'गौराङ्ग' बोलिते हबे
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
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45 भजन
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
'राधा-कृष्ण' बोल् बोल् बोलो रे सोबाइ
अनादि' करम-फले, पडि' भवार्णर जले,
दीव्यद्-वृन्दारण्य-कल्प-द्रुमाधः
आमार जीवन, सदा पापे रत,
उदिलो अरुण पूरब-भागे,
कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
गौरा पहु ना भजिया गोइनु
गौराङ्गेर दुटि पद, जार् धन सम्पद,
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं
(किब) जय जय गोराचान्देर् आरतिको शोभा
(जय) राधा-माधव (जय) कुञ्ज-बिहारी
जय राधे, जय कृष्ण, जय वृन्दावन्
जीव् जागो, जीव् जागो, गौरचान्द बोले
तातल सैकते, बारि-बिन्दु-सम,
दुष्ट मन! तुमि किसेर् वैष्णव?
नमस् ते नरसिंहाय
निताइ गुण-मणि आमार् निताइ गुण-मणि
निताइ-पद-कमल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल
परम कोरुण, पहू दुइ जन
श्रीमान् रास-रसारम्भी वंशी-वट-तट-स्थितः
प्रलय-पयोधि-जले धृतवान् असि वेदं
भज गोविन्दं भज गोविन्दं
भज भकत-वत्सल श्री-गौरहरि
भजहू रे मन श्री-नन्द-नन्दन
भुलिया तोमारे, संसारे आसिया,
वन्दे 'हं श्री-गुरोः श्री-युत-पद-कमलं श्री-गुरुन् वैष्णवांश् च
मानस, देहो, गेहो, जो किछु मोर्
यशोमती-नन्दन, ब्रज-बरो-नागर,
विभावरी शेष, आलोक-प्रवेश,
श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु दोया कोरो मोरे
हे कृष्ण करुणा-सिन्धो
नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते
पञ्च-तत्त्वात्मकं कृष्णं भक्त-रूप-स्वरूपकम्
तप्त-काञ्चन-गौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि
वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश् च कृपा-सिन्धुभ्य एव च
नमो गौर-किशोराय साक्षाद्-वैराग्य-मूर्तये
गौराविर्भाव-भूमेस् त्वं निर्देष्टा सज्-जन-प्रियः
नमो भक्तिविनोदाय सच्-चिद्-आनन्द-नामिने
नम ओं विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भू-तले
जयतां सुरतौ पङ्गोर् मम मन्द-मतेर् गती
संसार-दावानल-लीढ-लोक
हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः
हरि हरि! बिफले जनम गोँआइनु