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श्रील हरिदास ठाकुर

नामाचार्य: पवित्र नाम के शिक्षक

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114 मिनट का पाठ 9 अध्याय

Devotional painting of Srila Haridasa Thakura seated with his cloth bag of japa beads, chanting the Hare Krishna maha-mantra at sunset.
Devotional painting of Srila Haridasa Thakura seated with his cloth bag of japa beads, chanting the Hare Krishna maha-mantra at sunset.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution
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परिचय

श्रील हरिदास ठाकुर को सम्पूर्ण गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय में नामाचार्य के रूप में स्मरण किया जाता है। नामाचार्य का अर्थ है, पवित्र नाम के शिक्षक। गौर-गणोद्देश-दीपिका (श्लोक 93-95) उन्हें ऋचीक मुनि के पुत्र, महातपस्वी ब्रह्मा बताती है, जो प्रह्लाद के साथ मिलकर प्रकट हुए। श्रील प्रभुपाद उन्हें भगवान ब्रह्मा का अवतार कहते हैं (अन्त्य 11.25 तात्पर्य)। उनका पूरा जीवन यह दिखाता है कि कृष्ण के नामों के जप से क्या-क्या हो सकता है। उनका जन्म लगभग 1451 में ग्रामीण बंगाल के बूढ़न ग्राम में मुस्लिम माता-पिता के घर हुआ। कुछ स्रोत इस ग्राम का नाम बुरोन बताते हैं। अपनी युवावस्था से लेकर अन्तिम दिनों तक वे प्रतिदिन कृष्ण के तीन लाख नामों का जप करते रहे। उन्हें मार डालने के उद्देश्य से सबके सामने पिटवाया गया, फिर भी वे जीवित रहे। उन्हें बहकाने के लिए एक वेश्या भेजी गई थी। उनकी कृपा से वही स्त्री आगे चलकर अपने समय की सबसे सम्मानित वैष्णवियों में से एक बनी। वे श्री चैतन्य महाप्रभु को इतने प्रिय हो गए कि पुरी में हरिदास के अन्तिम वर्षों में प्रभु प्रतिदिन उनसे मिलने आते थे। जब उन्होंने यह संसार छोड़ा, तब प्रभु ने अपने ही हाथों से उन्हें समाधि दी।

विषयविवरण
जन्मलगभग 1451, बूढ़न/बुरोन ग्राम, बंगाल सल्तनत (वर्तमान सातखीरा जिला, बांग्लादेश)
तिरोभावअनन्त चतुर्दशी के दिन, जगन्नाथ पुरी में, श्री चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति में (जाँचे गए स्रोतों से सही वर्ष स्पष्ट नहीं होता)
पारिवारिक पृष्ठभूमिजन्म से मुस्लिम
पहचानभगवान ब्रह्मा के अवतार (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.25 तात्पर्य); ऋचीक मुनि के पुत्र ब्रह्मा महातपा, प्रह्लाद के साथ मिलकर (गौर-गणोद्देश-दीपिका 93-95)
उपाधिनामाचार्य, "पवित्र नाम के शिक्षक" (श्रील प्रभुपाद द्वारा किया गया श्री चैतन्य-चरितामृत का अनुवाद, अन्त्य 3.55)
दैनिक साधनाउच्च स्वर में कृष्ण के तीन लाख नामों का जप, लगभग 175 माला
गुरुश्री चैतन्य-चरितामृत या चैतन्य-भागवत में गुरु का नाम नहीं दिया गया; बाद की भक्ति-जीवनियाँ (अद्वैत-प्रकाश, प्रेम-विलास) अद्वैत आचार्य का नाम देती हैं
सबसे प्रसिद्ध प्रसंगबेनापोल में वेश्या की परीक्षा; बाईस बाज़ारों में पिटाई; पुरी में महाप्रभु का प्रतिदिन उनसे मिलने आना
परिचय के शास्त्र प्रमाण (12)

ऋचीकस्य मुनेः पुत्रो नाम्ना ब्रह्मा महातपाः ।
प्रह्लादेन समं जातो हरिदासाख्यकोऽपि सन् ॥९३॥

ṛcīkasya muneḥ putro nāmnā brahmā mahātapāḥ
prahlādena samaṁ jāto haridāsākhyako'pi san

ऋचीक मुनि के पुत्र ब्रह्मा महातपा और प्रह्लाद महाराज, दोनों मिलकर श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में हरिदास ठाकुर के रूप में प्रकट हुए।

Verse 93 Gaura-ganoddesha-dipika

कवि कर्णपुर हरिदास ठाकुर को ऋचीक मुनि के महातपस्वी पुत्र ब्रह्मा बताते हैं, जो प्रह्लाद महाराज के साथ मिलकर प्रकट हुए। संस्कृत: गौर-गणोद्देश-दीपिका का सविशेषचिह्न (diacritic) संस्करण; अंग्रेज़ी अनुवाद bvmlu.org पर प्रकाशित पाठ के अनुसार।

मुरारिगुप्तचरणैश्चैतन्यचरितामृते ।
उक्तो मुनिसुतः प्रातस्तुलसीपात्रमाहरन् ॥९४॥
अधौतमभिषप्तस्तं पिता यावनतां गतः ।
स एव हरिदासः सन्जातः परम भक्तिमान् ॥९५॥

murāri-gupta-caraṇaiś caitanya-caritāmṛte
ukto muni-sutaḥ prātas tulasī-pātram āharan
adhautam abhiṣaptas taṁ pitā yāvanatāṁ gataḥ
sa eva haridāsaḥ san jātaḥ parama bhaktimān

चैतन्य-चरित ग्रन्थ में मुरारि गुप्त बताते हैं कि एक प्रातः महातपा ने अपने पिता को बिना धोया हुआ तुलसी-पत्र दे दिया। इस पर पिता इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने उन्हें शाप दे दिया। इसी कारण महातपा ने यवन परिवार में महान भक्त हरिदास ठाकुर के रूप में जन्म लिया।

Verses 94-95 Gaura-ganoddesha-dipika

मुरारि गुप्त के आधार पर कवि कर्णपुर बताते हैं कि हरिदास ने यवन (मुस्लिम) परिवार में जन्म क्यों लिया: बिना धोया तुलसी-पत्र देने पर उनके पिता ने उन्हें शाप दिया था। संस्कृत: गौर-गणोद्देश-दीपिका का सविशेषचिह्न (diacritic) संस्करण; अंग्रेज़ी अनुवाद bvmlu.org पर प्रकाशित पाठ के अनुसार।

লোক নিস্তারিতে এই তোমার ‘অবতার’ ।
নামের মহিমা লোকে করিলা প্রচার ॥

loka nistārite ei tomāra ‘avatāra’
nāmera mahimā loke karilā pracāra

"इस अवतार में तुम्हारा कार्य सामान्य लोगों का उद्धार करना है। तुमने इस संसार में पवित्र नाम की महिमा का भरपूर प्रचार किया है।"

तात्पर्य से: श्रील प्रभुपाद, तात्पर्य: "'तोमार अवतार' ('तुम्हारा अवतार') शब्दों का प्रयोग करके श्री चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं कि हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं। ... इस प्रकार हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं, और दूसरे भक्त भी इसी प्रकार अवतार हैं, जो भगवान के कार्य को आगे बढ़ाने में सहायता करते हैं।"

Antya 11.25 Sri Chaitanya-charitamrita

श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास के "अवतार" (तोमार अवतार) की बात करते हैं; श्रील प्रभुपाद का तात्पर्य इसे इस बात की पुष्टि मानता है कि हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं। श्लोक, अनुवाद और तात्पर्य: श्रील प्रभुपाद, श्री चैतन्य-चरितामृत (vedabase.io)। हिन्दी अनुवाद हमारा है।

प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम-महान्ती ।
बड बड वैष्णव ताँर दर्शनेते यान्ति ॥

prasiddhā vaiṣṇavī haila parama-mahāntī
baḍa baḍa vaiṣṇava tāṅra darśanete yānti

इस प्रकार वह वेश्या एक विख्यात भक्त बन गई। वह आध्यात्मिक जीवन में बहुत उन्नत हो गई, और बड़े-बड़े वैष्णव उसके दर्शन करने आते थे।

तात्पर्य से: कोई भी, पुरुष हो या स्त्री, यदि वैष्णव सिद्धान्तों का पालन करे, तो उसे वैष्णव बनाया जा सकता है। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.142 तात्पर्य)

Antya 3.142 Sri Chaitanya-charitamrita

जीवनी में वेश्या के "एक विख्यात भक्त" बनने के लिए जिस श्लोक का उल्लेख है, उसे पूरा दिखाता है।

यद्यपि अन्य सङ्केते अन्य हय नामाभास ।
तथापि नामेर तेज ना हय विनाश ॥

yadyapi anya saṅkete anya haya nāmābhāsa
tathāpi nāmera teja nā haya vināśa

पवित्र नाम के जप में प्रामाणिक, नामाचार्य हरिदास ठाकुर ने कहा, “भगवान के अतिरिक्त किसी और वस्तु को सूचित करने के लिए भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण नामाभास का एक उदाहरण है। इस प्रकार जप करने पर भी पवित्र नाम की दिव्य शक्ति नष्ट नहीं होती।

Antya 3.55 Sri Chaitanya-charitamrita

हरिदास की श्री चैतन्य महाप्रभु को दी गई यह शिक्षा कि नामाभास में भी पवित्र नाम की शक्ति बनी रहती है; इसी श्लोक के श्रील प्रभुपाद कृत अनुवाद में नामाचार्य उपाधि आती है।

मन्दिरेर चक्र देखि' करिह प्रणाम ।
एइ ठाञि तोमार आसिबे प्रसादान्न ॥

mandirera cakra dekhi’ kariha praṇāma
ei ṭhāñi tomāra āsibe prasādānna

“यहाँ शान्ति से रहो, और मन्दिर के शिखर पर स्थित चक्र के दर्शन करके प्रणाम करो। जहाँ तक तुम्हारे प्रसाद की बात है, मैं उसे यहीं भिजवाने की व्यवस्था कर दूँगा।”

तात्पर्य से: इसका अर्थ है कि यदि किसी को मन्दिर में प्रवेश की अनुमति न हो, या वह स्वयं को मन्दिर में प्रवेश के योग्य न समझता हो, तो वह मन्दिर के बाहर से चक्र के दर्शन कर सकता है, और यह भीतर विग्रह के दर्शन करने के समान ही है। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.195 तात्पर्य)

Madhya 11.195 Sri Chaitanya-charitamrita

पुरी में प्रभु का हरिदास को निर्देश: बाहर से ही मन्दिर के चक्र को प्रणाम करो, प्रसाद तुम्हारे पास भेजा जाएगा।

हरिदास आछिल पृथिवीर ‘शिरोमणि’ ।
ताहा विना रत्न-शून्या ह-इल मेदिनी ॥

haridāsa āchila pṛthivīra ‘śiromaṇi’
tāhā vinā ratna-śūnyā ha-ila medinī

“हरिदास ठाकुर इस संसार के मस्तक के मुकुट-मणि थे। उनके बिना अब यह पृथ्वी अपने बहुमूल्य रत्न से रहित हो गई है।”

Antya 11.97 Sri Chaitanya-charitamrita

हरिदास के तिरोभाव के बाद हुए उत्सव में उनके विषय में स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के वचन, जिन्हें जीवनी में "इस संसार के मस्तक का मुकुट-मणि" के रूप में उद्धृत किया गया है।

तुमि खाइले हय कोटि-ब्राह्मण-भोजन ।
एत बलि, श्राद्ध-पात्र कराइला भोजन ॥

tumi khāile haya koṭi-brāhmaṇa-bhojana”
eta bali, śrāddha-pātra karāilā bhojana

“तुम्हें भोजन कराना एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है,” अद्वैत आचार्य ने कहा। “इसलिए यह श्राद्ध-पात्र स्वीकार करो।” इस प्रकार अद्वैत आचार्य ने उन्हें भोजन कराया।

तात्पर्य से: श्राद्ध-पात्र किसी और ब्राह्मण को देने के बजाय अद्वैत आचार्य ने उसे हरिदास ठाकुर को अर्पित किया, क्योंकि वे उन्हें सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों से भी बढ़कर मानते थे। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.222 तात्पर्य)

Antya 3.222 Sri Chaitanya-charitamrita

अद्वैत आचार्य अपने पिता के श्राद्ध की पहली थाली हरिदास को देते हैं, और इस प्रकार उन्हें सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों से भी अधिक सम्मान देते हैं।

ऐछे नामोदयारम्भे पाप-आदिर क्षय ।
उदय कैले कृष्ण-पदे हय प्रेमोदय ॥

aiche nāmodayārambhe pāpa-ādira kṣaya
udaya kaile kṛṣṇa-pade haya premodaya

“इसी प्रकार, भगवान के पवित्र नाम का निरपराध जप जागने का पहला संकेत ही पापमय जीवन के फलों को तुरन्त मिटा देता है। और जब कोई निरपराध होकर पवित्र नाम का जप करता है, तो उसमें कृष्ण के चरणकमलों की प्रेममयी सेवा जाग उठती है।

Antya 3.185 Sri Chaitanya-charitamrita

चाँदपुर में मजुमदारों की सभा में हरिदास की शिक्षा: पापों से छुटकारा तो नाम की पहली झलक से ही मिल जाता है; नाम का सच्चा फल कृष्ण-प्रेम है।

प्रभु कहे, — तोमा स्पर्शि पवित्र ह-इते ।
तोमार पवित्र धर्म नाहिक आमाते ॥

prabhu kahe, — tomā sparśi pavitra ha-ite
tomāra pavitra dharma nāhika āmāte

प्रभु ने कहा, “मैं तुम्हें केवल पवित्र होने के लिए स्पर्श करना चाहता हूँ, क्योंकि तुम्हारे पवित्र कर्म मुझमें नहीं हैं।”

तात्पर्य से: यह स्वामी और सेवक के बीच भावों के आदान-प्रदान का एक उदाहरण है। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.189 तात्पर्य)

Madhya 11.189 Sri Chaitanya-charitamrita

पुरी में हरिदास प्रभु से विनती करते हैं कि वे उन्हें स्पर्श न करें; महाप्रभु उन्हें गले लगाते हैं और कहते हैं कि वे पवित्र होने के लिए उन्हें स्पर्श कर रहे हैं।

‘श्री-कृष्ण-चैतन्य’ शब्द करिते उच्चारण ।
नामेर सहित प्राण कैल उत्क्रामण ॥

‘śrī-kṛṣṇa-caitanya’ śabda karite uccāraṇa
nāmera sahita prāṇa kaila utkrāmaṇa

श्री कृष्ण चैतन्य का पवित्र नाम जपते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए और देह छोड़ दी।

Antya 11.56 Sri Chaitanya-charitamrita

प्रभु की उपस्थिति में हरिदास का तिरोभाव। प्रभु के चरण उनके हृदय पर थे, और वे "श्री कृष्ण चैतन्य" नाम का जप कर रहे थे।

निर्जन-वने कुटिर करि’ तुलसी सेवन ।
रात्रि-दिने तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्तन ॥

nirjana-vane kuṭira kari’ tulasī sevana
rātri-dine tina lakṣa nāma-saṅkīrtana

हरिदास ठाकुर ने एक एकान्त वन में कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने तुलसी का एक पौधा लगाया, और तुलसी के सामने वे प्रतिदिन भगवान के पवित्र नाम का तीन लाख बार जप करते थे। वे पूरे दिन और पूरी रात जप करते थे।

तात्पर्य से: फिर भी, हम प्रतिदिन जप-माला पर हरे कृष्ण महा-मन्त्र की सोलह माला जप करके और तुलसी के पौधे को सम्मान देकर उनके उदाहरण का पालन कर सकते हैं। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.100 तात्पर्य)

Antya 3.100 Sri Chaitanya-charitamrita

बेनापोल में हरिदास का जीवन, जिसे श्रील प्रभुपाद ने हर भक्त के लिए आदर्श बताया: जप का एक निश्चित व्रत और तुलसी के प्रति सम्मान।

अध्याय 1

जन्म और बाल्यकाल

ग्रामीण बंगाल में मुस्लिम माता-पिता के घर जन्मा एक बालक आगे चलकर गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय में पवित्र नाम का सबसे एकनिष्ठ जप करने वाले भक्तों में से एक बना।

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Painting of Haridasa Thakura absorbed in chanting outdoors, undisturbed even by a wild animal nearby, illustrating the fearlessness the tradition attributes to his early, solitary years of chanting.
Painting of Haridasa Thakura absorbed in chanting outdoors, undisturbed even by a wild animal nearby, illustrating the fearlessness the tradition attributes to his early, solitary years of chanting.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution

श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) बंगाल के बूढ़न ग्राम में एक मुस्लिम परिवार में प्रकट हुए। यह श्री चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन आन्दोलन के आरम्भ से बहुत वर्ष पहले की बात है (चैतन्य-भागवत आदि 16.18)। अद्वैत-विलास उनके जन्म का वर्ष 1451 बताता है। इस हिसाब से वे महाप्रभु से लगभग पैंतीस वर्ष बड़े थे। उनके परिवार में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे आगे आने वाले जीवन का कोई संकेत मिलता। फिर भी बचपन से ही कृष्ण के नाम सदा उनके होठों पर रहते थे, और बंगाल के महान भक्तों ने जल्दी ही उन्हें अपना मान लिया। यहाँ उन्हीं आरम्भिक वर्षों की कथा है, जैसी चैतन्य-भागवत, श्री चैतन्य-चरितामृत और श्रील प्रभुपाद के तात्पर्य बताते हैं। यह कथा उस समय तक चलती है, जब उन्होंने और अद्वैत आचार्य ने मिलकर भगवान को इस संसार में आने के लिए पुकारा।

विषयविवरण
जन्मलगभग 1451, बूढ़न/बुरोन ग्राम, बंगाल सल्तनत (आज का सातखीरा ज़िला, बांग्लादेश)
परिवारजन्म से मुस्लिम
प्रमुख आरम्भिक प्रभावअद्वैत आचार्य, जिनसे फुलिया के पास गंगा-तट पर भेंट हुई
युवावस्था से साधनाहरे कृष्ण महामन्त्र का ऊँचे स्वर में जप, कहा जाता है कि प्रतिदिन तीन लाख बार
स्रोतचैतन्य-भागवत (आदि-खण्ड), श्री चैतन्य-चरितामृत (अन्त्य 3), बाद की भक्ति-जीवनियाँ

उन्होंने मुस्लिम परिवार में जन्म क्यों लिया #

इतनी महान आत्मा ऐसे लोगों के बीच क्यों प्रकट हुई, जो कृष्ण की पूजा नहीं करते थे? परम्परा इसके एक से अधिक उत्तर देती है, और ये उत्तर आपस में मेल खाते हैं। कवि कर्णपुर की गौर-गणोद्देश-दीपिका कहती है कि वे भगवान ब्रह्मा हैं, जो प्रह्लाद महाराज के साथ मिलकर प्रकट हुए। मुरारि गुप्त के वर्णन के आधार पर यह ग्रन्थ एक पुरानी कथा भी बताता है। ऋचीक मुनि के पुत्र ब्रह्मा महातपा के रूप में उन्होंने एक बार अपने पिता को बिना धोए तुलसी-पत्र दे दिया था। इस पर पिता ने उन्हें शाप दिया, और उसी शाप के कारण उन्होंने यवनों के बीच जन्म लिया (गौर-गणोद्देश-दीपिका 93-95; ये श्लोक श्रील हरिदास ठाकुर के जीवन-चरित में उद्धृत हैं)। बाद में स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास से उनके अवतार की बात कही, अर्थात् इस संसार में उनके आने की (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.25)। तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "तोमार अवतार (“तुम्हारा अवतार”) शब्दों का प्रयोग करके श्री चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं कि हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं।"

भक्तिविनोद ठाकुर अपने नवद्वीप-धाम-माहात्म्य में इसके पीछे की गहरी कथा बताते हैं। द्वापर-युग में ब्रह्मा ने कृष्ण की परीक्षा लेने के लिए एक बार उनके बछड़ों और ग्वाल-बाल सखाओं को छिपा दिया था। जब उन्होंने भगवान की शक्ति देखी, तो वे उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगी। बाद में ब्रह्मा को डर हुआ कि जब कृष्ण गौरांग के रूप में आएँगे, तब कहीं वे फिर से भगवान के प्रति अपराध न कर बैठें। इसलिए वे नवद्वीप के बीच वाले द्वीप, अन्तर्द्वीप, में गए और ध्यान में बैठ गए। तब गौरांग उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें उनका कार्य सौंपा:

"गौर के रूप में मेरे अवतार के समय तुम म्लेच्छों के परिवार में जन्म लोगे। तुम पवित्र नाम की महिमा का प्रचार करोगे और सभी जीवों का मंगल करोगे।" (भक्तिविनोद ठाकुर का नवद्वीप-धाम-माहात्म्य, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" में दिए गए वर्णन के अंग्रेज़ी पाठ के आधार पर)

तीर्थ महाराज आगे बताते हैं कि ब्रह्मा ने स्वयं निम्न कुल में जन्म की प्रार्थना की थी, ताकि गौर-लीला में झूठा अभिमान उन्हें छू भी न सके। वे कहते हैं कि अद्वैत-विलास का मत भी यही है।

वृन्दावन दास ठाकुर इसका कारण सबसे सरल शब्दों में बताते हैं। हरिदास ने भगवान की अपनी आज्ञा से निम्न कुल में जन्म लिया, ताकि उनका जीवन यह प्रमाणित करे कि शास्त्र जन्म और भक्ति के बारे में क्या कहते हैं:

"हरिदास ठाकुर ने भगवान की आज्ञा से निम्न जाति के परिवार में जन्म लिया, यह दिखाने के लिए कि जाति और वर्ग का कोई महत्त्व नहीं है। सभी शास्त्र कहते हैं कि विष्णु का भक्त, निम्न कुल में जन्म लेकर भी, सबके लिए पूजनीय होता है। जो ऊँची जाति में जन्म लेकर भी कृष्ण की पूजा नहीं करता, उसकी जाति उसके किस काम आएगी? ऊँचे जन्म के बावजूद वह नरक में जाएगा। हरिदास ने केवल इन शास्त्र-वचनों की साक्षी देने के लिए निम्न जन्म लिया।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.237-240, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)

अगला श्लोक उनकी तुलना प्रह्लाद से करता है, जिनका जन्म दैत्यों के बीच हुआ था, और हनुमान से, जिनका जन्म वानर के रूप में हुआ था। हर बार निम्न जन्म केवल एक बाहरी आवरण था (चैतन्य-भागवत आदि 16.241)। चैतन्य-भागवत में ये वचन एक बहुत अनोखे वक्ता के मुख से निकलते हैं। ये नागराज के वचन हैं, जो एक सपेरे के मुख से बोल रहे थे। यह कथा आगे दी गई है (चैतन्य-भागवत आदि 16.222-248)।

श्रीमद्भागवतम् ने यही सत्य बहुत पहले सिखाया था। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुरी में हरिदास को गले लगाया, तब उन्होंने हरिदास के विषय में यही श्लोक सुनाया (चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.192):

अहो बत श्वपचो ऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते

"अहो, वे कितने महिमामय हैं, जिनकी जिह्वा आपके पवित्र नाम का जप करती है! कुत्ते का मांस खाने वालों के कुल में जन्म लेकर भी ऐसे लोग पूजनीय हैं। जो लोग आपके पवित्र नाम का जप करते हैं, उन्होंने अवश्य ही सब प्रकार की तपस्याएँ और अग्नि-यज्ञ किए होंगे, और आर्यों का सारा सदाचार प्राप्त किया होगा। आपके पवित्र नाम का जप करने के लिए उन्होंने अवश्य ही तीर्थों में स्नान किया होगा, वेदों का अध्ययन किया होगा और जो कुछ आवश्यक है, वह सब पूरा किया होगा।" (श्रीमद्भागवतम् 3.33.7)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद सीधे हरिदास का नाम लेते हैं: "बाहर से देखने में उनका जन्म मुसलमानों के परिवार में हुआ था, लेकिन क्योंकि वे परमेश्वर के पवित्र नाम का अपराध-रहित जप करते थे, इसलिए भगवान चैतन्य ने उन्हें नाम के प्रचार का अधिकारी, अर्थात् आचार्य, बनने की शक्ति दी।"

बूढ़न: उनका जन्म-स्थान और परिवार #

चैतन्य-भागवत उनके ग्राम का नाम बूढ़न बताता है। वह यह भी कहता है कि उनके वहाँ प्रकट होने से पूरा ज़िला कीर्तन से भर गया (चैतन्य-भागवत आदि 16.18)। श्रील प्रभुपाद भी यही बात दोहराते हैं, लेकिन ठीक स्थान के बारे में वे सावधानी रखते हैं: "यह पूरी तरह निश्चित नहीं है कि श्री हरिदास ठाकुर खुलना ज़िले के बूढ़न नामक ग्राम में ही प्रकट हुए थे" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43 का तात्पर्य)। बूढ़न कहलाने वाला यह क्षेत्र आज बांग्लादेश के सातखीरा में है। तीर्थ महाराज इसका नाम बुरिहाना लिखते हैं, और दूसरे लेखक बुरोन।

उनके माता-पिता के बारे में वृत्तान्त एकमत नहीं हैं। न चैतन्य-भागवत उनके नाम बताता है, न चैतन्य-चरितामृत। एक परम्परा कहती है कि उनका जन्म सुमति और गौरी नाम के ब्राह्मण माता-पिता के घर हुआ। जब वे बहुत छोटे थे, तभी उनके माता-पिता चल बसे, और पास के हलीमपुर ग्राम के एक मुस्लिम परिवार ने उन्हें पाला। अद्वैत-विलास इससे अलग वृत्तान्त देता है। वह उनके पिता का नाम खानउल्ला काज़ी बताता है। उसके अनुसार उनका जन्म शक संवत् 1372 (1451) के अग्रहायण मास में हुआ, और वह भी कहता है कि बचपन में ही उनके माता-पिता का देहान्त हो गया था। दोनों मुख्य जीवनियाँ बस इतना कहती हैं कि उनका जन्म मुसलमान के रूप में हुआ। श्रील प्रभुपाद भी यह बात सीधे शब्दों में कहते हैं: "हरिदास ठाकुर का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था और बाद में वे एक महान वैष्णव के रूप में पहचाने गए, फिर भी ब्राह्मण उनकी बहुत आलोचना करते थे" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.220 का तात्पर्य)।

बचपन से ही पवित्र नाम #

आरम्भिक ग्रन्थ यह नहीं बताते कि इस बालक के मन में पवित्र नाम के लिए प्रेम पहली बार कैसे जागा। तीर्थ महाराज बस इतना कहते हैं कि यह प्रेम बहुत छोटी आयु में ही दिखाई देने लगा था। जब कृष्णदास कविराज गोस्वामी चैतन्य-वृक्ष की शाखाओं की सूची देते हैं, तब वे बताते हैं कि आगे चलकर उनका जीवन कैसा बना:

हरिदास-ठाकुर शाखार अद्भुत चरित
तिन लक्ष नाम तेँहो लयेन अपतित

"चैतन्य-वृक्ष की बीसवीं शाखा हरिदास ठाकुर थे। उनका चरित्र अद्भुत था। वे प्रतिदिन बिना चूके तीन लाख बार कृष्ण के पवित्र नाम का जप करते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "भगवान के तीन लाख पवित्र नामों का जप निश्चय ही अद्भुत है। कोई साधारण व्यक्ति इतने नामों का जप नहीं कर सकता, और न ही किसी को हरिदास ठाकुर के आचरण की बनावटी नकल करनी चाहिए।" फिर वे अपने अनुयायियों के लिए व्यावहारिक शिक्षा देते हैं: "इसलिए हमने अपने संघ में यह नियम बनाया है कि हमारे सभी विद्यार्थी प्रतिदिन कम से कम सोलह माला का जप करें।" इसी तात्पर्य में वे इन वर्षों की रूपरेखा भी देते हैं: "चैतन्य-भागवत के आदि-खण्ड के दूसरे अध्याय में बताया गया है कि हरिदास ठाकुर का जन्म बूढ़न नामक ग्राम में हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद वे शान्तिपुर के पास फुलिया में गंगा के तट पर रहने लगे।"

फुलिया में गंगा के तट पर #

कुछ वर्षों बाद हरिदास ने बूढ़न छोड़ दिया। वे शान्तिपुर के पास फुलिया ग्राम में गंगा के तट पर आकर बस गए। यह स्थान आज के नदिया ज़िले में है (चैतन्य-भागवत आदि 16.19)। उनका संग पाकर अद्वैत आचार्य इतने प्रसन्न हुए कि आनन्द से ज़ोर-ज़ोर से गर्जना करने लगे। फिर दोनों साथ-साथ कृष्ण की मधुरता के सागर में तैरने लगे (चैतन्य-भागवत आदि 16.20-21)। हरिदास दिन-प्रतिदिन नदी के किनारे घूमते हुए कृष्ण के नाम पुकारते रहते। कभी वे नाचते, कभी रोते, कभी हँसते, और कभी प्रेम में अचेत होकर गिर पड़ते (चैतन्य-भागवत आदि 16.22-29)। फुलिया के ब्राह्मणों ने देखा कि उनके आँसू और उनका काँपना सच्चा है। इसलिए वे मुस्लिम परिवार के इस पुत्र का सबसे ऊँची श्रेणी के भक्त के रूप में सम्मान करने लगे।

श्री चैतन्य-चरितामृत इन वर्षों की कथा दूसरे क्रम में बताता है। उसमें घर छोड़ने के बाद वे पहले कुछ समय बेनापोल के वन में रहते हैं (अन्त्य 3.99)। फिर वे चाँदपुर में रहते हैं, और उसके बाद ही शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के पास आते हैं (अन्त्य 3.214)। दोनों ग्रन्थों में घटनाओं का क्रम अलग है, लेकिन वे इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि हरिदास कैसे रहते थे:

निर्जन-वने कुटिर करि' तुलसी सेवन
रात्रि-दिने तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्तन

"हरिदास ठाकुर ने एक निर्जन वन में एक कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने तुलसी का एक पौधा लगाया, और तुलसी के सामने वे प्रतिदिन तीन लाख बार भगवान के पवित्र नाम का जप करते थे। वे पूरे दिन और पूरी रात जप करते रहते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.100)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद इस सरल चित्र में सबके लिए आशा देखते हैं: "उनके व्यक्तिगत उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि हरे कृष्ण मन्त्र का जप करना और कृष्णभावनामृत में अत्यन्त उन्नत होना बहुत सरल है।" बेनापोल की कथा वेश्या की परीक्षा में दी गई है, और चाँदपुर का शास्त्रार्थ पवित्र नाम पर शिक्षाएँ में।

अद्वैत आचार्य का आश्रय और श्राद्ध-पात्र #

जब हरिदास शान्तिपुर आए, तो उन्होंने अद्वैत आचार्य को प्रणाम किया। अद्वैत आचार्य ने उन्हें गले लगाया और बदले में उनका सम्मान किया (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.214-215)। फिर आचार्य ने उन्हें जप के लिए एक शान्त स्थान दिया, और साथ ही सबसे उत्तम शिक्षा भी दी:

गङ्गा-तीरे गोँफा करि' निर्जने ताँरे दिला
भागवत-गीतार भक्ति-अर्थ शुनाइला

"गंगा के तट पर, एक निर्जन स्थान में, अद्वैत आचार्य ने हरिदास ठाकुर के लिए गुफा जैसा एक घर बनाया। उन्होंने हरिदास को भक्ति की दृष्टि से श्रीमद्भागवतम् और भगवद्गीता का वास्तविक अर्थ सुनाया।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.216)

हरिदास प्रतिदिन अद्वैत आचार्य के घर भोजन करते थे, और दोनों साथ मिलकर कृष्ण-कथा का आनन्द लेते थे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.217)। लेकिन रोज़ की यह कृपा हरिदास के विनम्र हृदय को चिन्ता में डाल देती थी। शान्तिपुर अभिमानी ब्राह्मण परिवारों से भरा था। हरिदास को डर था कि उनके जैसे जन्म वाले व्यक्ति के प्रति आचार्य का यह खुला प्रेम आचार्य को ही मुसीबत में डाल देगा। इसलिए उन्होंने आचार्य से खुलकर अपने मन की बात कही:

महा-महा-विप्र एथा कुलीन-समाज
नीचे आदर कर, ना वासह भय लाज!!

