते हैं कि इस दण्ड का अर्थ क्या था: "काज़ी बहुत क्रोधित हुआ और उसने आदेश दिया कि हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में कोड़े लगाए जाएँ। इसका वास्तविक अर्थ यह था कि उन्हें पीट-पीटकर मार डाला जाए, लेकिन क्योंकि वे इतने महान भक्त थे, इसलिए उन्हें वास्तव में पीड़ा अनुभव नहीं हुई।" (भगवान कपिल की शिक्षाएँ 11) 1976 में वृन्दावन के एक प्रवचन में यह कथा सुनाते हुए उन्होंने सीधे शब्दों में कहा: "तो हरिदास ठाकुर को खुले बाज़ार में पीटा गया। सोच यह थी कि पिटते-पिटते वे मर जाएँगे। लेकिन वे नहीं मरे।" उसी प्रवचन में उन्होंने बात करते-करते "इक्कीस बाज़ार" कहा था (श्रील प्रभुपाद, श्रीमद्भागवतम् 5.5.32 पर प्रवचन, वृन्दावन, 19 नवम्बर 1976)। चैतन्य-भागवत और उनके ग्रन्थ यह संख्या बाईस बताते हैं।
बाज़ार-बाज़ार में पिटाई #
पहरेदार हरिदास को एक बाज़ार से दूसरे बाज़ार तक घसीटते ले गए और पूरी ताकत से उन्हें पीटते रहे। लेकिन हरिदास बस कृष्ण का नाम स्मरण करते रहे। नाम के आनन्द के कारण उन्हें मार का पता ही नहीं चला, ठीक वैसे ही जैसे दैत्यों के पीटने पर प्रह्लाद महाराज को कोई पीड़ा नहीं हुई थी (चैतन्य-भागवत आदि 16.101-110)। यह देखकर भले लोग काँप उठे। कुछ लोग चिल्लाने लगे कि एक सन्त के साथ ऐसा व्यवहार करने से पूरा राज्य नष्ट हो जाएगा। कुछ लोग शासक और काज़ी को शाप देने लगे, और कुछ लड़ने को तैयार हो गए। दूसरे लोग पहरेदारों के पैरों पर गिर पड़े और धीरे मारने के लिए उन्हें धन देने लगे, लेकिन पहरेदारों ने कोई दया नहीं दिखाई (चैतन्य-भागवत आदि 16.103-107)।
श्रील प्रभुपाद ने हरिदास की इस शान्ति में शुद्ध भक्त का लक्षण देखा। शुद्ध भक्त इस संसार के उतार-चढ़ाव से विचलित नहीं होता:
देहिनां देहसंयोगाद्
द्वन्द्वानीश्वरलीलया
सुखं दुःखं मृतिर्जन्म
शापो ऽनुग्रह एव च
"परमेश्वर की बाहरी शक्ति के कार्यों के कारण जीव भौतिक शरीरों के सम्पर्क में आकर बद्ध हो जाते हैं। सुख और दुख, जन्म और मृत्यु, शाप और वरदान जैसे द्वन्द्व भौतिक संसार में इसी सम्पर्क के स्वाभाविक परिणाम हैं।" (श्रीमद्भागवतम् 6.17.29)
तात्पर्य में वे लिखते हैं: "उदाहरण के लिए, हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में बेंत से पीटा गया, लेकिन वे कभी विचलित नहीं हुए। इसके बजाय, उन्होंने मुस्कुराते हुए वह पिटाई सह ली।"
पीटने वालों के लिए प्रार्थना #
हरिदास को अपनी पीड़ा का दुख नहीं था। उन्हें दुख उन लोगों के भविष्य का था, जो उन्हें पीट रहे थे। जब बेंत उन पर पड़ रहा था, तब भी वे उनके लिए प्रार्थना करते रहे (चैतन्य-भागवत आदि 16.110; कुछ संस्करणों में 16.113)। श्रील प्रभुपाद समझाते हैं कि शुद्ध भक्त ऐसी प्रार्थना क्यों करता है:
"इसी एक कारण से शुद्ध भक्त कभी अपमान का बुरा नहीं मानते। ... मुसलमान काज़ी के सिपाहियों ने हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में बुरी तरह कोड़े मारे। फिर भी उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि उन्हें सताने वालों को दण्ड न दिया जाए। ... शुद्ध भक्तों की करुणा ऐसी ही गहरी होती है।" (श्रील प्रभुपाद, रिनन्सिएशन थ्रू विज़डम 2.3)
