Read in English

मुख्य जीवनी पृष्ठ

श्रील राघव पण्डित

जगन्नाथ पुरी ले जाए जाने वाले वार्षिक भण्डार के रक्षक

सम्पूर्ण जीवनी, एक पृष्ठ पर: मुख्य जीवनी और सभी लीला-पृष्ठ, क्रम से, एक ही स्थान पर

24 मिनट का पाठ 5 अध्याय

श्रील राघव पण्डित, गौड़ीय वैष्णव आचार्य
श्रील राघव पण्डित
पठन उपकरण

परिचय

श्रील राघव पण्डित पानिहाटी में रहते थे। यह गंगा के तट पर बसा एक गाँव है, जो नवद्वीप से एक दिन की यात्रा की दूरी पर है। श्री चैतन्य-चरितामृत उन्हें महाप्रभु के सहयोगियों के महान वृक्ष की सातवीं शाखा बताता है और उन्हें महाप्रभु का "मूल अनुयायी" कहता है। उन्हें सबसे अधिक एक असाधारण भक्ति-कार्य के लिए याद किया जाता है, जिसे वे जीवन भर हर वर्ष करते रहे। वे अपनी बहन दमयन्ती के हाथों से बना पूरे वर्ष का भोग श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए इकट्ठा करते थे। फिर वे उसे सीलबन्द थैलों में सैकड़ों मील दूर जगन्नाथ पुरी भेजते थे। ये थैले गौड़ीय वैष्णव स्मृति में इतने प्रसिद्ध हुए कि आज भी उनके नाम से जाने जाते हैं: राघवेर झालि, अर्थात् "राघव के थैले"।

विशेषविवरण
निवासपानिहाटी, गंगा तट पर, नवद्वीप से एक दिन की यात्रा की दूरी पर, सोदपुर के निकट
भगवान् के सहयोगियों में स्थानभक्तों के वृक्ष की सातवीं शाखा (चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 10.24)
बहनदमयन्ती, जिन्होंने पुरी भेजा जाने वाला वार्षिक भण्डार पकाया
शिष्य/उप-शाखामकरध्वज कर, थैलों की देखरेख करने वाले
पहचानगोपी धनिष्ठा, जो व्रज में कृष्ण के लिए भोजन बनाती थीं (गौर-गणोद्देश-दीपिका 166; चैतन्य-चरितामृत आदि 10.24 तात्पर्य)
सबसे अधिक प्रसिद्धराघवेर झालि, भोग के वे थैले जो हर वर्ष जगन्नाथ पुरी ले जाए जाते थे
समाधिपानिहाटी, मदन-मोहन के विग्रह के पास
परिचय के शास्त्र प्रमाण (2)

rāghava-paṇḍita — prabhura ādya-anucara
tāṅra eka śākhā mukhya — makaradhvaja kara

शब्दार्थ

rāghava paṇḍita: Raghava Pandita; prabhura: of the Lord; ādya: original; anucara: follower; tāṅra: his; eka: one; śākhā: branch; mukhya: chief; makaradhvaja kara: Makaradhvaja Kara.

राघव पण्डित, भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के मूल अनुयायी, सातवीं शाखा माने जाते हैं। उनसे एक और उप-शाखा निकली, जिसके प्रमुख मकरध्वज कर थे।

तात्पर्य से: टीका का अंश: "राघव पण्डित पहले व्रज में कृष्ण की लीलाओं के समय एक अन्तरंग गोपी थीं, और उनका पूर्व नाम धनिष्ठा था। यह गोपी धनिष्ठा सदैव कृष्ण के लिए भोजन बनाने में लगी रहती थीं।"

Adi 10.24 Sri Chaitanya-charitamrita

यह श्लोक महाप्रभु के सहयोगियों में राघव पण्डित का स्थान निश्चित करता है, और टीका में उद्धृत गौर-गणोद्देश-दीपिका के माध्यम से उनकी गोपी धनिष्ठा के रूप में पहचान भी बताता है।

धनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादाद्व्रजेऽमिताम् ।
सैव सम्प्रति गौराङ्गप्रियो राघवपण्डितः ॥

dhaniṣṭhā bhakṣya-sāmagrīṁ kṛṣṇāyādād vraje’mitām
saiva samprati gaurāṅga-priyo rāghava-paṇḍitaḥ

राघव पण्डित पहले व्रज में कृष्ण की लीलाओं के समय एक अन्तरंग गोपी थीं, और उनका पूर्व नाम धनिष्ठा था। यह गोपी धनिष्ठा सदैव कृष्ण के लिए भोजन बनाने में लगी रहती थीं।

Verse 166 Gaura-ganoddesha-dipika

कवि कर्णपूर व्रज में कृष्ण को भोजन-सामग्री देने वाली गोपी धनिष्ठा को राघव पण्डित बताते हैं। संस्कृत: गौर-गणोद्देश-दीपिका का सविशेषक (डायक्रिटिक) संस्करण (श्लोक 166 का उत्तरार्ध, जिसमें उनका नाम है); अनुवाद: श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत आदि 10.24 का तात्पर्य।

अध्याय 1

जन्म और प्रारम्भिक जीवन

पानिहाटी में एक गृहस्थ-उपासक, और परम्परा के अनुसार व्रज की एक पूर्व गोपी।

अलग पृष्ठ के रूप में खोलें

व्रज की गोपी धनिष्ठा की याद दिलाती विग्रह-चित्रकारी। गौर-गणोद्देश-दीपिका धनिष्ठा को राघव पण्डित का पहले का आध्यात्मिक स्वरूप बताती है।
व्रज की गोपी धनिष्ठा की याद दिलाती विग्रह-चित्रकारी। गौर-गणोद्देश-दीपिका धनिष्ठा को राघव पण्डित का पहले का आध्यात्मिक स्वरूप बताती है।gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · ISKCON/BBT-affiliated devotional art, approved for use on this site

किसी भी शास्त्र या टीका में यह दर्ज नहीं है कि राघव पण्डित का जन्म किस वर्ष हुआ, उनके माता-पिता कौन थे, या वे पानिहाटी में कैसे आकर बसे। पानिहाटी गंगा के तट पर बसा एक गाँव है, जो नवद्वीप से लगभग एक दिन की यात्रा की दूरी पर है। यह कलकत्ता से निकलने वाली रेल लाइन पर, आज के सोदपुर स्टेशन के निकट है। श्री चैतन्य-चरितामृत में जो बात दर्ज है, वह है श्री चैतन्य महाप्रभु के सहयोगियों में उनका स्थान। कृष्णदास कविराज गोस्वामी उन्हें "भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के मूल अनुयायी" कहते हैं। वे उन्हें भक्तों के उस महान वृक्ष की सातवीं शाखा बताते हैं, जो प्रभु से फैला। मूल बंगाली का यह एक शब्द, आद्य-अनुचर, बहुत महत्त्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि राघव पण्डित का महाप्रभु से लगाव बिलकुल आरम्भ से था, उस समय से भी पहले, जब संकीर्तन आन्दोलन पूरे बंगाल में फैला।

