'गौराङ्ग' बोलिते हबे
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
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116 भजन · पृष्ठ 1 / 3
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
'राधा-कृष्ण' बोल् बोल् बोलो रे सोबाइ
अक्रोध परमानन्द नित्यानन्द राय्
अनादि' करम-फले, पडि' भवार्णर जले,
साधन निताइ भजन निताइ निताइ नयन
अरूण-कमल-दले शेष बिछाइब
अरे भाइ! भज मोर गौराङ्ग-चरण
अवतार-सार, गोरा-अवतार, केन ना भजिलि ता'रे
आमार जीवन, सदा पापे रत,
(आमि) जमुना-पुलिने, कदम्ब-कानने,
आहे नीळ शैल प्रबळ मत्त वारण
उदिलो अरुण पूरब-भागे,
एइ नव-दासी बलि श्री-रूप चाहिबे
एइ-बारो करुणा कोरो वैष्णव गोसाइ
एखोन बुझिनु प्रभु! तोमार चरण
(प्रभु हे!)
ओरे मन भालो नाहि लागे ए सोंसार
ओहे!
ओहे हरि-नाम तब महिमा अपार
कदाचित् कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीतक-रवो
कबे कृष्ण-धन पाब हियार माझारे थोब
कबे गौर-बने, सुरधुनी-तटे,
गुरुदेव्!
कबे श्री-चैतन्य मोरे कोरिबेन दोया
कबे ह'बे बोलो से-दिन आमार्
कलि-कुक्कुर्-कदन् जदि चाओ (हे)
यद् अपि समाधिषु विधिर् अपि पश्यति
कृष्ण-प्रसादेन समस्त-शैल
कृष्ण-प्रेम-मयी राधा
कृष्ण होइते चतुर्-मुख, होय् कृष्ण-सेवोन्मुख,
कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
गुरुदेव्!
गुरुदेव्!
गुरुदेवे, व्रज-वने, व्रज-भूमि-वासी जने,
गोपीनाथ आमार उपाय नाइ
गोपीनाथ घुचाओ सोंसार-ज्वाला
गोपीनाथ मम निबेदन शुनो
गौरा पहु ना भजिया गोइनु
गौराङ्ग करुणा कोरो, दीन हीन जने
गौराङ्ग तुमि मोरे दया ना छाडिह
गौराङ्गेर दुटि पद, जार् धन सम्पद,
जनम स-फल ता'र कृष्ण-दरशन जा'र
जय जय अद्वैत अचार्य महाशय
जय जय अद्वैत आचार्य दयामय
जय जय जगन्नाथ शचीर नन्दन्
जय जय श्री-चैतन्य पतित-पाबन