वर्षों बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने पवित्र नाम का जप करने वाले हर व्यक्ति से यही सहनशीलता माँगी:
तृणादपि सुनीचेन
तरोरिव सहिष्णुना
अमानिना मानदेन
कीर्तनीयः सदा हरिः
"जो स्वयं को घास से भी नीचा समझता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहनशील है, और जो अपने लिए सम्मान की आशा नहीं रखता, फिर भी दूसरों को पूरा सम्मान देने के लिए सदा तैयार रहता है, वह बहुत सरलता से सदा भगवान के पवित्र नाम का जप कर सकता है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 17.31)
श्रील प्रभुपाद इस सहनशीलता के सबसे अच्छे उदाहरण के रूप में हरिदास का नाम लेते हैं: "हरिदास ठाकुर अपनी सहनशीलता के लिए असाधारण हैं, क्योंकि बाईस बाज़ारों में बेंतों से पीटे जाने पर भी वे सहनशील बने रहे।" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.84 का तात्पर्य)
गंगा में बहा दिए गए #
बाईस बाज़ारों के बाद भी हरिदास जीवित थे, और मुस्कुरा भी रहे थे। उन्हें पीटने वाले सोचने लगे कि कहीं वे पीर, यानी कोई मुस्लिम सन्त, तो नहीं हैं (चैतन्य-भागवत आदि 16.114-118)। उन्हें अपने लिए भी डर लगने लगा, क्योंकि यदि हरिदास जीवित रहते, तो काज़ी उन्हें अवश्य मरवा देता (चैतन्य-भागवत आदि 16.119-120)। श्रील प्रभुपाद ने एक बार यह दृश्य इस प्रकार बताया: "तो वे उनकी खुशामद करने लगे, 'महाशय, जब तक आप नहीं मरेंगे, हम मारे जाएँगे। हमारे प्राण बड़े संकट में हैं।' तो हरिदास ठाकुर ने मृत्यु का दिखावा किया, और उन्हें काज़ी के सामने लाया गया" (श्रीमद्भागवतम् पर प्रवचन, 19 नवम्बर 1976)। उन पर दया करके हरिदास कृष्ण के गहरे ध्यान में चले गए, और उनकी साँस रुक गई (चैतन्य-भागवत आदि 16.121-123)।
वे लोग उनके निश्चल शरीर को शासक के पास ले गए। शासक ने उसे दफ़नाने का आदेश दिया। लेकिन काज़ी ने आपत्ति की। उसने कहा कि दफ़नाने से ऐसे व्यक्ति को मृत्यु के बाद अच्छी गति मिल जाएगी, इसलिए शरीर को गंगा में फेंक दिया जाए (चैतन्य-भागवत आदि 16.124-128)। चैतन्य-भागवत आगे बताता है कि कुछ समय तक सबसे बलवान पहरेदार भी उन्हें हिला नहीं सके, क्योंकि स्वयं भगवान उनके शरीर में प्रवेश कर गए थे (चैतन्य-भागवत आदि 16.129-132)। नदी में हरिदास बहते रहे। वे कृष्ण में इतने लीन थे कि उन्हें पता ही नहीं था कि वे आकाश में हैं, धरती पर हैं या जल में। कुछ समय बाद उन्हें फिर से बाहरी होश आया। वे किनारे पर चढ़ आए और ऊँचे स्वर में कृष्ण के नाम लेते हुए फुलिया की ओर चल पड़े (चैतन्य-भागवत आदि 16.133-145)। वृन्दावन दास उनकी तुलना हनुमान से करते हैं, जिन्होंने ब्रह्मा के सम्मान में स्वयं को ब्रह्मास्त्र से बँध जाने दिया था। उसी प्रकार, जिनके रक्षक स्वयं गोविन्द हों, उन हरिदास को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता था। उन्होंने यह मार केवल संसार को शिक्षा देने के लिए स्वीकार की (चैतन्य-भागवत आदि 16.137-140)।