विशेषविवरण
गृह-ग्रामपानिहाटी, गंगा तट पर, नवद्वीप से एक दिन की यात्रा की दूरी पर
घरानाराघव पण्डित और उनकी बहन, दमयन्ती
भगवान् के सहयोगियों में स्थानभक्तों के वृक्ष की सातवीं शाखा (चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 10.24)
गौर-गणोद्देश-दीपिका में पहचानगोपी धनिष्ठा, जो व्रज में कृष्ण को भोजन परोसती थीं
बहन की पहचान उसी ग्रन्थ मेंगोपी गुणमाला

विग्रह-सेवा पर केन्द्रित एक घर #

परम्परा यह स्पष्ट रूप से बताती है कि उनका घर कैसा था। राघव पण्डित अपनी बहन दमयन्ती के साथ रहते थे। उनके साझा जीवन का केन्द्र कृष्ण के एक विग्रह की नित्य सेवा थी। बाद में उसी स्थान पर इस विग्रह को मदन-मोहन के एक विग्रह के साथ याद किया गया। उनके बारे में जो कुछ और दर्ज है, वह सब इसी नित्य मन्दिर-सेवा से निकला है। इसमें भोजन बनाने में उनकी स्वच्छता के प्रसिद्ध नियम, अच्छी सामग्री पाने के लिए उनका असाधारण परिश्रम, और उनकी बहन का बनाया वह भोजन शामिल है, जो अन्त में जगन्नाथ पुरी तक पहुँचा। इन सबका पूरा वर्णन राघव पण्डित के भण्डार में है। यह कोई सार्वजनिक प्रचार या शिक्षा देने का अभियान नहीं था। यह एक घर की दृढ़ और पूरी भक्ति थी, जिसका उद्देश्य विग्रह को अच्छी तरह भोजन कराना था। इसे इतनी कठोरता से निभाया गया कि समय के साथ यह पूरे बंगाल में प्रसिद्ध हो गई।

धनिष्ठा, वह गोपी जिसने कृष्ण को भोजन कराया #

चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 10.24 की अपनी टीका में श्रील प्रभुपाद गौर-गणोद्देश-दीपिका का एक श्लोक देते हैं। यह श्लोक राघव पण्डित की आध्यात्मिक पहचान बताता है, जो कृष्ण की अपनी व्रज-लीलाओं तक जाती है: "राघव पण्डित पहले व्रज में कृष्ण की लीलाओं के समय एक अन्तरंग गोपी थीं, और उनका पूर्व नाम धनिष्ठा था। यह गोपी धनिष्ठा सदैव कृष्ण के लिए भोजन बनाने में लगी रहती थीं।" इसी ग्रन्थ का अगला श्लोक दमयन्ती की पहले की पहचान भी बताता है: "गोपी गुणमाला राघव पण्डित की बहन दमयन्ती के रूप में प्रकट हुईं।" दोनों पहचानों को साथ पढ़ने पर यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक ही सेवा का निरन्तर चलना दिखाई देता है। वृन्दावन में कृष्ण के लिए भोजन बनाने वाली गोपी धनिष्ठा ही पानिहाटी में राघव पण्डित के रूप में फिर से प्रकट हुईं। वहाँ वे श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में आए कृष्ण के लिए ठीक यही सेवा करते हैं। इस बार उनके घर में यह सेवा उनकी बहन दमयन्ती भी साथ मिलकर करती हैं, जो पहले गोपी गुणमाला थीं।

सार्वजनिक व्यक्ति नहीं, पर एक विश्वसनीय व्यक्ति #

राघव पण्डित का कोई ज्ञात लेखन नहीं है। उनके द्वारा दी गई किसी शिक्षा या उपदेश का भी कोई विवरण नहीं मिलता। वे महाप्रभु के सहयोगियों के उस छोटे और शान्त समूह में आते हैं, जिनका पूरा भक्ति-जीवन शब्दों से नहीं, बल्कि सेवा के एक विशेष कार्य से याद किया जाता है, जिसे वे बार-बार करते रहे। फिर भी श्री चैतन्य-चरितामृत में उन्हें कोई छोटा व्यक्ति नहीं माना गया है। महाप्रभु स्वयं बंगाल की यात्रा के समय उनके घर गए और वहाँ इकट्ठे भक्तों के सामने खुलकर उनकी सेवा की प्रशंसा की। बाद में जब नित्यानन्द प्रभु भक्तों के एक बड़े दल के साथ पानिहाटी आए, तो राघव पण्डित का घर ही उस उत्सव का केन्द्र बना। उस यात्रा का, और उससे जुड़े एक छोटे-से पर यादगार चमत्कार का वर्णन पानिहाटी में नित्यानन्द प्रभु में है। ये सभी प्रसंग मिलकर दिखाते हैं कि वे प्रचारक नहीं थे। वे एक ऐसे गृहस्थ थे, जिनकी शुद्ध भक्ति की ख्याति इतनी अधिक थी कि भगवान् के अपने निकटतम सहयोगी भी उनके घर आते रहे।

अपने ही भक्तों का एक गाँव #

पानिहाटी में रहने वाले प्रसिद्ध वैष्णव केवल राघव पण्डित ही नहीं थे। मकरध्वज कर राघव पण्डित से निकली उप-शाखा थे। बाद में उन्होंने राघव पण्डित के भण्डार को पुरी ले जाने का दायित्व सँभाला, जैसा कि पुरी की वार्षिक तीर्थयात्रा में बताया गया है। आदि-लीला 10.25 की टीका में श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि मकरध्वज कर स्वयं "भी पानिहाटी के ही निवासी" थे। वे यह भी बताते हैं कि "कर" बंगाल के कायस्थ समुदाय में सामान्यतः मिलने वाला उपनाम है। इसलिए पानिहाटी केवल एक भक्त के घर का स्थान नहीं था। यह गंगा के तट पर पास-पास बसे वैष्णव परिवारों का एक छोटा-सा समूह था, और उनमें राघव पण्डित का घर सबसे अधिक प्रसिद्ध हुआ। इतनी शताब्दियों के बाद भी इस स्थान की ठीक-ठीक पहचान की जा सकती है। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के अपने शोध के अनुसार यह स्थान कलकत्ता के सियालदह से निकलने वाली रेल लाइन पर, सोदपुर स्टेशन से लगभग एक मील दूर, गंगा की ओर है। यह गाँव नदी के पूर्वी तट पर बसा है। यह शहर के इतना निकट था कि पीढ़ियों बाद भी लोग यहाँ जाकर इसकी पुष्टि कर सके।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)

राघव पण्डित की बहन दमयन्ती भगवान् की प्रिय सेविका थीं। वे सदैव भगवान् चैतन्य के लिए भोजन पकाने की विविध सामग्री एकत्र करती रहती थीं।

तात्पर्य से: टीका का अंश: "गौर-गणोद्देश-दीपिका (167) में कहा गया है, गुण-माला व्रजे यासीद् दमयन्ती तु तत्-स्वसा: गोपी गुणमाला राघव पण्डित की बहन दमयन्ती के रूप में प्रकट हुईं।"

