श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर
वैष्णव-वन्दना के कवि
अन्य नाम देवकीनन्दन दास, देवकीनन्दन दास ठाकुर, देबकीनन्दन दास ठाकुर, देवकीनन्दन दास ठाकुर, देवकीनन्दन दास
“मैं अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक महाप्रभु के भक्तों की शरण ग्रहण करने आया हूँ, जो मुझ जैसे पापियों के लिए पतित-पावन हैं।”
वैष्णव-वन्दना के वैष्णव शरण नामक खण्ड से। अनेक गौड़ीय वैष्णव वैष्णव-अपराध से बचने के लिए आज भी इसे प्रतिदिन प्रार्थना के रूप में पढ़ते हैं।
गौड़ीय वैष्णव परम्परा श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर को पुरुषोत्तम दास ठाकुर के तीन प्रमुख शिष्यों में से एक के रूप में स्मरण करती है। श्री चैतन्य-चरितामृत पुरुषोत्तम दास ठाकुर को स्वयं नित्यानन्द प्रभु के सबसे निकट पार्षदों में गिनता है। देवकीनन्दन दास ठाकुर के अपने जन्म, परिवार या तिरोभाव के बारे में लगभग कुछ भी लिखा नहीं मिलता। साढ़े चार शताब्दियों में उनके केवल कुछ पद्य बचे हैं, जिनमें उनका अपना नाम आता है। इनमें एक ऐसी प्रार्थना भी है, जिसे गौड़ीय वैष्णव आज भी पढ़ते हैं, वे भी जिन्होंने शायद कभी उनका नाम तक न सुना हो।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| गुरु | पुरुषोत्तम दास ठाकुर, नित्यानन्द प्रभु के निकट पार्षद |
| गुरुभाई | माधवाचार्य (माधव चट्टोपाध्याय) और यादवाचार्य, जो पुरुषोत्तम ठाकुर के ही ब्राह्मण शिष्य थे |
| जन्म और तिरोभाव | उपलब्ध स्रोतों में दर्ज नहीं |
| साहित्यिक रचना | वैष्णव-वन्दना, जिसमें आज भी गाई जाने वाली समापन-प्रार्थना वैष्णव शरण सम्मिलित है |
| आज सुरक्षित पद | वैष्णव गीत-संग्रह में उनके नाम से हस्ताक्षरित दो गीत उपलब्ध हैं |
नित्यानन्द प्रभु के परिकर में एक शिष्य #
गौड़ीय इतिहास के स्रोत बताते हैं कि देवकीनन्दन दास ठाकुर का जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे उन्हें माधवाचार्य और यादवाचार्य के साथ पुरुषोत्तम दास ठाकुर के तीन प्रमुख शिष्यों में गिनते हैं। श्री चैतन्य-चरितामृत पुरुषोत्तम दास के पिता सदाशिव कविराज को नित्यानन्द प्रभु के भक्तों की सूची में गिनाता है। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की अनुभाष्य टीका के अनुसार इस परिवार का एक विग्रह-मन्दिर बंगाल के नागरदेश ग्राम-समूह में था। यह मन्दिर पहले बेलेडांगा में था, फिर सुखसागर में, और फिर आगे के अन्य स्थानों में, क्योंकि गंगा नदी के कारण परिवार को बार-बार अपना स्थान छोड़ना पड़ा। देवकीनन्दन दास ठाकुर इस परिवार में जन्म से नहीं, बल्कि शिष्य के रूप में आए। उनका नाम आज तक इसी शिष्यत्व के कारण बचा है। उनके अपने परिवार का कोई अलग विवरण इसे सुरक्षित नहीं रखता।
एक आम धारणा में सुधार #