"महोदय, आप बड़े-बड़े ब्राह्मणों और कुलीन लोगों के समाज में रहते हैं, फिर भी बिना किसी डर या लाज के आप मुझ जैसे निम्न व्यक्ति का आदर करते हैं।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.219)

श्रील प्रभुपाद अपने तात्पर्य में इस चिन्ता को समझाते हैं: "इस प्रकार हरिदास ठाकुर को डर था कि हरिदास ठाकुर के साथ घनिष्ठता के कारण अद्वैत आचार्य किसी कठिनाई में पड़ जाएँगे" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.220 का तात्पर्य)। लेकिन अद्वैत आचार्य समाज की रीतियों की परवाह नहीं करते थे। उन्होंने उत्तर दिया: "प्रिय हरिदास, डरो मत। मैं पूरी तरह शास्त्रों के सिद्धान्तों के अनुसार ही आचरण करूँगा।" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.221) इस पर श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "शास्त्रों के आदेशों में, जो प्रमाण का सच्चा माध्यम हैं, कहा गया है कि निम्न कुल में जन्म लेकर भी कोई भी व्यक्ति भगवद्धाम लौट सकता है।" श्रीमद्भागवतम् भी किसी व्यक्ति को परखने का यही नियम देता है: "यदि कोई व्यक्ति ऊपर बताए अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के लक्षण दिखाता है, तो चाहे वह किसी दूसरे वर्ण में जन्मा हो, उसे उन्हीं लक्षणों के अनुसार स्वीकार किया जाना चाहिए" (श्रीमद्भागवतम् 7.11.35)।

फिर अद्वैत आचार्य ने अपने व्यवहार से दिखाया कि शास्त्रों का अर्थ क्या है। अपने दिवंगत पिता के श्राद्ध के समय सम्मान की थाली वहाँ उपस्थित सबसे सम्मानित ब्राह्मण के लिए होती थी। लेकिन उन्होंने वह थाली हरिदास के सामने रख दी:

तुमि खाइले हय कोटि-ब्राह्मण-भोजन”
एत बलि, श्राद्ध-पात्र कराइला भोजन

“तुम्हें भोजन कराना एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है,” अद्वैत आचार्य ने कहा। “इसलिए यह श्राद्ध-पात्र स्वीकार करो।” इस प्रकार अद्वैत आचार्य ने उन्हें भोजन कराया। (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.222)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "श्राद्ध-पात्र किसी दूसरे ब्राह्मण को देने के बजाय अद्वैत आचार्य ने उसे हरिदास ठाकुर को दिया, क्योंकि वे उन्हें सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों से भी बढ़कर मानते थे।" कृष्णदास कविराज ने इस सम्मान को इतना महत्त्वपूर्ण माना कि चैतन्य-वृक्ष की शाखाओं में हरिदास का नाम गिनाते समय भी उन्होंने इसका उल्लेख किया (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.44)। अद्वैत-प्रकाश जैसी कुछ बाद की जीवनियाँ कहती हैं कि अद्वैत आचार्य ने ही उन्हें उनका नाम दिया और जप की पहली शिक्षा भी दी। लेकिन चैतन्य-चरितामृत और चैतन्य-भागवत में ऐसे किसी संस्कार का वर्णन नहीं मिलता।

गुफा में रहने वाला साँप #

चैतन्य-भागवत यह अगली कथा काज़ी के सामने हरिदास पर चले मुकदमे के बाद बताता है। वह मुकदमा बाईस बाज़ारों में उत्पीड़न में दिया गया है। फुलिया लौटकर हरिदास गंगा के तट पर एक गुफा में अकेले रहने लगे। वे दिन-रात कृष्ण का स्मरण करते और प्रतिदिन तीन लाख नामों का जप करते थे, इसलिए वह गुफा वैकुण्ठ जैसी बन गई (चैतन्य-भागवत आदि 16.172-173)। लेकिन उसी गुफा में एक बड़ा विषैला साँप भी रहता था। जो लोग हरिदास से बात करने आते थे, उन्हें उसके विष से तेज़ जलन होने लगती थी, और वे कुछ पल से अधिक वहाँ रुक नहीं पाते थे। लेकिन स्वयं हरिदास को कुछ भी अनुभव नहीं होता था (चैतन्य-भागवत आदि 16.174-176)।

फुलिया के कुछ वैद्य साँपों के बारे में जानते थे। उन्होंने इसका कारण पता लगाया, और फिर स्थानीय ब्राह्मणों के साथ मिलकर हरिदास से वह स्थान छोड़ने की विनती की (चैतन्य-भागवत आदि 16.177-184)। हरिदास ने कहा कि उन्हें वहाँ कभी कोई जलन अनुभव नहीं हुई। लेकिन उनसे मिलने आने वालों को कष्ट हो रहा था, इसलिए यदि साँप नहीं गया, तो वे अगले दिन स्वयं वह स्थान छोड़ देंगे। फिर सब लोग मिलकर कीर्तन करने बैठे। ठीक जब शाम हुई, तब वह बड़ा साँप सबकी आँखों के सामने अपने बिल से निकला और सदा के लिए चला गया (चैतन्य-भागवत आदि 16.185-194)। इसके बाद हरिदास पर ब्राह्मणों की श्रद्धा और भी गहरी हो गई, क्योंकि उनके एक वचन पर एक साँप ने भी अपना घर छोड़ दिया था (चैतन्य-भागवत आदि 16.195-197)।

श्रील प्रभुपाद यह कथा एक ऐसे श्लोक की व्याख्या करते हुए सुनाते हैं, जो बताता है कि त्यागी भक्त पूरी तरह भगवान पर कैसे निर्भर रहता है:

चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षां
नैवाङ्घ्रिपाः परभृतः सरितो ऽप्यशुष्यन्
रुद्धा गुहाः किमजितो ऽवति नोपसन्नान्
कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान्

"क्या आम रास्ते पर फटे-पुराने कपड़े नहीं पड़े हैं? क्या दूसरों का पालन करने के लिए ही जीने वाले वृक्ष अब भिक्षा नहीं देते? क्या नदियाँ सूख गई हैं और अब प्यासों को जल नहीं देतीं? क्या पर्वतों की गुफाएँ अब बन्द हो गई हैं? और सबसे बढ़कर, क्या सर्वशक्तिमान भगवान पूरी तरह शरण में आए जीवों की रक्षा नहीं करते? तो फिर विद्वान मुनि उन लोगों की चापलूसी करने क्यों जाते हैं, जो बड़ी मेहनत से कमाए धन के नशे में अन्धे हो गए हैं?" (श्रीमद्भागवतम् 2.2.5)

तात्पर्य में वे निष्कर्ष देते हैं: "भगवान उस साँप के हृदय में भी रहते थे। उन्हीं के निर्देश से साँप ने हरिदास को प्राथमिकता दी और वह स्थान छोड़कर उन्हें परेशान न करने का निर्णय लिया। तो यह इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि भगवान ठाकुर हरिदास जैसे प्रामाणिक भक्त की रक्षा कैसे करते हैं।"

सपेरा और ईर्ष्यालु ब्राह्मण #

इसके बाद चैतन्य-भागवत साँप से जुड़ी एक दूसरी कथा बताता है। एक दिन एक सपेरा किसी धनी व्यक्ति के आँगन में अपना खेल दिखा रहा था। वह कालिय नाग के फनों पर कृष्ण के नृत्य के बारे में गाते हुए नाच रहा था, और उसके साथी चारों ओर बाजा बजाकर गा रहे थे। संयोग से हरिदास भी वहाँ आ पहुँचे। अपने प्रभु की लीलाएँ सुनते ही वे अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। फिर वे ज़ोर से गर्जना करते हुए उठे और रोते-काँपते हुए नाचने लगे। सपेरा एक ओर हटकर हाथ जोड़े खड़ा रहा। वहाँ के लोगों ने हरिदास के पैरों के निशानों की धूल अपने शरीर पर लगा ली (चैतन्य-भागवत आदि 16.198-212)।

भीड़ में एक ब्राह्मण भी था, जो अपने लिए भी वैसा ही सम्मान चाहता था। जब फिर से गाना शुरू हुआ, तो वह भूमि पर गिर पड़ा और ऐसे पड़ा रहा, मानो प्रेम में डूब गया हो। तुरन्त सपेरे ने बेंत से उस पर हमला कर दिया। वह उसके सिर और शरीर पर तब तक मारता रहा, जब तक वह चिल्लाता हुआ भाग नहीं गया (चैतन्य-भागवत आदि 16.213-219)। लोगों ने पूछा कि सपेरे ने एक व्यक्ति का सम्मान क्यों किया और दूसरे को क्यों पीटा। तब नागराज ने उत्तर दिया। सपेरे के मन्त्र की शक्ति से नागराज उसके शरीर में प्रवेश कर चुके थे, और वे उसी के मुख से बोले। उन्होंने कहा कि उस ब्राह्मण का दिखावा ईर्ष्या से और बड़ा कहलाने की इच्छा से निकला था, और केवल कपट से मुक्त व्यक्ति ही कृष्ण तक पहुँच सकता है। लेकिन जो कोई हरिदास को नाचते हुए देखता है, वह सब बन्धनों से छूट जाता है। ब्रह्मा और शिव भी ऐसे भक्त के संग के लिए तरसते हैं (चैतन्य-भागवत आदि 16.220-236)। इसी भाषण में नागराज यह भी बताते हैं कि हरिदास ने निम्न कुल में जन्म क्यों लिया।

तीर्थ महाराज इससे हर भक्त के लिए एक शिक्षा निकालते हैं: सम्मान पाने के लिए भक्ति का दिखावा करने से अपने ही भक्ति-जीवन को बहुत हानि पहुँचती है। ऊपर उद्धृत आदि 10.43 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद की चेतावनी भी इसी ओर संकेत करती है। हरिदास के प्रेम-भाव का सम्मान करना है, उसकी नकल नहीं करनी है।

भगवान को पुकारते दो भक्त #

यह सब उस समय हुआ, जब बंगाल संकीर्तन के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानता था। चैतन्य-भागवत बताता है कि ऊँचे स्वर में जप करने वाले थोड़े-से भक्तों का लोग कैसे मज़ाक उड़ाते थे। यह देखकर हरिदास दुखी होते थे, लेकिन वे जितने ऊँचे स्वर में हो सके, पवित्र नाम का जप करते रहे (चैतन्य-भागवत आदि 16.251-265)। इसी विषय पर हरिनदी के एक ब्राह्मण के साथ उनका शास्त्रार्थ पवित्र नाम पर शिक्षाएँ में दिया गया है।

श्री चैतन्य-चरितामृत दिखाता है कि शान्तिपुर के इन शान्त वर्षों के भीतर-भीतर क्या चल रहा था। अद्वैत आचार्य सदा यही सोचते रहते थे कि भक्ति से इतना खाली यह सारा संसार कैसे बचेगा। इसलिए उन्होंने कृष्ण को इस संसार में उतार लाने का व्रत लिया, और वे गंगाजल और तुलसी-पत्रों से उनकी पूजा करने लगे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.223-224)। उधर नदी किनारे अपनी गुफा में हरिदास भी ठीक उसी लालसा से जप करते थे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.225)। कृष्णदास कविराज गोस्वामी इसका फल बताते हैं:

दुइ-जनेर भक्त्ये चैतन्य कैला अवतार
नाम-प्रेम प्रचारि' कैला जगत् उद्धार

"इन दोनों की भक्ति के कारण भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु अवतार के रूप में प्रकट हुए। इस प्रकार उन्होंने सारे संसार का उद्धार करने के लिए भगवान के पवित्र नाम और कृष्ण-प्रेम का प्रचार किया।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.226)

इस प्रकार बूढ़न का वह बालक, जिसका जन्म ऐसी जगह हुआ जहाँ किसी को वैष्णव के जन्म की आशा नहीं थी, उन दो भक्तों में से एक बना, जिनकी प्रार्थनाओं से श्री चैतन्य महाप्रभु इस संसार में आए। उनके जीवन का अगला भाग, जब मृत्यु-दण्ड मिलने पर भी उन्होंने पवित्र नाम छोड़ने से इनकार कर दिया, बाईस बाज़ारों में उत्पीड़न में बताया गया है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (12)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

yasya yal lakṣaṇaṁ proktaṁ
puṁso varṇābhivyañjakam
yad anyatrāpi dṛśyeta
tat tenaiva vinirdiśet

यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के उपर्युक्त लक्षण प्रदर्शित करता है, तो चाहे वह किसी अन्य वर्ण में क्यों न जन्मा हो, उसे उन्हीं लक्षणों के अनुसार वर्गीकृत किया जाना चाहिए।

SB 7.11.35 Srimad-Bhagavatam

यह श्लोक इस पृष्ठ पर दिए गए उस वृत्तान्त का समर्थन करता है, जिसमें अद्वैत आचार्य बताते हैं कि उन्होंने हरिदास से मित्रता क्यों की और उनकी रक्षा क्यों की। आत्मा को सच में योग्य बनाती है कृष्ण के प्रति उसकी भक्ति, न कि वह परिवार जिसमें उसका जन्म हुआ। नारद मुनि यही सिद्धान्त महाराज युधिष्ठिर को बताते हैं। यही श्लोक इस आचार्य के पुरी में जीवन वाले पृष्ठ पर भी दिया गया है। वहाँ श्राद्ध-पात्र प्रसंग पर भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की टीका ठीक यही बात कहती है।

निर्जन-वने कुटिर करि' तुलसी सेवन ।
रात्रि-दिने तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्तन ॥

nirjana-vane kuṭira kari’ tulasī sevana
rātri-dine tina lakṣa nāma-saṅkīrtana

हरिदास ठाकुर ने एक निर्जन वन में कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने एक तुलसी का पौधा लगाया, और उस तुलसी के सामने वे प्रतिदिन तीन लाख बार भगवान के पवित्र नाम का जप करते थे। वे पूरे दिन और पूरी रात जप करते रहते थे।

तात्पर्य से: फिर भी, हम प्रतिदिन माला पर हरे कृष्ण महामन्त्र की सोलह माला जप करके और तुलसी के पौधे को सम्मान देकर उनके उदाहरण का पालन कर सकते हैं। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.100 तात्पर्य)

Antya 3.100 Sri Chaitanya-charitamrita

तुलसी के सामने दिन-रात जप करने वाला हरिदास का एकान्त जीवन; चैतन्य-चरितामृत इसे बेनापोल में बताता है, और यह पृष्ठ जिस परम्परा का अनुसरण करता है, वह फुलिया में।

अलौकिक आचार तोमार कहिते पाइ भय
सेइ कृपा करिबा, — याते मोर रक्षा हय”

alaukika ācāra tomāra kahite pāi bhaya
sei kṛpā karibā, — yāte mora rakṣā haya”

“प्रिय महोदय, आपका आचरण असाधारण है। सच कहूँ तो कभी-कभी आपसे कुछ कहते हुए मुझे डर लगता है। लेकिन कृपया मुझ पर यह कृपा करें कि समाज के व्यवहार से मेरी रक्षा करें।”

तात्पर्य से: हरिदास ठाकुर का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था और बाद में वे एक महान वैष्णव के रूप में पहचाने गए, फिर भी ब्राह्मण उनकी बहुत आलोचना करते थे। इस प्रकार हरिदास ठाकुर को डर था कि हरिदास ठाकुर के साथ घनिष्ठता के कारण अद्वैत आचार्य किसी कठिनाई में पड़ जाएँगे। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.220 का तात्पर्य)

Antya 3.220 Sri Chaitanya-charitamrita

श्रील प्रभुपाद सीधे शब्दों में कहते हैं कि हरिदास का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था, और समझाते हैं कि हरिदास को अद्वैत आचार्य की प्रतिष्ठा की चिन्ता क्यों थी।

आचार्य कहेन, — “तुमि ना करिह भय
सेइ आचरिब, येइ शास्त्र-मत हय

ācārya kahena, — “tumi nā kariha bhaya
sei ācariba, yei śāstra-mata haya

अद्वैत आचार्य ने उत्तर दिया, “प्रिय हरिदास, डरो मत। मैं पूरी तरह शास्त्रों के सिद्धान्तों के अनुसार ही आचरण करूँगा।

तात्पर्य से: शास्त्रों के आदेशों में, जो प्रमाण का सच्चा माध्यम हैं, कहा गया है कि निम्न कुल में जन्म लेकर भी कोई भी व्यक्ति भगवद्धाम लौट सकता है। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.221 का तात्पर्य)

Antya 3.221 Sri Chaitanya-charitamrita

अद्वैत आचार्य का उत्तर: हरिदास का सम्मान करने में वे समाज की रीति के अनुसार नहीं, शास्त्र के अनुसार चलेंगे।

लोक निस्तारिते एइ तोमार ‘अवतार’
नामेर महिमा लोके करिला प्रचार

loka nistārite ei tomāra ‘avatāra’
nāmera mahimā loke karilā pracāra

“इस अवतार में तुम्हारा कार्य सामान्य लोगों का उद्धार करना है। तुमने इस संसार में पवित्र नाम की महिमा का भरपूर प्रचार किया है।”

तात्पर्य से: तोमार अवतार (“तुम्हारा अवतार”) शब्दों का प्रयोग करके श्री चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं कि हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.25 का तात्पर्य)

Antya 11.25 Sri Chaitanya-charitamrita

श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास के अवतार की बात करते हैं, और तात्पर्य उन्हें भगवान ब्रह्मा बताता है। हरिदास ने मुस्लिम परिवार में जन्म क्यों लिया, इसका यह एक उत्तर है।

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अध्याय 2

बाईस बाज़ारों में उत्पीड़न

पवित्र नाम छोड़ने से इनकार करने पर हरिदास ठाकुर को बाज़ार-दर-बाज़ार पीटने का आदेश दिया गया। उन्होंने यह सब बिना किसी शिकायत के सहा और केवल अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना की।

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Devotional painting depicting Haridasa Thakura being caned by order of the qazi while devotee boys look on in distress, illustrating his beating in twenty-two marketplaces.
Devotional painting depicting Haridasa Thakura being caned by order of the qazi while devotee boys look on in distress, illustrating his beating in twenty-two marketplaces.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution

श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने से बहुत पहले, श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) पर कृष्ण के नामों का जप करने के लिए मुकदमा चलाया गया। उनका जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था, इसलिए उनके ज़िले के काज़ी ने शासक से उनकी शिकायत की। जब उन्होंने पवित्र नाम छोड़ने से इनकार किया, तो उन्हें दण्ड सुनाया गया कि बाईस बाज़ारों में उन्हें तब तक बेंतों से पीटा जाए, जब तक उनके प्राण न निकल जाएँ। लेकिन वे बच गए। उन्होंने उन्हीं लोगों के लिए प्रार्थना की, जो उन्हें पीट रहे थे, और अन्त में उनके न्यायाधीशों ने भी उन्हें प्रणाम किया। वृन्दावन दास ठाकुर चैतन्य-भागवत के आदि-खण्ड के सोलहवें अध्याय में यह पूरी कथा बताते हैं, और कृष्णदास कविराज गोस्वामी ये लीलाएँ उन्हीं के वर्णन पर छोड़ देते हैं (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.47)। श्रील प्रभुपाद हर पाठक को उसी अध्याय की ओर भेजते हैं: "चैतन्य-भागवत के आदि-खण्ड के सोलहवें अध्याय में एक मुस्लिम न्यायाधीश द्वारा उन्हें दिए गए दण्ड का जो वर्णन है, उससे हम समझ सकते हैं कि हरिदास ठाकुर कितने विनम्र और दीन थे, और उन्होंने भगवान की अहैतुकी कृपा कैसे प्राप्त की" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43 का तात्पर्य)।

काज़ी ने शिकायत क्यों की #

फुलिया में हरिदास प्रतिदिन गंगा में स्नान करते थे। फिर वे ऊँचे स्वर में हरि के नाम पुकारते हुए घूमते रहते थे (चैतन्य-भागवत आदि 16.35)। वहाँ का काज़ी, यानी मुस्लिम न्यायाधीश, यह सहन नहीं कर सका कि उसके अपने समुदाय का एक व्यक्ति दूसरे धर्म की रीति पर चल रहा है। उसे यह डर भी था कि दूसरे लोग भी हरिदास के पीछे चल पड़ेंगे। इसलिए वह ज़िले के शासक के पास गया और माँग की कि हरिदास पर मुकदमा चलाया जाए। शासक ने उन्हें तुरन्त बुलवा लिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.36-38)। श्रील प्रभुपाद एक ही पंक्ति में पूरा आरोप बता देते हैं: "हरिदास ठाकुर, जो जन्म से मुसलमान थे, एक बहुत महान भक्त थे और सदा हरे कृष्ण का जप करते रहते थे। बस यही उनका एकमात्र दोष था।" (भगवान कपिल की शिक्षाएँ 11)

कृष्ण की कृपा से हरिदास को शासकों का, यहाँ तक कि मृत्यु का भी, कोई डर नहीं था। वे "कृष्ण, कृष्ण" कहते हुए तुरन्त चल पड़े। वहाँ के भले लोग उनका साहस देखकर प्रसन्न हुए, लेकिन उन्हें उनके प्राणों की चिन्ता भी होने लगी (चैतन्य-भागवत आदि 16.39-41)। किसने क्या किया, इस बारे में वृत्तान्तों में थोड़ा अन्तर है। तीर्थ महाराज शासक को नवाब कहते हैं। श्रील प्रभुपाद यह कथा संक्षेप में सुनाते हैं, और पूछताछ और दण्ड, दोनों काज़ी के नाम करते हैं। चैतन्य-भागवत में शासक हरिदास से प्रश्न करता है, और काज़ी दण्ड का सुझाव देता है।

बन्दियों के लिए एक आशीर्वाद #

शासक के सामने ले जाने से पहले हरिदास को शासक के कारागार के बन्दियों के बीच लाया गया। उनमें से कुछ अच्छे परिवारों के लोग थे। जब उन्होंने सुना कि हरिदास आए हैं, तो वे प्रसन्न हुए। उन्हें आशा थी कि ऐसे महान वैष्णव के दर्शन से उनका कष्ट दूर हो जाएगा। उन्होंने पहरेदारों को मनाकर उनसे मिलने की अनुमति ली, और उनके चरणों में प्रणाम किया (चैतन्य-भागवत आदि 16.42-48)। हरिदास ने प्रेम से मुस्कुराकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे जैसे हैं, वैसे ही बने रहें। यह सुनकर बन्दी बहुत दुखी हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि हरिदास चाहते हैं कि वे बेड़ियों में ही पड़े रहें। तब हरिदास ने समझाया (चैतन्य-भागवत आदि 16.49-62):

"मेरा अर्थ यह नहीं है कि तुम बन्दी ही बने रहो। मेरा अर्थ यह है कि तुम इन्द्रिय-तृप्ति को भूल जाओ और हरे कृष्ण का जप करो। मेरे आशीर्वाद का यही अर्थ था। इस बात के लिए एक पल भी दुखी मत होओ।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.63-64, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)

उन्होंने बन्दियों को बताया कि कारागार में, व्यापार और परिवार से दूर, उनका मन कृष्ण की ओर मुड़ गया है। लेकिन बाहर जाते ही पुरानी आसक्तियाँ उन्हें जल्दी ही फिर से खींच लेंगी। उन्होंने यह वचन भी दिया कि दो-तीन दिनों में वे छूट जाएँगे (चैतन्य-भागवत आदि 16.55-67)। अपने ही मुकदमे के लिए जाते हुए भी हरिदास दूसरों के भले के बारे में सोच रहे थे।

शासक के सामने: "ईश्वर एक है" #

शासक ने हरिदास के मुख पर उज्ज्वल तेज देखा। इसलिए उसने उन्हें बैठने के लिए आसन दिया और लगभग कोमलता से उनसे प्रश्न किया। उसने कहा कि बड़े सौभाग्य से हरिदास का जन्म मुसलमान के रूप में हुआ है। फिर वे दूसरे धर्म की रीतियाँ अपनाकर अपने को नीचा क्यों कर रहे हैं? यदि वे कलिमा पढ़ लें, तो अनजाने में किया गया उनका हर दोष मिट जाएगा (चैतन्य-भागवत आदि 16.69-74)। माया की शक्ति देखकर हरिदास धीरे से हँसे, और फिर बहुत मधुरता से उत्तर दिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.75-76)। तीर्थ महाराज के अनुवाद में उन्होंने कहा: "ईश्वर एक है। हर धर्म में वही एक ईश्वर है। वह अद्वय परम सत्य है।"

हरिदास ने समझाया कि अन्तर केवल उन नामों में है, जिनसे लोग उसे पुकारते हैं: "वही ईश्वर हर एक जीव के हृदय में बैठा है, और वह हर जीव को अलग-अलग ढंग से अपनी सेवा में लगाता है। वह जिसे जैसी पूजा करने में लगाता है, वह वैसी ही पूजा करता है।" उन्होंने बताया कि ब्राह्मण के रूप में जन्मे कुछ लोग इस्लाम अपना लेते हैं। उसी प्रकार उनका जन्म तो मुसलमान के रूप में हुआ, लेकिन भगवान ने उन्हें कृष्ण के नामों के जप में लगा दिया है। अन्त में उन्होंने बिना किसी विद्रोह के, नम्रता से कहा: "ऐसी बातों में जीव स्वतंत्र नहीं होता। यदि यह दोष है, तो कृपया मुझे दण्ड दीजिए।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.76-85)

हृदय में बैठे भगवान के बारे में उनके वचन वही हैं, जो भगवद्गीता में स्वयं कृष्ण सिखाते हैं:

ईश्वरः सर्वभूतानां
हृद्देशे ऽर्जुन तिष्ठति
भ्रामयन्सर्वभूतानि
यन्त्रारूढानि मायया

"हे अर्जुन, परमेश्वर सबके हृदय में स्थित हैं, और भौतिक शक्ति से बने यन्त्र पर मानो बैठे हुए सभी जीवों के भ्रमण का निर्देशन कर रहे हैं।" (भगवद्गीता 18.61)

"मैं पवित्र नाम कभी नहीं छोड़ूँगा" #

वहाँ उपस्थित मुसलमान इस उत्तर से सन्तुष्ट हो गए, लेकिन काज़ी सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने शासक पर दबाव डाला कि दूसरों को चेतावनी देने के लिए हरिदास को दण्ड दिया जाए, या कम से कम उनसे ज़बरदस्ती कलिमा पढ़वाया जाए। उसने कहा कि नहीं तो हरिदास दूसरों को भी भटका देंगे (चैतन्य-भागवत आदि 16.86-89)। तब हरिदास से कहा गया कि वे केवल अपने धर्म के नाम लें, नहीं तो भयंकर दण्ड भुगतें। उनका उत्तर तब से भक्तों को बहुत प्रिय रहा है:

"चाहे आप मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दें, और प्राण भी इसे छोड़ दें, फिर भी मैं उस पवित्र नाम को कभी नहीं छोड़ूँगा, जिसका जप मेरी जिह्वा सदा करती रहेगी।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.91, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर; कुछ दूसरे संस्करणों में यह श्लोक 16.94 है)

कृष्णदास कविराज गोस्वामी प्रभु के पार्षदों की सूची में इस पूरे मुकदमे के लिए बस एक पंक्ति लिखते हैं, और वह पंक्ति हरिदास के मन की स्थिति दिखाती है:

प्रह्लाद-समान ताँर गुणेर तरङ्ग
यवन-ताडनेओ याँर नाहिक भ्रू-भङ्ग

"उनके सद्गुणों की लहरें प्रह्लाद महाराज के गुणों जैसी थीं। जब मुसलमान शासक ने उन्हें सताया, तब उन्होंने ज़रा-सी भौंह भी नहीं चढ़ाई।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 10.45)

बाईस बाज़ारों का दण्ड #

शासक ने काज़ी की ओर मुड़कर पूछा कि अब क्या किया जाए। काज़ी का उत्तर वास्तव में मृत्यु-दण्ड था, भले ही उसने उसे परीक्षा कहा। तीर्थ महाराज के अनुवाद में उसके शब्द हैं: "इसे बाईस बाज़ारों में सबके सामने तब तक कोड़े मारे जाएँ, जब तक यह मर न जाए। यदि बाईस बाज़ारों में पिटने के बाद भी यह जीवित रहा, तो हम जान लेंगे कि इसमें सचमुच कोई आध्यात्मिक शक्ति है और यह सच बोल रहा था!" (चैतन्य-भागवत आदि 16.95-97)। काज़ी ने पहरेदारों से कहा कि उसे तब तक पीटो, जब तक वह मर न जाए, और शासक ने आदेश दे दिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.98-100)।