Adi 10.25 Sri Chaitanya-charitamrita

यह श्लोक दमयन्ती की अपनी गोपी-पहचान बताता है। यह इसकी भी पुष्टि करता है कि वे और राघव पण्डित साथ रहते थे, और सेवा में लगे एक ही घर के दो अंग थे।

ऊपर जाएँ

अध्याय 2

राघव पण्डित का भण्डार

बीस मील दूर से मँगाए गए नारियल, और महाप्रभु द्वारा समस्त भक्तों के समक्ष की गई शुद्धता की प्रशंसा।

अलग पृष्ठ के रूप में खोलें

ताज़े नारियल। ये उन नारियलों की याद दिलाते हैं जिन्हें राघव पण्डित बीस मील दूर से लाते थे, और उस थाल की भी, जिसे उन्होंने धूल के एक ही स्पर्श के कारण अस्वीकार कर दिया।
ताज़े नारियल। ये उन नारियलों की याद दिलाते हैं जिन्हें राघव पण्डित बीस मील दूर से लाते थे, और उस थाल की भी, जिसे उन्होंने धूल के एक ही स्पर्श के कारण अस्वीकार कर दिया।gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · ISKCON/BBT-affiliated devotional art, approved for use on this site

संन्यास ग्रहण करने के बाद के वर्षों में श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी माता और अपने भक्तों से मिलने बंगाल की यात्रा पर आए। इस यात्रा में वे पानिहाटी में राघव पण्डित के घर रुके। वहाँ उन्होंने जो देखा, उससे वे इतने प्रभावित हुए कि बाद में, बिना किसी के पूछे ही, उन्होंने इसका वर्णन किया। पुरी में सार्वभौम भट्टाचार्य के घर इकट्ठे हुए सभी भक्तों से उन्होंने कहा: "सुनो, कृष्ण की सेवा में राघव पण्डित की शुद्ध भक्ति के विषय में। वस्तुतः राघव पण्डित की सेवा परम शुद्ध और अत्यन्त उत्तम है।"

विशेषविवरण
स्थानराघव पण्डित का घर, पानिहाटी, और बाद में सार्वभौम भट्टाचार्य का घर, पुरी
स्रोतश्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 15.69–91
जिस भेंट का सबसे अधिक विवरण मिलता हैनारियल, बीस मील दूर से साधारण मूल्य से चार गुना अधिक में मँगाए गए
अन्य भेंटकेले, आम, सन्तरे, कटहल, पालक, मिठाइयाँ, अचार और मसाले
प्रशंसा करने वालेश्री चैतन्य महाप्रभु, इकट्ठे भक्तों के सामने

बीस मील दूर से लाए गए नारियल #

कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने महाप्रभु का जो वर्णन दर्ज किया है, वह बहुत बारीक और स्पष्ट है। "यद्यपि उनके पास पहले से ही सैकड़ों वृक्ष और लाखों फल हैं," भगवान् ने कहा, "फिर भी वे यह सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक रहते हैं कि कहाँ मीठे नारियल मिलते हैं। वे बीस मील दूर से अत्यन्त परिश्रम से नारियल एकत्र करते हैं, और प्रत्येक के लिए चार पण चुकाते हैं।" हर दिन पाँच से सात नारियल छीले जाते थे और ठण्डा होने के लिए जल में रखे जाते थे। भोग लगाने के समय उन्हें फिर से छीला जाता, ऊपर छेद किया जाता, और विग्रह के सामने रखा जाता। महाप्रभु ने बताया कि विग्रह उनका जल पी लेते थे और कभी-कभी भीतर की गिरी फिर से भर देते थे। इसलिए पहली भेंट के बाद राघव पण्डित को नारियल का खोल रहस्यमय ढंग से फिर भरा हुआ मिलता था। महाप्रभु के वर्णन के अनुसार, इस बात से राघव पण्डित की श्रद्धा और भी गहरी हो जाती थी।

विग्रह को अर्पित पालक का एक व्यंजन। यह पालक के उन व्यंजनों की याद दिलाता है जिनके लिए परम्परा में राघव पण्डित की रसोई को याद किया जाता है।
विग्रह को अर्पित पालक का एक व्यंजन। यह पालक के उन व्यंजनों की याद दिलाता है जिनके लिए परम्परा में राघव पण्डित की रसोई को याद किया जाता है।gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · ISKCON/BBT-affiliated devotional art, approved for use on this site

वे नारियल जिन्हें उन्होंने फेंक दिया #

एक विशेष दिन की घटना से पता चलता है कि उन्होंने अपने लिए कितना ऊँचा नियम रखा था। एक सेवक ठीक से साफ किए गए दस नारियल विग्रह के पास ले जा रहा था। द्वार पर भीतर जाने की प्रतीक्षा करते समय उसका हाथ द्वार के ऊपर की छत से छू गया। फिर उसने उसी हाथ से नारियलों को छू लिया। राघव पण्डित ने यह देख लिया। "उस द्वार से लोग निरन्तर आते-जाते रहते हैं," उन्होंने कहा। "उनके पैरों की धूल उड़कर छत तक पहुँच जाती है। द्वार के ऊपर की छत को छूने के बाद, तुमने नारियलों को छुआ है। अब वे कृष्ण को भेंट करने योग्य नहीं रहे, क्योंकि वे अशुद्ध हो गए हैं।" उन्होंने सारे नारियल दीवार के पार फिंकवा दिए और बिलकुल नए सिरे से नारियल तैयार करवाए।

श्रील प्रभुपाद ने इसी श्लोक पर अपनी टीका में श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की टीका उद्धृत की है। वह टीका ज़ोर देकर कहती है कि यह स्वच्छता के प्रति कोई साधारण सनक नहीं थी: "राघव पण्डित किसी शुद्धता के पागलपन से ग्रस्त कोई विचित्र व्यक्ति नहीं थे... वे सदैव इसी दिव्य विचार में लीन रहते थे कि वे कृष्ण की सेवा हर वस्तु से किस प्रकार कर सकते हैं।" टीका आगे उलटी भूल से भी सावधान करती है। वह चेतावनी देती है कि निचले स्तर के भक्त राघव पण्डित के बाहरी व्यवहार की नक़ल इस तरह न करें, मानो स्वच्छता ही असली लक्ष्य हो। यह पूरा प्रसंग वास्तव में सेवा में राघव पण्डित की अपनी विशेष और गहरी तल्लीनता के बारे में था, और उसकी नक़ल यों ही नहीं की जा सकती।