शासक ने क्षमा माँगी #
जब मुसलमानों ने उनकी शक्ति देखी, तो वे अपनी घृणा भूल गए। उन्होंने हरिदास को पीर मानकर प्रणाम किया और अपने पापों से मुक्त हो गए (चैतन्य-भागवत आदि 16.146-147)। शासक स्वयं हाथ जोड़कर उनके पास आया। उसने कहा कि अब वह जान गया है कि हरिदास एक सच्चे सन्त हैं, जो इस ज्ञान में स्थिर हैं कि ईश्वर एक है। उसने हरिदास से अपने सब अपराधों के लिए क्षमा माँगी। उसने यह भी कहा कि वे जहाँ चाहें जाने के लिए स्वतंत्र हैं, चाहे गंगा-तट की किसी गुफा में रहें या कहीं और (चैतन्य-भागवत आदि 16.148-155)। जिस व्यक्ति ने उनकी मृत्यु का आदेश दिया था, अब वही उनके चरण पकड़े हुए था (चैतन्य-भागवत आदि 16.157)। शासक के अन्तिम शब्द थे: "अब आप जहाँ चाहें रहें, और जो चाहें करें।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.155, भूमिपति दास के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर) जिस काज़ी ने उनकी मृत्यु माँगी थी, उसका भी सिर झुक गया। वह भी दूसरों के साथ हरिदास के पास आया और अपने अपराधों के लिए क्षमा माँगी, और हरिदास ने सबको क्षमा कर दिया।
बस एक छोटा-सा दण्ड #
पिटाई का समाचार सुनकर फुलिया के ब्राह्मणों का हृदय टूट गया था। जब हरिदास जप करते हुए उनके बीच लौटे, तो वे आनन्द से भर उठे। उन्होंने हरिदास के चारों ओर हरि-नाम का कीर्तन किया, और हरिदास प्रेम में नाचने लगे (चैतन्य-भागवत आदि 16.159-164)। फिर हरिदास ने उनसे कहा कि वे उनके लिए दुखी न हों। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने कानों से भगवान की बहुत निन्दा सुनी थी, और विष्णु की निन्दा सुनना बड़ा पाप है। भगवान ने बस एक छोटे-से दण्ड से वह बड़ा अपराध मिटा दिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.165-169)। जहाँ बाकी सबको क्रूरता दिखी, वहाँ हरिदास को केवल भगवान की दया दिखी। वृन्दावन दास आगे बताते हैं कि जिन लोगों ने उन्हें पीटा था, वे कुछ ही दिनों में अपने परिवारों सहित नष्ट हो गए (चैतन्य-भागवत आदि 16.171)।
श्रील प्रभुपाद कष्ट को देखने का यही ढंग तब सिखाते हैं, जब वे डरे हुए देवताओं से कहे गए ब्रह्मा के वचनों को समझाते हैं:
विश्वस्य यः स्थितिलयोद्भवहेतुराद्यो
योगेश्वरैरपि दुरत्यययोगमायः
क्षेमं विधास्यति स नो भगवांस्त्र्यधीशस्
तत्रास्मदीयविमृशेन कियानिहार्थः
"मेरे प्रिय पुत्रो, भगवान प्रकृति के तीनों गुणों के नियन्ता हैं, और वे ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालन और संहार के कारण हैं। उनकी अद्भुत सृजन-शक्ति, योगमाया, को योग के आचार्य भी आसानी से नहीं समझ सकते। वही सबसे प्राचीन पुरुष, भगवान, अकेले हमारी रक्षा करेंगे। इस विषय पर सोच-विचार करके हम उनकी ओर से क्या कर सकते हैं?" (श्रीमद्भागवतम् 3.16.37)
