जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप में अपना संकीर्तन आन्दोलन आरम्भ किया, तब श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) उनके साथ थे। वे श्रीवास के घर में पूरी-पूरी रात कीर्तन करते थे। वे नित्यानन्द प्रभु के साथ घर-घर जाकर पवित्र नाम पहुँचाते थे। और काज़ी के विरुद्ध निकली विशाल कीर्तन-यात्रा में वे प्रभु के सामने नाचे। ये वे वर्ष थे, जब महाप्रभु ने अभी सन्न्यास नहीं लिया था। उसके बाद पुरी में उनका जीवन श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन में बताया गया है।
श्रीवास के घर में कीर्तन की रातें #
श्री चैतन्य महाप्रभु गया से लौटे, जहाँ ईश्वर पुरी ने उन्हें दीक्षा दी थी। लौटते समय उनमें भगवत्-प्रेम के सभी लक्षण दिखाई दे रहे थे (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.9)। जल्दी ही उन्होंने पवित्र नामों का सामूहिक कीर्तन (saṅkīrtana) आरम्भ कर दिया। हरिदास कई वर्षों से शान्तिपुर के पास जप कर रहे थे। अब वे अद्वैत आचार्य जैसे शुद्ध भक्तों के बीच रहने के लिए नवद्वीप आए, और इस कीर्तन में शामिल हो गए (चैतन्य-भागवत मध्य 8)। वृन्दावन दास ठाकुर उन्हें उन थोड़े-से भक्तों में गिनते हैं, जो रात भर प्रभु के साथ कीर्तन करते थे। उस समय द्वार बन्द रखे जाते थे, ताकि उपहास करने वाले लोग भीतर आकर मज़ाक न उड़ा सकें (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.35):
"जब वैष्णवों ने सुना कि प्रभु ने अपनी संकीर्तन-लीला आरम्भ कर दी है, तो वे सब बहुत आनन्दित हुए। प्रभु हर रात श्रीवास पण्डित के घर कीर्तन करते थे, और कभी-कभी चन्द्रशेखर आचार्य के घर। नित्यानन्द, गदाधर, अद्वैत, श्रीवास, विद्यानिधि, मुरारी, हिरण्य और हरिदास, सब वहाँ होते थे।" (चैतन्य-भागवत मध्य 8.110-112, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)
जिस दिन प्रभु ने अपने घाव दिखाए #
एक दिन श्रीवास ठाकुर के घर में श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान विष्णु की शय्या पर बैठ गए। वे सात प्रहर, यानी लगभग इक्कीस घंटे, अपने दिव्य भाव में डूबे रहे। भक्त इसे महा-प्रकाश, अर्थात "महान प्राकट्य", कहते हैं। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं कि उस समय "उन्होंने हरिदास ठाकुर को अपना आशीर्वाद दिया" (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.18 का तात्पर्य)।
वह आशीर्वाद क्या था, यह चैतन्य-भागवत बताता है। प्रभु ने हरिदास को बुलाया, और उस दिन की बात की, जब उन्हें बाईस बाज़ारों में बेंतों से पीटा गया था। प्रभु ने कहा कि वे उस दिन हाथ में अपना चक्र लेकर नीचे आए थे। वे अपने भक्त को पीटने वालों को नष्ट करने के लिए तैयार थे। लेकिन हरिदास उन्हीं लोगों के लिए प्रार्थना कर रहे थे, और उस प्रार्थना के सामने प्रभु कुछ नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने अपना शरीर हरिदास के शरीर पर रख दिया और सारे प्रहार स्वयं सह लिए। फिर प्रभु ने अपनी पीठ खोलकर बेंतों के निशान दिखाए। यह सुनकर हरिदास मूर्छित हो गए। जब उन्हें होश आया, तो प्रभु ने उन्हें अपना दिव्य रूप दिखाया और उनकी प्रशंसा की। तीर्थ महाराज के अनुवाद में प्रभु कहते हैं: "जो हरिदास के दर्शन भर कर लेता है, वह भी सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा और शिव जैसे महान देवता भी हरिदास का संग चाहते हैं। गंगा भी उनका स्पर्श चाहती हैं।" (चैतन्य-भागवत मध्य 10, तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" में बताए गए प्रसंग के आधार पर)
कृष्णदास कविराज गोस्वामी इसी आशीर्वाद को एक पंक्ति में लिखते हैं:
हरिदास ठाकुरेरे करिल प्रसाद
आचार्य-स्थाने मातार खण्डाइल अपराध
"इस घटना के बाद प्रभु ने हरिदास ठाकुर को आशीर्वाद दिया, और अद्वैत आचार्य के घर में अपनी माता का अपराध दूर किया।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 17.71)
तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "महा-प्रकाश के दिन भगवान चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर को गले लगाया, और उन्हें बताया कि वे और कोई नहीं, स्वयं प्रह्लाद महाराज के अवतार हैं।"
नित्यानन्द के साथ घर-घर प्रचार #
जल्दी ही प्रभु चाहने लगे कि पवित्र नाम श्रीवास के बन्द द्वारों से बाहर भी पहुँचे। इसके लिए उन्होंने नित्यानन्द प्रभु और हरिदास को अपना सन्देशवाहक चुना:
"सुनो, सुनो, नित्यानन्द। सुनो, हरिदास। मैं चाहता हूँ कि तुम जाकर मेरा यह आदेश सबको सुनाओ। हर घर में जाओ और लोगों से विनती करो कि वे कृष्ण के नामों का जप करें, कृष्ण की पूजा करें, कृष्ण के बारे में पढ़ें। इसके अलावा कुछ मत कहो, और दूसरों से भी कुछ और मत कहलवाओ। दिन के अन्त में यहाँ आकर मुझे अपने प्रचार का फल बताओ। तुम लोगों से इसी तरह विनती करोगे, और जो नहीं मानेंगे, उन्हें मैं हाथ में चक्र लेकर आऊँगा और नष्ट कर दूँगा।" (चैतन्य-भागवत मध्य 13.7-11, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)
श्रील प्रभुपाद इसकी पुष्टि करते हैं: "भगवान चैतन्य के आदेश से नित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर, दोनों घर-घर जाकर कृष्णभावनामृत का प्रचार करते थे" (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.17 का तात्पर्य)। एक दिन वे जगाई और मधाई के पास गए। ये दोनों भाई एक अच्छे ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन शराब और हर तरह के पाप में डूब गए थे। नशे में धुत उन दोनों भाइयों ने नित्यानन्द और हरिदास को खदेड़ दिया (आदि 17.17 का तात्पर्य)। चैतन्य-भागवत के आधार पर तीर्थ महाराज यहाँ एक हल्का-सा हास्य-प्रसंग भी बताते हैं। बूढ़े हरिदास नित्यानन्द के साथ दौड़ नहीं पा रहे थे। बाद में उन्होंने अद्वैत आचार्य से कहा कि ऐसे अनोखे साथी के साथ वे फिर कभी प्रचार करने नहीं जाएँगे (चैतन्य-भागवत मध्य 13, तीर्थ महाराज के वर्णन के आधार पर)।
फिर भी इस कथा का अन्त कृपा में हुआ। मधाई ने मिट्टी के घड़े के एक टुकड़े से नित्यानन्द को मारा। तब प्रभु दोनों भाइयों को दण्ड देने के लिए दौड़कर वहाँ आए। लेकिन जगाई का पश्चात्ताप देखकर उन्होंने उसे गले लगा लिया। फिर दोनों भाई शुद्ध हो गए, और उन्हें पवित्र नाम मिला (आदि 17.17 का तात्पर्य)।
चौकीदार, रक्षक और नर्तक #
एक बार प्रभु ने चन्द्रशेखर आचार्य के घर में कृष्ण-लीला का एक नाटक किया। उसमें हरिदास गाँव के चौकीदार के वेश में, हाथ में लाठी लिए, मंच पर आए। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "भगवान चैतन्य महाप्रभु द्वारा किए गए नाटकों में हरिदास ठाकुर ने कोतवाल (पुलिस-प्रमुख) की भूमिका निभाई" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43 का तात्पर्य)। उनका काम सबको जगाकर कृष्ण की सेवा में लगाना था। चैतन्य-भागवत में उनकी पुकार लिखी हुई है: "जागो! जागो! जागो! श्रीवास नारद मुनि के वेश में नाचेंगे।" (चैतन्य-भागवत मध्य 18.100, तीर्थ महाराज के अनुवाद के आधार पर)
एक दूसरे दिन एक ब्राह्मण की पत्नी बार-बार प्रभु के चरणों की धूल लेती रही। इससे प्रभु को दुःख हुआ, और वे दौड़कर गंगा में कूद पड़े। तब नित्यानन्द और हरिदास ने ही उन्हें बाहर निकाला (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.243-245)।
जब चाँद काज़ी ने कीर्तन पर रोक लगाने का प्रयास किया, तब प्रभु ने इसका उत्तर मशालों के प्रकाश में निकली एक कीर्तन-यात्रा से दिया। इस यात्रा में कीर्तन के तीन दल थे। "आगे के दल में ठाकुर हरिदास नाच रहे थे, और बीच के दल में अद्वैत आचार्य बड़े आनन्द से नाच रहे थे" (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.136)। चैतन्य-भागवत भी वहाँ उनका वर्णन करता है: "तब कृष्ण-रस के सागर हरिदास ने महाप्रभु के आदेश पर सुन्दर नृत्य किया।" (चैतन्य-भागवत मध्य 23.204, तीर्थ महाराज के अनुवाद के आधार पर)