दूर गाँवों के फल, और पालक का प्रिय व्यंजन #

यही मानदण्ड रसोई की हर वस्तु पर लागू होता था। "दूर-दूर के गाँवों से वे उत्तम केले, आम, सन्तरे, कटहल और जिन भी उत्कृष्ट फलों के बारे में उन्होंने सुना है, वे सब लाते हैं," महाप्रभु ने भक्तों को बताया। ये फल "ऊँचे मूल्य पर ख़रीदे गए" होते थे, और इन्हें भी उतनी ही सावधानी से छाँटा और साफ किया जाता था। राघव पण्डित पालक, सब्ज़ियाँ, मूली, चिड़ा, चावल का चूर्ण, मिठाइयाँ, पूए, मीठे चावल, खोया और कशाम्दी जैसे अचार तैयार करते थे। साथ ही वे विग्रह के लिए सुगन्ध, वस्त्र और आभूषण भी तैयार करते थे। परम्परा के अनुसार महाप्रभु को इसी रसोई से बने पालक के व्यंजन विशेष रूप से प्रिय थे। पूरी यात्रा के बारे में महाप्रभु ने सीधे शब्दों में सार बताया: "इस प्रकार राघव पण्डित भगवान् की सेवा अतुलनीय ढंग से करते हैं। उन्हें देखकर ही सब को अपार सन्तोष होता है।" फिर उन्होंने राघव पण्डित को गले लगाया और अपनी यात्रा आगे बढ़ाई।

इसी घर की रसोई में, इससे कहीं बड़े और अधिक प्रसिद्ध स्तर पर, वह भोजन बनता था, जिससे हर वर्ष जगन्नाथ पुरी जाने वाले थैले भरे जाते थे। इसकी पूरी कथा पुरी की वार्षिक तीर्थयात्रा में है। यही वह घर भी था, जिसे नित्यानन्द प्रभु ने एक अलग यात्रा में कीर्तन और नृत्य से भर दिया था। इसका वर्णन पानिहाटी में नित्यानन्द प्रभु में है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (2)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

अन्य शास्त्र प्रमाण:

iṅhāra kṛṣṇa-sevāra kathā śuna, sarva-jana
parama-pavitra sevā ati sarvottama

शब्दार्थ

iṅhāra: of him; kṛṣṇa-sevāra: of service to Lord Krishna; kathā śuna: hear the stories; sarva-jana: all people; parama-pavitra: supremely pure; sevā: service; ati sarvottama: very much well accomplished.

श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब सबको बताया, 'सुनो, कृष्ण की सेवा में राघव पण्डित की शुद्ध भक्ति के विषय में। वस्तुतः राघव पण्डित की सेवा परम शुद्ध और अत्यन्त उत्तम है।'

Madhya 15.69 Sri Chaitanya-charitamrita

यह महाप्रभु का अपना परिचय-वचन है, जिसके बाद इस अध्याय में राघव पण्डित की विग्रह-सेवा का लंबा वर्णन आता है। यही वचन राघव पण्डित के मुख्य उद्धरण के रूप में दिया गया है।

ऊपर जाएँ

अध्याय 3

पानिहाटी में नित्यानन्द प्रभु

राघव पण्डित के घर को भर देने वाला कीर्तन, ऐसे स्थान पर मिले फूलों का हार, जहाँ फूल खिलने ही नहीं चाहिए थे, और वह उत्सव जो आज भी पानिहाटी में मनाया जाता है।

अलग पृष्ठ के रूप में खोलें

पानीहाटी के नदी-तट पर चिड़ा-दधि महोत्सव का पारम्परिक गौड़ीय वैष्णव चित्र, जिसमें नित्यानन्द प्रभु और श्री चैतन्य महाप्रभु इकट्ठे हुए भक्तों के सामने नाच रहे हैं।
पानीहाटी के नदी-तट पर चिड़ा-दधि महोत्सव का पारम्परिक गौड़ीय वैष्णव चित्र, जिसमें नित्यानन्द प्रभु और श्री चैतन्य महाप्रभु इकट्ठे हुए भक्तों के सामने नाच रहे हैं।gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · ISKCON/BBT-affiliated devotional art, approved for use on this site

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को प्रचार के लिए वापस बंगाल भेजा, तो अपनी यात्राओं में नित्यानन्द प्रभु दूसरे स्थानों के साथ पानिहाटी भी आए। परम्परा के अनुसार वे राघव पण्डित की शुद्ध भक्ति की ख्याति के कारण वहाँ आए थे। उनके साथ एक बड़ा दल था, जिसमें कीर्तनिया भाई गोविन्द घोष, माधव और वासुदेव भी थे। इसके बाद राघव पण्डित के घर में जो कीर्तन हुआ, उसे नित्यानन्द प्रभु की बंगाल-यात्रा के दर्ज प्रसंगों में सबसे भाव-विभोर प्रसंगों में से एक के रूप में याद किया जाता है।

विशेषविवरण
स्थानराघव पण्डित का घर, पानिहाटी
आगन्तुकनित्यानन्द प्रभु, घोष बन्धु, और भक्तों का एक बड़ा दल
सबसे प्रसिद्ध परिणामचिड़ा-दधि-महोत्सव (चिपटे चावल और दही का उत्सव)
इस यात्रा में जिन्हें दण्ड मिलारघुनाथ दास गोस्वामी, जो बाद में वृन्दावन के छह गोस्वामियों में से एक बने
आज भी मनाया जाता हैहाँ, प्रतिवर्ष पानिहाटी में आज भी

कीर्तन से भरा एक घर #

परम्परा याद करती है कि जैसे-जैसे घोष बन्धु गाते गए, नित्यानन्द प्रभु पूरी तरह भाव-विभोर होकर तल्लीन हो गए। वे बिना रुके नाचते रहे। अन्त में थककर वे उसी वेदी पर बैठ गए, जहाँ राघव पण्डित के विग्रहों की पूजा होती थी। वहाँ उपस्थित भक्तों ने उन्हें एक सम्मानित अतिथि की तरह स्नान कराया, वस्त्र पहनाए, और जहाँ वे बैठे थे वहीं उन्हें माला पहनाई। उसी समय, गहरी समाधि में रहते हुए ही, नित्यानन्द प्रभु ने अचानक राघव पण्डित से कदम्ब के फूलों की एक माला लाने को कहा। राघव पण्डित को बताना पड़ा कि यह असम्भव है, क्योंकि उस ऋतु में कदम्ब के वृक्षों पर फूल नहीं आते। नित्यानन्द प्रभु ने उनसे फिर भी जाकर देखने को कहा। आसपास खोजते हुए राघव पण्डित ने देखा कि एक नींबू के वृक्ष पर, प्रकृति के नियम के विरुद्ध, कदम्ब के फूल खिले हुए थे। उन्होंने फूल इकट्ठे करके माला बनाई और नित्यानन्द प्रभु को पहनाई। इसके बाद पूरा घर एक अलग ही सुगन्ध से भर गया। यह दमनक के फूलों की सुगन्ध थी। नित्यानन्द प्रभु ने इसका कारण बताया कि स्वयं महाप्रभु अदृश्य रूप में पुरी से कीर्तन सुनने आए थे, और वे वही माला पहने हुए थे।

बिना मौसम के खिले कदम्ब के फूल। ये उन फूलों की याद दिलाते हैं जो नित्यानन्द प्रभु के कहने पर राघव पण्डित को नींबू के पेड़ पर उगे मिले।
बिना मौसम के खिले कदम्ब के फूल। ये उन फूलों की याद दिलाते हैं जो नित्यानन्द प्रभु के कहने पर राघव पण्डित को नींबू के पेड़ पर उगे मिले।gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · ISKCON/BBT-affiliated devotional art, approved for use on this site