तात्पर्य में वे लिखते हैं: "जब कोई बात भगवान की व्यवस्था से होती है, तो उससे किसी को विचलित नहीं होना चाहिए, भले ही वह अपने हिसाब से उलटी लगती हो।" अपने उदाहरणों में वे हरिदास का नाम भी लेते हैं: "लेकिन हरिदास को काज़ी के हाथों बाईस बाज़ारों में पिटवाकर दण्ड दिया गया।" और ऐसे भक्त के बारे में वे कहते हैं: "वह उलटी परिस्थितियों को भी भगवान की कृपा मानकर स्वीकार करता है।"
प्रभु जिन्होंने मार अपने ऊपर ली #
वर्षों बाद स्वयं प्रभु ने बताया कि वह मार वास्तव में किसने सही थी। नवद्वीप में, जब उन्होंने श्रीवास ठाकुर के घर में अपना दिव्य ऐश्वर्य प्रकट किया, तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास को आगे बुलाया। उन्होंने कहा कि जब पहरेदार हरिदास को गाँव-गाँव पीट रहे थे, तब वे उन पहरेदारों के टुकड़े-टुकड़े करने के लिए अपना चक्र लेकर उतर आए थे। लेकिन हरिदास उन्हीं के भले के लिए प्रार्थना कर रहे थे, इसलिए चक्र कुछ नहीं कर सका। तब प्रभु ने हरिदास की पीठ को अपने शरीर से ढक लिया और सारी मार स्वयं सह ली। उन्होंने हरिदास को उस मार के निशान भी दिखाए (चैतन्य-भागवत मध्य 10.35-44)। यह सुनकर हरिदास प्रेम में अचेत हो गए (चैतन्य-भागवत मध्य 10.52-56)। वह क्षण, और हरिदास से कहे गए प्रभु के प्रेम-भरे वचन, श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन में बताए गए हैं।
श्रील प्रभुपाद इससे क्या सिखाते हैं #
श्रील प्रभुपाद बार-बार इस प्रसंग की चर्चा करते थे। वे इससे दिखाते थे कि सच्चे प्रचार का विरोध होगा ही, और साधु उस विरोध का उत्तर दया से देता है। साधु के गुणों को समझाते हुए वे लिखते हैं (श्रीमद्भागवतम् 3.25.21 का तात्पर्य): "कभी-कभी भक्तों पर व्यक्तिगत रूप से हिंसक आक्रमण किया जाता है। प्रभु ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया, हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में बेंतों से पीटा गया, और भगवान चैतन्य के प्रमुख सहायक नित्यानन्द पर जगाई और माधाई ने हिंसक आक्रमण किया। फिर भी वे सहनशील रहे, क्योंकि उनका उद्देश्य पतित जीवों का उद्धार करना था।" जिस श्लोक की वे व्याख्या कर रहे थे, उसमें साधु का वर्णन इस प्रकार है:
तितिक्षवः कारुणिकाः
सुहृदः सर्वदेहिनाम्
अजातशत्रवः शान्ताः
साधवः साधुभूषणाः
"साधु के लक्षण यह हैं कि वह सहनशील, दयालु और सभी जीवों का मित्र होता है। उसका कोई शत्रु नहीं होता, वह शान्त होता है, शास्त्रों का पालन करता है, और उसके सभी गुण उत्तम होते हैं।" (श्रीमद्भागवतम् 3.25.21)
"भगवान कपिल की शिक्षाएँ" नामक पुस्तक में इसी श्लोक पर बोलते हुए वे आगे कहते हैं: "भले ही भक्त को कभी-कभी कष्ट सहना पड़े, वह उस कष्ट को सह लेता है। साथ ही, वह बद्ध जीवों पर बहुत दया करता है और उन्हें कृष्णभावनामृत तक ऊपर उठाने का प्रयत्न करता है।" (भगवान कपिल की शिक्षाएँ 11) नित्यानन्द प्रभु ने जगाई और माधाई पर यही दया दिखाई थी। हरिदास की सहनशीलता और दया एक और कथा में भी उतनी ही उज्ज्वल दिखाई देती है। वह कथा बेनापोल की है, जहाँ रामचन्द्र खाँ ने उनकी कुटिया पर एक वेश्या को भेजा था। यह कथा वेश्या की परीक्षा में पढ़ें।