श्रील प्रभुपाद समझाते हैं कि इस दण्ड का अर्थ क्या था: "काज़ी बहुत क्रोधित हुआ और उसने आदेश दिया कि हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में कोड़े लगाए जाएँ। इसका वास्तविक अर्थ यह था कि उन्हें पीट-पीटकर मार डाला जाए, लेकिन क्योंकि वे इतने महान भक्त थे, इसलिए उन्हें वास्तव में पीड़ा अनुभव नहीं हुई।" (भगवान कपिल की शिक्षाएँ 11) 1976 में वृन्दावन के एक प्रवचन में उन्होंने बात करते-करते "इक्कीस बाज़ार" कहा था (श्रीमद्भागवतम् पर प्रवचन, 19 नवम्बर 1976)। चैतन्य-भागवत और उनके ग्रन्थ यह संख्या बाईस बताते हैं।

बाज़ार-बाज़ार में पिटाई #

पहरेदार हरिदास को एक बाज़ार से दूसरे बाज़ार तक घसीटते ले गए और पूरी ताकत से उन्हें पीटते रहे। लेकिन हरिदास बस कृष्ण का नाम स्मरण करते रहे। नाम के आनन्द के कारण उन्हें मार का पता ही नहीं चला, ठीक वैसे ही जैसे दैत्यों के पीटने पर प्रह्लाद महाराज को कोई पीड़ा नहीं हुई थी (चैतन्य-भागवत आदि 16.101-110)। यह देखकर भले लोग काँप उठे। कुछ लोग चिल्लाने लगे कि एक सन्त के साथ ऐसा व्यवहार करने से पूरा राज्य नष्ट हो जाएगा। कुछ लोग शासक और काज़ी को शाप देने लगे, और कुछ लड़ने को तैयार हो गए। दूसरे लोग पहरेदारों के पैरों पर गिर पड़े और धीरे मारने के लिए उन्हें धन देने लगे, लेकिन पहरेदारों ने कोई दया नहीं दिखाई (चैतन्य-भागवत आदि 16.103-107)।

श्रील प्रभुपाद ने हरिदास की इस शान्ति में शुद्ध भक्त का लक्षण देखा। शुद्ध भक्त इस संसार के उतार-चढ़ाव से विचलित नहीं होता:

देहिनां देहसंयोगाद्
द्वन्द्वानीश्वरलीलया
सुखं दुःखं मृतिर्जन्म
शापो ऽनुग्रह एव च

"परमेश्वर की बाहरी शक्ति के कार्यों के कारण जीव भौतिक शरीरों के सम्पर्क में आकर बद्ध हो जाते हैं। सुख और दुख, जन्म और मृत्यु, शाप और वरदान जैसे द्वन्द्व भौतिक संसार में इसी सम्पर्क के स्वाभाविक परिणाम हैं।" (श्रीमद्भागवतम् 6.17.29)

तात्पर्य में वे लिखते हैं: "उदाहरण के लिए, हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में बेंत से पीटा गया, लेकिन वे कभी विचलित नहीं हुए। इसके बजाय, उन्होंने मुस्कुराते हुए वह पिटाई सह ली।"

पीटने वालों के लिए प्रार्थना #

हरिदास को अपनी पीड़ा का दुख नहीं था। उन्हें दुख उन लोगों के भविष्य का था, जो उन्हें पीट रहे थे। जब बेंत उन पर पड़ रहा था, तब भी वे उनके लिए प्रार्थना करते रहे:

"हे प्रभु, इन सब बेचारे जीवों पर दया करो! ये मुझसे शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं, फिर भी इसे अपराध मत मानना।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.110, तीर्थ महाराज की पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर; कुछ दूसरे संस्करणों में यह श्लोक 16.113 है)

वर्षों बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने पवित्र नाम का जप करने वाले हर व्यक्ति से यही सहनशीलता माँगी:

तृणादपि सुनीचेन
तरोरिव सहिष्णुना
अमानिना मानदेन
कीर्तनीयः सदा हरिः

"जो स्वयं को घास से भी नीचा समझता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहनशील है, और जो अपने लिए सम्मान की आशा नहीं रखता, फिर भी दूसरों को पूरा सम्मान देने के लिए सदा तैयार रहता है, वह बहुत सरलता से सदा भगवान के पवित्र नाम का जप कर सकता है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 17.31)

श्रील प्रभुपाद इस सहनशीलता के सबसे अच्छे उदाहरण के रूप में हरिदास का नाम लेते हैं: "हरिदास ठाकुर अपनी सहनशीलता के लिए असाधारण हैं, क्योंकि बाईस बाज़ारों में बेंतों से पीटे जाने पर भी वे सहनशील बने रहे।" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.84 का तात्पर्य)

गंगा में बहा दिए गए #

बाईस बाज़ारों के बाद भी हरिदास जीवित थे, और मुस्कुरा भी रहे थे। उन्हें पीटने वाले सोचने लगे कि कहीं वे पीर, यानी कोई मुस्लिम सन्त, तो नहीं हैं (चैतन्य-भागवत आदि 16.114-118)। उन्हें अपने लिए भी डर लगने लगा, क्योंकि यदि हरिदास जीवित रहते, तो काज़ी उन्हें अवश्य मरवा देता (चैतन्य-भागवत आदि 16.119-120)। श्रील प्रभुपाद ने एक बार यह दृश्य इस प्रकार बताया: "तो वे उनकी खुशामद करने लगे, 'महाशय, जब तक आप नहीं मरेंगे, हम मारे जाएँगे। हमारे प्राण बड़े संकट में हैं।' तो हरिदास ठाकुर ने मृत्यु का दिखावा किया, और उन्हें काज़ी के सामने लाया गया" (श्रीमद्भागवतम् पर प्रवचन, 19 नवम्बर 1976)। उन पर दया करके हरिदास कृष्ण के गहरे ध्यान में चले गए, और उनकी साँस रुक गई (चैतन्य-भागवत आदि 16.121-123)।

वे लोग उनके निश्चल शरीर को शासक के पास ले गए। शासक ने उसे दफ़नाने का आदेश दिया। लेकिन काज़ी ने आपत्ति की। उसने कहा कि दफ़नाने से ऐसे व्यक्ति को मृत्यु के बाद अच्छी गति मिल जाएगी, इसलिए शरीर को गंगा में फेंक दिया जाए (चैतन्य-भागवत आदि 16.124-128)। चैतन्य-भागवत आगे बताता है कि कुछ समय तक सबसे बलवान पहरेदार भी उन्हें हिला नहीं सके, क्योंकि स्वयं भगवान उनके शरीर में प्रवेश कर गए थे (चैतन्य-भागवत आदि 16.129-132)। नदी में हरिदास बहते रहे। वे कृष्ण में इतने लीन थे कि उन्हें पता ही नहीं था कि वे आकाश में हैं, धरती पर हैं या जल में। कुछ समय बाद उन्हें फिर से बाहरी होश आया। वे किनारे पर चढ़ आए और ऊँचे स्वर में कृष्ण के नाम लेते हुए फुलिया की ओर चल पड़े (चैतन्य-भागवत आदि 16.133-145)। वृन्दावन दास उनकी तुलना हनुमान से करते हैं, जिन्होंने ब्रह्मा के सम्मान में स्वयं को ब्रह्मास्त्र से बँध जाने दिया था। उसी प्रकार, जिनके रक्षक स्वयं गोविन्द हों, उन हरिदास को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता था। उन्होंने यह मार केवल संसार को शिक्षा देने के लिए स्वीकार की (चैतन्य-भागवत आदि 16.137-140)।

शासक ने क्षमा माँगी #

जब मुसलमानों ने उनकी शक्ति देखी, तो वे अपनी घृणा भूल गए। उन्होंने हरिदास को पीर मानकर प्रणाम किया और अपने पापों से मुक्त हो गए (चैतन्य-भागवत आदि 16.146-147)। शासक स्वयं हाथ जोड़कर उनके पास आया। उसने कहा कि अब वह जान गया है कि हरिदास एक सच्चे सन्त हैं, जो इस ज्ञान में स्थिर हैं कि ईश्वर एक है। उसने हरिदास से अपने सब अपराधों के लिए क्षमा माँगी। उसने यह भी कहा कि वे जहाँ चाहें जाने के लिए स्वतंत्र हैं, चाहे गंगा-तट की किसी गुफा में रहें या कहीं और (चैतन्य-भागवत आदि 16.148-155)। जिस व्यक्ति ने उनकी मृत्यु का आदेश दिया था, अब वही उनके चरण पकड़े हुए था (चैतन्य-भागवत आदि 16.157)। तीर्थ महाराज आगे बताते हैं कि काज़ी ने भी उन्हें प्रणाम किया, और शासक ने हरिदास को औपचारिक अनुमति दी कि वे जहाँ भी जाएँ, पवित्र नाम का जप करें।

बस एक छोटा-सा दण्ड #

पिटाई का समाचार सुनकर फुलिया के ब्राह्मणों का हृदय टूट गया था। जब हरिदास जप करते हुए उनके बीच लौटे, तो वे आनन्द से भर उठे। उन्होंने हरिदास के चारों ओर हरि-नाम का कीर्तन किया, और हरिदास प्रेम में नाचने लगे (चैतन्य-भागवत आदि 16.159-164)। फिर हरिदास ने उनसे कहा कि वे उनके लिए दुखी न हों। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने कानों से भगवान की बहुत निन्दा सुनी थी, और विष्णु की निन्दा सुनना बड़ा पाप है। भगवान ने बस एक छोटे-से दण्ड से वह बड़ा अपराध मिटा दिया (चैतन्य-भागवत आदि 16.165-169)। जहाँ बाकी सबको क्रूरता दिखी, वहाँ हरिदास को केवल भगवान की दया दिखी। वृन्दावन दास आगे बताते हैं कि जिन लोगों ने उन्हें पीटा था, वे कुछ ही दिनों में अपने परिवारों सहित नष्ट हो गए (चैतन्य-भागवत आदि 16.171)।

श्रील प्रभुपाद कष्ट को देखने का यही ढंग तब सिखाते हैं, जब वे डरे हुए देवताओं से कहे गए ब्रह्मा के वचनों को समझाते हैं:

विश्वस्य यः स्थितिलयोद्भवहेतुराद्यो
योगेश्वरैरपि दुरत्यययोगमायः
क्षेमं विधास्यति स नो भगवांस्त्र्यधीशस्
तत्रास्मदीयविमृशेन कियानिहार्थः

"मेरे प्रिय पुत्रो, भगवान प्रकृति के तीनों गुणों के नियन्ता हैं, और वे ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालन और संहार के कारण हैं। उनकी अद्भुत सृजन-शक्ति, योगमाया, को योग के आचार्य भी आसानी से नहीं समझ सकते। वही सबसे प्राचीन पुरुष, भगवान, अकेले हमारी रक्षा करेंगे। इस विषय पर सोच-विचार करके हम उनकी ओर से क्या कर सकते हैं?" (श्रीमद्भागवतम् 3.16.37)

तात्पर्य में वे लिखते हैं: "जब कोई बात भगवान की व्यवस्था से होती है, तो उससे किसी को विचलित नहीं होना चाहिए, भले ही वह अपने हिसाब से उलटी लगती हो।" अपने उदाहरणों में वे हरिदास का नाम भी लेते हैं: "लेकिन हरिदास को काज़ी के हाथों बाईस बाज़ारों में पिटवाकर दण्ड दिया गया।" और ऐसे भक्त के बारे में वे कहते हैं: "वह उलटी परिस्थितियों को भी भगवान की कृपा मानकर स्वीकार करता है।"

प्रभु जिन्होंने मार अपने ऊपर ली #

वर्षों बाद स्वयं प्रभु ने बताया कि वह मार वास्तव में किसने सही थी। नवद्वीप में, जब उन्होंने श्रीवास ठाकुर के घर में अपना दिव्य ऐश्वर्य प्रकट किया, तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास को आगे बुलाया। उन्होंने कहा कि जब पहरेदार हरिदास को गाँव-गाँव पीट रहे थे, तब वे उन पहरेदारों के टुकड़े-टुकड़े करने के लिए अपना चक्र लेकर उतर आए थे। लेकिन हरिदास उन्हीं के भले के लिए प्रार्थना कर रहे थे, इसलिए चक्र कुछ नहीं कर सका। तब प्रभु ने हरिदास की पीठ को अपने शरीर से ढक लिया और सारी मार स्वयं सह ली। उन्होंने हरिदास को उस मार के निशान भी दिखाए (चैतन्य-भागवत मध्य 10.35-44)। यह सुनकर हरिदास प्रेम में अचेत हो गए (चैतन्य-भागवत मध्य 10.52-56)। वह क्षण, और हरिदास से कहे गए प्रभु के प्रेम-भरे वचन, श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन में बताए गए हैं।

श्रील प्रभुपाद इससे क्या सिखाते हैं #

श्रील प्रभुपाद बार-बार इस प्रसंग की चर्चा करते थे। वे इससे दिखाते थे कि सच्चे प्रचार का विरोध होगा ही, और साधु उस विरोध का उत्तर दया से देता है। साधु के गुणों को समझाते हुए वे लिखते हैं (श्रीमद्भागवतम् 3.25.21 का तात्पर्य): "कभी-कभी भक्तों पर व्यक्तिगत रूप से हिंसक आक्रमण किया जाता है। प्रभु ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया, हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में बेंतों से पीटा गया, और भगवान चैतन्य के प्रमुख सहायक नित्यानन्द पर जगाई और माधाई ने हिंसक आक्रमण किया। फिर भी वे सहनशील रहे, क्योंकि उनका उद्देश्य पतित जीवों का उद्धार करना था।" जिस श्लोक की वे व्याख्या कर रहे थे, उसमें साधु का वर्णन इस प्रकार है:

तितिक्षवः कारुणिकाः
सुहृदः सर्वदेहिनाम्
अजातशत्रवः शान्ताः
साधवः साधुभूषणाः

"साधु के लक्षण यह हैं कि वह सहनशील, दयालु और सभी जीवों का मित्र होता है। उसका कोई शत्रु नहीं होता, वह शान्त होता है, शास्त्रों का पालन करता है, और उसके सभी गुण उत्तम होते हैं।" (श्रीमद्भागवतम् 3.25.21)

"भगवान कपिल की शिक्षाएँ" नामक पुस्तक में इसी श्लोक पर बोलते हुए वे आगे कहते हैं: "भले ही भक्त को कभी-कभी कष्ट सहना पड़े, वह उस कष्ट को सह लेता है। साथ ही, वह बद्ध जीवों पर बहुत दया करता है और उन्हें कृष्णभावनामृत तक ऊपर उठाने का प्रयत्न करता है।" (भगवान कपिल की शिक्षाएँ 11) नित्यानन्द प्रभु ने जगाई और माधाई पर यही दया दिखाई थी। हरिदास की सहनशीलता और दया एक और कथा में भी उतनी ही उज्ज्वल दिखाई देती है। वह कथा बेनापोल की है, जहाँ रामचन्द्र खाँ ने उनकी कुटिया पर एक वेश्या को भेजा था। यह कथा वेश्या की परीक्षा में पढ़ें।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (8)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

তিতিক্ষবঃ কারুণিকাঃ সুহৃদঃ সর্বদেহিনাম্। অজাতশত্রবঃ শান্তাঃ সাধবঃ সাধুভূষণাঃ॥

titikṣavaḥ kāruṇikāḥ suhṛdaḥ sarva-dehinām
ajāta-śatravaḥ śāntāḥ sādhavaḥ sādhu-bhūṣaṇāḥ

शब्दार्थ

titikṣavaḥ: tolerant; kāruṇikāḥ: merciful; suhṛdaḥ: friendly; sarva-dehinām: to all living entities; ajāta-śatravaḥ: inimical to none; śāntāḥ: peaceful; sādhavaḥ: abiding by scriptures; sādhu-bhūṣaṇāḥ: adorned with sublime characteristics.

साधु के लक्षण यह हैं कि वह सहिष्णु, दयालु और समस्त जीवों के प्रति मैत्रीपूर्ण होता है। उसका कोई शत्रु नहीं होता, वह शान्त होता है, शास्त्रों का पालन करता है, और उसके सभी गुण उत्कृष्ट होते हैं।

तात्पर्य से: तात्पर्य का अंश: "कभी-कभी भक्तों पर हिंसापूर्वक व्यक्तिगत आक्रमण किया जाता है। प्रभु ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया, हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में पिटवाया गया, और भगवान चैतन्य के प्रमुख सहायक नित्यानन्द पर जगाई-माधाई द्वारा हिंसक आक्रमण किया गया।"

SB 3.25.21 Srimad-Bhagavatam

श्रील प्रभुपाद हरिदास ठाकुर की पिटाई को इस बात के आदर्श उदाहरण के रूप में बताते हैं कि हिंसक उत्पीड़न सहते हुए भी साधु कैसी सहनशीलता रखता है।

अनुपम-वल्लभ, श्री-रूप, सनातन
एइ तिन शाखा वृक्षेर पश्चिमे सर्वोत्तम

anupama-vallabha, śrī-rūpa, sanātana
ei tina śākhā vṛkṣera paścime sarvottama

पश्चिम दिशा में तैंतालीसवीं, चौवालीसवीं और पैंतालीसवीं शाखाएँ थीं, श्री सनातन, श्री रूप और अनुपम। वे सबसे श्रेष्ठ थे।

तात्पर्य से: हरिदास ठाकुर अपनी सहनशीलता के लिए असाधारण हैं, क्योंकि बाईस बाज़ारों में बेंतों से पीटे जाने पर भी वे सहनशील बने रहे। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत आदि 10.84 का तात्पर्य)

Adi 10.84 Sri Chaitanya-charitamrita

यह केवल तात्पर्य के लिए उद्धृत है: श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि बाईस बाज़ारों में पिटने पर भी सहनशील रहने के कारण हरिदास असाधारण हैं। श्लोक स्वयं रूप, सनातन और अनुपम के बारे में है।

हरिदास-ठाकुर शाखार अद्भुत चरित
तिन लक्ष नाम तेँहो लयेन अपतित

haridāsa-ṭhākura śākhāra adbhuta carita
tina lakṣa nāma teṅho layena apatita

चैतन्य-वृक्ष की बीसवीं शाखा हरिदास ठाकुर थे। उनका चरित्र अद्भुत था। वे प्रतिदिन बिना चूके तीन लाख बार कृष्ण के पवित्र नाम का जप करते थे।

तात्पर्य से: चैतन्य-भागवत के आदि-खण्ड के सोलहवें अध्याय में एक मुस्लिम न्यायाधीश द्वारा उन्हें दिए गए दण्ड का जो वर्णन है, उससे हम समझ सकते हैं कि हरिदास ठाकुर कितने विनम्र और दीन थे, और उन्होंने भगवान की अहैतुकी कृपा कैसे प्राप्त की। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43 का तात्पर्य)

Adi 10.43 Sri Chaitanya-charitamrita

हरिदास के मुकदमे और पिटाई के वर्णन के लिए श्रील प्रभुपाद पाठकों को चैतन्य-भागवत आदि 16 की ओर भेजते हैं।

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अध्याय 3

जप-व्रत और वेश्या की परीक्षा

एक ईर्ष्यालु ज़मींदार ने हरिदास ठाकुर के जप-व्रत को भंग करने के लिए एक भाड़े की वेश्या भेजी; लेकिन तीन रातों बाद हरिदास नहीं, बल्कि वह स्वयं पूरी तरह बदल चुकी थी।

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Painting of Haridasa Thakura seated in his cottage, chanting, as the prostitute sent by Ramachandra Khan approaches him at the door.
Painting of Haridasa Thakura seated in his cottage, chanting, as the prostitute sent by Ramachandra Khan approaches him at the door.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution

जब कृष्णदास कविराज गोस्वामी अन्त्य-लीला के तीसरे अध्याय पर पहुँचे, तो उन्होंने भक्तों से श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) के उन गुणों के बारे में सुनने को कहा, "जिनका वर्णन श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने विस्तार से नहीं किया है" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.98)। इसलिए आगे की कथाएँ हमें चैतन्य-चरितामृत से मिलती हैं। ये उन बातों में से हैं, जिन्हें वृन्दावन दास ठाकुर ने विस्तार से नहीं कहा था। ये कथाएँ बेनापोल के वन से शुरू होती हैं, जहाँ हरिदास घर छोड़ने के बाद कुछ समय तक रहे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.99)। श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि बेनापोल जेसोर (यशोहर) ज़िले में, बनगाँव के पास है, जो आज बांग्लादेश की सीमा पर है (अन्त्य 3.100 का तात्पर्य)। चैतन्य-भागवत उनके आरम्भिक जीवन की कथा फुलिया से शुरू करता है, और उनके जन्म और आरम्भिक जीवन का वर्णन उसी क्रम में चलता है।

उस वन में उन्होंने अपने लिए एक कुटिया बनाई और उसके सामने तुलसी (tulasī) का एक पौधा लगाया। वे किसी ब्राह्मण के घर से थोड़ा-सा भोजन माँग लेते थे, और दिन-रात जप करते थे:

निर्जन-वने कुटिर करि' तुलसी सेवन
रात्रि-दिने तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्तन

"हरिदास ठाकुर ने एक निर्जन वन में एक कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने तुलसी का एक पौधा लगाया, और तुलसी के सामने वे प्रतिदिन तीन लाख बार भगवान के पवित्र नाम का जप करते थे। वे पूरे दिन और पूरी रात जप करते रहते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.100)

ब्राह्मणेर घरे करे भिक्षा निर्वाहण
प्रभावे सकल लोक करये पूजन

"अपने शरीर के निर्वाह के लिए वे किसी ब्राह्मण के घर जाकर थोड़ा भोजन माँग लेते थे। वे आध्यात्मिक रूप से इतने प्रभावशाली थे कि आस-पास के सभी लोग उनकी पूजा करते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.101)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "उनके व्यक्तिगत उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि हरे कृष्ण मन्त्र का जप करना और कृष्णभावनामृत में अत्यन्त उन्नत होना बहुत सरल है।"

वह ज़मींदार जो उनकी ख्याति सह न सका #

गाँव वाले इस निर्धन साधु से जो प्रेम करते थे, वह एक शक्तिशाली व्यक्ति से सहन नहीं हुआ:

सेइ देशाध्यक्ष नाम — रामचन्द्र खाँन
वैष्णव-विद्वेषी सेइ पाषण्ड-प्रधान

"रामचन्द्र खाँ नाम का एक भू-स्वामी उस ज़िले का ज़मींदार था। वह वैष्णवों से ईर्ष्या करता था, और इसलिए वह एक बड़ा नास्तिक था।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.102)

उसने हरिदास को बदनाम करने के कई उपाय किए। लेकिन ठाकुर के जीवन में कोई दोष था ही नहीं, जिसे वह सबके सामने ला सके। इसलिए उसने एक दोष गढ़ने की ठानी। उसने उस क्षेत्र की वेश्याओं को बुलाया और उनसे कहा कि इस वैरागी का व्रत भंग करो (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.103-105)। श्रील प्रभुपाद ने अपने समय के आलोचकों में भी यही भाव देखा, जो दोष ढूँढ़ते फिरते थे, "ठीक उस पुराने दुष्ट रामचन्द्र खाँ की तरह, जिसने हरिदास ठाकुर का विरोध किया था" (अन्त्य 3.104 का तात्पर्य)। एक सुन्दर युवती ने वचन दिया कि वह तीन दिन के भीतर हरिदास का मन अपने वश में कर लेगी। ज़मींदार चाहता था कि उसका सिपाही उसके साथ जाए और हरिदास को वहीं पकड़ ले। लेकिन उस युवती ने उसे रुकने को कहा। उसने कहा कि पहले वह एक बार हरिदास के साथ हो ले, फिर दूसरी बार वह सिपाही को साथ ले जाएगी (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.106-108)।

पहली रात #

उस रात उसने बड़े ध्यान से श्रृंगार किया और बड़े उत्साह के साथ कुटिया पर गई। ऐसे काम के लिए आई स्त्री के लिए यह अजीब बात थी कि उसने पहले तुलसी के पौधे को प्रणाम किया और फिर हरिदास को (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.109-110)। वह द्वार की देहली पर बैठ गई और अपने शरीर का कुछ भाग खोलकर उनकी सुन्दरता और उनके यौवन की प्रशंसा करने लगी। उसके शब्दों में उनका यौवन "अभी आरम्भ ही हुआ है"। उसने कहा कि वह उनके बिना जी नहीं सकती (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.111-113)। हरिदास ने न क्रोध दिखाया, न उसे कोई उपदेश दिया। ऊपर से सुनने में उनका उत्तर एक वचन जैसा लगता था:

हरिदास कहे, — “तोमा करिमु अङ्गीकार
सङ्ख्या-नाम-समाप्ति यावत् ना हय आमार
तावत् तुमि वसि' शुन नाम-सङ्कीर्तन
नाम-समाप्ति हैले करिमु ये तोमार मन”

"हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, 'मैं तुम्हें अवश्य स्वीकार करूँगा, लेकिन तुम्हें तब तक प्रतीक्षा करनी होगी, जब तक मैं अपनी माला पर अपना नियमित जप पूरा न कर लूँ। तब तक कृपया बैठकर पवित्र नाम का कीर्तन सुनो। जैसे ही मेरा जप पूरा होगा, मैं तुम्हारी इच्छा पूरी कर दूँगा।'" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.114-115)

तो वह बैठी रही और वे जप करते रहे, जब तक सुबह का पहला उजाला नहीं हो गया। तब वह रामचन्द्र खाँ के पास लौट गई। उसने उसे बताया कि हरिदास ने वचन दे दिया है, और कल वह अवश्य सफल होगी (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.116-118)।

दूसरी रात #

अगली रात हरिदास ने उसे बहुत-से आश्वासन देकर उसका स्वागत किया। उन्होंने पिछली रात की निराशा के लिए उससे क्षमा भी माँगी। फिर उन्होंने उससे दोबारा कहा कि जब तक उनके नामों की संख्या पूरी न हो जाए, तब तक वह बैठकर महामन्त्र सुने (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.119-121)। तब कुछ ऐसा हुआ, जिसकी योजना न उस स्त्री ने बनाई थी, न ज़मींदार ने:

तुलसीरे ताँके वेश्या नमस्कार करि'
द्वारे वसि' नाम शुने बले ‘हरि’ ‘हरि’

"तुलसी के पौधे और हरिदास ठाकुर को प्रणाम करके वह द्वार पर बैठ गई। हरिदास ठाकुर को हरे कृष्ण मन्त्र का जप करते सुनकर वह भी बोलने लगी, 'हे मेरे प्रभु हरि, हे मेरे प्रभु हरि।'" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.122)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "वेश्या हरिदास ठाकुर को दूषित करने आई थी, परन्तु उन्होंने उसका उद्धार करना अपना कर्तव्य माना।"

भोर होने तक वह बेचैन हो गई। हरिदास ने उसे समझाया कि उन्होंने एक महीने में एक करोड़ नाम जपने का व्रत लिया है। व्रत लगभग पूरा हो चुका है। उसे पूरा करने की आशा में उन्होंने पूरी रात जप किया, फिर भी वह अभी पूरा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि कल वे मुक्त हो जाएँगे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.123-126)। पाठक इन वचनों पर अटक सकता है, और श्रील प्रभुपाद इसका सीधा उत्तर देते हैं: "हरिदास ठाकुर कभी भी उस वेश्या का भोग नहीं करना चाहते थे। उन्होंने उसका उद्धार करने के लिए उसे युक्ति से बहलाया, ताकि जब वे जप करें तो उसे भगवान का पवित्र नाम सुनने का अवसर मिले" (अन्त्य 3.126 का तात्पर्य)।

तीसरी रात: बदला हुआ हृदय #

तीसरे दिन वह जल्दी आ गई, शाम होते ही। उसने फिर तुलसी को और ठाकुर को प्रणाम किया, द्वार पर बैठी, सुनती रही और स्वयं भी "हरि, हरि" बोलती रही। हरिदास ने उससे कहा कि आज रात उनका जप अवश्य पूरा हो जाएगा (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.127-129)। पिछली दो रातों की तरह यह रात भी कीर्तन में बीत गई। लेकिन रात के अन्त तक, जैसा कृष्णदास कविराज गोस्वामी बताते हैं, "उनके संग से उस वेश्या का मन बदल गया था" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.130)।

वह उनके चरणों में दण्डवत् गिर पड़ी। उसने रामचन्द्र खाँ का षड्यन्त्र स्वीकार किया और विनती की: "हे प्रभु, मुझ पर कृपा कीजिए। मुझ पतित का उद्धार कीजिए" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.131-132)। हरिदास से कुछ भी छिपा नहीं था। उन्हें आरम्भ से ही इस षड्यन्त्र का पता था। उन्होंने ज़मींदार को "एक अज्ञानी मूर्ख" कहा, जिसकी चालों से उन्हें कोई दुख नहीं हुआ (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.133)। फिर उन्होंने उसे बताया कि वे वहाँ से चुपचाप क्यों नहीं चले गए:

सेइ-दिन याइताम ए-स्थान छाडिया
तिन दिन रहिलाङ तोमा निस्तार लागिया

"जिस दिन रामचन्द्र खाँ मेरे विरुद्ध षड्यन्त्र रच रहा था, उसी दिन मैं यह स्थान तुरन्त छोड़ देता, लेकिन क्योंकि तुम मेरे पास आईं, इसलिए तुम्हारा उद्धार करने के लिए मैं यहाँ तीन दिन रुका।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.134)

वे तीन रातें उनके लिए कभी कोई खतरा नहीं थीं। वे उस स्त्री पर उनकी कृपा थीं।

"कृपया मेरे गुरु बनें" #

जो स्त्री उन्हें गिराने आई थी, अब वही ऊपर उठाए जाने की प्रार्थना कर रही थी: "कृपया मेरे गुरु बनें। मुझे मेरा कर्तव्य बताइए, जिससे मुझे भौतिक जीवन से छुटकारा मिल सके" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.135)। उनका उपदेश छोटा था, पर पूरा था। उसे अपनी सम्पत्ति ब्राह्मणों को दे देनी थी और उसी कमरे में लौटकर सदा के लिए वहीं रहना था (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.136)। और फिर: "निरन्तर हरे कृष्ण मन्त्र का जप करो और तुलसी के पौधे को जल देकर तथा उनकी प्रार्थना करके उनकी सेवा करो। इस प्रकार तुम्हें बहुत शीघ्र कृष्ण के चरण-कमलों की शरण पाने का अवसर मिलेगा" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.137)। तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद इसका सार सामने रखते हैं: "हरिदास ठाकुर कहते हैं, निरन्तर नाम लओ: 'बिना रुके हरे कृष्ण मन्त्र का जप करो।'"

उसे जप करना सिखाकर हरिदास उठे और "हरि, हरि" बोलते हुए वहाँ से चले गए (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.138)। उन्होंने अपनी कुटिया, अपनी तुलसी और अपनी जीवन-शैली उसके लिए छोड़ दी। अपने साथ वे केवल पवित्र नाम ले गए।