एक अलग परम्परा में एक दूसरे वैष्णव, सुन्दरानन्द ठाकुर, के साथ भी ऐसी ही एक अद्भुत घटना याद की जाती है। माहेशपुर में उनके अपने घर पर एक नींबू के वृक्ष पर कदम्ब का फूल खिला। उन्होंने उसे वहाँ अपने राधा-रमण विग्रह की पूजा में अर्पित किया। ये दोनों वृत्तान्त अलग-अलग स्थानों और अलग-अलग स्रोतों से आते हैं, और चमत्कार का श्रेय भी अलग-अलग ढंग से देते हैं। माहेशपुर के वृत्तान्त में परम्परा स्वयं सुन्दरानन्द ठाकुर को श्रेय देती है। पानिहाटी के वृत्तान्त में नित्यानन्द प्रभु फूल प्रकट करते हैं, और राघव पण्डित केवल उन्हें खोजते हैं। गौड़ीय भक्ति-जीवनियों में यह चित्र एक से अधिक बार आता है। यह दो अलग-अलग परम्पराओं में सँजोया गया एक साझा विषय है। इसमें दोनों वृत्तान्तों के बीच कोई विरोध नहीं है।

उसके बाद हुआ उत्सव #

इसी यात्रा से एक दूसरा, और भी अधिक प्रसिद्ध प्रसंग जुड़ा है। इसके मुख्य पात्र राघव पण्डित नहीं थे। वे रघुनाथ दास गोस्वामी थे, एक युवक जो अपना पारिवारिक घर छोड़कर श्री चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचने के लिए व्याकुल थे। जब रघुनाथ दास पानिहाटी पहुँचे और उन्होंने दूर से ही प्रणाम किया, तो नित्यानन्द प्रभु ने हँसते हुए पुकारा कि यहाँ एक चोर आया है, जिसे दण्ड मिलना चाहिए। दण्ड के रूप में उन्होंने आज्ञा दी कि रघुनाथ दास एक उत्सव करें और पूरी भीड़ को दही में मिला चिड़ा बाँटें: "उत्सव करो और मेरे सभी गणों को दही और चिड़ा खिलाओ।" यह सुनकर रघुनाथ दास का मन प्रसन्नता से भर गया। उन्होंने पूरे मन से स्वयं को इस कार्य में लगा दिया और कई गाँवों का सारा भोजन-भण्डार ख़रीद लिया। उत्सव के बीच नित्यानन्द प्रभु ने ध्यान में महाप्रभु को नदी के तट पर बुलाया। इस प्रकार दोनों भाइयों ने वहाँ साथ बैठकर भोजन किया, और उनके चारों ओर भक्त पवित्र नामों का कीर्तन कर रहे थे। राघव पण्डित स्वयं इस पूरे समय वहाँ उपस्थित रहे। परम्परा के अनुसार वे अपनी ओर से ऐसा भोजन भी लाए, जिसे सामान्य रसोई में नहीं छुआ गया था। उसी सन्ध्या, जब भीड़ जा चुकी थी और नित्यानन्द प्रभु ने फिर से नृत्य आरम्भ किया, तब राघव पण्डित के घर में महाप्रभु के दूसरी बार प्रकट होने की बात याद की जाती है। चिड़ा-दधि-महोत्सव, या पानिहाटी उत्सव, आज भी वहाँ हर वर्ष मनाया जाता है। रघुनाथ दास गोस्वामी के जीवन की दृष्टि से इस कथा का पूरा वर्णन पानिहाटी में नित्यानन्द प्रभु का आशीर्वाद वाले पृष्ठ पर दिया गया है।

भक्ति-रत्नाकर में स्मरण #

पीढ़ियों बाद वैष्णव इतिहासकार श्रील नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने भक्ति-रत्नाकर में इसी यात्रा पर कई श्लोक लिखे। इन श्लोकों में राघव पण्डित, मकरध्वज कर और गाँव के बाकी निवासी नित्यानन्द प्रभु के दल को आते देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं। राघव पण्डित के घर में हुए कीर्तन के बारे में कहा गया है कि उसने सारे जगत् को दिव्य आनन्द से भर दिया। नरहरि चक्रवर्ती विशेष रूप से यह भी कहते हैं कि पानिहाटी राघव पण्डित की जन्मभूमि थी। वे राघव पण्डित से गाँव के इस सम्बन्ध को ही उस स्थान की महिमा का कारण मानते हैं। इससे पता चलता है कि कम-से-कम बाद की पीढ़ियों के गौड़ीय वैष्णवों के लिए राघव पण्डित की ख्याति और पवित्र स्थान के रूप में पानिहाटी की पहचान को अब अलग नहीं किया जा सकता था।

पानिहाटी: एक जीवंत तीर्थ स्थान #

पानिहाटी में उत्सव के परम्परागत स्थान पर आज भी एक बरगद का वृक्ष है, जिसे पाँच सौ वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। हाल के दशकों में चिड़ा-दधि-महोत्सव एक दिन के आयोजन से बढ़कर कई दिनों का उत्सव बन गया है, जिसमें हज़ारों तीर्थयात्री आते हैं। राघव पण्डित के अपने घर से लेकर आज तक यह सम्बन्ध बिना टूटे चला आ रहा है। महाप्रभु के बहुत कम दूसरे सहयोगियों के घरों के बारे में ऐसा कहा जा सकता है। राघव पण्डित के बाद के वर्षों और उनके बाद पानिहाटी के इतिहास के बारे में जो कुछ ज्ञात है, वह तिरोभाव और विरासत में दिया गया है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)

ऊपर पाठ में उद्धृत:

ऊपर जाएँ

अध्याय 4

पुरी की वार्षिक तीर्थयात्रा

राघवेर झालि: सीलबन्द थैलों में सैकड़ों मील दूर ले जाया गया वर्ष भर का भोग, जिसे महाप्रभु जब चाहते तभी, पूरे वर्ष थोड़ा-थोड़ा करके ग्रहण करते थे।

अलग पृष्ठ के रूप में खोलें

आज इस्कॉन पानीहाटी में हाथों से बड़ी मात्रा में महाप्रसाद बनाते भक्त। यह राघवेर झालि के लिए दमयन्ती द्वारा पूरे वर्ष किए जाने वाले भोजन बनाने की एक आधुनिक झलक है।
आज इस्कॉन पानीहाटी में हाथों से बड़ी मात्रा में महाप्रसाद बनाते भक्त। यह राघवेर झालि के लिए दमयन्ती द्वारा पूरे वर्ष किए जाने वाले भोजन बनाने की एक आधुनिक झलक है।dandavats.com · ISKCON-affiliated news photograph, approved for use on this site

हर वर्ष शिवानन्द सेन उस लम्बी पैदल यात्रा का आयोजन करते थे और उसका खर्च उठाते थे, जिसमें बंगाल के भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन के लिए जगन्नाथ पुरी जाते थे। इस यात्रा का पूरा विवरण शिवानन्द सेन के अपने वृत्तान्त में है। राघव पण्डित का घर हर वर्ष उसी दल के साथ कुछ ऐसा भी भेजता था, जो कोई दूसरा घर नहीं भेजता था। ये भोजन से भरे बहुत सारे थैले थे। उनकी बहन दमयन्ती पूरे वर्ष यह भोजन तैयार करती थीं, और फिर दक्षिण की यात्रा के लिए इसे बाँधकर सीलबन्द किया जाता था।