देवकीनन्दन दास ठाकुर बंगाल के गौड़ीय वैष्णव इतिहास के लगभग उसी काल के थे, जिस काल के नरोत्तम दास ठाकुर थे। यह वह पीढ़ी थी, जिसने छह गोस्वामियों के बाद इस मिशन को आगे बढ़ाया। इसलिए यह मान लेना आसान है कि इन दोनों के बीच कोई सीधा सम्बन्ध रहा होगा। यह मान लेना भी आसान है कि ऐतिहासिक खेतुरी महोत्सव में देवकीनन्दन की कोई भूमिका रही होगी। यह महोत्सव नरोत्तम ने आयोजित किया था, और श्रीनिवास आचार्य ने इसके संचालन में सहायता की थी। लेकिन उपलब्ध किसी भी स्रोत से इस धारणा का समर्थन नहीं होता। जो स्रोत उनके बारे में बताते हैं, वे किसी और बात पर एकमत हैं। ये स्रोत हैं: gaudiyahistory.iskcondesiretree.com पर देवकीनन्दन दास ठाकुर का जीवनी-पृष्ठ, पुरुषोत्तम दास ठाकुर की जीवनी, और vaishnavsongs.iskcondesiretree.com तथा gourgovindaswami.org पर उनके बचे हुए गीतों के साथ छपे परिचय। ये सभी बताते हैं कि उनके गुरु पुरुषोत्तम दास ठाकुर थे, और उपलब्ध विवरण में ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें खेतुरी में उपस्थित बताए। इसलिए यह पृष्ठ अधिक प्रचलित, नरोत्तम-केन्द्रित कथा के बजाय इसी प्रमाण का पालन करता है।
स्वयं उनकी लेखनी से, एक पद्य #
पुरुषोत्तम दास ठाकुर के बारे में आँखों देखे विवरण जैसा जो कुछ हमारे पास है, वह स्वयं देवकीनन्दन दास ठाकुर का लिखा हुआ है। वैष्णव-वन्दना के एक छोटे, बचे हुए पद्य में वे अपने गुरु के पिता सदाशिव कविराज का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि सदाशिव कविराज प्रेम में इतने लीन रहते थे कि उन्हें अपने आसपास की भी सुध नहीं रहती थी। वे स्वयं पुरुषोत्तम ठाकुर को भी याद करते हैं, जो केवल सात वर्ष की आयु में कृष्ण-प्रेम में मग्न होकर नृत्य करते थे। जो भी उन्हें देखता, उनकी ओर खिंच जाता। यह किसी इतिहासकार का नहीं, बल्कि एक शिष्य का वर्णन है। लेकिन परम्परा में उस परिवार की यही एकमात्र प्रत्यक्ष झलक बची है।
प्रत्येक वैष्णव के लिए एक वचन #
देवकीनन्दन दास ठाकुर की वास्तविक विरासत वैष्णव-वन्दना है। यह वैष्णवों को प्रणाम करने वाला एक बंगाली काव्य है, जो धीरे-धीरे बड़े होते घेरों में आगे बढ़ता है। पहले यह वृन्दावन के वैष्णवों को प्रणाम करता है, फिर नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) में महाप्रभु के पार्षदों को, और फिर नवद्वीप तथा पूरे गौड़-देश के भक्तों को। अन्त में यह किसी भी देश में रहने वाले गौरांग के अनुयायियों को प्रणाम करता है, चाहे वे आज हों या भविष्य में आएँ। एक स्रोत के अनुसार, वैष्णव बनने से पहले देवकीनन्दन दास ठाकुर गोपाल चपल नाम से जाने जाते थे। यह स्रोत श्रील गौर गोविन्द स्वामी का 1986 का एक प्रवचन है, जिसे आनन्द संबाद वेबसाइट पर लिखित रूप में दिया गया है। कोई अन्य उपलब्ध स्रोत इस बात की पुष्टि नहीं करता, इसलिए इसे यहाँ केवल एक अपुष्ट उल्लेख के रूप में दिया गया है। इस काव्य के उद्देश्य पर सभी स्रोत एकमत हैं। जैसा काव्य स्वयं कहता है, वैष्णवों की महिमा गाना ही वह एक निश्चित उपाय है, जिससे ऐसे अपराध भी भस्म हो जाते हैं, जिन्हें कोई भी औपचारिक प्रायश्चित मिटा नहीं सकता।
वैष्णव शरण, आज भी गाई जाने वाली #