धन ब्राह्मणों को क्यों गया #

उसने तुरन्त आज्ञा मानी और "अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए" अपने घर का सब कुछ ब्राह्मणों को दे दिया (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.139)। हरिदास, जो अपना भोजन स्वयं भिक्षा में माँगते थे, उसमें से कुछ भी अपने पास नहीं रखा। श्रील प्रभुपाद तात्पर्य में इससे शिक्षा निकालते हैं: "वैष्णव गुरु कभी अपने शिष्यों के दान पर निर्भर नहीं होता। हरिदास ठाकुर के उपदेश का पालन करते हुए, एक शुद्ध वैष्णव किसी से अपने लिए एक पैसा भी नहीं लेता, बल्कि वह अपने अनुयायियों को प्रेरित करता है कि उनके पास जो भी सम्पत्ति हो, उसे वे भगवान की सेवा में लगाएँ।"

भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर भी इस श्लोक पर अपनी अनुभाष्य टीका में यही बात कहते हैं। श्रील प्रभुपाद के तात्पर्य में यह टीका उद्धृत नहीं है, इसलिए इसे श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर दिया गया है:

"यद्यपि शिष्य की सारी सांसारिक सम्पत्ति पर गुरु का उचित अधिकार होता है, फिर भी वे उसे अपने उपयोग के लिए नहीं माँगते। ... शिष्य की सम्पत्ति, जो आखिरकार इन्द्रिय-तृप्ति के लिए ही होती है, स्वीकार न करके वैष्णव गुरु अपने शिष्य से स्वतंत्र रहते हैं और अपनी सत्यनिष्ठा पर कोई आँच नहीं आने देते। ... यहाँ हरिदास ठाकुर की शिक्षा यह है कि गुरु का कर्तव्य शिष्य के सांसारिक अहंकार को दूर करना है, न कि वह भौतिक सम्पत्ति स्वयं स्वीकार करना, जिसका शिष्य ने त्याग किया है।" (श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर, श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.139 पर अनुभाष्य, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)

एक विख्यात वैष्णवी #

उसने अपना सिर मुँड़वा लिया, केवल एक वस्त्र रखा और उसी कमरे में रहने लगी। वह "अपने गुरु के पदचिह्नों पर चलते हुए" दिन-रात तीन लाख नामों का जप करती थी (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.140)। वह तुलसी के पौधे की सेवा करती थी। भिक्षा में जो मिल जाता, उसी पर रहती थी, और जब कुछ न मिलता तो उपवास करती थी। जैसे-जैसे उसकी इन्द्रियाँ वश में आईं, उसमें कृष्ण-प्रेम के लक्षण प्रकट होने लगे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.141)।

प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम-महान्ती
बड बड वैष्णव ताँर दर्शनेते यान्ति

"इस प्रकार वह वेश्या एक विख्यात भक्त बन गई। वह आध्यात्मिक जीवन में बहुत उन्नत हो गई, और अनेक बड़े-बड़े वैष्णव उसके दर्शन करने आते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.142)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "यदि कोई पुरुष या स्त्री वैष्णव सिद्धान्तों का पालन करे, तो किसी को भी वैष्णव बनाया जा सकता है।" जिन लोगों ने उसका यह नया जीवन देखा, वे चकित रह गए। उन्होंने हरिदास को प्रणाम किया और उनकी महिमा गाई (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.143)।

श्री चैतन्य-चरितामृत उसका नाम नहीं बताता। बेनापोल की स्थानीय परम्परा, जहाँ उसकी भजन-कुटी आज भी तीर्थयात्रियों को दिखाई जाती है, उसे हीरा के नाम से स्मरण करती है। प्रतिदिन लाखों पवित्र नाम जपने के कारण बाद में वह लक्ष-हीरा (लक्षहीरा) कहलाई। श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक में उसे हर जगह लक्षहीरा ही कहा गया है। पुस्तक यह भी बताती है कि बाद में वह वन "हीरा वेश्या का जंगल" कहलाने लगा। कुछ बाद के पुनर्कथनों में यह परीक्षा कई और रातों तक चलती है। लेकिन चैतन्य-चरितामृत तीन रातें बताता है, और हरिदास स्वयं भी तीन ही गिनते हैं (अन्त्य 3.134)।

अपराध का बीज: रामचन्द्र खाँ का अन्त #

जिस व्यक्ति ने हरिदास को नष्ट करना चाहा था, उसके प्रति उनके मन में कोई द्वेष नहीं था। लेकिन भगवान अपने भक्त के प्रति किए गए अपराध को अनदेखा नहीं करते:

रामचन्द्र खाँन अपराध-बीज कैल
सेइ बीज वृक्ष हञा आगेते फलिल

"एक वेश्या को उकसाकर हरिदास ठाकुर को विचलित करने के प्रयास से, रामचन्द्र खाँ ने उनके चरण-कमलों पर अपराध का एक बीज अंकुरित किया। यह बीज बाद में एक वृक्ष बना, और जब वह फलित हुआ, तो रामचन्द्र खाँ ने उसके फल भोगे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.144)

रामचन्द्र खाँ स्वभाव से ही भक्त नहीं था। इस अपराध के कारण वह एक असुर जैसा हो गया, और वैष्णवों के प्रति उसके लम्बे समय से चले आ रहे तिरस्कार का फल अन्त में सामने आया (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.146-147)। नित्यानन्द प्रभु भगवत्-प्रेम फैलाने और नास्तिकों का दमन करने के लिए बंगाल में घूम रहे थे। वे जान-बूझकर उसके घर आए और उसके दुर्गा-मण्डप में बैठ गए। दुर्गा-मण्डप वह भवन था, जो देवी दुर्गा की वार्षिक पूजा के लिए रखा जाता था (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.148-150)। ज़मींदार भीतर ही रहा। उसने एक सेवक के द्वारा कहलवा भेजा कि इतने लोगों के लिए यहाँ जगह नहीं है, और किसी ग्वाले की बड़ी गोशाला उनके लिए अधिक ठीक रहेगी (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.151-153)। नित्यानन्द प्रभु क्रोध में बाहर आए और ज़ोर से हँसते हुए बोले: "रामचन्द्र खाँ ने ठीक कहा है। यह स्थान मेरे योग्य नहीं है। यह गो-वध करने वाले माँसाहारियों के योग्य है।" वे तुरन्त वहाँ से चले गए और उस गाँव में भी नहीं रुके (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.154-156)। रामचन्द्र खाँ ने उस जगह की मिट्टी खुदवा दी जहाँ प्रभु बैठे थे, और पूरे मण्डप को गोबर-पानी से लिपवाया। फिर भी उसके मन को शान्ति नहीं मिली (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.157-158)।

वे वचन जल्दी ही सच हो गए। रामचन्द्र खाँ सरकार का राजस्व नहीं चुका रहा था। इसलिए एक क्रोधित मुसलमान मन्त्री आया। उसने उसी दुर्गा-मण्डप में डेरा डाला, वहाँ एक गाय का वध किया और उसका माँस पकाया (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.159-160)। उसने रामचन्द्र खाँ को उसकी पत्नी और पुत्रों सहित बन्दी बना लिया। उसने तीन दिन तक घर और गाँव को लूटा, और "रामचन्द्र खाँ का पद, धन और अनुयायी छीन लिए। बहुत दिनों तक वह गाँव उजड़ा पड़ा रहा" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.161-163)। कृष्णदास कविराज गोस्वामी इससे सबके लिए शिक्षा निकालते हैं: "जहाँ कहीं किसी उन्नत भक्त का अपमान होता है, वहाँ एक व्यक्ति के दोष से पूरा नगर या स्थान कष्ट पाता है" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.164)। श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज अपनी पुस्तक में लिखते हैं: "ऐसे अपराधों का फल तुरन्त मिल सकता है या देर से, लेकिन मिलता अवश्य है।"

इस बीच हरिदास बहुत पहले ही वहाँ से चलकर चाँदपुर में बलराम आचार्य के घर पहुँच चुके थे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.165)। वहाँ जल्दी ही गोपाल चक्रवर्ती नाम का एक ब्राह्मण भी ऐसा ही अपराध करने वाला था। वह कथा चाँदपुर के शास्त्रार्थ में बताई गई है।

गंगा तट पर एक दूसरी परीक्षा #

हरिदास की ऐसी परीक्षा यह अन्तिम नहीं थी। बाद में, जब वे शान्तिपुर के पास गंगा तट की एक गुफा में रहते थे, तब स्वयं माया देवी, भगवान की माया शक्ति, तीन रातों तक उनके पास आईं। उन्हें भी हरिदास से पवित्र नाम के सिवा और कुछ नहीं मिला, और अन्त में उन्होंने स्वयं वही नाम माँगा (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.228-266)। यह पूरी कथा माया देवी द्वारा हरिदास ठाकुर की परीक्षा में दी गई है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (14)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

রামচন্দ্র খাঁন অপরাধ-বীজ কৈল। সেই বীজ বৃক্ষ হঞা আগেতে ফলিল॥

rāmacandra khāṅna aparādha-bīja kaila
sei bīja vṛkṣa hañā āgete phalila

शब्दार्थ

rāmacandra khāṅna: Ramachandra Khan; aparādha: of the offense; bīja: seed; kaila: caused to germinate; sei bīja: that seed; vṛkṣa hañā: becoming a tree; āgete: later; phalila: fructified.

रामचन्द्र खाँ ने एक वेश्या को उकसाकर हरिदास ठाकुर को विचलित करने का प्रयत्न किया, जिससे उनके चरण-कमलों पर अपराध का एक बीज अंकुरित हुआ। यह बीज बाद में एक वृक्ष बना, और जब वह फलित हुआ, तो रामचन्द्र खाँ ने उसके फल भोगे।

Antya 3.144 Sri Chaitanya-caritamrta

कृष्णदास कविराज गोस्वामी का अपना सारांश कि रामचन्द्र खाँ ने बाद में एक सरकारी कर अधिकारी के हाथों अपना पद, धन और परिवार क्यों खो दिया।

वेश्या कहे, — “कृपा करि' करह उपदेश
कि मोर कर्तव्य, याते याय भव-क्लेश”

veśyā kahe, — “kṛpā kari’ karaha upadeśa
ki mora kartavya, yāte yāya bhava-kleśa”

वेश्या ने कहा, "कृपया मेरे गुरु बनें। मुझे मेरा कर्तव्य बताइए, जिससे मुझे भौतिक जीवन से छुटकारा मिल सके।"

Antya 3.135 Sri Chaitanya-charitamrita

तीसरी रात के बाद उसकी विनती: "कृपया मेरे गुरु बनें।" हरिदास को उसका गुरु कहने का आधार श्रील प्रभुपाद का यही अनुवाद है।

तबे सेइ वेश्या गुरुर आज्ञा ल-इल
गृह-वित्त येबा छिल, ब्राह्मणेरे दिल

tabe sei veśyā gurura ājñā la-ila
gṛha-vitta yebā chila, brāhmaṇere dila

इसके बाद उस वेश्या ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए अपने घर की जो भी सम्पत्ति थी, वह सब ब्राह्मणों में बाँट दी।

तात्पर्य से: वैष्णव गुरु कभी अपने शिष्यों के दान पर निर्भर नहीं होता। हरिदास ठाकुर के उपदेश का पालन करते हुए, एक शुद्ध वैष्णव किसी से अपने लिए एक पैसा भी नहीं लेता, बल्कि वह अपने अनुयायियों को प्रेरित करता है कि उनके पास जो भी सम्पत्ति हो, उसे वे भगवान की सेवा में लगाएँ।

Antya 3.139 Sri Chaitanya-charitamrita

वह अपनी सारी सम्पत्ति ब्राह्मणों को दे देती है, और हरिदास अपने पास कुछ नहीं रखते। इस श्लोक पर भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की अनुभाष्य टीका पृष्ठ पर बी.बी. तीर्थ महाराज की पुस्तक से उद्धृत है (यह प्रभुपाद के तात्पर्य में उद्धृत नहीं है)।

जाति-धन-जन खानेर सकल ल-इल
बहु-दिन पर्यन्त ग्राम उजाड रहिल

jāti-dhana-jana khānera sakala la-ila
bahu-dina paryanta grāma ujāḍa rahila

उस मुसलमान मन्त्री ने रामचन्द्र खाँ का पद, धन और अनुयायी छीन लिए। बहुत दिनों तक वह गाँव उजड़ा पड़ा रहा।

Antya 3.163 Sri Chaitanya-charitamrita

रामचन्द्र खाँ का अन्त: पद, धन और अनुयायी छिन गए, और गाँव उजड़ गया।

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अध्याय 4

माया देवी द्वारा हरिदास ठाकुर की परीक्षा

गंगा तट की एक गुफा में स्वयं भगवान की माया शक्ति तीन रातों तक उनके पास आईं, और अन्त में पवित्र नाम माँगकर लौटीं।

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बेनापोल और चाँदपुर की घटनाओं के बाद श्रील हरिदास ठाकुर शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के पास रहने लगे। वहीं गंगा तट की एक गुफा में उनके जीवन की सबसे अनोखी परीक्षा हुई। इस बार कोई ईर्ष्यालु व्यक्ति किसी स्त्री को नहीं भेज रहा था, जैसा बेनापोल में हुआ था। इस बार स्वयं माया देवी आईं, वही माया शक्ति जो सारे संसार को बाँधकर रखती है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी यह कथा श्री चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य-लीला के तीसरे अध्याय में सुनाते हैं। रामचन्द्र खाँ द्वारा भेजी गई वेश्या की पहली परीक्षा जप-व्रत और वेश्या की परीक्षा में दी गई है।

स्वयं माया देवी परीक्षा लेने आईं #

चाँदपुर से हरिदास शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के पास गए। अद्वैत आचार्य ने गंगा के किनारे एक एकान्त स्थान पर उनके लिए गुफा जैसा एक निवास बनवा दिया (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.214-216)। कृष्णदास कविराज गोस्वामी उसी गुफा में घटी एक और कथा बताते हैं। लेकिन उससे पहले वे पाठकों से श्रद्धा माँगते हैं: "ऐसी घटनाओं को सूखे तर्क किए बिना सुनो, क्योंकि ये घटनाएँ हमारे भौतिक तर्क से परे हैं। इन पर श्रद्धा के साथ विश्वास करना चाहिए" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.228)।

वह उजली चाँदनी रात थी। गंगा झिलमिला रही थी। गुफा के द्वार पर स्वच्छ वेदी पर तुलसी विराजमान थीं, और हरिदास भीतर बैठकर ऊँचे स्वर में पवित्र नाम का जप कर रहे थे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.229-231)। तभी आँगन में एक स्त्री प्रकट हुई। उसके शरीर की आभा से पूरा स्थान पीला-सा हो गया। उसकी सुगन्ध सब दिशाओं में फैल गई और उसके आभूषण झनकने लगे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.232-233)। बेनापोल वाली स्त्री की तरह उसने भी पहले तुलसी को प्रणाम किया। उसने तुलसी की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर हरिदास के चरणों में प्रणाम किया। उसने उन्हें "सारे जगत के मित्र" कहा, बताया कि वह केवल उन्हीं के लिए आई है, और याद दिलाया कि सन्त दीन-दुखियों पर दया करते हैं। फिर उसने अपने रूप का ऐसा प्रदर्शन किया, जिससे किसी महान मुनि का धैर्य भी डोल जाए (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.234-238)।

"हरिदास ठाकुर अडिग थे, क्योंकि उनका संकल्प बहुत दृढ़ था।" फिर भी उन्होंने "उस पर बहुत दया करते हुए" उसे उत्तर दिया (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.239)। यह वही उत्तर था, जो बेनापोल में दिया गया था। उनके प्रतिदिन के नामों की संख्या एक महान यज्ञ थी, जिसका उन्होंने व्रत लिया था। इसलिए वह द्वार पर बैठकर सुने, और जप पूरा होने पर वे उसे प्रसन्न करेंगे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.240-242)। तीन रातों तक वह आती रही। उसके हाव-भाव ऐसे थे कि भगवान ब्रह्मा भी मोहित हो जाएँ। लेकिन हरिदास का मन कृष्ण के नाम में स्थिर था, और उसका सारा प्रदर्शन "जैसे वन में रोना" था (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.243-246)। तीसरी रात के अन्त में उसने शिकायत की कि उन्होंने उसे ठगा है, क्योंकि उनका जप दिन हो या रात, कभी समाप्त ही नहीं होता। उन्होंने बस इतना कहा: "मेरी प्रिय मित्र, मैं क्या करूँ? मैंने व्रत लिया है। तो फिर मैं उसे कैसे छोड़ दूँ?" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.247-249)। तब उसने प्रणाम किया और बताया कि वह कौन है:

तबे नारी कहे ताँरे करि' नमस्कार
‘आमि — माया’ करिते आइलाङ परीक्षा तोमार

"हरिदास ठाकुर को प्रणाम करके उस स्त्री ने कहा, 'मैं परम पुरुषोत्तम भगवान की माया-शक्ति हूँ। मैं यहाँ आपकी परीक्षा लेने आई थी।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.250)

ब्रह्मादि जीव, आमि सबारे मोहिलुँ
एकेला तोमारे आमि मोहिते नारिलुँ

"'मैंने पहले ब्रह्मा तक के मन को मोहित किया है, फिर दूसरों की तो बात ही क्या। केवल आपके मन को मैं आकर्षित नहीं कर पाई।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.251)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद इसे भगवद्-गीता 7.14 में भगवान कृष्ण के उस वचन से जोड़ते हैं, कि जो उनकी शरण में आता है, वह उनकी माया-शक्ति को पार कर लेता है। वे यह भी समझाते हैं कि हरिदास ने यह कैसे किया: "ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि हरिदास ठाकुर कृष्ण के चरण-कमलों में पूर्ण रूप से शरणागत थे, और व्रत के रूप में प्रतिदिन तीन लाख बार भगवान के पवित्र नामों का जप करके सदा कृष्ण के चिन्तन में लीन रहते थे।"

वह नाम जिसकी भीख माया ने माँगी #

अब परीक्षा लेने वाली स्वयं भिखारिन बन गई। उसने कहा कि उन्हें देखकर और उनका जप सुनकर उसका हृदय शुद्ध हो गया है, और वह भी जप करना चाहती है (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.252-253)। उसने उस प्रेम की बाढ़ की बात कही, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट होने से उमड़ पड़ी थी (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.254-255)। बहुत पहले उसने भगवान शिव से भगवान राम का नाम पाया था। अब वह कृष्ण का नाम पाने के लिए व्याकुल थी, क्योंकि "कृष्ण का पवित्र नाम मनुष्य को अज्ञान के सागर के उस पार ले जाता है और अन्त में कृष्ण का प्रेम प्रदान करता है" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.256-258)।

एत बलि' वन्दिला हरिदासेर चरण
हरिदास कहे, — “कर कृष्ण-सङ्कीर्तन”

"ऐसा कहकर माया ने हरिदास ठाकुर के चरण-कमलों की वन्दना की, और हरिदास ठाकुर ने यह कहकर उसे दीक्षा दी, 'बस हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करो।'" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.259)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "अब माया भी हरिदास ठाकुर की कृपा पाना चाहती थी। इसलिए हरिदास ठाकुर ने उसे हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करने के लिए कहकर विधिवत् दीक्षा दी।"

माया बड़े आनन्द के साथ चली गई (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.260)। जो इस कथा पर सन्देह करे, उसके लिए कृष्णदास कविराज गोस्वामी कारण बताते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु के समय में भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव, चारों कुमार, नारद मुनि, प्रह्लाद और लक्ष्मी देवी, सभी ने कृष्ण-प्रेम के लोभ में मनुष्य रूप में जन्म लिया (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.261-265)। तो यदि उनकी दासी माया भी उसी प्रेम की भीख माँगे, तो इसमें आश्चर्य क्या है? "भक्त की कृपा के बिना और भगवान के पवित्र नाम के जप के बिना भगवत्-प्रेम सम्भव नहीं है" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.266)।

दो परीक्षाएँ, एक उत्तर #

दोनों स्त्रियाँ रात में आईं, और दोनों ने कुछ कहने से पहले तुलसी को प्रणाम किया। दोनों को एक ही उत्तर मिला, और दोनों कृष्ण का नाम जपती हुई लौटीं। एक बद्ध जीव थी, जिसे एक ईर्ष्यालु व्यक्ति ने पैसे देकर भेजा था। दूसरी वह शक्ति थी, जो सारे जगत को बाँधती है। फिर भी हरिदास ने दोनों के साथ एक जैसा व्यवहार किया। उन्होंने उन्हें बैठने दिया, सुनने दिया, और उन्हें पवित्र नाम दे दिया। श्रील प्रभुपाद उनकी इस विजय को "भक्ति की शक्ति का व्यावहारिक प्रमाण" कहते हैं (अन्त्य 3.251 का तात्पर्य)। श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज दूसरी ओर से चेतावनी देते हैं: "यदि कोई ऐसा व्यक्ति दिखे, जो ऊपर से पवित्र नाम की शरण लेता दिखाई देता है, लेकिन साथ ही स्त्री, धन और शक्ति के प्रलोभनों में फँस जाता है, तो समझना चाहिए कि वह सच में नाम के प्रति शरणागत नहीं है।"

कृष्णदास कविराज गोस्वामी अन्त में कहते हैं कि उन्होंने "हरिदास ठाकुर की महिमा का केवल एक अंश" ही बताया है (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.271)। इसी दृढ़ता ने बाईस बाज़ारों में क़ाज़ी के कोड़ों का सामना किया था, और इसी कारण उन्हें पवित्र नाम के आचार्य के रूप में सम्मान दिया जाता है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (7)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

हरिदास ठाकुर कहेन, — “आमि कि करिमु?
नियम करियाछि, ताहा केमने छाडिमु?”

haridāsa ṭhākura kahena, — “āmi ki karimu?
niyama kariyāchi, tāhā kemane chāḍimu?”

हरिदास ठाकुर ने कहा, "मेरी प्रिय मित्र, मैं क्या करूँ? मैंने व्रत लिया है। तो फिर मैं उसे कैसे छोड़ दूँ?"

Antya 3.249 Sri Chaitanya-charitamrita

तीसरी रात के अन्त में माया देवी को हरिदास का पूरा उत्तर।

मुक्ति-हेतुक तारक हय ‘राम-नाम’
‘कृष्ण-नाम’ पारक हञा करे प्रेम-दान

mukti-hetuka tāraka haya ‘rāma-nāma’
‘kṛṣṇa-nāma’ pāraka hañā kare prema-dāna

"भगवान राम का पवित्र नाम निश्चय ही मुक्ति देता है, लेकिन कृष्ण का पवित्र नाम मनुष्य को अज्ञान के सागर के उस पार ले जाता है और अन्त में कृष्ण का प्रेम प्रदान करता है।

तात्पर्य से: लेकिन हरे कृष्ण महामन्त्र मुक्ति भी देता है और साथ ही कृष्ण के चरण-कमलों की शरण भी प्रदान करता है।

Antya 3.257 Sri Chaitanya-charitamrita

भगवान शिव से राम का नाम पा चुकी माया बताती है कि अब वह कृष्ण का नाम क्यों चाहती है।

माया-दासी ‘प्रेम’ मागे, — इथे कि विस्मय?
‘साधु-कृपा’-‘नाम’ विना ‘प्रेम’ ना जन्मय

māyā-dāsī ‘prema’ māge, — ithe ki vismaya?
‘sādhu-kṛpā’-‘nāma’ vinā ‘prema’ nā janmaya

यदि कृष्ण की दासी, उनकी बहिरंगा शक्ति, भगवत्-प्रेम की भीख माँगती है, तो इसमें आश्चर्य क्या है? भक्त की कृपा के बिना और भगवान के पवित्र नाम के जप के बिना भगवत्-प्रेम सम्भव नहीं है।

Antya 3.266 Sri Chaitanya-charitamrita

माया देवी की कथा पर कृष्णदास कविराज गोस्वामी का निष्कर्ष: भगवत्-प्रेम केवल भक्त की कृपा और पवित्र नाम से ही मिलता है।

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अध्याय 5

पवित्र नाम पर शिक्षाएँ

चाँदपुर में और बाद में पुरी में, हरिदास ठाकुर ने ध्यान से समझाया कि पवित्र नाम का जप क्यों प्रभाव करता है, और कौन-सी बातें उसे अपना पूरा फल देने से रोकती हैं।

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A japa mala of tulasi wood beads, the same kind of beads used for the counted chanting of the Hare Krishna maha-mantra that Haridasa Thakura taught and practiced.
A japa mala of tulasi wood beads, the same kind of beads used for the counted chanting of the Hare Krishna maha-mantra that Haridasa Thakura taught and practiced.Wikimedia Commons · Public domain / CC-licensed

श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) ने पवित्र नाम की शिक्षा अधिकतर उसे जपकर ही दी। वे हर दिन तीन लाख बार नाम जपते थे, और तर्क-वितर्क बहुत कम करते थे। फिर भी जब उनसे पूछा गया कि नाम वास्तव में क्या करता है, तो उनके उत्तर गौड़ीय वैष्णव परम्परा में एक बड़े अन्तर का सबसे स्पष्ट वर्णन बन गए। यह अन्तर है अपराधों के साथ किए गए जप, नामाभास (nāmābhāsa, नाम की पहली हल्की झलक) और शुद्ध जप के बीच। ऐसे तीन संवाद लिखे हुए मिलते हैं। इनमें से दो कृष्णदास कविराज गोस्वामी के श्री चैतन्य-चरितामृत में हैं। पहला चाँदपुर में मजूमदार भाइयों की सभा में हुई खुली चर्चा है, और दूसरा पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ हुई एकान्त बातचीत। तीसरा संवाद हरिनदी में ऊँचे स्वर से जप करने पर हुआ एक शास्त्रार्थ है, जो वृन्दावन दास ठाकुर के चैतन्य-भागवत में मिलता है। ये दोनों जीवनी-लेखक हरिदास के आरम्भिक वर्षों की घटनाएँ अलग-अलग क्रम में बताते हैं। इसलिए हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि चाँदपुर की घटना पहले हुई या हरिनदी की।

चाँदपुर की शान्त कुटिया #

बेनापोल की घटनाओं के बाद, जिनका वर्णन जप-व्रत और वेश्या की परीक्षा में है, हरिदास पैदल चलकर चाँदपुर नाम के गाँव पहुँचे और बलराम आचार्य के घर ठहरे (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.165)। श्रील प्रभुपाद के तात्पर्य के अनुसार चाँदपुर हुगली ज़िले में सप्तग्राम के पास है। वे यह भी बताते हैं कि श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के अनुसार बाद में इस गाँव का नाम कृष्णपुर रख दिया गया (अन्त्य 3.165 का तात्पर्य)। उस क्षेत्र के सरकारी कोषाध्यक्ष दो भाई थे, हिरण्य और गोवर्धन मजूमदार, और बलराम आचार्य उनके कुल-पुरोहित थे (अन्त्य 3.166)।

बलराम आचार्य पर हरिदास की कृपा थी, और वे हरिदास से बहुत गहरा स्नेह करते थे। उन्होंने ठाकुर को फूस की एक एकान्त कुटिया दी, जहाँ वे बिना किसी बाधा के हरे कृष्ण महामन्त्र का जप कर सकें। हरिदास भोजन बलराम के घर पर करते थे (अन्त्य 3.167-168)। एक विद्यार्थी बालक हर दिन उनसे मिलने आता था। वह गोवर्धन का पुत्र रघुनाथ था, जो आगे चलकर रघुनाथ दास गोस्वामी बने (अन्त्य 3.169)। कृष्णदास कविराज गोस्वामी बताते हैं कि उस बालक का पूरा भविष्य इन्हीं भेंटों से बना:

हरिदास कृपा करे ताँहार उपरे
सेइ कृपा ‘कारण’ हैल चैतन्य पाइबारे

"स्वाभाविक रूप से हरिदास ठाकुर उन पर कृपा करते थे, और इसी वैष्णव की कृपा के आशीर्वाद से बाद में उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण मिली।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.170)

मजूमदारों की सभा #

एक दिन बलराम आचार्य ने बड़ी विनम्रता से हरिदास से प्रार्थना की कि वे उनके साथ दोनों भाइयों की सभा में चलें। ठाकुर को देखते ही हिरण्य और गोवर्धन उठ खड़े हुए, उनके चरणों में गिर पड़े और बड़े आदर से उन्हें आसन दिया (अन्त्य 3.172-173)। सभा विद्वान पण्डितों, ब्राह्मणों और सम्मानित लोगों से भरी थी, और दोनों भाई स्वयं भी विद्वान थे (अन्त्य 3.174)। सब लोग हरिदास के गुणों का ऐसे वर्णन करने लगे, "मानो उनके पाँच मुख हों", और यह सुनकर दोनों भाई बहुत प्रसन्न हुए (अन्त्य 3.175)।

जब किसी ने बताया कि हरिदास हर दिन तीन लाख नाम जपते हैं, तो पण्डित स्वयं नाम की महिमा पर चर्चा करने लगे (अन्त्य 3.176)। एक पक्ष ने कहा कि नाम जपने से मनुष्य पापों के फलों से छूट जाता है। दूसरे पक्ष ने कहा कि नाम जपने से भौतिक बन्धन से मुक्ति मिलती है (अन्त्य 3.177)। लेकिन ये दोनों उत्तर असली बात से बहुत पीछे रह गए।

नाम का असली फल #

हरिदास ने इन दोनों उत्तरों को एक ओर रख दिया और बताया कि पवित्र नाम वास्तव में क्या देता है:

हरिदास कहेन, — “नामेर एइ दुइ फल नय
नामेर फले कृष्ण-पदे प्रेम उपजय

"हरिदास ठाकुर ने विरोध करते हुए कहा, 'ये दोनों वरदान पवित्र नाम के जप का सच्चा फल नहीं हैं। वास्तव में निरपराध होकर पवित्र नाम का जप करने से कृष्ण के चरणकमलों के प्रति आनन्दमय प्रेम जाग उठता है।'" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.178)

अपनी बात के समर्थन में उन्होंने भागवत का वह चित्र सामने रखा, जिसमें नाम से प्रेम करने वाला भक्त ऊँचे स्वर से नाम गाता है, हँसता है, रोता है और पागल की तरह नाचता है। बाहर के लोग क्या सोचते हैं, इसकी उसे कोई परवाह नहीं होती (अन्त्य 3.179, जहाँ श्रीमद्भागवतम् 11.2.40 उद्धृत है)। उन्होंने कहा कि पापों से छुटकारा और मुक्ति तो केवल उप-फल हैं, यानी ऐसे फल जो साथ में अपने-आप मिल जाते हैं (अन्त्य 3.180)। फिर उन्होंने श्रील रूप गोस्वामी की पद्यावली से एक श्लोक सुनाया, जिसमें नाम की तुलना उगते हुए सूर्य से की गई है। जब पण्डितों ने उनसे उसका अर्थ पूछा, तो उन्होंने स्वयं उसे समझाया (अन्त्य 3.181-182)।