विशेषविवरण
तैयार करने वालीदमयन्ती, राघव पण्डित की बहन, उन्हीं के निर्देश पर
ढोने वालेतीन कहार, शिवानन्द सेन द्वारा आयोजित तीर्थयात्री दल के साथ
थैलों की देखरेख करने वालेमकरध्वज कर, राघव पण्डित के अपने शिष्य
सामूहिक रूप से जाना जाता हैराघवेर झालि ("राघव के थैले")
भोजन कितने समय तक चलता थापूरे वर्ष, अगली तीर्थयात्रा आने तक
स्रोतश्री चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य-लीला 10.13–42, 124–131

थैलों में क्या-क्या भरा जाता था #

श्री चैतन्य-चरितामृत में उन वस्तुओं की असाधारण रूप से लम्बी और विस्तृत सूची मिलती है, जिन्हें दमयन्ती ने थैलों में भरा। उन्होंने गंगा की मिट्टी को सुखाकर उसका चूर्ण बनाया, उसे छाना और उससे सुगन्धित गोलियाँ बनाईं। उन्होंने कोली-शुण्ठी, कोली-चूर्ण और कोली-खण्ड सहित सौ प्रकार के अचार और मसाले तैयार किए। उन्होंने शक्कर में पकाए धनिया और सौंफ से मिठाइयाँ बनाईं, और पाचन ठीक रखने के लिए सोंठ की मिठाइयाँ भी बनाईं। उन्होंने बहुत दिनों तक चलने वाला पनीर, क्रीम की मिठाइयाँ और अमृत-कर्पूर तैयार किए। उन्होंने घी में तले और शक्कर की चाशनी में पकाए चिड़ा और मुरमुरे के कई व्यंजन भी बनाए, और चूर्ण किए मटर के लड्डू भी। "मैं इन सभी अद्भुत व्यंजनों के नाम एक जीवनकाल में भी नहीं गिना सकता," कृष्णदास कविराज गोस्वामी लिखते हैं। "दमयन्ती सैकड़ों-हज़ारों प्रकार बनाती थीं।" एक व्यंजन का विशेष उल्लेख मिलता है। यह सुकुता है, सूखी सब्ज़ियों का एक कड़वा व्यंजन। दमयन्ती महाप्रभु को एक साधारण मनुष्य समझती थीं, जो अधिक खाने से बीमार हो सकते हैं। इसलिए उन्हें महाप्रभु के पाचन की चिन्ता रहती थी, और पाचन ठीक रखने के लिए वे सुकुता बनाती थीं। "सुकुता को इसलिए न छोड़ो कि वह कड़वी तैयारी है," ग्रन्थ कहता है। "श्री चैतन्य महाप्रभु को यह सुकुता खाने से पंचामृत पीने से भी अधिक आनन्द मिलता था।" छोटे कपड़े के थैलों को बड़े थैलों में सिला जाता, बाँधा जाता और सीलबन्द किया जाता। यह पूरा संग्रह सदा के लिए राघवेर झालि के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इसे तीन कहारों को सौंपा जाता था और मकरध्वज कर की अपनी देखरेख में रखा जाता था। ग्रन्थ में उनके बारे में कहा गया है कि वे इन्हें "अपने ही प्राणों की भाँति अत्यन्त सावधानी से" सम्भालते थे।

बंगाली मिठाइयों और मुरब्बों की एक कतार। यह उन सैकड़ों प्रकार के अचारों, चटनियों और मिठाइयों की याद दिलाती है जिन्हें दमयन्ती हर वर्ष झोलों में भरती थीं।
बंगाली मिठाइयों और मुरब्बों की एक कतार। यह उन सैकड़ों प्रकार के अचारों, चटनियों और मिठाइयों की याद दिलाती है जिन्हें दमयन्ती हर वर्ष झोलों में भरती थीं।gaudiyahistory.iskcondesiretree.com · ISKCON/BBT-affiliated devotional art, approved for use on this site

"केवल राघव के थैले" #

जब दल पुरी पहुँचता, तब जो होता था, उससे साफ दिखता है कि महाप्रभु इस उपहार को कितना विशेष मानते थे। हर वर्ष भक्त उनके लिए भोजन लाते थे। उनके सेवक गोविन्द हर भोजन को भगवान् के सामने रखते हुए उसके देने वाले का नाम पुकारते थे: अद्वैत आचार्य की ओर से, श्रीवास ठाकुर की ओर से, वासुदेव दत्त और मुरारि गुप्त की ओर से, और कुलीन-ग्राम तथा खण्ड के समुदायों की ओर से। महाप्रभु उसी दिन यह सब खा लेते थे। ग्रन्थ के अनुसार यह भोजन सौ लोगों के लिए पर्याप्त होता था। फिर वे गोविन्द से पूछते कि कुछ शेष रहा या नहीं। "अब केवल राघव के थैले शेष हैं," गोविन्द ने उत्तर दिया। महाप्रभु ने उन्हें अलग रखवा दिया और कहा: "आज इन्हें रहने दो। मैं इन्हें बाद में देखूँगा।" अगले दिन एकान्त स्थान में अकेले भोजन करते हुए उन्होंने स्वयं राघव पण्डित के थैले खोले। उन्होंने हर वस्तु में से थोड़ा-थोड़ा चखा और उसके स्वाद और सुगन्ध की प्रशंसा की। फिर उन्होंने बाकी भोजन अलग रखवा दिया। अगले वर्ष के थैले आने तक, पूरे वर्ष, कभी दोपहर के भोजन में और कभी रात में, यह उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके परोसा जाता था। किसी दूसरे भक्त की भेंट के साथ ऐसा नहीं किया गया। बाकी सबके उपहार उसी दिन, दूसरों के सामने, नाम लेकर खा लिए जाते थे। केवल राघव के थैले अलग रखे जाते, एकान्त में उनका आस्वादन किया जाता, और उन्हें लम्बे समय तक चलाया जाता।

एक ऐसा उपहार जो पूरे वर्ष तक चलता रहा #

इसका परिणाम यह हुआ कि राघव पण्डित और दमयन्ती की भक्ति का एक अंश वर्ष के अधिकांश दिनों में पुरी में महाप्रभु की थाली में रहता था। यह उन तीर्थयात्रियों के बंगाल लौट जाने के बहुत बाद तक चलता रहा, जो इसे लेकर आए थे। इस शान्त ढंग से उनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन चलती रही, उत्सवों और कीर्तन की अधिक सार्वजनिक भक्ति के साथ-साथ। राघव पण्डित के बाद के जीवन के बारे में जो ज्ञात है, और पानिहाटी आज उन्हें कैसे याद करता है, इसका वर्णन तिरोभाव और विरासत में है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (3)

se saba sāmagrī yata jhālite bhariyā
rāghava la-iyā yā'na gupata kariyā

vāra-māsa tāhā prabhu karena aṅgīkāra
'rāghavera jhāli' bali' prasiddhi yāhāra

शब्दार्थ

se saba sāmagrī: all those ingredients; jhālite bhariyā: packing in bags; rāghava la-iyā: Raghava carrying; gupata kariyā: very confidentially; vāra-māsa: the whole year; aṅgīkāra: acceptance; rāghavera jhāli: the bags of Raghava; prasiddhi: celebrated.