वैष्णव-वन्दना का अन्तिम खण्ड वैष्णव शरण नाम से पूरा सुरक्षित है। इसकी पहली पंक्ति है: "वृन्दावन-वासी यत वैष्णवेर गण"। अपने बारह पद्यों के बीच में यह काव्य अपनी मुख्य शिक्षा खुलकर बताता है। एक भी शुद्ध वैष्णव में इतनी आध्यात्मिक शक्ति होती है कि वह पूरे ब्रह्माण्ड का उद्धार कर सके। काव्य कहता है कि स्वयं वेद और पुराण इस शिक्षा की पुष्टि करते हैं। आज हर गायक को यह बात कण्ठस्थ हो या न हो, यह गीत आज भी गाया जाता है। शिवराम स्वामी और हलधर स्वामी जैसे भक्तों ने इसे रिकॉर्ड किया है, और अनुवाद सहित इसके सभी बारह पद्य गीत-पृष्ठ पर, गीत-संग्रह में, दिए गए हैं। उनके नाम से जुड़ा एक दूसरा गीत भी बचा है। इसमें चैतन्य महाप्रभु के नदिया की गलियों में नृत्य करने का वर्णन है। यह गीत उसी संग्रह में एक दूसरी सूची में मिलता है, क्योंकि उपलब्ध विवरणों में उनका नाम एक ही प्रविष्टि में नहीं, बल्कि दो थोड़ी अलग वर्तनियों में दर्ज है।
विरासत #
उनके कई समकालीनों के मन्दिर, समाधि या शिष्य-परम्परा का विवरण मिलता है। लेकिन देवकीनन्दन दास ठाकुर के लिए इनमें से कुछ भी दर्ज नहीं है। इस कमी को अनुमान से भरने के बजाय यहाँ ईमानदारी से स्वीकार किया गया है। जो बचा है, वह एक कवि की वाणी है। उन्होंने स्वयं कहा कि उनमें वैष्णवों की ठीक से महिमा गाने की "कोई शक्ति" नहीं है। फिर भी उन्होंने यह महिमा गाई, क्योंकि, उनके अपने शब्दों में, उन्हें वैष्णवों की कृपा पाने का बहुत गहरा लोभ था। शताब्दियों बाद भी गौड़ीय वैष्णव प्रतिदिन उनकी समापन-प्रार्थना का पाठ करते हैं, चाहे वे उनका नाम न जानते हों। इस प्रकार ये वैष्णव आज भी ठीक वही कर रहे हैं, जो देवकीनन्दन दास ठाकुर ने उनसे माँगा था। वे महाप्रभु के हर भक्त को, हर स्थान पर और हर युग में, प्रणाम करते हैं।
- Devakinandana Dasa Thakur - Gaudiya History
- Devakinandan Das Thakur - Vaishnav Songs (ISKCON Desire Tree)
- Ananda Sambada - Vaishnava Sharana (translation by Srila Gour Govinda Swami)
- Purushottama Dasa Thakura - Biography - Gaudiya History
- Sri Caitanya-caritamrta, Adi-lila 11.38-40
- Purushottama dasa Thakura - Stephen Knapp
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर का जन्म कब हुआ था?
श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर का प्राकट्य उपलब्ध स्रोतों में दर्ज नहीं में, इस पृष्ठ हेतु परामर्शित स्रोतों में अभिलिखित नहीं में हुआ।
श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर के गुरु कौन थे?
श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर के गुरु श्रील पुरुषोत्तम दास ठाकुर थे।
श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर का तिरोभाव कब और कहाँ हुआ?
श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर का तिरोभाव उपलब्ध स्रोतों में दर्ज नहीं, उपलब्ध स्रोतों में अभिलिखित नहीं में हुआ।
श्रील देवकीनन्दन दास ठाकुर की प्रमुख लीलाएँ कौन-सी हैं?
यहाँ इन लीलाओं पर पृष्ठ उपलब्ध हैं: जीवन और शिष्यत्व, वैष्णव-वन्दना।