हरिदास ने कहा कि सूर्य के क्षितिज पर दिखने से पहले ही उसका पहला प्रकाश रात के अँधेरे को कम करने लगता है। लोगों का चोरों, भूतों और राक्षसों का डर तुरन्त मिट जाता है, और जब सूर्य पूरी तरह उग आता है, तो सब लोग अपने धार्मिक कर्तव्य करने लगते हैं (अन्त्य 3.183-184)। पवित्र नाम भी इन्हीं दो चरणों में काम करता है:

ऐछे नामोदयारम्भे पाप-आदिर क्षय
उदय कैले कृष्ण-पदे हय प्रेमोदय

"उसी प्रकार, भगवान के पवित्र नाम का निरपराध जप जागने की पहली झलक ही पाप-कर्मों के फलों को तुरन्त मिटा देती है। और जब कोई निरपराध होकर पवित्र नाम का जप करता है, तो वह कृष्ण के चरणकमलों की प्रेममयी सेवा के लिए जाग उठता है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.185)

इसलिए हरिदास ने निष्कर्ष दिया कि मुक्ति तो "निरपराध नाम-जप के जागने की एक झलक से मिलने वाला तुच्छ फल" है। अजामिल इसका प्रमाण था। मरते समय वह केवल अपने पुत्र नारायण को पुकारना चाहता था, फिर भी वह आध्यात्मिक जगत पहुँच गया। और जो मुक्ति कृष्ण इतनी सरलता से दे देते हैं, उसे उनके शुद्ध भक्त स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे केवल उनकी सेवा करना चाहते हैं (अन्त्य 3.186-189, जहाँ श्रीमद्भागवतम् 6.2.49 और 3.29.13 उद्धृत हैं)। श्रील प्रभुपाद इसी सभा को भागवत की अजामिल-कथा से जोड़ते हैं: "रघुनाथ दास गोस्वामी के पिता की सभा में हरिदास ठाकुर ने पुष्टि की कि केवल भगवान का पवित्र नाम जपने से ही मनुष्य मुक्त हो जाता है, चाहे वह पूरी तरह निरपराध होकर जप न करे।" (श्रीमद्भागवतम् 6.3.24 का तात्पर्य)

गोपाल चक्रवर्ती की चुनौती #

सभा में गोपाल चक्रवर्ती भी बैठा था। वह मजूमदारों की सेवा में मुख्य कर-संग्राहक था, और उसका काम बादशाह के खज़ाने के लिए बारह लाख मुद्राएँ इकट्ठी करना था (अन्त्य 3.190-191)। वह सुन्दर, विद्वान और युवा था, लेकिन वह यह बात सहन नहीं कर सका कि नाम की केवल एक झलक से मुक्ति मिल जाती है (अन्त्य 3.192)। श्रील प्रभुपाद उसके क्रोध की जड़ समझाते हैं: "मायावादी शास्त्रों के उन कथनों को सहन नहीं कर पाते, जो बताते हैं कि मुक्ति कितनी सरलता से पाई जा सकती है।" (अन्त्य 3.192 का तात्पर्य)

क्रोध में भरकर गोपाल ने सभा से कहा, "हे विद्वान पण्डितों की सभा ... ज़रा इस भावुक भक्त का निष्कर्ष सुनिए।" उसने कहा कि करोड़ों जन्मों तक पूर्ण ज्ञान पाने के बाद भी हो सकता है कि मनुष्य मुक्त न हो, और यह व्यक्ति कहता है कि नाम की एक झलक ही काफ़ी है (अन्त्य 3.193-194)। हरिदास ने बिना क्रोध के उत्तर दिया, "आप संदेह क्यों कर रहे हैं? प्रकट शास्त्र कहते हैं कि निरपराध नाम-जप की केवल एक झलक से ही मुक्ति मिल सकती है।" (अन्त्य 3.195)। उन्होंने आगे कहा कि भक्ति के सुख के सामने मुक्ति इतनी छोटी है कि शुद्ध भक्त उसे कभी नहीं चाहते। हरि-भक्ति-सुधोदय कहता है कि भगवान के दर्शन के आनन्द-सागर के सामने ब्रह्म का आनन्द भी बछड़े के खुर के गड्ढे में भरे पानी जैसा है (अन्त्य 3.196-197)।

तब गोपाल ने इसे एक शर्त बना दिया। उसने कहा, "यदि नामाभास से मुक्ति नहीं मिलती, तो निश्चित जान लो कि मैं तुम्हारी नाक काट दूँगा।" (अन्त्य 3.198)। हरिदास ने तुरन्त यह चुनौती स्वीकार कर ली और अपनी ओर से अपनी नाक दाँव पर लगा दी। उन्होंने कहा, "यदि नामाभास से मुक्ति नहीं मिलती, तो मैं निश्चय ही अपनी नाक काट लूँगा।" (अन्त्य 3.199)।

क्षमा, और कृष्ण का न्याय #

पूरी सभा में हलचल मच गई, और दोनों मजूमदार भाइयों ने उस ब्राह्मण को डाँटा (अन्त्य 3.200)। बलराम आचार्य ने और भी कड़े शब्द कहे, "तुम एक मूर्ख तार्किक हो। तुम भगवान की भक्ति के बारे में क्या जानते हो?" उन्होंने चेतावनी दी कि तुमने हरिदास ठाकुर का अपमान किया है, इसलिए तुम्हारा कोई भला नहीं होगा (अन्त्य 3.201-202)। हरिदास वहाँ से जाने के लिए उठ खड़े हुए, और दोनों भाइयों ने गोपाल को उसी समय अपनी सेवा से निकाल दिया। फिर दोनों भाई और सभा के सभी लोग हरिदास के चरणों में गिर पड़े (अन्त्य 3.203-204)।

हरिदास मुस्करा रहे थे। उन्होंने मधुर स्वर में कहा कि इसमें आप में से किसी का दोष नहीं है, उस ब्राह्मण का भी नहीं, क्योंकि उसके मन को केवल सूखे तर्क की ही शिक्षा मिली है। उन्होंने कहा, "केवल तर्क और वाद-विवाद से पवित्र नाम की महिमा नहीं समझी जा सकती।" फिर उन्होंने सबको आशीर्वाद देकर घर भेज दिया, और केवल इतना कहा कि उनके अपमान के कारण कोई दुखी न हो (अन्त्य 3.205-207)। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "हरिदास ठाकुर के इस कथन से समझ में आता है कि एक शुद्ध वैष्णव कभी किसी के अपमान को गम्भीरता से नहीं लेता।" (अन्त्य 3.207 का तात्पर्य)

फिर भी हिरण्य मजूमदार ने गोपाल के अपने घर आने पर रोक लगा दी (अन्त्य 3.208)। तीन दिन के भीतर उस ब्राह्मण को कुष्ठरोग हो गया। उसकी ऊँची नाक गलकर गिर गई, और उसके हाथ-पैरों की उँगलियाँ, जो कभी सुनहरी चम्पा की कलियों जैसी सुन्दर थीं, सूखकर नष्ट हो गईं (अन्त्य 3.209-210)। जिसने भी यह देखा, वह चकित रह गया। सब लोगों ने हरिदास की शक्ति की प्रशंसा की और उन्हें प्रणाम किया (अन्त्य 3.211)। हरिदास ने उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया था, फिर भी उसे कष्ट भोगना पड़ा। ये दोनों बातें एक साथ कैसे सच हैं, यह कृष्णदास कविराज गोस्वामी समझाते हैं:

भक्त-स्वभाव, — अज्ञ-दोष क्षमा करे
कृष्ण-स्वभाव, — भक्त-निन्दा सहिते ना पारे

"शुद्ध भक्त का स्वभाव है कि वह किसी अज्ञानी मूर्ख के अपराध को भी क्षमा कर देता है। परन्तु कृष्ण का स्वभाव है कि वे अपने भक्तों की निन्दा सहन नहीं कर सकते।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.213)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "यद्यपि श्रील हरिदास ठाकुर ने गोपाल चक्रवर्ती का अपमान सह लिया, परन्तु कृष्ण उसे सहन नहीं कर सके। भगवान ने तुरन्त गोपाल चक्रवर्ती को कुष्ठरोग से पीड़ित करके दण्ड दिया।" हरिदास को स्वयं इससे कोई सन्तोष नहीं हुआ। जब उन्होंने उस ब्राह्मण के रोग के बारे में सुना, तो वे दुखी हुए। फिर बलराम आचार्य को बताकर वे अद्वैत आचार्य के निवास-स्थान शान्तिपुर चले गए (अन्त्य 3.214)।

ऊँचे स्वर से जप: हरिनदी का शास्त्रार्थ #

हरिदास धीमे स्वर में, मन ही मन जप नहीं करते थे। चैतन्य-चरितामृत में उनका ऐसा चित्र है कि वे अपनी गुफा में बैठे "बहुत ऊँचे स्वर से भगवान का पवित्र नाम ले रहे थे" (अन्त्य 3.229)। महाप्रभु के संकीर्तन शुरू करने से पहले के वर्षों में उनकी यह आदत सबको अच्छी नहीं लगती थी। श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज बताते हैं कि कुछ लोग भगवान को पुकारने के लिए हरिदास और अद्वैत आचार्य की हँसी उड़ाते थे। वे कहते थे कि इनकी ऊँची पुकार से वर्षा-ऋतु में भगवान के विश्राम में बाधा पड़ेगी और देश में अकाल पड़ जाएगा (श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स)। इस उपहास से हरिदास को दुख होता था, लेकिन उन्होंने अपना स्वर कभी धीमा नहीं किया।

हरिनदी नाम के एक गाँव में एक ब्राह्मण ने उन्हें खुलकर चुनौती दी। उसका तर्क था कि भगवान के नामों का ध्यान मन में चुपचाप करना चाहिए। उसने पूछा कि कौन-सा शास्त्र किसी को नाम ऊँचे स्वर से जपने को कहता है। उत्तर में हरिदास ने विस्तार से नाम की महिमा बताई (चैतन्य-भागवत आदि 16)। वृन्दावन दास ठाकुर के श्लोकों में उन्होंने समझाया:

"पशु, पक्षी, कीड़े और दूसरे जीव बोल नहीं सकते, लेकिन यदि वे पवित्र नाम केवल सुन भी लें, तो वे सब तर जाते हैं। यदि तुम पवित्र नाम मन में चुपचाप जपते हो, तो तुम स्वयं बच जाओगे, लेकिन यदि तुम ऊँचे स्वर से जपते हो, तो दूसरों का भी भला करोगे। इसलिए सभी शास्त्र कहते हैं कि नाम का ऊँचे स्वर से जप करने से सौ गुना अधिक फल मिलता है।" (चैतन्य-भागवत आदि 16.280-282, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)

तीर्थ महाराज इन श्लोकों के साथ नारदीय पुराण का एक कथन भी रखते हैं, जो यही बात कहता है:

"जो व्यक्ति ऊँचे स्वर से पवित्र नामों का कीर्तन करता है, वह जप करने वाले से सौ गुना श्रेष्ठ है, क्योंकि ... जो व्यक्ति ऊँचे स्वर से जप करता है, वह केवल अपना ही भला नहीं करता, बल्कि उन सबका भी भला करता है जो उसे सुनते हैं।" (नारदीय पुराण, तीर्थ महाराज की उसी पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)

वह ब्राह्मण नहीं माना। वह क्रोधित हो गया और हरिदास का उनके जन्म-कुल को लेकर अपमान करने लगा। उसने धमकी दी कि यदि नाम की ये महिमाएँ शास्त्र में न मिलीं, तो वह सबके सामने हरिदास के नाक-कान काट देगा। तीर्थ महाराज चैतन्य-भागवत के आधार पर बताते हैं कि जल्दी ही उस ब्राह्मण को चेचक हो गई, और उसकी अपनी नाक और कान गल गए (चैतन्य-भागवत आदि 16)। यह वही शिक्षा है जो चाँदपुर में मिली: वैष्णव क्षमा कर देता है, लेकिन कृष्ण अपने भक्त के प्रति किए गए अपराध को अनदेखा नहीं करते।

सदियों बाद श्रील प्रभुपाद के सामने भी यही आपत्ति आई। बम्बई में एक अतिथि ने उनसे कहा कि मन्त्र को गुप्त रूप से जपना चाहिए। प्रभुपाद ने उत्तर दिया कि "कलियुग में इसे खुलकर जपना चाहिए, और हमें अपने से पहले आए नामाचार्य हरिदास ठाकुर का अनुसरण करना है।" फिर उन्होंने बात पूरी तरह साफ़ कर दी: "हरिदास ठाकुर बहुत ऊँचे स्वर से जप करते थे; चैतन्य महाप्रभु बहुत ऊँचे स्वर से जप करते थे। तो आपको और क्या प्रमाण चाहिए? मेरे गुरु महाराज ऊँचे स्वर से जप करते थे; हम ऊँचे स्वर से जप कर रहे हैं।" (श्रील प्रभुपाद, श्रीमद्भागवतम् 6.1.14 पर प्रवचन, बम्बई, 10 नवम्बर 1970)

पुरी में: "इन यवनों का उद्धार कैसे होगा?" #

बहुत वर्षों बाद, जब हरिदास पुरी में महाप्रभु के पास रह रहे थे (श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन), एक दिन प्रभु सदा की तरह उनसे मिले और उनसे एक ऐसी बात पूछी, जो उन्हें चिन्ता में डाल रही थी (अन्त्य 3.49)। उन्होंने कहा कि इस कलियुग में अधिकतर लोग वैदिक संस्कृति से दूर हैं। उन्हें यवन कहा जाता है, और वे गायों और ब्राह्मण-संस्कृति को हानि पहुँचाते हैं। "इन यवनों का उद्धार कैसे होगा? मुझे बड़ा दुख है कि मुझे कोई उपाय नहीं दिखता।" (अन्त्य 3.50-51)। श्रीमद्भागवतम् ने बहुत पहले ही कह दिया था कि यवन और दूसरे लोग, जो "पापकर्मों के आदी हैं, भगवान के भक्तों की शरण लेकर शुद्ध हो सकते हैं" (श्रीमद्भागवतम् 2.4.18)। अब प्रभु उन्हीं भक्तों में से एक से पूछ रहे थे कि यह होगा कैसे।

हरिदास ने पहले उन्हें सान्त्वना दी, "हे प्रभु, आप चिन्ता न करें।" (अन्त्य 3.52)। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "जब पतित जीवों की दशा के कारण भगवान दुखी होते हैं, तो भक्त उन्हें यह कहकर सान्त्वना देता है, 'हे प्रभु, आप चिन्ता न करें।' यही सेवा है।" (अन्त्य 3.52 का तात्पर्य)। फिर हरिदास ने समझाया। यवनों को घृणा प्रकट करने के लिए "हा राम, हा राम" कहने की आदत है, जबकि एक भक्त यही शब्द प्रेम के आनन्द में पुकारता है। इसलिए बिना जाने ही वे भगवान का नाम ले लेते हैं, और इस नामाभास से उनका उद्धार सरलता से हो जाएगा (अन्त्य 3.53-54)। यहीं श्रील प्रभुपाद का अनुवाद उन्हें "नामाचार्य हरिदास ठाकुर, पवित्र नाम के जप के अधिकारी" कहता है। उनका कहना था कि नाम किसी दूसरे अर्थ में बोला जाए, तब भी उसकी शक्ति नष्ट नहीं होती (अन्त्य 3.55)। इस उपाधि का अर्थ नामाचार्य, पवित्र नाम के शिक्षक में समझाया गया है। अपनी बात के प्रमाण में हरिदास ने नृसिंह पुराण का एक श्लोक सुनाया:

दंष्ट्रिदंष्ट्राहतो म्लेच्छो
हा रामेति पुनः पुनः
उक्त्वापि मुक्तिमाप्नोति
किं पुनः श्रद्धया गृणन्

"जिसे सूअर अपने दाँत से मार रहा हो और जो पीड़ा में बार-बार “हा राम, हा राम” पुकारे, ऐसा म्लेच्छ भी मुक्ति पा लेता है। तो फिर उनका क्या कहना, जो श्रद्धा और आदर के साथ पवित्र नाम का जप करते हैं?" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.56)

श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "फिर भी, क्योंकि 'हा राम' शब्द परम आध्यात्मिक सत्य हैं, इसलिए बात वही रहती है, चाहे उन्हें यवन बोलें या महान भक्त, ठीक वैसे ही जैसे आग बच्चे के लिए भी वही है और बूढ़े के लिए भी।" (अन्त्य 3.54 का तात्पर्य)

हरिदास ने प्रभु को अजामिल की याद दिलाई, जो यमराज के दूतों से इसलिए छूट गया, क्योंकि उसने मृत्यु के समय अपने पुत्र नारायण को पुकारा था। उन्होंने यह भी कहा कि नाम के अक्षर ठीक से न बोले जाएँ, तब भी उनकी शक्ति बनी रहती है (अन्त्य 3.57-59)। लेकिन उन्होंने ध्यान रखा कि कोई नामाभास को ही लक्ष्य न समझ ले। उन्होंने पद्म पुराण का एक श्लोक सुनाया, जो नाम की शक्ति की प्रशंसा भी करता है और गलत उद्देश्यों से जप करने के विरुद्ध चेतावनी भी देता है:

नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं श्रोत्रमूलं गतं वा
शुद्धं वाशुद्धवर्णं व्यवहितरहितं तारयत्येव सत्यम्
तच्चेद्देहद्रविणजनतालोभपाषण्डमध्ये
निक्षिप्तं स्यान्न फलजनकं शीघ्रमेवात्र विप्र

"यदि कोई भक्त एक बार भी भगवान का पवित्र नाम बोल दे, या वह नाम उसके मन में आ जाए, या सुनने के द्वार, कान में पड़ जाए, तो वह पवित्र नाम उसे निश्चय ही भौतिक बन्धन से छुड़ा देता है, चाहे उसका उच्चारण ठीक हुआ हो या ठीक न हुआ हो, व्याकरण शुद्ध हो या अशुद्ध, और वह ठीक से जुड़कर बोला गया हो या टुकड़ों में। हे ब्राह्मण, इसलिए पवित्र नाम की शक्ति निश्चय ही महान है। लेकिन यदि कोई पवित्र नाम का उच्चारण शरीर के लाभ के लिए, भौतिक धन और अनुयायियों के लिए, या लोभ या नास्तिकता के प्रभाव में करता है, अर्थात् अपराधों के साथ नाम लेता है, तो ऐसा जप जल्दी इच्छित फल नहीं देता। इसलिए पवित्र नाम के जप में अपराधों से पूरी सावधानी से बचना चाहिए।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.60)

हरिदास ने आगे कहा, "यदि कोई निरपराध होकर पवित्र नाम का अशुद्ध उच्चारण भी करता है, तो वह पापमय जीवन के सभी फलों से मुक्त हो सकता है।" उन्होंने श्रील रूप गोस्वामी के भक्ति-रसामृत-सिन्धु का एक श्लोक सुनाया, जिसमें नाम की तुलना सूर्य से की गई है, और अन्त में कहा, "इसका प्रमाण श्रीमद्भागवतम् में अजामिल की कथा में मिलता है।" (अन्त्य 3.61-65)। भागवत स्वयं कहता है: "यदि कोई भगवान का पवित्र नाम गलत उच्चारण के साथ भी जपता है, तो निरपराध होकर जपने पर उसे भौतिक बन्धन से छुटकारा मिल जाएगा।" (श्रीमद्भागवतम् 6.3.24)

वृक्षों का भी उद्धार हो सकता है #

सुनते-सुनते महाप्रभु की प्रसन्नता बढ़ती गई, लेकिन उन्होंने एक और प्रश्न पूछा। वृक्षों, पौधों और कीड़ों का क्या होगा, यानी चलने वाले और न चलने वाले जीवों का? "भौतिक बन्धन से उनका उद्धार कैसे होगा?" (अन्त्य 3.66-67)। हरिदास ने उत्तर दिया कि उनका उद्धार केवल प्रभु की कृपा पर निर्भर है, और वह कृपा प्रभु पहले ही कर चुके हैं (अन्त्य 3.68)। "आपने ऊँचे स्वर से हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन किया है, और चलने वाले हों या न चलने वाले, सबको उसे सुनकर लाभ मिला है।" जिन चलने वाले जीवों ने उसे सुना, वे मुक्त हो गए। और जब वृक्षों ने उसे सुना, तो उनसे वह ध्वनि प्रतिध्वनि की तरह लौट आई (अन्त्य 3.69-70)। लेकिन वह सचमुच प्रतिध्वनि नहीं थी:

‘प्रतिध्वनि’ नहे, सेइ करये ‘कीर्तन’
तोमार कृपार एइ अकथ्य कथन

"परन्तु वास्तव में यह प्रतिध्वनि नहीं है, यह स्थावर जीवों का कीर्तन है। यह सब अचिन्त्य होते हुए भी आपकी कृपा से सम्भव है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.71)

फिर हरिदास ने आगे आने वाले समय की बात कही: "जब आपके पद-चिह्नों पर चलने वाले लोग पूरे संसार में ऊँचे स्वर से हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करते हैं, तो चलने वाले और न चलने वाले सभी जीव प्रेम-भक्ति के आनन्द में नाचने लगते हैं।" (अन्त्य 3.72)। उन्होंने प्रभु की झारिखण्ड वन की यात्रा को याद किया, और वासुदेव दत्त की उस प्रार्थना को भी, जिसमें उन्होंने सभी जीवों के उद्धार की विनती की थी (अन्त्य 3.73-74)। "आपने हरे कृष्ण महामन्त्र के ऊँचे स्वर से कीर्तन का प्रचार किया है, और इस प्रकार सभी चलने वाले और न चलने वाले जीवों को भौतिक बन्धन से मुक्त कर दिया है।" (अन्त्य 3.76)

जब प्रभु ने आपत्ति की कि तब तो ब्रह्माण्ड खाली हो जाएगा, तो हरिदास ने उत्तर दिया कि प्रभु उन आत्माओं को जगाएँगे जो अभी विकसित नहीं हुई हैं, और ब्रह्माण्ड को फिर से भर देंगे (अन्त्य 3.77-80)। उन्होंने पूरी विनम्रता के साथ अपनी बात समाप्त की: "हे प्रभु, आपकी लीलाएँ अमृत के सागर जैसी हैं। मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि वह सागर कितना बड़ा है, और उसकी एक बूँद को समझना भी मेरे लिए सम्भव नहीं है।" (अन्त्य 3.88)

प्रभु का आनन्द #

महाप्रभु चकित रह गए। उन्होंने मन में सोचा, "ये तो वास्तव में मेरी गोपनीय लीलाएँ हैं। हरिदास ने इन्हें कैसे समझ लिया?" (अन्त्य 3.89)। वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने हरिदास को आलिंगन किया, लेकिन बाहर से वे इस विषय पर बात करने से बचते रहे। भगवान अपनी महिमा छिपाना चाहें, तब भी उसे अपने भक्तों से नहीं छिपा सकते (अन्त्य 3.90-91)। फिर वे अपने भक्तों के पास गए और हरिदास के गुणों का ऐसे वर्णन करने लगे, "मानो उनके सैकड़ों मुख हों" (अन्त्य 3.93)। कृष्णदास कविराज गोस्वामी आगे लिखते हैं कि प्रभु को अपने भक्तों की महिमा गाने में बड़ा आनन्द मिलता है, "और भक्तों में हरिदास ठाकुर सबसे श्रेष्ठ हैं।" (अन्त्य 3.94)

जप की तीन अवस्थाएँ #

हरिदास की इन शिक्षाओं को एक साथ रखें, तो जप की तीन अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। अपराधों के साथ किया गया जप धीरे-धीरे फल देता है। नामाभास, यानी शुद्ध नाम की पहली झलक, उसी समय पापों को नष्ट कर देता है और मुक्ति दे देता है। और शुद्ध जप कृष्ण-प्रेम जगाता है। यही वह एकमात्र फल है, जिसकी हरिदास को परवाह थी। श्रील प्रभुपाद ने एक कक्षा में इसका सार बताया: "अपराधों के साथ किया गया जप आपको भौतिक दुख और सुख दे सकता है, और लगभग निरपराध जप आपको मुक्ति देगा, आपको दिव्य स्तर पर स्थित कर देगा। और जब जप निरपराध होता है, तब आप तुरन्त भगवान का प्रेम, कृष्ण-प्रेम, जगा लेंगे।" उसी कक्षा में उन्होंने वृक्षों के बारे में हरिदास के उत्तर से यह शिक्षा भी निकाली: "यह हरिदास ठाकुर की सलाह है कि यदि हम ऊँचे स्वर से जप करें, तो वृक्ष सुनेंगे, पक्षी सुनेंगे, कीड़े सुनेंगे, और वे मुक्त हो जाएँगे। यह नामाचार्य हरिदास ठाकुर का कथन है।" (श्रील प्रभुपाद, भक्तिरसामृत सिन्धु (द नेक्टर ऑफ़ डिवोशन) पर प्रवचन, वृन्दावन, 8 नवम्बर 1972)

उनकी उपाधि का अर्थ, और उससे जुड़ा वह उदाहरण जिसे श्रील प्रभुपाद अपने अनुयायियों से अपनाने को कहते हैं, नामाचार्य, पवित्र नाम के शिक्षक में पढ़ें।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (15)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

নামৈকং যস্য বাচি স্মরণ পথগতং শ্রোত্রমূলং গতং বা শুদ্ধং বাশুদ্ধবর্ণং ব্যবহিত-রহিতং তারয়ত্যেব সত্যম্। তচ্চেদ্দেহ-দ্রবিণ-জনতা-লোভ-পাষণ্ড-মধ্যে নিক্ষিপ্তং স্যান্ন ফলজনকং শীঘ্রমেবাত্র বিপ্র॥

nāmaikaṁ yasya vāci smaraṇa-patha-gataṁ śrotra-mūlaṁ gataṁ vā
śuddhaṁ vāśuddha-varṇaṁ vyavahita-rahitaṁ tārayaty eva satyam
tac ced deha-draviṇa-janatā-lobha-pāṣaṇḍa-madhye
nikṣiptaṁ syān na phala-janakaṁ śīghram evātra vipra

शब्दार्थ

nāma: the holy name; ekam: once; yasya: whose; vāci: in the mouth; smaraṇa-patha-gatam: entered the path of remembrance; śrotra-mūlam gatam: entered the roots of the ears; śuddham: pure; aśuddha-varṇam: impurely uttered; vyavahita-rahitam: without offenses; tārayati: delivers; eva satyam: certainly, truly; tat: that name; cet: if; deha: the material body; draviṇa: material opulence; janatā: public support; lobha: greed; pāṣaṇḍa: atheism; madhye nikṣiptam: directed toward; na phala-janakam śīghram: does not produce the result quickly; vipra: O brahmana.

"यदि कोई भक्त एक बार भी प्रभु के पवित्र नाम का उच्चारण कर ले, अथवा वह नाम उसके मन में प्रवेश कर जाए या उसके कान में पड़ जाए, जो सुनने का मार्ग है, तो वह पवित्र नाम उसे भौतिक बन्धन से अवश्य मुक्त कर देगा, चाहे उसका उच्चारण सही हो या गलत, व्याकरण शुद्ध हो या अशुद्ध, और वह पूरा बोला गया हो या टुकड़ों में। हे ब्राह्मण, इसलिए पवित्र नाम की शक्ति निश्चय ही महान है। लेकिन यदि कोई पवित्र नाम का उपयोग शरीर के लाभ के लिए, भौतिक धन और अनुयायियों के लिए, या लोभ या नास्तिकता के प्रभाव में करता है, अर्थात् यदि वह अपराधों के साथ नाम लेता है, तो ऐसा जप जल्दी वांछित फल नहीं देगा। इसलिए पवित्र नाम के जप में अपराधों से सावधानी से बचना चाहिए।"

Antya 3.60 Sri Chaitanya-caritamrta

स्वयं हरिदास ठाकुर द्वारा उद्धृत, यह समझाने के लिए कि पवित्र नाम की शक्ति निश्चित है, किन्तु जप में हुए अपराधों से उसका पूर्ण फल फिर भी विलम्बित हो सकता है।

kirāta-hūṇāndhra-pulinda-pulkaśā
ābhīra-śumbhā yavanāḥ khasādayaḥ
ye 'nye ca pāpā yad-apāśrayāśrayāḥ
śudhyanti tasmai prabhaviṣṇave namaḥ

किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कश, आभीर, शुम्भ, यवन, खश जातियों के लोग, और पापकर्मों में लिप्त अन्य लोग भी, भगवान के भक्तों की शरण लेकर शुद्ध हो सकते हैं, क्योंकि भगवान ही परम शक्ति हैं। मैं उन्हें सादर प्रणाम करता हूँ।

SB 2.4.18 Srimad-Bhagavatam

यह श्लोक इस पृष्ठ के उस वृत्तान्त का समर्थन करता है, जिसमें श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास से पूछते हैं कि कलियुग के यवनों का उद्धार कैसे होगा। शुकदेव गोस्वामी का महाराज परीक्षित को दिया गया यह श्लोक इस प्रश्न का मूल उत्तर पहले ही दे देता है। इसमें यवनों का नाम स्पष्ट रूप से उन लोगों में लिया गया है, जो भगवान के भक्तों की शरण लेकर शुद्ध होते हैं। इसके बाद हरिदास अपने उत्तर में ठीक-ठीक समझाते हैं कि ऐसा कैसे होता है।

etāvatālam agha-nirharaṇāya puṁsāṁ
saṅkīrtanaṁ bhagavato guṇa-karma-nāmnāṁ
vikruśya putram aghavān yad ajāmilo 'pi
nārāyaṇeti mriyamāṇa iyāya muktim

इसलिए यह समझना चाहिए कि भगवान के पवित्र नाम का, और उनके गुणों और लीलाओं का कीर्तन करके मनुष्य सभी पापफलों से सहज ही मुक्त हो जाता है। पापफलों से छुटकारे के लिए यही एकमात्र अनुशंसित विधि है। यदि कोई भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण अशुद्ध भी करे, फिर भी यदि वह अपराध-रहित होकर जप करता है, तो वह भौतिक बन्धन से मुक्त हो जाएगा। उदाहरण के लिए, अजामिल अत्यन्त पापी था, लेकिन मरते समय उसने केवल पवित्र नाम का उच्चारण किया, और यद्यपि वह अपने पुत्र को पुकार रहा था, फिर भी नारायण का नाम स्मरण करने के कारण उसे पूर्ण मुक्ति मिल गई।

SB 6.3.24 Srimad-Bhagavatam

यह वही श्लोक है, जिस पर अजामिल की कथा आधारित है। हरिदास इस कथा को इस बात के प्रमाण के रूप में बताते हैं कि भगवान के नाम का अनजाने में किया गया उच्चारण भी जप करने वाले का उद्धार कर देता है। अजामिल जीवन भर पापी रहा था। उसने केवल अपने पुत्र को बुलाने के लिए 'नारायण' पुकारा था। फिर भी मृत्यु के क्षण में केवल उस ध्वनि से उसे मुक्ति मिल गई।

ऐछे नामोदयारम्भे पाप-आदिर क्षय
उदय कैले कृष्ण-पदे हय प्रेमोदय

aiche nāmodayārambhe pāpa-ādira kṣaya
udaya kaile kṛṣṇa-pade haya premodaya

उसी प्रकार, निरपराध नाम-जप के जागने की पहली झलक ही पापों के फलों को तुरन्त नष्ट कर देती है। और जब कोई निरपराध होकर पवित्र नाम का जप करता है, तब कृष्ण के चरणकमलों में प्रेममयी सेवा जाग उठती है।

Antya 3.185 Sri Chaitanya-charitamrita

चाँदपुर की सभा में हरिदास का अपना स्पष्टीकरण कि निरपराध जप की पहली झलक ही पापों को नष्ट कर देती है, जबकि उसका असली फल कृष्ण-प्रेम है।

हरिदास कहेन, — “यदि नामाभासे ‘मुक्ति’ नय
तबे आमार नाक काटिमु, — एइ सुनिश्चय”

haridāsa kahena, — “yadi nāmābhāse ‘mukti’ naya
tabe āmāra nāka kāṭimu, — ei suniścaya”

तब हरिदास ठाकुर ने गोपाल चक्रवर्ती की चुनौती स्वीकार कर ली। उन्होंने कहा, "यदि नामाभास से मुक्ति नहीं मिलती, तो मैं निश्चय ही अपनी नाक काट लूँगा।"

Antya 3.199 Sri Chaitanya-charitamrita

हरिदास गोपाल चक्रवर्ती की चुनौती स्वीकार करते हैं और अपनी नाक दाँव पर लगा देते हैं। इससे पहले के श्लोक (3.198) में गोपाल ने हरिदास की नाक काटने की धमकी दी थी।

तर्केर गोचर नहे नामेर महत्त्व
कोथा हैते जानिबे से एइ सब तत्त्व?

tarkera gocara nahe nāmera mahattva
kothā haite jānibe se ei saba tattva?

"केवल तर्क और वाद-विवाद से पवित्र नाम की महिमा नहीं समझी जा सकती। इसलिए यह व्यक्ति पवित्र नाम की महिमा समझ ही नहीं सकता।"

Antya 3.206 Sri Chaitanya-charitamrita

सभा में हरिदास गोपाल चक्रवर्ती को क्षमा कर देते हैं और समझाते हैं कि पवित्र नाम की महिमा तर्क और वाद-विवाद से नहीं समझी जा सकती।

हरिदास कहे, — “प्रभु, चिन्ता ना करिह
यवनेर संसार देखि' दुःख ना भाविह

haridāsa kahe, — “prabhu, cintā nā kariha
yavanera saṁsāra dekhi’ duḥkha nā bhāviha

हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, "हे प्रभु, आप चिन्ता न करें। भौतिक संसार में यवनों की दशा देखकर दुखी न हों।"

तात्पर्य से: जब पतित जीवों की दशा के कारण भगवान दुखी होते हैं, तो भक्त उन्हें यह कहकर सान्त्वना देता है, "हे प्रभु, आप चिन्ता न करें।" यही सेवा है।

Antya 3.52 Sri Chaitanya-charitamrita

पुरी में जब श्री चैतन्य महाप्रभु यवनों के उद्धार को लेकर चिन्तित थे, तब यह हरिदास का पहला उत्तर था।

भक्तेर गुण कहिते प्रभुर बाडये उल्लास
भक्त-गण-श्रेष्ठ ताते श्री-हरिदास

bhaktera guṇa kahite prabhura bāḍaye ullāsa
bhakta-gaṇa-śreṣṭha tāte śrī-haridāsa

श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने भक्तों की महिमा गाने में बड़ा आनन्द मिलता है, और भक्तों में हरिदास ठाकुर सबसे श्रेष्ठ हैं।

Antya 3.94 Sri Chaitanya-charitamrita

पुरी के संवाद के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों के सामने हरिदास की प्रशंसा की। कृष्णदास कविराज गोस्वामी उन्हें सभी भक्तों में सबसे श्रेष्ठ कहते हैं।

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अध्याय 6

नामाचार्य, पवित्र नाम के शिक्षक

प्रतिदिन तीन लाख नाम, और एक ऐसी उपाधि जो श्री चैतन्य-चरितामृत का श्रील प्रभुपाद कृत अनुवाद केवल उन्हें देता है: कैसे हरिदास ठाकुर नामाचार्य कहलाए।

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Devotional painting of a young Haridasa Thakura seated in meditation before the temple spire and chakra of Jagannatha, evoking his lifelong identity as Namacharya.
Devotional painting of a young Haridasa Thakura seated in meditation before the temple spire and chakra of Jagannatha, evoking his lifelong identity as Namacharya.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution

आचार्य वह शिक्षक है, जो जितना अपने शब्दों से सिखाता है, उतना ही अपने आचरण से भी सिखाता है। जब कृष्ण ने श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब उन्होंने यही मापदण्ड रखा: "जब तक कोई स्वयं भक्ति का आचरण न करे, तब तक वह दूसरों को उसकी शिक्षा नहीं दे सकता" (चैतन्य-चरितामृत आदि 3.21)। नामाचार्य (Nāmācārya) शब्द आचार्य के अर्थ को एक ही विषय तक सीमित कर देता है। वह विषय है कृष्ण का पवित्र नाम, उसका जप कैसे किया जाता है, और जप क्या कर सकता है और क्या नहीं। श्रील प्रभुपाद के श्री चैतन्य-चरितामृत के अनुवाद में श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) को यह उपाधि दी गई है। यह उपाधि ठीक उसी वाक्य में आती है, जहाँ वे महाप्रभु को नामाभास समझाते हैं: "पवित्र नाम के जप के प्रामाणिक ज्ञाता, नामाचार्य हरिदास ठाकुर ने कहा..." (अन्त्य 3.55)। कुछ श्लोक बाद यह उपाधि फिर आती है (अन्त्य 3.61)। तब से गौड़ीय वैष्णव इस उपाधि को केवल उन्हीं की उपाधि मानकर इसका सम्मान करते आए हैं।

विषयविवरण
उपाधिनामाचार्य, "पवित्र नाम के शिक्षक"
उपाधि कहाँ मिलती हैश्री चैतन्य-चरितामृत का श्रील प्रभुपाद कृत अनुवाद, अन्त्य-लीला 3.55 और 3.61
दैनिक जपकृष्ण के तीन लाख नाम, लगभग 175 माला
अन्य नामब्रह्म हरिदास (ब्रह्मा से जुड़े हुए माने जाते हैं)
सबसे प्रसिद्ध शिक्षानामाभास (नाम की धुँधली झलक) और शुद्ध, निरपराध जप के बीच का अन्तर

यह उपाधि कहाँ से आई #

नामाचार्य शब्द चैतन्य-चरितामृत के बांग्ला श्लोकों में नहीं है। यह श्रील प्रभुपाद के उस श्लोक के अंग्रेज़ी अनुवाद से आता है, जिसमें हरिदास यवनों के बारे में प्रभु के प्रश्न का उत्तर देते हैं:

यद्यपि अन्य सङ्केते अन्य हय नामाभास
तथापि नामेर तेज ना हय विनाश

"पवित्र नाम के जप के प्रामाणिक ज्ञाता, नामाचार्य हरिदास ठाकुर ने कहा, “भगवान के अतिरिक्त किसी और वस्तु को बताने के लिए भगवान का पवित्र नाम लेना नामाभास का एक उदाहरण है। इस प्रकार नाम लेने पर भी पवित्र नाम की दिव्य शक्ति नष्ट नहीं होती।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.55)

छह श्लोक बाद अनुवाद फिर इसी तरह शुरू होता है: "नामाचार्य हरिदास ठाकुर ने आगे कहा..." (अन्त्य 3.61)। श्रील प्रभुपाद अपने तात्पर्यों में भी यह उपाधि फिर-फिर लेते हैं, और हर बार इसका कारण समझाते हैं। बेनापोल के प्रसंग में वे लिखते हैं: "हरिदास ठाकुर हरे कृष्ण महा-मन्त्र के जप के आचार्य हैं, इसलिए उन्हें नामाचार्य हरिदास ठाकुर कहा जाता है" (अन्त्य 3.100 का तात्पर्य)। वेश्या द्वारा ली गई परीक्षा के प्रसंग में वे कहते हैं कि हरिदास "म्लेच्छ या यवन परिवार में जन्म लेकर भी नामाचार्य हरिदास ठाकुर बने, क्योंकि वे प्रतिदिन कम से कम तीन लाख बार नाम-यज्ञ करते थे" (अन्त्य 3.124 का तात्पर्य)। पुरी में मन्दिर की प्रथा के कारण हरिदास जगन्नाथ मन्दिर के बाहर ही रहते थे। वहाँ प्रभुपाद लिखते हैं: "फिर भी, श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें नामाचार्य हरिदास ठाकुर के रूप में मान्यता दी" (मध्य 11.195 का तात्पर्य)। वल्लभ भट्ट के सामने प्रभु ने स्वयं हरिदास की जो प्रशंसा की, उसका अनुवाद भी यही है: "हरिदास ठाकुर, पवित्र नाम के शिक्षक..." (अन्त्य 7.48)।

अपनी कक्षाओं में श्रील प्रभुपाद ज़ोर देकर कहते थे कि यह उपाधि जन्म पर नहीं, बल्कि प्रभु के अपने चुनाव पर टिकी थी: "ये हरिदास ठाकुर एक मुसलमान परिवार में जन्मे थे। और चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें नामाचार्य श्रील हरिदास ठाकुर बनाया।" फिर वे इससे भी आगे कहते हैं: "चैतन्य महाप्रभु स्वयं हरे कृष्ण महा-मन्त्र की महिमा फैलाने आए थे। इसलिए स्वयं आचार्य बनने के बजाय उन्होंने हरिदास ठाकुर को आचार्य नियुक्त किया" (श्रील प्रभुपाद, भगवद्-गीता 2.26 पर प्रवचन, हैदराबाद, 30 नवम्बर 1972)।

ब्रह्म हरिदास #

परम्परा में उनका एक दूसरा नाम भी है। अन्त्य-लीला के तीसरे अध्याय का सार श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने लिखा था, और श्रील प्रभुपाद ने उसका अनुवाद किया। उसमें "हरिदास ठाकुर, जो ब्रह्म हरिदास के नाम से जाने जाते थे" की बात आती है (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3, अध्याय-सार)। जब एक शिष्य ने इसके बारे में पूछा, तो प्रभुपाद ने उत्तर दिया: "हाँ, श्रीवास आचार्य नारद मुनि के अवतार हैं और हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं, इसलिए कभी-कभी हरिदास ठाकुर को ब्रह्म हरिदास कहा जाता है" (श्रील प्रभुपाद, जयपताका को पत्र, 17 अप्रैल 1970)। हरिदास के जीवन के अन्तिम दिनों में महाप्रभु ने स्वयं उनके "इस अवतार" की बात कही:

लोक निस्तारिते एइ तोमार ‘अवतार'
नामेर महिमा लोके करिला प्रचार

"इस अवतार में तुम्हारा कार्य सामान्य लोगों का उद्धार करना है। तुमने इस संसार में पवित्र नाम की महिमा का भरपूर प्रचार किया है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.25)

श्रील प्रभुपाद का तात्पर्य इन दोनों नामों को एक साथ जोड़ता है: "हरिदास ठाकुर नामाचार्य के नाम से जाने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने ही हरि-नाम, अर्थात भगवान के पवित्र नाम के जप की महिमा का प्रचार किया। 'तोमार अवतार' ('तुम्हारा अवतार') शब्दों का प्रयोग करके श्री चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं कि हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं" (अन्त्य 11.25 का तात्पर्य)। गौर-गणोद्देश-दीपिका (93-95) उनका वर्णन ऋचीक मुनि के पुत्र ब्रह्मा महातपा के रूप में करती है, जो प्रह्लाद महाराज के साथ मिलकर प्रकट हुए। यह पहचान श्रील हरिदास ठाकुर की जीवनी में विस्तार से दी गई है। श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज अपनी पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" में भक्तिविनोद ठाकुर की नवद्वीप-धाम-माहात्म्य से एक प्रसंग और जोड़ते हैं। भगवान ब्रह्मा को याद था कि उन्होंने एक बार व्रज में कृष्ण के बछड़ों और ग्वाल-बाल सखाओं को चुरा लिया था। इसलिए उन्हें डर था कि जब प्रभु गौरांग के रूप में आएँगे, तब कहीं वे फिर से कोई अपराध न कर बैठें। तब उनसे कहा गया कि वे म्लेच्छों के बीच जन्म लेंगे और पवित्र नाम की महिमा का प्रचार करेंगे।

प्रतिदिन तीन लाख नाम #

हरिदास के दैनिक जीवन की एक बात पर सभी स्रोत सहमत हैं, और वह है उनकी जप-संख्या। कृष्णदास कविराज गोस्वामी जब चैतन्य-वृक्ष की शाखाओं में उनका नाम गिनाते हैं, तो यही बात लिखते हैं:

हरिदास-ठाकुर शाखार अद्भुत चरित
तिन लक्ष नाम तेँहो लयेन अपतित

"चैतन्य-वृक्ष की बीसवीं शाखा हरिदास ठाकुर थे। उनका चरित्र अद्भुत था। वे बिना चूके प्रतिदिन कृष्ण के पवित्र नाम का तीन लाख बार जप करते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43)

यह संख्या उनके जीवन के हर पड़ाव में उनके साथ रही। बेनापोल के वन में वे अपने तुलसी के पौधे के सामने यही जप करते थे, "पूरे दिन और पूरी रात" (अन्त्य 3.100)। जो वेश्या उनकी परीक्षा लेने भेजी गई थी, उससे उन्होंने एक महीने में एक करोड़ नाम जपने के व्रत की बात कही (अन्त्य 3.124)। श्रील प्रभुपाद हिसाब लगाकर बताते हैं कि इसका अर्थ है तीस दिनों तक प्रतिदिन 3,33,333 नाम, और ऊपर से दस नाम और (अन्त्य 3.124 का तात्पर्य)। चाँदपुर में मजुमदारों की सभा में उनके तीन लाख नामों की चर्चा से ही पवित्र नाम पर वह प्रसिद्ध वार्तालाप शुरू हुआ (अन्त्य 3.176)। वह प्रसंग पवित्र नाम पर शिक्षाएँ में बताया गया है। और पुरी में स्वयं महाप्रभु ने भी यही संख्या बताई (अन्त्य 7.48)।

श्रील प्रभुपाद ने एक बार एक शिष्य के लिए इसका हिसाब लगाया: "हरिदास ठाकुर प्रतिदिन 3 लाख नाम जपते थे। इसका अर्थ है, मन्त्र में 16 नाम हैं, माला के हर फेरे में 108x16 यानी 1,728 नाम। 3,00,000 को 1,728 से भाग देने पर लगभग 175 माला प्रतिदिन आती हैं। और हमारे लिए तो 16 माला जपना भी कठिन है! इसीलिए हरिदास ठाकुर 'नामाचार्य' हैं" (श्रील प्रभुपाद, यज्ञेश्वर को पत्र, 2 जनवरी 1972)।

प्रभु के अपने मुख से प्रशंसा #

श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास के प्रति अपना आदर कभी नहीं छिपाया। पुरी में यवनों और वृक्षों के बारे में उनसे बातचीत के बाद प्रभु अपने भक्तों के पास गए। वहाँ उन्होंने हरिदास के गुणों का ऐसा वर्णन किया, "मानो उनके सैकड़ों मुख हों।" कृष्णदास कविराज गोस्वामी यह भी जोड़ते हैं कि सब भक्तों में "हरिदास ठाकुर सबसे श्रेष्ठ हैं" (अन्त्य 3.93-94)। एक बार हरिदास ने स्वयं को "सबसे पतित और अछूत" कहकर प्रभु से विनती की कि वे उन्हें स्पर्श न करें। तब महाप्रभु ने उत्तर दिया: "मैं तुम्हें केवल पवित्र होने के लिए स्पर्श करना चाहता हूँ, क्योंकि तुम्हारे पवित्र कर्म मुझमें नहीं हैं।" प्रभु ने यह भी कहा कि हरिदास "किसी भी ब्राह्मण या सन्न्यासी से कहीं श्रेष्ठ" हैं (मध्य 11.188-191)। वह भेंट श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन में बताई गई है।

सबसे स्पष्ट प्रशंसा तब हुई, जब विद्वान वल्लभ भट्ट पुरी आए। उन्होंने पवित्र नाम का प्रचार करने के लिए महाप्रभु की महिमा गाई। प्रभु ने देखा कि इस विद्वान का हृदय अभिमान से भरा है। इसलिए उन्होंने वह प्रशंसा अपने पार्षदों की ओर मोड़ दी, और बताया कि उन्होंने हर एक से क्या सीखा है (अन्त्य 7.16-53)। हरिदास के बारे में उन्होंने कहा:

हरिदास-ठाकुर — महा-भागवत-प्रधान
प्रति दिन लय तेँह तिन-लक्ष नाम

"हरिदास ठाकुर, पवित्र नाम के शिक्षक, सभी शुद्ध भक्तों में सबसे श्रेष्ठ हैं। वे प्रतिदिन भगवान के तीन लाख पवित्र नाम लेते हैं।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 7.48)

प्रभु का अपना लक्ष्य ही संसार को पवित्र नाम देना था। फिर भी उन्होंने कहा कि नाम की महिमा उन्होंने हरिदास से सीखी है:

नामेर महिमा आमि ताँर ठाञि शिखिलुँ
ताँर प्रसादे नामेर महिमा जानिलुँ

"मैंने भगवान के पवित्र नाम की महिमा हरिदास ठाकुर से सीखी है, और उनकी कृपा से ही मैंने यह महिमा समझी है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 7.49)

जिस दिन हरिदास ने यह संसार छोड़ा, उस दिन महाप्रभु ने उनकी अन्तिम और सबसे ऊँची प्रशंसा की: "हरिदास ठाकुर इस संसार के मस्तक के मुकुट-मणि थे। उनके बिना अब यह संसार अपने बहुमूल्य रत्न से रहित हो गया है" (अन्त्य 11.97)। उस दिन की कथा प्रभु के आलिंगन में तिरोभाव में बताई गई है।

उनके उदाहरण से श्रील प्रभुपाद की शिक्षा #

श्रील प्रभुपाद ने हरिदास के जीवन से एक व्यावहारिक शिक्षा बार-बार दी: उनकी संख्या की नकल मत करो, लेकिन एक निश्चित व्रत अवश्य रखो। तीन लाख नामों वाले श्लोक को समझाते हुए वे लिखते हैं: "कोई साधारण व्यक्ति इतने नामों का जप नहीं कर सकता, और न ही किसी को बनावटी ढंग से हरिदास ठाकुर के आचरण की नकल करनी चाहिए। लेकिन यह आवश्यक है कि हर कोई हरे कृष्ण मन्त्र के जप का एक निश्चित व्रत पूरा करे। इसीलिए हमने अपने संघ में यह नियम बनाया है कि हमारे सभी विद्यार्थी प्रतिदिन कम से कम सोलह माला जपें। ऊँचे स्तर का होने के लिए यह जप अपराध-रहित होना चाहिए" (आदि 10.43 का तात्पर्य)।

बेनापोल में हरिदास की कुटिया का वर्णन करने वाले श्लोक पर भी वे यही शिक्षा देते हैं:

निर्जन-वने कुटिर करि' तुलसी सेवन
रात्रि-दिने तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्तन

"हरिदास ठाकुर ने एक निर्जन वन में एक कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने तुलसी का एक पौधा लगाया, और तुलसी के सामने वे प्रतिदिन तीन लाख बार भगवान के पवित्र नाम का जप करते थे। वे पूरे दिन और पूरी रात जप करते रहते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.100)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "फिर भी, हम प्रतिदिन जप-माला पर हरे कृष्ण महा-मन्त्र की सोलह माला जपकर और तुलसी के पौधे को सम्मान देकर उनके उदाहरण का पालन कर सकते हैं।" वे इस अभ्यास को सरल, फिर भी "अपार आध्यात्मिक शक्ति" वाला बताते हैं, और अपने अनुयायियों से आग्रह करते हैं कि वे "हरिदास ठाकुर के उदाहरण का दृढ़ता से पालन करें" (अन्त्य 3.100 का तात्पर्य)। जहाँ हरिदास वेश्या से निरन्तर जप करने और तुलसी की सेवा करने को कहते हैं, वहाँ प्रभुपाद जोड़ते हैं कि जिन्हें इसका अभ्यास नहीं है, उन्हें भी "सलाह दी जाती है कि वे जप-माला पर कम से कम सोलह माला जपें, ताकि उनका प्रशिक्षण हो सके" (अन्त्य 3.137 का तात्पर्य)।

हरिदास के लिए यह व्रत अन्त तक महत्त्वपूर्ण रहा। पुरी में अपनी अन्तिम बीमारी के समय गोविन्द उनके लिए प्रसाद लाए। हरिदास ने प्रसाद के सम्मान में उसका केवल एक कण लिया, क्योंकि उनकी माला-संख्या पूरी नहीं हुई थी (अन्त्य 11.17-20)। और जब प्रभु ने पूछा कि उन्हें कौन-सा रोग है, तो उन्होंने साफ़-साफ़ बता दिया:

प्रभु कहे, — ‘कोन् व्याधि, कह त' निर्णय?'
तेँहो कहे, — ‘सङ्ख्या-कीर्तन ना पूरय'

"श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास से आगे पूछा, “क्या तुम निश्चित कर सकते हो कि तुम्हारा रोग क्या है?” हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, “मेरा रोग यह है कि मैं अपनी माला-संख्या पूरी नहीं कर पाता।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.23)

श्रील प्रभुपाद इससे हर भक्त के लिए शिक्षा निकालते हैं: "यदि कोई अपने लिए निश्चित की गई माला-संख्या पूरी नहीं कर पाता, तो समझना चाहिए कि उसका आध्यात्मिक जीवन रोगी अवस्था में है। श्रील हरिदास ठाकुर को नामाचार्य कहा जाता है। निश्चय ही, हम हरिदास ठाकुर की नकल नहीं कर सकते, परन्तु हर किसी को एक निश्चित संख्या में माला का जप करना ही चाहिए।" वे यह भी जोड़ते हैं कि सोलह माला "अवश्य जपनी चाहिए, और ज़ोर से जपनी चाहिए, ताकि व्यक्ति स्वयं भी सुन सके और दूसरे भी सुन सकें" (अन्त्य 11.23 का तात्पर्य)। अगले श्लोक में प्रभु ने प्रेमवश बूढ़े हरिदास से कहा कि वे अपनी संख्या कम कर सकते हैं, क्योंकि वे तो पहले से ही मुक्त हैं। प्रभुपाद लिखते हैं: "ठाकुर हरिदास इस बात के जीवंत उदाहरण थे कि विधि-विधानों का पालन कैसे किया जाता है" (अन्त्य 11.24 का तात्पर्य)।

प्रभुपाद ने हरिदास के एकान्त जीवन की नकल करने से भी सावधान किया। महाप्रभु ने अलग-अलग भक्तों को अलग-अलग आदेश दिए। नित्यानन्द प्रभु को बंगाल में प्रचार करने का, रूप और सनातन को वृन्दावन के पवित्र स्थानों को खोजकर प्रकट करने का, और हरिदास को पुरी में रहकर जप करने का। "इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु या उनके प्रतिनिधि के आदेश के बिना किसी को हरिदास ठाकुर के आचरण की नकल करने का प्रयास नहीं करना चाहिए" (मध्य 11.195 का तात्पर्य)। उसी तात्पर्य में वे श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का एक गीत उद्धृत करते हैं। यह गीत उस नकलची के विरुद्ध है, जो अकेले बैठकर जप करने का दिखावा करता है: "प्रतिष्ठार तरे, निर्जनेर घरे, तव हरि-नाम केवल कैतव"। प्रभुपाद के अनुवाद के अनुसार ऐसा व्यक्ति "सस्ती लोकप्रियता चाहता है, हरिदास ठाकुर की वास्तविक योग्यता नहीं।" प्रभुपाद समझाते हैं कि नए साधक को पहले गुरु के निर्देशन में काम और प्रचार करना चाहिए। "अपने आध्यात्मिक जीवन के आरम्भ में ही किसी को हरिदास ठाकुर की नकल करने का प्रयास नहीं करना चाहिए" (मध्य 11.176 का तात्पर्य)।

हरिदास नाम के दूसरे भक्तों से अलग #

श्री चैतन्य महाप्रभु के परिकर में हरिदास नाम के और भी भक्त थे, और परम्परा इन्हें अलग-अलग पहचानती है।

  • छोटा हरिदास (कनिष्ठ हरिदास) एक वैरागी थे, जो पुरी में महाप्रभु के लिए कीर्तन गाते थे (अन्त्य 2.102)। भगवान आचार्य के कहने पर वे माधवी देवी से अच्छे चावल माँग लाए। माधवी देवी शिखी माहिति की वृद्ध और साध्वी बहन थीं (अन्त्य 2.103-107)। तब प्रभु ने उन्हें अपने पास आने से रोक दिया, और कहा: "जिस व्यक्ति ने सन्न्यास-आश्रम स्वीकार कर लिया है, फिर भी किसी स्त्री से घनिष्ठ बातें करता है, उसका मुख देखना मैं सहन नहीं कर सकता" (अन्त्य 2.113-117)। उनकी कथा अन्त्य-लीला के दूसरे अध्याय, "छोटे हरिदास को दण्ड", में पूरी बताई गई है। यह अध्याय हरिदास ठाकुर की महिमा वाले अध्याय से ठीक पहले आता है (अन्त्य 2)।
  • द्विज हरिदास का नाम महाप्रभु के अपने वृक्ष की बहत्तरवीं शाखा के रूप में आता है (आदि 10.112)। तात्पर्य में भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की अनुभाष्य टीका उद्धृत है। उससे हमें पता चलता है कि "उनके दो पुत्र थे, श्रीदाम और गोकुलानन्द, जो श्री अद्वैत आचार्य के शिष्य थे।" उसी से यह भी पता चलता है कि यह निश्चित नहीं है कि अष्टोत्तर-शत-नाम उन्होंने ही लिखा था (आदि 10.112 का तात्पर्य)।
  • नामाचार्य हरिदास ठाकुर बेनापोल, चाँदपुर, फुलिया और सिद्ध बकुल वाले भक्त हैं, जो पवित्र नाम के शिक्षक हैं।

गौड़ीय साहित्य में जहाँ भी हरिदास नाम आता है, वहाँ नामाचार्य की उपाधि उस भक्त की पहचान कराती है, जिनसे महाप्रभु ने, अपने ही शब्दों में, पवित्र नाम की महिमा सीखी थी।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (10)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

যদ্যপি অন্য সঙ্কেতে অন্য হয় নামাভাস। তথাপি নামের তেজ না হয় বিনাশ॥

yadyapi anya saṅkete anya haya nāmābhāsa
tathāpi nāmera teja nā haya vināśa

शब्दार्थ

yadyapi: although; anya: another; saṅkete: by intimation; anya: that other; haya: is; nāma-ābhāsa: almost equal to the holy name; tathāpi: still; nāmera teja: the transcendental power of the holy name; nā haya vināśa: is not destroyed.

नामाचार्य हरिदास ठाकुर, पवित्र नाम के जप में प्रामाणिक, ने कहा, "प्रभु के पवित्र नाम का जप किसी अन्य वस्तु का संकेत देने के लिए करना नामाभास का एक उदाहरण है। इस प्रकार जप किए जाने पर भी, पवित्र नाम की दिव्य शक्ति नष्ट नहीं होती।

Antya 3.55 Sri Chaitanya-caritamrta

इस श्लोक के श्रील प्रभुपाद कृत अनुवाद में हरिदास ठाकुर को नामाचार्य कहा गया है, और यह उपाधि अन्त्य 3.61 में फिर आती है। बंगाली श्लोक में स्वयं यह शब्द नहीं है।

“कोटि-नाम-ग्रहण-यज्ञ करि एक-मासे
एइ दीक्षा करियाछि, हैल आसि' शेषे

“koṭi-nāma-grahaṇa-yajña kari eka-māse
ei dīkṣā kariyāchi, haila āsi’ śeṣe

“मैंने एक महीने में एक करोड़ नाम जपने का व्रत लिया है। मैंने यह व्रत लिया है, और अब यह पूरा होने वाला है।

तात्पर्य से: दूसरी ओर हम देखते हैं कि हरिदास ठाकुर म्लेच्छ या यवन परिवार में जन्म लेकर भी नामाचार्य हरिदास ठाकुर बने, क्योंकि वे प्रतिदिन कम से कम तीन लाख बार नाम-यज्ञ करते थे।

Antya 3.124 Sri Chaitanya-charitamrita

एक महीने में एक करोड़ नाम जपने का हरिदास का व्रत (तात्पर्य के अनुसार प्रतिदिन 3,33,333 नाम)। प्रभुपाद समझाते हैं कि इसी नाम-यज्ञ के कारण हरिदास यवन परिवार में जन्म लेकर भी नामाचार्य बने।

प्रभु कहे, — “वृद्ध ह-इला ‘सङ्ख्या' अल्प कर
सिद्ध-देह तुमि, साधने आग्रह केने कर?

prabhu kahe, — “vṛddha ha-ilā ‘saṅkhyā’ alpa kara
siddha-deha tumi, sādhane āgraha kene kara?