दमयन्ती जो भोजन भगवान् चैतन्य के लिए पकाती थीं, जब वे पुरी में थे, उसे उनके भाई राघव अन्य लोगों की जानकारी के बिना थैलों में भरकर ले जाते थे। भगवान् इस भोजन को पूरे वर्ष स्वीकार करते थे। वे थैले आज भी राघवेर झालि, अर्थात् 'राघव पण्डित के थैले' के नाम से प्रसिद्ध हैं।

Adi 10.26-27 Sri Chaitanya-charitamrita

ये श्लोक वार्षिक भण्डार को उसका स्थायी नाम राघवेर झालि देते हैं, और स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वह भोजन महाप्रभु के लिए पूरे वर्ष तक चलता था।

saṅkṣepe kahiluṅ ei jhālira vicāra
'rāghavera jhāli' bali' vikhyāti yāhāra

jhālira upara 'munsiba' makaradhvaja-kara
prāṇa-rūpe jhāli rākhe hañā tatpara

शब्दार्थ

saṅkṣepe kahiluṅ: I have briefly spoken; vicāra: description; vikhyāti: fame; jhālira upara: upon the bags; munsiba: the superintendent; makaradhvaja-kara: Makaradhvaja Kara; prāṇa-rūpe: like his very life; hañā tatpara: with great attention.

इस प्रकार मैंने उन थैलों का संक्षिप्त वर्णन किया है जो राघवेर झालि के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन सभी थैलों के अधीक्षक मकरध्वज कर थे, जो उन्हें अपने ही प्राणों की भाँति अत्यन्त सावधानी से सम्भालते थे।

Antya 10.39-40 Sri Chaitanya-charitamrita

ये श्लोक बताते हैं कि पुरी की वार्षिक यात्रा में थैलों की ज़िम्मेदारी मकरध्वज कर नाम के शिष्य को सौंपी गई थी। इन्हीं के साथ दमयन्ती द्वारा भरी गई वस्तुओं की कृष्णदास कविराज गोस्वामी की लम्बी सूची समाप्त होती है।

govinda bale, — 'rāghavera jhāli mātra āche'
prabhu kahe, — 'āji rahu, tāhā dekhimu pāche'

शब्दार्थ

govinda bale: Govinda replied; rāghavera jhāli: the bags given by Raghava; mātra āche: only there is; prabhu kahe: Sri Chaitanya Mahaprabhu said; āji rahu: let it remain today; dekhimu pāche: I shall see later.

गोविन्द ने उत्तर दिया, 'अब केवल राघव के थैले शेष हैं।' भगवान् ने कहा, 'आज इन्हें रहने दो। मैं इन्हें बाद में देखूँगा।'

Antya 10.128 Sri Chaitanya-charitamrita

इस क्षण में दिखता है कि राघव पण्डित की भेंट के साथ बाकी सभी भक्तों की भेंटों से अलग व्यवहार हुआ। उसे उसी दिन नाम लेकर खाने के बजाय अलग रख दिया गया, और अगले दिन दोपहर को महाप्रभु ने अकेले में स्वयं उसे खोला।

ऊपर जाएँ

अध्याय 5

तिरोभाव और विरासत

तिरोभाव की तिथि कहीं दर्ज नहीं, कभी लताओं से ढकी एक समाधि, और अब पुनः तीर्थयात्रा का स्थल बना एक गाँव।

अलग पृष्ठ के रूप में खोलें

श्री चैतन्य-चरितामृत में राघव पण्डित के तिरोभाव की कोई तिथि नहीं दी गई है, और बाद का कोई गौड़ीय वैष्णव स्रोत भी यह कमी पूरी नहीं करता। इसके बदले हमें यह जानकारी मिलती है कि उनकी समाधि कहाँ है, और बाद की शताब्दियों में उस स्थान का क्या हुआ। श्री चैतन्य महाप्रभु के कई निकटतम बंगाली सहयोगियों के बारे में भी यही बात सच है। उनका जीवन उनके तिरोभाव की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट रूप से याद किया जाता है।

विशेषविवरण
समाधि स्थलपानिहाटी, गंगा तट पर
उसी स्थल पर पूजित विग्रहमदन-मोहन
भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर द्वारा वर्णित स्थिति (बीसवीं शताब्दी का आरम्भ)समाधि लताओं से ढकी हुई, विग्रह-मन्दिर जर्जर और उपेक्षित
उस विवरण में उल्लिखित स्थानीय रक्षकशिवचन्द्र राय चौधुरी, पानिहाटी के एक ज़मींदार
वर्तमान स्थितिपानिहाटी एक सक्रिय गौड़ीय वैष्णव तीर्थ स्थल है, जहाँ 2013 में इस्कॉन का एक केन्द्र स्थापित हुआ

लताओं से ढकी एक समाधि #

राघव पण्डित की समाधि का सबसे विस्तृत विवरण, जो आज उपलब्ध है, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के अनुभाष्य में मिलता है। श्रील प्रभुपाद ने चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 10.25 की अपनी टीका में इसे उद्धृत किया है: "राघव पण्डित की समाधि पर एक कंक्रीट के चबूतरे पर एक लता उग आई है। पास में ही एक जर्जर मन्दिर में मदन-मोहन का एक विग्रह भी है। इस मन्दिर का प्रबन्धन श्री शिवचन्द्र राय चौधुरी नामक स्थानीय ज़मींदार करते हैं।" यह टिप्पणी बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में लिखी गई थी। इसमें कोई शोक नहीं है, केवल सीधे तथ्य हैं। यह बस इतना बताती है कि उस समय तक एक पवित्र स्थान शान्त हो चुका था। उसकी देखभाल किसी संगठित मिशन के बजाय एक स्थानीय ज़मींदार परिवार कर रहा था।