“अब तुम बूढ़े हो गए हो,” प्रभु ने कहा, “इसलिए तुम प्रतिदिन जपी जाने वाली माला की संख्या कम कर सकते हो। तुम पहले से ही मुक्त हो, इसलिए तुम्हें विधि-विधानों का बहुत कड़ाई से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

तात्पर्य से: जब तक कोई भगवान के प्रति स्वाभाविक प्रेम के स्तर पर नहीं पहुँच जाता, तब तक उसे विधि-विधानों का पालन करना ही चाहिए। ठाकुर हरिदास इस बात के जीवंत उदाहरण थे कि विधि-विधानों का पालन कैसे किया जाता है।

Antya 11.24 Sri Chaitanya-charitamrita

महाप्रभु प्रेमवश बूढ़े हरिदास को अपनी माला-संख्या कम करने की अनुमति देते हैं। प्रभुपाद हरिदास को विधि-विधानों के पालन का जीवंत उदाहरण कहते हैं।

मन्दिरेर चक्र देखि' करिह प्रणाम
एइ ठाञि तोमार आसिबे प्रसादान्न

mandirera cakra dekhi’ kariha praṇāma
ei ṭhāñi tomāra āsibe prasādānna

“यहाँ शान्ति से रहो, मन्दिर के शिखर पर स्थित चक्र के दर्शन करो और प्रणाम करो। जहाँ तक तुम्हारे प्रसाद की बात है, उसे मैं यहीं भिजवाने की व्यवस्था कर दूँगा।”

तात्पर्य से: इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु या उनके प्रतिनिधि के आदेश के बिना किसी को हरिदास ठाकुर के आचरण की नकल करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

Madhya 11.195 Sri Chaitanya-charitamrita

सिद्ध बकुल में हरिदास के लिए प्रभु की व्यवस्था। तात्पर्य बताता है कि मन्दिर की प्रथा उन्हें बाहर रखती थी, फिर भी महाप्रभु ने उन्हें नामाचार्य के रूप में मान्यता दी। साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि प्रभु या उनके प्रतिनिधि के आदेश के बिना उनके एकान्त जप की नकल नहीं करनी चाहिए।

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अध्याय 7

नवद्वीप में श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ

श्रीवास के घर में रात-रात भर कीर्तन, नित्यानन्द प्रभु के साथ घर-घर जाकर प्रचार, और काज़ी के विरुद्ध निकली शोभायात्रा में प्रभु के आगे नृत्य।

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जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप में अपना संकीर्तन आन्दोलन आरम्भ किया, तब श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) उनके साथ थे। वे श्रीवास के घर में पूरी-पूरी रात कीर्तन करते थे। वे नित्यानन्द प्रभु के साथ घर-घर जाकर पवित्र नाम पहुँचाते थे। और काज़ी के विरुद्ध निकली विशाल कीर्तन-यात्रा में वे प्रभु के सामने नाचे। ये वे वर्ष थे, जब महाप्रभु ने अभी सन्न्यास नहीं लिया था। उसके बाद पुरी में उनका जीवन श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन में बताया गया है।

श्रीवास के घर में कीर्तन की रातें #

श्री चैतन्य महाप्रभु गया से लौटे, जहाँ ईश्वर पुरी ने उन्हें दीक्षा दी थी। लौटते समय उनमें भगवत्-प्रेम के सभी लक्षण दिखाई दे रहे थे (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.9)। जल्दी ही उन्होंने पवित्र नामों का सामूहिक कीर्तन (saṅkīrtana) आरम्भ कर दिया। हरिदास कई वर्षों से शान्तिपुर के पास जप कर रहे थे। अब वे अद्वैत आचार्य जैसे शुद्ध भक्तों के बीच रहने के लिए नवद्वीप आए, और इस कीर्तन में शामिल हो गए (चैतन्य-भागवत मध्य 8)। वृन्दावन दास ठाकुर उन्हें उन थोड़े-से भक्तों में गिनते हैं, जो रात भर प्रभु के साथ कीर्तन करते थे। उस समय द्वार बन्द रखे जाते थे, ताकि उपहास करने वाले लोग भीतर आकर मज़ाक न उड़ा सकें (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.35):

"जब वैष्णवों ने सुना कि प्रभु ने अपनी संकीर्तन-लीला आरम्भ कर दी है, तो वे सब बहुत आनन्दित हुए। प्रभु हर रात श्रीवास पण्डित के घर कीर्तन करते थे, और कभी-कभी चन्द्रशेखर आचार्य के घर। नित्यानन्द, गदाधर, अद्वैत, श्रीवास, विद्यानिधि, मुरारी, हिरण्य और हरिदास, सब वहाँ होते थे।" (चैतन्य-भागवत मध्य 8.110-112, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)

जिस दिन प्रभु ने अपने घाव दिखाए #

एक दिन श्रीवास ठाकुर के घर में श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान विष्णु की शय्या पर बैठ गए। वे सात प्रहर, यानी लगभग इक्कीस घंटे, अपने दिव्य भाव में डूबे रहे। भक्त इसे महा-प्रकाश, अर्थात "महान प्राकट्य", कहते हैं। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं कि उस समय "उन्होंने हरिदास ठाकुर को अपना आशीर्वाद दिया" (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.18 का तात्पर्य)।

वह आशीर्वाद क्या था, यह चैतन्य-भागवत बताता है। प्रभु ने हरिदास को बुलाया, और उस दिन की बात की, जब उन्हें बाईस बाज़ारों में बेंतों से पीटा गया था। प्रभु ने कहा कि वे उस दिन हाथ में अपना चक्र लेकर नीचे आए थे। वे अपने भक्त को पीटने वालों को नष्ट करने के लिए तैयार थे। लेकिन हरिदास उन्हीं लोगों के लिए प्रार्थना कर रहे थे, और उस प्रार्थना के सामने प्रभु कुछ नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने अपना शरीर हरिदास के शरीर पर रख दिया और सारे प्रहार स्वयं सह लिए। फिर प्रभु ने अपनी पीठ खोलकर बेंतों के निशान दिखाए। यह सुनकर हरिदास मूर्छित हो गए। जब उन्हें होश आया, तो प्रभु ने उन्हें अपना दिव्य रूप दिखाया और उनकी प्रशंसा की। तीर्थ महाराज के अनुवाद में प्रभु कहते हैं: "जो हरिदास के दर्शन भर कर लेता है, वह भी सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा और शिव जैसे महान देवता भी हरिदास का संग चाहते हैं। गंगा भी उनका स्पर्श चाहती हैं।" (चैतन्य-भागवत मध्य 10, तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" में बताए गए प्रसंग के आधार पर)

कृष्णदास कविराज गोस्वामी इसी आशीर्वाद को एक पंक्ति में लिखते हैं:

हरिदास ठाकुरेरे करिल प्रसाद
आचार्य-स्थाने मातार खण्डाइल अपराध

"इस घटना के बाद प्रभु ने हरिदास ठाकुर को आशीर्वाद दिया, और अद्वैत आचार्य के घर में अपनी माता का अपराध दूर किया।" (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 17.71)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "महा-प्रकाश के दिन भगवान चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर को गले लगाया, और उन्हें बताया कि वे और कोई नहीं, स्वयं प्रह्लाद महाराज के अवतार हैं।"

नित्यानन्द के साथ घर-घर प्रचार #

जल्दी ही प्रभु चाहने लगे कि पवित्र नाम श्रीवास के बन्द द्वारों से बाहर भी पहुँचे। इसके लिए उन्होंने नित्यानन्द प्रभु और हरिदास को अपना सन्देशवाहक चुना:

"सुनो, सुनो, नित्यानन्द। सुनो, हरिदास। मैं चाहता हूँ कि तुम जाकर मेरा यह आदेश सबको सुनाओ। हर घर में जाओ और लोगों से विनती करो कि वे कृष्ण के नामों का जप करें, कृष्ण की पूजा करें, कृष्ण के बारे में पढ़ें। इसके अलावा कुछ मत कहो, और दूसरों से भी कुछ और मत कहलवाओ। दिन के अन्त में यहाँ आकर मुझे अपने प्रचार का फल बताओ। तुम लोगों से इसी तरह विनती करोगे, और जो नहीं मानेंगे, उन्हें मैं हाथ में चक्र लेकर आऊँगा और नष्ट कर दूँगा।" (चैतन्य-भागवत मध्य 13.7-11, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज की पुस्तक "श्री चैतन्य: हिज़ लाइफ़ एण्ड एसोसिएट्स" के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)

श्रील प्रभुपाद इसकी पुष्टि करते हैं: "भगवान चैतन्य के आदेश से नित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर, दोनों घर-घर जाकर कृष्णभावनामृत का प्रचार करते थे" (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.17 का तात्पर्य)। एक दिन वे जगाई और मधाई के पास गए। ये दोनों भाई एक अच्छे ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन शराब और हर तरह के पाप में डूब गए थे। नशे में धुत उन दोनों भाइयों ने नित्यानन्द और हरिदास को खदेड़ दिया (आदि 17.17 का तात्पर्य)। चैतन्य-भागवत के आधार पर तीर्थ महाराज यहाँ एक हल्का-सा हास्य-प्रसंग भी बताते हैं। बूढ़े हरिदास नित्यानन्द के साथ दौड़ नहीं पा रहे थे। बाद में उन्होंने अद्वैत आचार्य से कहा कि ऐसे अनोखे साथी के साथ वे फिर कभी प्रचार करने नहीं जाएँगे (चैतन्य-भागवत मध्य 13, तीर्थ महाराज के वर्णन के आधार पर)।

फिर भी इस कथा का अन्त कृपा में हुआ। मधाई ने मिट्टी के घड़े के एक टुकड़े से नित्यानन्द को मारा। तब प्रभु दोनों भाइयों को दण्ड देने के लिए दौड़कर वहाँ आए। लेकिन जगाई का पश्चात्ताप देखकर उन्होंने उसे गले लगा लिया। फिर दोनों भाई शुद्ध हो गए, और उन्हें पवित्र नाम मिला (आदि 17.17 का तात्पर्य)।

चौकीदार, रक्षक और नर्तक #

एक बार प्रभु ने चन्द्रशेखर आचार्य के घर में कृष्ण-लीला का एक नाटक किया। उसमें हरिदास गाँव के चौकीदार के वेश में, हाथ में लाठी लिए, मंच पर आए। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "भगवान चैतन्य महाप्रभु द्वारा किए गए नाटकों में हरिदास ठाकुर ने कोतवाल (पुलिस-प्रमुख) की भूमिका निभाई" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43 का तात्पर्य)। उनका काम सबको जगाकर कृष्ण की सेवा में लगाना था। चैतन्य-भागवत में उनकी पुकार लिखी हुई है: "जागो! जागो! जागो! श्रीवास नारद मुनि के वेश में नाचेंगे।" (चैतन्य-भागवत मध्य 18.100, तीर्थ महाराज के अनुवाद के आधार पर)

एक दूसरे दिन एक ब्राह्मण की पत्नी बार-बार प्रभु के चरणों की धूल लेती रही। इससे प्रभु को दुःख हुआ, और वे दौड़कर गंगा में कूद पड़े। तब नित्यानन्द और हरिदास ने ही उन्हें बाहर निकाला (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.243-245)।

जब चाँद काज़ी ने कीर्तन पर रोक लगाने का प्रयास किया, तब प्रभु ने इसका उत्तर मशालों के प्रकाश में निकली एक कीर्तन-यात्रा से दिया। इस यात्रा में कीर्तन के तीन दल थे। "आगे के दल में ठाकुर हरिदास नाच रहे थे, और बीच के दल में अद्वैत आचार्य बड़े आनन्द से नाच रहे थे" (चैतन्य-चरितामृत आदि 17.136)। चैतन्य-भागवत भी वहाँ उनका वर्णन करता है: "तब कृष्ण-रस के सागर हरिदास ने महाप्रभु के आदेश पर सुन्दर नृत्य किया।" (चैतन्य-भागवत मध्य 23.204, तीर्थ महाराज के अनुवाद के आधार पर)

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (3)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

श्रीकान्त, वल्लभ-सेन आर दुइ जन
हरिदास-ठाकुर ताहाँ करेन नर्तन

śrīkānta, vallabha-sena āra dui jana
haridāsa-ṭhākura tāhāṅ karena nartana

दो और व्यक्ति, श्रीकान्त और वल्लभ सेन, मुख्य गायक के पीछे-पीछे दोहराकर गाने वालों के रूप में जुड़े। इस दल में बड़े हरिदास [हरिदास ठाकुर] नर्तक थे।

Madhya 13.41 Sri Chaitanya-charitamrita

रथ-यात्रा में प्रभु ने कीर्तन के सात दल बनाए। मुकुन्द के नेतृत्व वाले दल में हरिदास ठाकुर नर्तक थे।

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अध्याय 8

श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन

जन्म के कारण हरिदास ठाकुर को जगन्नाथ मन्दिर में जाने की अनुमति नहीं थी। वे पुरी में एक छोटे उद्यान-कुटीर में रहते थे, जहाँ स्वयं प्रभु प्रतिदिन उनसे मिलने आते थे।

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The chakra atop the Jagannatha temple at Puri, which Haridasa Thakura, barred from entering the temple itself, offered his obeisances to from a distance every day.
The chakra atop the Jagannatha temple at Puri, which Haridasa Thakura, barred from entering the temple itself, offered his obeisances to from a distance every day.Wikimedia Commons · Public domain / CC-licensed

श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) ने अपने अन्तिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में बिताए। वे फूलों के एक बगीचे में बने एक छोटे-से कमरे में रहते थे। वे कभी बड़े मन्दिर के भीतर नहीं गए, फिर भी श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं हर दिन वहाँ उनसे मिलने आते थे। इससे पहले के वर्षों में हरिदास नवद्वीप में प्रभु के साथ रहकर कीर्तन करते, नाचते और प्रचार करते थे। उन वर्षों की कथा नवद्वीप में श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ में दी गई है। यहाँ कथा वहाँ से शुरू होती है, जब प्रभु ने सन्न्यास लिया और पुरी की ओर चल पड़े।

"मेरी क्या गति होगी?" #

भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज लिखते हैं कि प्रभु सन्न्यास लेने के लिए जिस दिन नवद्वीप छोड़कर गए, उससे पहले की रात हरिदास प्रभु के घर में ही ठहरे हुए थे। बाद में शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के घर पर प्रभु ने भक्तों से कहा कि वे अपने-अपने घर लौट जाएँ और मिलकर पवित्र नाम का कीर्तन करें (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 3.188-192)। जब प्रभु पुरी जाने की तैयारी कर रहे थे, तब हरिदास रो पड़े:

नीलाचले याबे तुमि, मोर कोन् गति
नीलाचले याइते मोर नाहिक शकति

हरिदास ठाकुर ने कहा, "आप जगन्नाथ पुरी जा रहे हैं, यह तो ठीक है, लेकिन मेरी क्या गति होगी? मैं जगन्नाथ पुरी नहीं जा सकता।" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 3.194)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "यद्यपि श्रील हरिदास ठाकुर का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था, फिर भी उन्हें विधिवत् दीक्षित ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया गया था। इसलिए उन्हें जगन्नाथ पुरी के मन्दिर में प्रवेश करने का पूरा अधिकार था, लेकिन ... हरिदास ठाकुर अपनी महान विनम्रता के कारण इन प्रचलित नियमों को तोड़ना नहीं चाहते थे।"

हरिदास को लगता था कि यदि प्रभु मन्दिर में रहेंगे, तो जो व्यक्ति मन्दिर में जा ही नहीं सकता, वह उन्हें फिर कभी नहीं देख पाएगा (मध्य 3.194, तात्पर्य)। प्रभु ने उत्तर दिया, "कृपया अपनी विनम्रता को रोकिए। आपकी विनम्रता को देखकर ही मेरा मन बहुत व्याकुल हो उठता है।" उन्होंने वचन दिया कि वे भगवान जगन्नाथ से विनती करेंगे और स्वयं हरिदास को पुरी ले जाएँगे (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 3.196-197)।

पुरी पहुँचना और मन्दिर का नियम #

प्रभु ने अपना वचन निभाया। कुछ वर्ष बाद, जब प्रभु दक्षिण भारत की यात्रा से लौट आए थे, बंगाल के भक्त रथयात्रा के लिए पुरी आए, और हरिदास भी उनके साथ आए। प्रभु ने एक-एक भक्त से मिलकर उनका स्वागत किया, फिर पूछा, "हरिदास कहाँ हैं?" हरिदास बहुत दूर, आम रास्ते के किनारे ज़मीन पर दण्डवत् पड़े हुए थे और वहीं से प्रणाम कर रहे थे (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.161-163)। भक्त उन्हें बुलाने दौड़े, तो उन्होंने उत्तर दिया:

हरिदास कहे, — मुञि नीच-जाति छार
मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि आधिकार

हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, "मैं मन्दिर के पास नहीं जा सकता, क्योंकि मैं नीच जाति का, अधम व्यक्ति हूँ। मुझे वहाँ जाने का कोई अधिकार नहीं है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.165)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "यह एक पुराना नियम है, और इसीलिए हरिदास ठाकुर मन्दिर में प्रवेश करने के लिए निश्चित रूप से सक्षम और योग्य होते हुए भी उसके पास तक नहीं जाना चाहते थे।"

उन्होंने बस इतना माँगा कि उन्हें मन्दिर के पास कोई एकान्त स्थान मिल जाए, जहाँ भगवान जगन्नाथ के किसी सेवक से उनका स्पर्श न हो (मध्य 11.166-167)। यह सुनकर प्रभु बहुत प्रसन्न हुए (मध्य 11.168)। श्री चैतन्य-चरितामृत में इस नियम को लेकर हरिदास की किसी शिकायत का उल्लेख नहीं है।

फूलों के बगीचे में एक कमरा #

जब काशी मिश्र भक्तों के ठहरने की व्यवस्था करने आए, तो प्रभु ने उनसे अपने निवास के पास फूलों के बगीचे में एक अलग, एकान्त कमरा माँगा। प्रभु ने कहा, "वास्तव में, मैं उस एकान्त स्थान में बैठकर भगवान के चरण-कमलों का स्मरण करूँगा" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.175-176)। श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि प्रभु यह कमरा "या तो अपने लिए या हरिदास ठाकुर के लिए" चाहते थे। वे यह चेतावनी भी देते हैं कि नए साधकों को ऐसे एकान्त जप की नकल नहीं करनी चाहिए (मध्य 11.176, तात्पर्य)।

तब प्रभु हरिदास के पास गए। हरिदास डण्डे की तरह सीधे ज़मीन पर गिर पड़े। प्रभु ने उन्हें उठाकर गले लगा लिया, और दोनों रोने लगे (मध्य 11.185-187)। हरिदास ने विनती की, "मेरे प्रिय प्रभु, कृपया मुझे स्पर्श न कीजिए, क्योंकि मैं सबसे पतित और अछूत हूँ, और मनुष्यों में सबसे नीच हूँ।" प्रभु ने उत्तर दिया, "मैं आपको केवल पवित्र होने के लिए स्पर्श करना चाहता हूँ, क्योंकि आपके पवित्र कर्म मुझमें नहीं हैं" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.188-189)। प्रभु ने कहा कि हरिदास हर क्षण हर तीर्थ में स्नान करते हैं, और वे किसी भी ब्राह्मण या सन्न्यासी से कहीं श्रेष्ठ हैं (मध्य 11.190-192)। फिर प्रभु उन्हें बगीचे में ले गए और उनका कमरा दिखाया:

मन्दिरेर चक्र देखि' करिह प्रणाम
एइ ठाञि तोमार आसिबे प्रसादान्न

"यहाँ शान्ति से रहिए और मन्दिर के शिखर पर लगे चक्र को देखकर प्रणाम कीजिए। जहाँ तक आपके प्रसाद की बात है, मैं उसे यहीं भिजवाने की व्यवस्था करूँगा।" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.195)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "इसका अर्थ है कि यदि किसी को मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है, या वह स्वयं को मन्दिर में प्रवेश के अयोग्य मानता है, तो वह मन्दिर के बाहर से चक्र का दर्शन कर सकता है, और यह भीतर विग्रह के दर्शन के समान ही है।"

उसी दिन प्रभु ने अपने सेवक गोविन्द के हाथ बड़े ध्यान से हरिदास के लिए प्रसाद भिजवाया (मध्य 11.206)। उस दिन से हरिदास पुरी में ही रहे, प्रभु के अपने पुरी वाले भक्तों के बीच (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 10.124-126)।

सिद्ध बकुल और बकुल का वृक्ष #

जिस बगीचे में हरिदास रहते थे, उसे आज सिद्ध बकुल कहा जाता है। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "अब वहाँ एक मठ बना दिया गया है, जिसे सिद्धबकुल मठ कहा जाता है" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 3.194, तात्पर्य)। तीर्थ महाराज यह भी बताते हैं कि पहले इस स्थान को मुद्रा मठ कहा जाता था।

यह नाम एक बकुल के पेड़ से आया है। श्री चैतन्य-चरितामृत में इस पेड़ का उल्लेख नहीं है। यह कथा पुरी की एक स्थानीय परम्परा है, जिसे तीर्थ महाराज ने लिखा है। कहा जाता है कि मन्दिर के पुजारी कभी-कभी भगवान जगन्नाथ के दाँत साफ़ करने वाली टहनी (दन्त-काष्ठ) किसी विशेष व्यक्ति को प्रसाद के रूप में देते थे। एक बार बकुल की ऐसी ही एक टहनी श्री चैतन्य महाप्रभु को दी गई। प्रभु ने उसे उस स्थान पर लगा दिया, जहाँ हरिदास जप करते थे, और वह बढ़कर एक बड़ा पेड़ बन गई। परम्परा कहती है कि यह टहनी महाविषुव संक्रान्ति के दिन लगाई गई थी, जिस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। इसी विवरण के अनुसार हर वर्ष उस दिन दन्त-काष्ठ-रोपण उत्सव मनाया जाता है।

प्रभु का हर दिन आना #

हर सुबह प्रभु मन्दिर में उपल-भोग का दर्शन करने जाते थे, और लौटते समय रास्ते में हरिदास से मिलने रुकते थे। जब रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी पुरी आए, तो वे भी मन्दिर से दूर रहे और हरिदास के साथ ठहरे। उनमें से जो भी वहाँ होता, प्रभु उससे मिलने आते थे (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 1.63-65; अन्त्य 1.45; अन्त्य 4.13-16)। तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद इससे यह शिक्षा निकालते हैं: "कृष्ण स्वयं उन भक्तों का संग करते हैं, जो उनके पवित्र नाम का जप करते हैं, और किसी विशेष मन्दिर में प्रवेश न कर पाने पर दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है।" प्रभु हरिदास और सनातन से खुले मन से और बड़ी कोमलता से स्नेह करते थे। उन्होंने उनसे कहा, "मैं तुम दोनों को अपने छोटे बालक मानता हूँ, जिनका पालन-पोषण मुझे करना है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 4.184)

वहीं, हरिदास के कमरे में, सनातन ने हरिदास की वह प्रशंसा की, जो तब से हरिदास की पहचान बन गई है:

‘आचार', ‘प्रचार', — नामेर करह ‘दुइ' कार्य
तुमि — सर्व-गुरु, तुमि जगतेर आर्य

"आप अपने आचरण से और अपने प्रचार से, पवित्र नाम से जुड़े दोनों कर्तव्य एक साथ निभाते हैं। इसलिए आप सारे संसार के गुरु हैं, क्योंकि आप संसार के सबसे उन्नत भक्त हैं।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 4.103)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "यहाँ जो योग्यताएँ बताई गई हैं, वे ये हैं कि व्यक्ति को शास्त्र के आदेशों के अनुसार आचरण करना चाहिए और साथ ही प्रचार भी करना चाहिए।"

उत्सव के दिनों में हरिदास बाहर आकर नाचते थे। रथयात्रा में मुकुन्द दत्त के नेतृत्व वाली टोली में "बड़े हरिदास [हरिदास ठाकुर] नर्तक थे" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 13.40-41)।

ये वे वर्ष थे, जब प्रभु कृष्ण के विरह में सबसे गहराई से डूबे हुए थे। उनकी रातें रामानन्द राय और स्वरूप दामोदर गोस्वामी के साथ बीतती थीं (अन्त्य 11.11-15)। हरिदास से मिलने का समय दिन में था। यह शान्त मित्रता का एक तय समय था।

दिने नृत्य-कीर्तन, ईश्वर-दरशन
रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन

"दिन के समय श्री चैतन्य महाप्रभु नृत्य और कीर्तन में तथा भगवान जगन्नाथ के मन्दिर के दर्शन में लगे रहते थे। रात में वे अपने सबसे अन्तरंग भक्तों, जैसे रामानन्द राय और स्वरूप दामोदर गोस्वामी, के साथ भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं के दिव्य रसों के अमृत का आस्वादन करते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.12)

जन्म से बढ़कर सम्मान #

बहुत वर्ष पहले, शान्तिपुर में, अद्वैत आचार्य ने हरिदास को श्राद्ध-पात्र अर्पित किया था। यह अद्वैत आचार्य के पिता के श्राद्ध-कर्म के भोजन की थाली थी। रीति के अनुसार ऐसी थाली केवल सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दी जाती थी (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 10.44)। अपने जीवन के अन्त के पास, प्रभु से बात करते हुए, हरिदास ने स्वयं इस सम्मान को याद किया:

अनेक नाचाइला मोरे प्रसाद करिया
विप्रेर श्राद्ध-पात्र खाइनु ‘म्लेच्छ' हञा

"मेरे प्रिय प्रभु, आपकी कृपा से आपने मुझे अनेक प्रकार से नचाया है। उदाहरण के लिए, मुझे श्राद्ध-पात्र अर्पित किया गया, जो प्रथम श्रेणी के ब्राह्मणों को अर्पित किया जाना चाहिए था। मैंने उसमें से खाया, यद्यपि मैं मांसाहारियों के कुल में जन्मा था।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.30)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "यद्यपि हरिदास ठाकुर मांसाहारियों के कुल में जन्मे थे, तथापि एक उन्नत भक्त होने के कारण उन्हें प्रथम श्रेणी के ब्राह्मण से भी अधिक सम्मान दिखाया गया।"

उसी तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के अनुभाष्य का उल्लेख करते हैं। उसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल में जन्मा है, लेकिन ब्राह्मण जैसा जीवन नहीं जीता, उसे श्राद्ध-पात्र नहीं दिया जाना चाहिए। श्रीमद्भागवतम् यह नियम देता है: "यदि कोई व्यक्ति ऊपर बताए गए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के लक्षण दिखाता है, तो चाहे वह किसी दूसरे वर्ण में जन्मा हो, उसे उन्हीं लक्षणों के अनुसार स्वीकार किया जाना चाहिए" (श्रीमद्भागवतम् 7.11.35)। मन्दिर का नियम बना रहा, और हरिदास ने उसका आदर किया। लेकिन प्रभु इस नियम के बारे में क्या सोचते थे, यह श्रील प्रभुपाद साफ़ बताते हैं: "ऐसे कट्टर प्रतिबन्धों को भगवान चैतन्य महाप्रभु ने स्वीकार नहीं किया था" (मध्य 1.63, तात्पर्य)।

सिद्ध बकुल में अन्तिम वर्ष #

हरिदास उसी बगीचे में बूढ़े हुए, और तब भी हर दिन तीन लाख नाम जपते रहे। एक दिन गोविन्द ने देखा कि वे लेटे हुए हैं और धीरे-धीरे जप कर रहे हैं। उन्होंने प्रसाद में से बस थोड़ा-सा लिया और कहा, "लेकिन तुम महाप्रसाद लाए हो, तो मैं इसकी उपेक्षा कैसे करूँ?" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.16-20)। अगले दिन उन्होंने प्रभु को बताया कि उनका एकमात्र रोग यह है कि वे अपनी मालाएँ पूरी नहीं कर पाते (अन्त्य 11.21-23)। तब प्रभु ने प्रेम से उन्हें एक सुझाव दिया:

प्रभु कहे, — “वृद्ध ह-इला ‘सङ्ख्या' अल्प कर
सिद्ध-देह तुमि, साधने आग्रह केने कर?

"अब जब आप वृद्ध हो गए हैं," प्रभु ने कहा, "तो आप प्रतिदिन जपी जाने वाली मालाओं की संख्या कम कर सकते हैं। आप पहले से ही मुक्त हैं, इसलिए आपको विधि-विधानों का बहुत कड़ाई से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.24)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "ठाकुर हरिदास इस बात के जीवन्त उदाहरण थे कि विधि-विधानों का पालन कैसे किया जाता है।"

हरिदास ने वह विश्राम स्वीकार नहीं किया, जो उन्हें दिया जा रहा था। इसके बजाय उन्होंने प्रभु से एक अन्तिम कृपा माँगी। उसकी कथा प्रभु के आलिंगन में तिरोभाव में दी गई है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (9)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

yasya yal lakṣaṇaṁ proktaṁ
puṁso varṇābhivyañjakam
yad anyatrāpi dṛśyeta
tat tenaiva vinirdiśet

यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के उपर्युक्त लक्षण प्रदर्शित करता है, तो चाहे वह किसी अन्य वर्ण में क्यों न जन्मा हो, उसे उन्हीं लक्षणों के अनुसार वर्गीकृत किया जाना चाहिए।

SB 7.11.35 Srimad-Bhagavatam

यह श्लोक ऊपर उद्धृत भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की टीका का समर्थन करता है। टीका कहती है कि ब्राह्मण कुल में जन्मा व्यक्ति यदि ब्राह्मण जैसा आचरण नहीं करता, तो उसे ब्राह्मण का सम्मान नहीं मिलना चाहिए। लेकिन हरिदास जैसी योग्यता वाला भक्त, जन्म चाहे जो भी हो, इस सम्मान का पात्र है। यही श्लोक जन्म और बाल्यकाल वाले पृष्ठ पर भी अद्वैत आचार्य के इसी तर्क के लिए दिया गया है।

प्रभु कहे, — तोमा स्पर्शि पवित्र ह-इते
तोमार पवित्र धर्म नाहिक आमाते

prabhu kahe, — tomā sparśi pavitra ha-ite
tomāra pavitra dharma nāhika āmāte

प्रभु ने कहा, "मैं आपको केवल पवित्र होने के लिए स्पर्श करना चाहता हूँ, क्योंकि आपके पवित्र कर्म मुझमें नहीं हैं।"

तात्पर्य से: यह स्वामी और सेवक के बीच भावों के आदान-प्रदान का एक उदाहरण है। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत मध्य 11.189 तात्पर्य)

Madhya 11.189 Sri Chaitanya-charitamrita

पुरी पहुँचने पर जब हरिदास ने प्रभु से विनती की कि वे उन्हें स्पर्श न करें, तब प्रभु का उत्तर।

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अध्याय 9

प्रभु के आलिंगन में तिरोभाव

हरिदास ठाकुर ने स्वयं अपने देहत्याग का दिन चुना। उनके अन्तिम समय में श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके सामने कीर्तन किया, और हरिदास उस कीर्तन में जप करते रहे। फिर प्रभु के चरणों को हृदय से लगाए हुए उन्होंने देह त्याग दी।

अलग पृष्ठ के रूप में खोलें

Devotional painting of Sri Chaitanya Mahaprabhu carrying the body of Haridasa Thakura, both figures haloed, on the way to the sea for burial.
Devotional painting of Sri Chaitanya Mahaprabhu carrying the body of Haridasa Thakura, both figures haloed, on the way to the sea for burial.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने श्री चैतन्य-चरितामृत का एक पूरा अध्याय श्रील हरिदास ठाकुर (Haridāsa Ṭhākura) के अन्तिम दिनों को दिया है। यह अन्त्य-लीला का ग्यारहवाँ अध्याय है, जिसका नाम है "हरिदास ठाकुर का तिरोभाव"। वे यह कथा धीरे-धीरे, लगभग घड़ी-घड़ी का हाल बताते हुए सुनाते हैं, क्योंकि यहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु का अपने भक्त के प्रति प्रेम पूरी तरह दिखाई देता है। अध्याय के पहले ही श्लोक में पूरी कथा समाई हुई है:

नमामि हरिदासं तं
चैतन्यं तं च तत्प्रभुम्
संस्थितामपि यन्मूर्तिं
स्वाङ्के कृत्वा ननर्त यः

"मैं हरिदास ठाकुर तथा उनके स्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ, जिन्होंने हरिदास ठाकुर के शरीर को अपनी गोद में लेकर नृत्य किया।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.1)

कुछ श्लोकों के बाद लेखक इसी भाव से प्रभु की महिमा गाते हैं: "हरिदास ठाकुर के स्वामी की जय हो!" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.3)। हरिदास के लिए इन स्वामी के सिवा और कोई शरण नहीं थी। यह अध्याय दिखाता है कि स्वामी ने उनके इस भरोसे का उत्तर कैसे दिया।

थोड़ा-सा प्रसाद, पूरे आदर के साथ #

इस समय तक कृष्ण के विरह में श्री चैतन्य महाप्रभु के भाव दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे थे। स्वरूप दामोदर गोस्वामी और रामानन्द राय दिन-रात उनके साथ रहते थे (अन्त्य 11.13-15)। हरिदास सिद्ध बकुल में रहते थे, जैसा श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ पुरी में जीवन में बताया गया है। एक दिन प्रभु के सेवक गोविन्द बड़े आनन्द से भगवान जगन्नाथ का प्रसाद लेकर उनके पास आए। उन्होंने देखा कि हरिदास पीठ के बल लेटे हैं और बहुत धीरे-धीरे अपनी मालाएँ जप रहे हैं (अन्त्य 11.16-17)। गोविन्द ने कहा, "कृपया उठिए और अपना महाप्रसाद लीजिए।" हरिदास ने उत्तर दिया कि आज वे उपवास करेंगे, क्योंकि उनका जप पूरा नहीं हुआ है। फिर भी उन्होंने कहा, "लेकिन तुम महाप्रसाद लाए हो, तो मैं इसकी उपेक्षा कैसे करूँ?" उन्होंने प्रसाद की वन्दना की, उसका एक छोटा-सा अंश लिया और खा लिया (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.18-20)। तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "महाप्रसाद कृष्ण से अभिन्न है। इसलिए महाप्रसाद को खाने के बजाय उसका सम्मान करना चाहिए।"

"मेरा रोग यह है कि मैं अपनी मालाएँ पूरी नहीं कर पाता" #

अगले दिन प्रभु स्वयं आए और पूछा, "हरिदास, क्या आप स्वस्थ हैं?" हरिदास ने प्रणाम करके कहा, "मेरा शरीर तो ठीक है, लेकिन मेरा मन और बुद्धि ठीक नहीं हैं।" जब प्रभु ने पूछा कि उन्हें कौन-सा रोग है, तो उन्होंने उत्तर दिया, "मेरा रोग यह है कि मैं अपनी मालाएँ पूरी नहीं कर पाता" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.21-23)। श्रील प्रभुपाद इससे हर भक्त के लिए शिक्षा निकालते हैं: "यदि कोई व्यक्ति उसे दी गई मालाओं की निश्चित संख्या पूरी नहीं कर पाता, तो समझना चाहिए कि वह आध्यात्मिक जीवन में रोगी अवस्था में है" (अन्त्य 11.23, तात्पर्य)।

प्रभु ने प्रेम से उनसे कहा कि वे अब वृद्ध हो गए हैं और पहले से ही मुक्त हैं, इसलिए कम नाम जप सकते हैं (अन्त्य 11.24)। फिर उन्होंने कहा: "इस अवतार में आपकी भूमिका सामान्य लोगों का उद्धार करना है। आपने इस संसार में पवित्र नाम की महिमा का पर्याप्त प्रचार कर लिया है" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.25)। तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद बताते हैं: "‘तोमार अवतार’ (‘आपका अवतार’) शब्दों का प्रयोग करके श्री चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं कि हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं।" (इस पहचान के बारे में नामाचार्य, पवित्र नाम के शिक्षक देखें।)

विनती #

हरिदास ने अपनी मालाओं को लेकर कोई बहस नहीं की। उन्होंने एक प्रार्थना से उत्तर दिया, जिसे वे बहुत समय से अपने हृदय में सँजोए हुए थे। पहले उन्होंने अपनी दीनता और प्रभु की दया की बात की। उन्होंने कहा कि उनका जन्म नीच कुल में हुआ था और वे "न देखने योग्य, न छूने योग्य" थे। फिर भी प्रभु ने उन्हें अपना सेवक स्वीकार किया और नरक से उठाकर वैकुण्ठ में पहुँचा दिया। प्रभु ने उन्हें अनेक प्रकार से नचाया, यहाँ तक कि उन्हें वह श्राद्ध-पात्र भी खाने दिया, जो सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों के लिए होता है (अन्त्य 11.27-30)। फिर उन्होंने अपनी विनती रखी। उन्हें लगता था कि प्रभु शीघ्र ही इस संसार में अपनी लीलाएँ समेट लेंगे, और वे यह दृश्य देख नहीं पाएँगे (अन्त्य 11.31):

सेइ लीला प्रभु मोरे कभु ना देखाइबा
आपनार आगे मोर शरीर पाडिबा

"मेरी इच्छा है कि आप मुझे अपनी लीलाओं का यह अन्तिम अध्याय न दिखाएँ। वह समय आने से पहले, कृपा करके मेरा शरीर आपकी उपस्थिति में गिर जाने दीजिए।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.32)

वे ठीक-ठीक जानते थे कि वे किस प्रकार जाना चाहते हैं। वे चाहते थे कि प्रभु के चरण-कमल उनके हृदय पर हों, उनकी आँखें प्रभु के चन्द्रमा जैसे मुख को देख रही हों, और उनकी जिह्वा प्रभु का अपना नाम, "श्री कृष्ण चैतन्य!", जप रही हो (अन्त्य 11.33-34)। उन्होंने विनती की, "नीच कुल में जन्मे इस शरीर को अपने सामने गिर जाने दीजिए।" (अन्त्य 11.36)

"मेरा जो भी सुख है" #

प्रभु उन्हें मना नहीं कर सके, लेकिन उनका हृदय भारी था। उन्होंने कहा, "मेरे प्रिय हरिदास, कृष्ण इतने दयालु हैं कि आप जो भी चाहेंगे, उन्हें वह पूरा करना ही होगा।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.37) फिर उन्होंने अपने मन की बात खोलकर कही:

किन्तु आमार ये किछु सुख, सब तोमा लञा
तोमार योग्य नहे, — याबे आमारे छाडिया”

"लेकिन मेरा जो भी सुख है, वह सब आपकी संगति के कारण ही है। आपके लिए यह उचित नहीं है कि आप मुझे पीछे छोड़कर चले जाएँ।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.38)

हरिदास ने प्रभु के चरण पकड़ लिए। उन्होंने कहा, "मेरे प्रभु, कोई माया मत रचिए! भले ही मैं इतना पतित हूँ, फिर भी आपको मुझ पर यह कृपा अवश्य करनी होगी!" (अन्त्य 11.39)। उन्होंने कहा कि प्रभु के करोड़ों भक्त हैं। वे सब ऐसे हैं कि उन्हें सिर पर रखा जाए, और वे सब प्रभु की लीलाओं में सहायता करते हैं (अन्त्य 11.40)। तो फिर उनके चले जाने से संसार का क्या घटेगा?

आमा-हेन यदि एक कीट मरि' गेल
एक पिपीलिका मैले पृथ्वीर काहाँ हानि हैल?

"मेरे प्रभु, यदि मेरे जैसा एक तुच्छ कीड़ा मर जाए, तो क्या हानि है? यदि एक चींटी मर जाए, तो भौतिक संसार की कहाँ हानि होती है?" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.41)

अन्त में उन्होंने कहा, "मैं तो केवल एक नकली भक्त हूँ, फिर भी मैं चाहता हूँ कि आप मेरी यह इच्छा पूरी करें" (अन्त्य 11.42)। प्रभु ने उन्हें गले लगाया और दोपहर के अपने नियमित कामों के लिए समुद्र पर चले गए। यह तय हो गया कि वे अगली सुबह भगवान जगन्नाथ के दर्शन के बाद फिर आएँगे (अन्त्य 11.43-44)।

अन्तिम सुबह #

अगले दिन सुबह-सुबह, मन्दिर में दर्शन करने के बाद, प्रभु अपने सब भक्तों के साथ जल्दी से हरिदास के पास पहुँचे। हरिदास ने प्रभु के चरणों में और हर वैष्णव के चरणों में प्रणाम किया। प्रभु ने पूछा, "मेरे प्रिय हरिदास, क्या समाचार है?" हरिदास ने उत्तर दिया, "मेरे प्रभु, आप मुझ पर जो भी कृपा कर सकें" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.45-47)।

प्रभु ने तुरन्त आँगन में एक विशाल संकीर्तन (saṅkīrtana) शुरू कर दिया। वक्रेश्वर पण्डित मुख्य नर्तक थे, और स्वरूप दामोदर के नेतृत्व में भक्त हरिदास को घेरकर कीर्तन करने लगे (अन्त्य 11.48-49)। फिर रामानन्द राय, सार्वभौम भट्टाचार्य और बाकी सबके सामने प्रभु हरिदास के गुणों का वर्णन करने लगे। वे ऐसे बोल रहे थे मानो उनके पाँच मुख हों, और वे जितना अधिक वर्णन करते, उतने ही अधिक प्रसन्न होते जाते। भक्त आश्चर्य से भर गए, और सबने हरिदास के चरणों में प्रणाम किया (अन्त्य 11.50-52)।

हरिदास ने प्रभु को अपने सामने बिठाया। उन्होंने अपनी आँखें प्रभु के कमल जैसे मुख पर ऐसे टिका दीं, मानो दो भौंरे कमल पर बैठे हों। उन्होंने प्रभु के चरणों को अपने हृदय पर रखा और सब भक्तों के चरणों की धूल अपने सिर पर लगाई। वे बार-बार "श्री कृष्ण चैतन्य" का जप करते रहे। वे प्रभु के मुख की मधुरता को पी रहे थे, और उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे (अन्त्य 11.53-55)। और इस प्रकार उनकी इच्छा पूरी हुई:

‘श्री-कृष्ण-चैतन्य' शब्द करिते उच्चारण
नामेर सहित प्राण कैल उत्क्रामण

"श्री कृष्ण चैतन्य का पवित्र नाम जपते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए और शरीर छोड़ दिया।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.56)

उन्हें कोई रोग नहीं ले गया। वे तब गए, जब उन्होंने स्वयं जाना चाहा। यह देखकर भक्तों को महाभारत के पितामह भीष्म की याद आई: "हरिदास ठाकुर की अपनी इच्छा से हुई इस अद्भुत मृत्यु को देखकर, जो किसी महान योगी की मृत्यु जैसी थी, सबको भीष्म के देहत्याग का स्मरण हो आया" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.57)।

प्रभु का उनके शरीर के साथ नृत्य #

आँगन हरि और कृष्ण के नामों से गूँज उठा, और श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेम में डूब गए। उन्होंने हरिदास का शरीर उठाया, उसे अपनी गोद में रखा और आँगन में नाचने लगे। उन्हें देखकर भक्त भी अपने को सँभाल नहीं सके, और वे भी उनके साथ नाचने और कीर्तन करने लगे (अन्त्य 11.58-60)। काफ़ी देर बाद स्वरूप दामोदर ने प्रभु को याद दिलाया कि अभी आगे के संस्कार करने बाकी हैं (अन्त्य 11.61)।

शरीर को एक छोटे विमान जैसी पालकी पर रखा गया और कीर्तन करते हुए समुद्र तक ले जाया गया। प्रभु शोभायात्रा में सबसे आगे नाच रहे थे, और वक्रेश्वर पण्डित तथा दूसरे भक्त उनके पीछे नाच रहे थे (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.62-63)।

समुद्र के किनारे समाधि #

समुद्र-तट पर प्रभु ने स्वयं शरीर को स्नान कराया:

हरिदासे समुद्र-जले स्नान कराइला
प्रभु कहे, — “समुद्र एइ ‘महा-तीर्थ' ह-इला”

"श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर के शरीर को समुद्र में स्नान कराया और फिर घोषणा की, ‘आज से यह समुद्र एक महान तीर्थ बन गया है।’" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.64)

भक्तों ने वह जल पिया, जिससे हरिदास के चरण धोए गए थे। उन्होंने उनके शरीर पर भगवान जगन्नाथ का चन्दन-लेप लगाया। बालू में एक गड्ढा खोदा गया, और शरीर को जगन्नाथ के प्रसाद-अवशेषों के साथ उसमें रखा गया। ये थे उनकी रेशमी डोरियाँ, चन्दन, भोजन और वस्त्र (अन्त्य 11.65-66)। वक्रेश्वर नाच रहे थे और भक्त चारों ओर कीर्तन कर रहे थे। फिर प्रभु ने "हरिबोल! हरिबोल!" का जप करते हुए अपने ही हाथों से शरीर को बालू से ढक दिया (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.67-68)। समाधि के ऊपर एक चबूतरा बनाया गया और उसके चारों ओर घेरा लगा दिया गया। प्रभु उसके चारों ओर तब तक नाचते और कीर्तन करते रहे, जब तक सारा संसार हरि के नाम से भरा हुआ न लगने लगा। इसके बाद उन्होंने अपने भक्तों के साथ समुद्र में स्नान किया (अन्त्य 11.69-71)।

सिंह-द्वार पर भिक्षा #

फिर प्रभु ने समाधि की परिक्रमा की और सीधे जगन्नाथ मन्दिर के सिंह-द्वार पर गए। उस समय पूरा नगर कीर्तन से गूँज रहा था। वहाँ उन्होंने प्रसाद बेचने वाले दुकानदारों के सामने अपना वस्त्र फैलाया और उनसे भिक्षा माँगी। प्रभु ने कहा, "मैं हरिदास ठाकुर के तिरोभाव के सम्मान में होने वाले उत्सव के लिए प्रसाद की भिक्षा माँग रहा हूँ। कृपया मुझे भिक्षा दीजिए" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.72-74)।

दुकानदार आनन्द से उछल पड़े और प्रसाद की पूरी-पूरी टोकरियाँ लेकर आगे आए। स्वरूप दामोदर ने उन्हें रोका और प्रभु को उनके निवास पर वापस भेज दिया। उन्होंने अपने साथ चार वैष्णव और चार कुली रखे। उन्होंने हर दुकान से हर वस्तु की चार-चार मुट्ठी माँगी, और इस तरह कुलियों पर पूरा बोझ लद गया। वाणीनाथ पट्टनायक और काशी मिश्र ने भी बहुत सारा प्रसाद भेजा (अन्त्य 11.75-80)।

भोज #

प्रभु ने भक्तों को पंक्तियों में बिठाया और स्वयं उन्हें परोसने लगे। उनका हाथ थोड़ा देना जानता ही नहीं था, इसलिए वे हर थाली में पाँच लोगों जितना भोजन रख देते थे। तब स्वरूप दामोदर ने उनसे विनती की कि वे बैठकर देखें और दूसरे लोग परोसें (अन्त्य 11.81-83)। स्वरूप, जगदानन्द पण्डित, काशीश्वर पण्डित और शंकर पण्डित बिना रुके परोसते रहे। प्रभु से पहले कोई भोजन करने को तैयार नहीं था, इसलिए काशी मिश्र प्रभु के लिए प्रसाद लाए और बड़े प्रेम से उन्हें खिलाया। प्रभु ने परमानन्द पुरी और ब्रह्मानन्द भारती के साथ भोजन किया (अन्त्य 11.84-87)। फिर सब वैष्णवों ने भोजन किया। सबका पेट गले तक भर गया, क्योंकि प्रभु परोसने वालों को बार-बार पुकारते रहे, "इन्हें और दो! इन्हें और दो!" इसके बाद प्रभु ने हर भक्त को फूलों की माला पहनाई और चन्दन लगाया (अन्त्य 11.88-89)।

आशीर्वाद #

तब प्रेम से भरकर प्रभु ने एक ऐसा आशीर्वाद दिया, जो उस दिन में भाग लेने वाले हर व्यक्ति तक पहुँचता है (अन्त्य 11.90):

“हरिदासेर विजयोत्सव ये कैल दर्शन
ये इहाँ नृत्य कैल, ये कैल कीर्तन
ये ताँरे वालुका दिते करिल गमन
तार मध्ये महोत्सवे ये कैल भोजन
अचिरे ह-इबे ता-सबार ‘कृष्ण-प्राप्ति'
हरिदास-दरशने हय ऐछे ‘शक्ति'

श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह आशीर्वचन दिया: "जिस किसी ने भी श्री हरिदास ठाकुर के तिरोभाव का उत्सव देखा है, जिस किसी ने भी यहाँ कीर्तन और नृत्य किया है, जिस किसी ने भी हरिदास ठाकुर के शरीर पर बालू अर्पित की है, और जो कोई भी प्रसाद पाने के लिए इस उत्सव में सम्मिलित हुआ है, उसे शीघ्र ही कृष्ण की कृपा प्राप्त होगी। हरिदास ठाकुर के दर्शन में ऐसी अद्भुत शक्ति है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.91-93)

फिर प्रभु ने अपने वियोग की बात कही: "कृष्ण ने मुझ पर कृपा करके मुझे हरिदास ठाकुर का संग दिया था। वे अपनी इच्छा में स्वतन्त्र हैं, इसलिए अब उन्होंने वह संग तोड़ दिया है।" और फिर कहा: "जब हरिदास ठाकुर इस भौतिक संसार को छोड़ना चाहते थे, तो उन्हें रोक लेना मेरी शक्ति में नहीं था।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.94-95) प्रभु को भी भीष्म की याद आई:

इच्छा-मात्रे कैला निज-प्राण निष्क्रामण
पूर्वे येन शुनियाछि भीष्मेर मरण

"हरिदास ठाकुर केवल अपनी इच्छा से अपने प्राण त्यागकर जा सके, ठीक भीष्म की भाँति, जिन्होंने पहले केवल अपनी इच्छा से देह त्यागी थी, जैसा हमने शास्त्र से सुना है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.96)

फिर प्रभु ने कहा, "हरिदास ठाकुर इस संसार के मस्तक के मुकुट-मणि थे। उनके बिना यह संसार अब अपने अमूल्य रत्न से खाली हो गया है।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.97) उन्होंने सबसे कहा कि वे "हरिदास ठाकुर की जय!" पुकारें, और स्वयं नाचने लगे। सब भक्त गाने लगे, "हरिदास ठाकुर की जय हो, जिन्होंने भगवान के पवित्र नाम के जप का महत्त्व प्रकट किया!" (अन्त्य 11.98-99)। इसके बाद प्रभु ने भक्तों को घर भेज दिया और "सुख और दुख के मिले-जुले भावों के साथ" विश्राम किया (अन्त्य 11.100)।

हार नहीं, विजय #

कृष्णदास कविराज इसे मृत्यु नहीं कहते। वे इसे हरिदास की विजय, यानी उनकी जीत, कहते हैं, और हर सुनने वाले को एक आशीर्वाद का वचन देते हैं:

एइ त' कहिलुँ हरिदासेर विजय
याहार श्रवणे कृष्णे दृढ-भक्ति हय

"इस प्रकार मैंने हरिदास ठाकुर के विजय भरे तिरोभाव का वर्णन किया है। जो कोई यह कथा सुनेगा, उसका मन निश्चित रूप से कृष्ण की भक्ति में दृढ़ता से टिक जाएगा।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.101)

वे इसमें सबसे बढ़कर अपने भक्तों के प्रति प्रभु का प्रेम देखते हैं: "यद्यपि वे सभी सन्न्यासियों में सबसे श्रेष्ठ हैं, फिर भी उन्होंने हरिदास ठाकुर की इच्छा को पूरी तरह सन्तुष्ट किया" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.102)। प्रभु ने अन्त समय में हरिदास को अपना संग और अपना स्पर्श दिया। उन्होंने उनके शरीर के साथ नृत्य किया, अपने हाथ से उसे बालू से ढका, उनके उत्सव के लिए भोजन की भिक्षा माँगी और स्वयं वह उत्सव मनाया (अन्त्य 11.103-104)। और लेखक हरिदास के पहले चले जाने को सौभाग्य मानते हैं: "यह उनका महान सौभाग्य था कि वे श्री चैतन्य महाप्रभु से पहले चले गए" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.105)। उसी श्लोक में हरिदास को "परम-विद्वान", अर्थात् सबसे बड़ा विद्वान, कहा गया है। श्रील प्रभुपाद तात्पर्य में इसका कारण बताते हैं: "वास्तव में, जानने योग्य सबसे महत्त्वपूर्ण विज्ञान भौतिक अस्तित्व के चंगुल से बाहर निकलने का विज्ञान है। जो कोई यह विज्ञान जानता है, उसे सबसे बड़ा विद्वान मानना चाहिए।"

पुरी में उनकी समाधि #

समुद्र के किनारे की वह समाधि आज भी आदर पाती है। अन्त्य 11.101 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "यदि कोई वहाँ से समुद्र की ओर जाए, तो वह हरिदास ठाकुर की समाधि को आज भी वहाँ देख सकता है। हर वर्ष अनन्त-चतुर्दशी की तिथि पर हरिदास ठाकुर के तिरोभाव की स्मृति में एक उत्सव होता है।" यहाँ वे टोटा-गोपीनाथ मन्दिर से नीचे समुद्र तक जाने वाले रास्ते की बात कर रहे हैं। तीर्थ महाराज भी उनके तिरोभाव का दिन भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी बताते हैं, जो अनन्त-चतुर्दशी ही है।

उसी तात्पर्य में यह भी बताया गया है कि श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने समाधि के पास भक्ति-कुटी नाम का एक छोटा घर बनवाया था। फिर 1922 में वहाँ गौड़ीय मठ की एक शाखा, पुरुषोत्तम मठ, की स्थापना हुई। तात्पर्य में भक्ति-रत्नाकर का भी उल्लेख है। यह ग्रन्थ बताता है कि श्रील श्रीनिवास आचार्य दौड़कर तट पर आए और हरिदास की समाधि के सामने लगभग मूर्छित होकर गिर पड़े। तीर्थयात्री आज भी उस तट पर आते हैं। यहीं स्वयं प्रभु ने समुद्र को एक महान तीर्थ घोषित किया था, क्योंकि हरिदास के शरीर ने उसे छुआ था।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (14)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

महा-भागवत हरिदास — परम-विद्वान्
ए सौभाग्य लागि' आगे करिला प्रयाण

mahā-bhāgavata haridāsa — parama-vidvān
e saubhāgya lāgi’ āge karilā prayāṇa

हरिदास ठाकुर केवल प्रभु के सबसे श्रेष्ठ भक्त ही नहीं, बल्कि एक महान विद्वान भी थे। यह उनका महान सौभाग्य था कि वे श्री चैतन्य महाप्रभु से पहले चले गए।

तात्पर्य से: वास्तव में, जानने योग्य सबसे महत्त्वपूर्ण विज्ञान भौतिक अस्तित्व के चंगुल से बाहर निकलने का विज्ञान है। जो कोई यह विज्ञान जानता है, उसे सबसे बड़ा विद्वान मानना चाहिए। (श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.105 तात्पर्य)

Antya 11.105 Sri Chaitanya-charitamrita

हरिदास को परम-विद्वान, यानी सबसे बड़ा विद्वान, कहा गया है, और प्रभु से पहले उनके चले जाने को उनका महान सौभाग्य माना गया है।

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उपसंहार

श्री चैतन्य की लीलाओं में भगवान ब्रह्मा #

Devotional painting of Krishna appearing before four-headed Brahma, illustrating the tradition that identifies Haridasa Thakura, called Brahma Haridasa, with Brahma the secondary creator.
Devotional painting of Krishna appearing before four-headed Brahma, illustrating the tradition that identifies Haridasa Thakura, called Brahma Haridasa, with Brahma the secondary creator.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution

गौड़ीय वैष्णवों ने कभी यह नहीं माना कि हरिदास का एक मुस्लिम घर में जन्म लेना केवल भाग्य का संयोग था। कवि कर्णपुर की गौर-गणोद्देश-दीपिका (श्लोक 93) उन्हें ऋचीक मुनि के पुत्र ब्रह्मा बताती है। वे महातपस्वी (महातपा) थे और प्रह्लाद महाराज के साथ मिलकर प्रकट हुए। श्लोक 94-95 मुरारि गुप्त के वर्णन के आधार पर बताते हैं कि उन्होंने यवन (मुस्लिम) परिवार में जन्म क्यों लिया:

ऋचीकस्य मुनेः पुत्रो नाम्ना ब्रह्मा महातपाः ।
प्रह्लादेन समं जातो हरिदासाख्यकोऽपि सन् ।
मुरारिगुप्तचरणैश्चैतन्यचरितामृते ।
उक्तो मुनिसुतः प्रातस्तुलसीपात्रमाहरन् ।
अधौतमभिषप्तस्तं पिता यावनतां गतः ।
स एव हरिदासः सन्जातः परम भक्तिमान् ॥

"ऋचीक मुनि के पुत्र ब्रह्मा महातपा और प्रह्लाद महाराज, दोनों मिलकर श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में हरिदास ठाकुर के रूप में प्रकट हुए। ... चैतन्य-चरित ग्रन्थ में मुरारि गुप्त बताते हैं कि एक प्रातः महातपा ने अपने पिता को बिना धोया हुआ तुलसी-पत्र दे दिया। इस पर पिता इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने उन्हें शाप दे दिया। इसी कारण महातपा ने यवन परिवार में महान भक्त हरिदास ठाकुर के रूप में जन्म लिया।" (गौर-गणोद्देश-दीपिका 93-95)

श्री चैतन्य-चरितामृत (अन्त्य 11.25) में स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास से कहते हैं: "इस अवतार में तुम्हारा कार्य सामान्य लोगों का उद्धार करना है। तुमने इस संसार में पवित्र नाम की महिमा का भरपूर प्रचार किया है।" श्रील प्रभुपाद चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.25 के अपने तात्पर्य में समझाते हैं: "'तोमार अवतार' ('तुम्हारा अवतार') शब्दों का प्रयोग करके श्री चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं कि हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं। ... इस प्रकार हरिदास ठाकुर भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं, और दूसरे भक्त भी इसी प्रकार अवतार हैं, जो भगवान के कार्य को आगे बढ़ाने में सहायता करते हैं।"

उनके जीवन से श्रील प्रभुपाद की शिक्षाएँ #

Painting of Haridasa Thakura chanting alone before a tulasi plant in a quiet garden, evoking his bhajana-kutir at Siddha Bakula in Puri.
Painting of Haridasa Thakura chanting alone before a tulasi plant in a quiet garden, evoking his bhajana-kutir at Siddha Bakula in Puri.gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · Used with attribution

श्रील प्रभुपाद बार-बार हरिदास ठाकुर के उदाहरण की चर्चा करते थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी से तीन लाख की संख्या की नकल करने को नहीं कहा। "कोई साधारण व्यक्ति इतने नामों का जप नहीं कर सकता, और न ही किसी को कृत्रिम रूप से हरिदास ठाकुर के आचरण की नकल करनी चाहिए। फिर भी यह आवश्यक है कि हर कोई हरे कृष्ण मन्त्र के जप का एक निश्चित व्रत पूरा करे" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.43, तात्पर्य)। बेनापोल का सादा जीवन उनके लिए हर भक्त का आदर्श बन गया:

निर्जन-वने कुटिर करि’ तुलसी सेवन ।
रात्रि-दिने तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्तन ॥

"हरिदास ठाकुर ने एक एकान्त वन में कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने तुलसी का एक पौधा लगाया, और तुलसी के सामने वे प्रतिदिन भगवान के पवित्र नाम का तीन लाख बार जप करते थे। वे पूरे दिन और पूरी रात जप करते थे।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.100)

तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "फिर भी, हम प्रतिदिन जप-माला पर हरे कृष्ण महा-मन्त्र की सोलह माला जप करके और तुलसी के पौधे को सम्मान देकर उनके उदाहरण का पालन कर सकते हैं।" प्रभुपाद ने हरिदास में यह प्रमाण देखा कि जन्म से कुछ तय नहीं होता: "वे देखने में मुसलमानों के परिवार में जन्मे थे, लेकिन क्योंकि वे परम भगवान के पवित्र नाम का निरपराध जप कर रहे थे, इसलिए भगवान चैतन्य ने उन्हें नाम-प्रचार का प्रामाणिक अधिकारी, अर्थात् आचार्य, बनने की शक्ति दी" (श्रीमद्भागवत 3.33.7, तात्पर्य)। हरिदास ने जिस स्त्री का उद्धार किया था, उसे उन्होंने जिस ढंग से मार्ग दिखाया, उससे प्रभुपाद ने हर शिक्षक के लिए एक नियम निकाला: "हरिदास ठाकुर के निर्देशों का पालन करते हुए, एक शुद्ध वैष्णव व्यक्तिगत रूप से किसी से एक पैसा भी नहीं लेता" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 3.139, तात्पर्य)। और हरिदास की अन्तिम बीमारी से उन्होंने हम सबके लिए एक कोमल चेतावनी दी: "यदि कोई अपने लिए निश्चित की गई माला-संख्या पूरी नहीं कर पाता, तो उसे आध्यात्मिक जीवन की रोगग्रस्त अवस्था में समझना चाहिए" (चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 11.23, तात्पर्य)।

आगे पढ़ें और स्रोत

श्रील प्रभुपाद की शिक्षाएँ

ऐतिहासिक एवं द्वितीयक सन्दर्भ

Nandgram Dham
सत्यापित शास्त्रीय
लेखक
हमारी सम्पादकीय टीम हरे कृष्ण मूवमेंट, कोटा के प्रशिक्षित भक्तों एवं शोधकर्ताओं से बनी है, जो इसी गुरु-परम्परा का प्रतिदिन पालन करते हैं। प्रत्येक जीवनी सावधानीपूर्वक शोध और शास्त्रों के विरुद्ध तथ्य-जाँच के बाद लिखी जाती है।
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मंदिर एवं शास्त्रीय शोध टीम
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