पानिहाटी: स्मरण और पुनरुत्थान #

यह शान्ति लम्बे समय तक नहीं रही। गौड़ीय वैष्णव पानिहाटी को श्री चैतन्य महाप्रभु के बंगाल-जीवन के प्रसिद्ध स्थानों में से एक के रूप में पहचानते रहे। यहीं राघव पण्डित का घर था। यहीं नित्यानन्द प्रभु का कीर्तन हुआ, जिसका वर्णन पानिहाटी में नित्यानन्द प्रभु में है। और यहीं वह चिड़ा-दधि-महोत्सव होता है, जो आज भी चल रहा है। श्रील प्रभुपाद स्वयं अपने जीवनकाल में दो बार पानिहाटी गए और उन्होंने वहाँ एक मन्दिर बनने की इच्छा प्रकट की। यह इच्छा 2013 में पूरी होनी आरम्भ हुई, जब पानिहाटी में गंगा के तट पर एक पैतृक सम्पत्ति ली गई और वहाँ इस्कॉन का एक केन्द्र स्थापित हुआ। तब से चिड़ा का वार्षिक उत्सव एक दिन से बढ़कर कई दिनों का हो गया है, और इसमें बड़ी संख्या में तीर्थयात्री आते हैं। अब इस स्थान पर गंगा के दो घाट भी हैं। इनका उपयोग परम्परागत वैष्णव संस्कारों के लिए होता है, जैसे दिवंगत पूर्वजों का श्राद्ध। 2022 में वहाँ एक गोविन्दाज़ रेस्तराँ भी खोला गया। केन्द्र के संचालकों ने पानिहाटी को मायापुर से जोड़ने वाली एक नौका-सेवा की योजना की घोषणा की है। इससे एक ऐसी इच्छा पूरी होगी, जिसके बारे में याद किया जाता है कि वह स्वयं श्रील प्रभुपाद ने प्रकट की थी। केन्द्र के संचालकों ने एक बड़े "चैतन्य सर्किट" तीर्थ-मार्ग की योजना की भी घोषणा की है। यह मार्ग पश्चिम बंगाल के उन स्थानों को जोड़ेगा, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु रहे या जहाँ वे पधारे। यह निश्चित नहीं है कि आज पानिहाटी में खड़ा कोई भवन वही है, जिसका वर्णन कभी भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने किया था। लेकिन वह स्थान, वह भूमि जहाँ राघव पण्डित और दमयन्ती रहते थे और भोजन पकाते थे, आज भी वैसा ही है जैसा सदा था। यह भक्ति का एक जीवित केन्द्र है, केवल उसकी याद में बना कोई स्मारक नहीं।

क्या शेष रहा #

महाप्रभु के कुछ दूसरे सहयोगियों ने अपने पीछे ग्रन्थ, दार्शनिक सम्प्रदाय या औपचारिक शिष्यों की परम्पराएँ छोड़ीं। राघव पण्डित ने ऐसा कुछ नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने पीछे एक आदर्श छोड़ा: भोजन बनाने में शुद्धता और भोग अर्पित करने में सावधानी। उनकी भक्ति इतनी विशेष और इतनी विश्वसनीय थी कि महाप्रभु ने उनके उपहार के साथ बाकी सबसे अलग व्यवहार किया। महाप्रभु ने उसे अकेले में चखा और पूरे वर्ष तक चलाया। आज यह आदर्श केवल श्री चैतन्य-चरितामृत के पृष्ठों में, और उस गाँव के निरन्तर चलते जीवन में सुरक्षित है, जहाँ राघव पण्डित ने इसे जिया। इसके आरम्भ का वर्णन जन्म और प्रारम्भिक जीवन में है, और उनकी रसोई की कथा राघव पण्डित के भण्डार में है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)

तात्पर्य से: टीका का अंश: "राघव पण्डित की समाधि पर एक कंक्रीट के चबूतरे पर एक लता उग आई है। पास में ही एक जर्जर मन्दिर में मदन-मोहन का एक विग्रह भी है। इस मन्दिर का प्रबन्धन श्री शिवचन्द्र राय चौधुरी नामक स्थानीय ज़मींदार करते हैं।"

Adi 10.25 (Anubhasya) Sri Chaitanya-charitamrita

श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का राघव पण्डित की समाधि और उसके पास के उपेक्षित मदन-मोहन मन्दिर का यह प्रत्यक्षदर्शी विवरण 1930 के दशक में लिखा गया था, और इसे श्रील प्रभुपाद ने अपनी टीका में इसी सन्दर्भ पर उद्धृत किया है।

ऊपर जाएँ

उपसंहार

व्रज की एक पूर्व गोपी #

श्रील प्रभुपाद इसी श्लोक की अपनी टीका में गौर-गणोद्देश-दीपिका (श्लोक 166) का वह कथन उद्धृत करते हैं, जो राघव पण्डित की आध्यात्मिक पहचान बताता है। वे पहले व्रज की एक अन्तरंग गोपी धनिष्ठा थीं, जो "सदैव कृष्ण के लिए भोजन बनाने में लगी रहती थीं।" अगले श्लोक (आदि 10.25) की टीका में श्रील प्रभुपाद श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के अनुभाष्य को उद्धृत करते हैं, जो इसी ग्रन्थ (श्लोक 167) के आधार पर बताता है कि उनकी बहन दमयन्ती गोपी गुणमाला थीं। यह सम्बन्ध अद्भुत है। कृष्ण की लीलाओं में इस गोपी की सेवा कृष्ण के लिए भोजन बनाना था। श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में वही गोपी फिर से प्रकट होती हैं। इस बार वे ऐसे भक्त के रूप में आती हैं, जिनका घर ठीक इसी सेवा के लिए प्रसिद्ध हुआ। इस बार यह सेवा उनकी अपनी बहन ने, उनके ही निर्देशन में की।

चैतन्य-चरितामृत आदि 10.24 के उसी तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद गौर-गणोद्देश-दीपिका 166 का संस्कृत श्लोक उद्धृत करके उसका अर्थ बताते हैं:

धनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादाद्व्रजेऽमिताम् ।
सैव सम्प्रति गौराङ्गप्रियो राघवपण्डितः ॥

"राघव पण्डित पहले व्रज में कृष्ण की लीलाओं के समय एक अन्तरंग गोपी थीं, और उनका पूर्व नाम धनिष्ठा था। यह गोपी धनिष्ठा सदैव कृष्ण के लिए भोजन बनाने में लगी रहती थीं।" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.24 तात्पर्य)

इसी ग्रन्थ में चार श्लोक पहले, श्लोक 162 में, लगभग इसी नाम के एक दूसरे भक्त का वर्णन है: गोवर्धन के श्रील राघव पण्डित गोस्वामी, जो गोपी चम्पकलता हैं और जिन्होंने श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर को व्रज के तीर्थों के दर्शन कराए। आधुनिक पुस्तकें प्रायः दोनों को एक मान लेती हैं, पर वे दो अलग-अलग व्यक्ति हैं।

Nandgram Dham
सत्यापित शास्त्रीय
लेखक
हमारी सम्पादकीय टीम हरे कृष्ण मूवमेंट, कोटा के प्रशिक्षित भक्तों एवं शोधकर्ताओं से बनी है, जो इसी गुरु-परम्परा का प्रतिदिन पालन करते हैं। प्रत्येक जीवनी सावधानीपूर्वक शोध और शास्त्रों के विरुद्ध तथ्य-जाँच के बाद लिखी जाती है।
समीक्षक
मंदिर एवं शास्त्रीय शोध टीम
तथ्यात्मक शुद्धता तथा वैष्णव दर्शन एवं श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं के साथ संगति सुनिश्चित करने हेतु प्रत्येक जीवनी की हमारे वरिष्ठ भक्तों एवं शास्त्रीय शोधकर्ताओं द्वारा विस्तृत समीक्षा की जाती है।
अंतिम अद्यतन: