श्री गदाधर पण्डित
भगवान की अपनी ह्लादिनी शक्ति
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परिचय
श्री गदाधर पण्डित पञ्च-तत्त्व के चतुर्थ सदस्य हैं। गौड़ीय सिद्धान्त में वे भगवान की आन्तरिक ह्लादिनी शक्ति, अर्थात् शक्ति-तत्त्व, का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं कृष्ण हैं, जिन्होंने श्रीमती राधारानी का भाव धारण किया है। वहीं गदाधर पण्डित को स्वयं राधारानी माना जाता है, जो इस रूप में महाप्रभु के पूरे जीवन में उनके साथ रहे। परम्परा गदाधर के महाप्रभु के साथ निरन्तर रहने को ठीक इसी दृष्टि से देखती है।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| प्राकट्य | लगभग 1486 में, महाप्रभु के ही वर्ष में, नवद्वीप में |
| माता-पिता | माधव मिश्र और रत्नावती देवी |
| पारिवारिक मूल | चट्टग्राम |
| पहचान | कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति, श्रीमती राधारानी; पञ्च-तत्त्व में भक्त-शक्ति (गौर-गणोद्देश-दीपिका 11, 147; चैतन्य-चरितामृत आदि 10.15) |
| दीक्षा गुरु | पुण्डरीक विद्यानिधि |
| जीवन की सेवा | जगन्नाथ पुरी में टोटा गोपीनाथ की विग्रह-सेवा |
परिचय के शास्त्र प्रमाण (3)
अस्यार्थो विवृतस्तैर्यः स सङ्क्षिप्य विलिख्यते ।
भक्तरूपो गौरचन्द्रो यतोऽसौ नन्दनन्दनः ॥
भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः ।
भक्तावतार आचार्योऽद्वैतो यः श्रीसदाशिवः ॥
भक्ताख्याः श्रीनिवासाद्या यतस्ते भक्तरूपिनः ।
भक्तशक्तिर्द्विजाग्रण्यः श्रीगदाधरपण्डितः ॥११॥
asyārtho vivṛtas tair yaḥ sa saṅkṣipya vilikhyate |
bhakta-rūpo gauracandro yato’sau nanda-nandanaḥ ||
bhakta-svarūpo nityānando vraje yaḥ śrī-halāyudhaḥ |
bhaktāvatāra ācāryo’dvaito yaḥ śrī-sadāśivaḥ ||
bhaktākhyāḥ śrīnivāsādyā yatas te bhakta-rūpinaḥ |
bhakta-śaktir dvijāgraṇyaḥ śrī-gadādhara-paṇḍitaḥ ||11||
अब मैं इन शब्दों का अर्थ संक्षेप में बताता हूँ। इस पंच-तत्त्व में भक्त-रूप (भक्त का रूप) भगवान चैतन्य महाप्रभु हैं, जो पहले नन्द महाराज के पुत्र भगवान कृष्ण के रूप में प्रकट हुए थे। भक्त-स्वरूप भगवान नित्यानन्द हैं, जो पहले व्रजभूमि में भगवान बलराम के रूप में प्रकट हुए थे। भक्तावतार भगवान अद्वैत आचार्य हैं, जो भगवान सदाशिव से अभिन्न हैं। भक्ताख्य (शुद्ध भक्त) श्रीनिवास तथा अन्य महान भक्त हैं। भक्त-शक्ति ब्राह्मणों में अग्रणी गदाधर पण्डित हैं।
तात्पर्य से: श्रीवास ठाकुर के नेतृत्व वाले सभी भक्त उनकी तटस्था शक्ति हैं, जबकि गदाधर पण्डित के नेतृत्व वाले भक्त उनकी अन्तरंगा शक्ति के प्रकाश हैं।
कवि कर्णपूर द्वारा पंच-तत्त्व का सार: गदाधर पण्डित भक्त-शक्ति हैं। संस्कृत: गौर-गणोद्देश-दीपिका का सविशेषचिह्न (डायक्रिटिक) संस्करण; अंग्रेज़ी अनुवाद bvmlu.org पर प्रकाशित पाठ के अनुसार। तात्पर्य-अंश: श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत आदि 17.301।
श्रीराधा प्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी ।
सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः ॥१४७॥
śrī-rādhā prema-rūpā yā purā vṛndāvaneśvarī |
sā śrī-gadādharo gaura-vallabhaḥ paṇḍitākhyakaḥ ||147||
श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति, जो पहले वृन्दावनेश्वरी के नाम से जानी जाती थीं, अब भगवान चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में श्री गदाधर पण्डित के रूप में प्रकट हैं।
तात्पर्य से: पहले, ललिता-सखी के रूप में, वे सदा श्रीमती राधारानी के प्रति समर्पित थीं। इस प्रकार गदाधर पण्डित एक साथ श्रीमती राधारानी और ललिता-सखी, दोनों के अवतार हैं।
यह श्लोक गदाधर पण्डित को वृन्दावन की स्वामिनी श्री राधा बताता है; आगे के श्लोक (148-153) यह भी कहते हैं कि ललिता-सखी ने भी उनमें प्रवेश किया। संस्कृत: गौर-गणोद्देश-दीपिका का सविशेषचिह्न (डायक्रिटिक) संस्करण; अनुवाद: श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत आदि 10.15 का तात्पर्य।
বড় শাখা,—গদাধর পণ্ডিত–গোসাঞি ।
তেঁহো লক্ষ্মীরূপা, তাঁর সম কেহ নাই ॥ ১৫ ॥
baḍa śākhā, — gadādhara paṇḍita-gosāñi
teṅho lakṣmī-rūpā, tāṅra sama keha nāi
चौथी शाखा, गदाधर पण्डित, को श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति का अवतार बताया गया है। इसलिए कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता।
तात्पर्य से: श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति, जो पहले वृन्दावनेश्वरी के नाम से जानी जाती थीं, अब भगवान चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में श्री गदाधर पण्डित के रूप में प्रकट हैं।
कृष्णदास कविराज गोस्वामी गदाधर पण्डित को लक्ष्मी-रूपा, अर्थात् कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति का अवतार, कहते हैं।
अध्याय 1
गदाधर पण्डित का प्राकट्य और बाल्यकाल
निमाई के ही वर्ष में और उन्हीं के पड़ोस में जन्मे, पर स्वभाव में उनसे बिल्कुल भिन्न
गदाधर पण्डित जिस पीढ़ी के बीच बड़े हुए, उसके अधिकांश वैष्णव कहीं और से नवद्वीप आए थे। पंद्रहवीं शताब्दी में बंगाल के विद्वान ब्राह्मण परिवार प्रायः एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसते रहते थे। नवद्वीप उस प्रदेश में संस्कृत अध्ययन का सबसे प्रसिद्ध केन्द्र था, इसलिए वह उन्हें अपनी ओर खींचता था। गदाधर पण्डित का परिवार उस क्षेत्र के सुदूर पूर्व से, चट्टग्राम जिले से आया था, जो अब बांग्लादेश में है। वहाँ वे वारेन्द्र नामक ब्राह्मण समूह के थे। उनके पिता माधव मिश्र और माता रत्नावती देवी थीं। उनका एक छोटा भाई था, बनिनाथ। परिवार स्वयं को काश्यप गोत्र का मानता था।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| जन्म वर्ष | शक 1408, अर्थात् पाश्चात्य कैलेंडर के अनुसार 1486 |
| पिता | माधव मिश्र |
| माता | रत्नावती देवी |
| छोटा भाई | बनिनाथ |
| पारिवारिक मूल | चट्टग्राम जिले के वारेन्द्र ब्राह्मण |
| गोत्र | काश्यप |
उनके जन्मस्थान के दो वृत्तान्त #
जीवनियों में एक विवरण पर मतभेद है, और यहाँ उस अन्तर को छिपाने के बजाय दोनों वृत्तान्त दर्ज किए गए हैं। कुछ वृत्तान्तों के अनुसार, जिनमें भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज द्वारा संकलित जीवनी भी शामिल है, उनका जन्म चट्टग्राम के बेलेटी ग्राम में शक वर्ष 1408 में हुआ, जो पाश्चात्य कैलेंडर का 1486 है। ये वृत्तान्त कहते हैं कि जब बालक बारह वर्ष का था, तब परिवार नवद्वीप आया। दूसरे वृत्तान्तों के अनुसार परिवार उनके जन्म से पहले ही गंगा तट पर मायापुर में बस चुका था। उनका घर जगन्नाथ मिश्र के घर से कुछ ही घर दूर था। ये वृत्तान्त बताते हैं कि रत्नावती देवी और शचीदेवी बहनों जैसी थीं, और रत्नावती देवी लगातार उनके घर आती-जाती रहती थीं। गदाई और निमाई के बचपन में अभिन्न सखा होने की सारी कथाएँ इसी दूसरे वृत्तान्त पर टिकी हैं। अधिकांश गौड़ीय वैष्णव भी यही वृत्तान्त जानते हैं। सभी वृत्तान्त इस बात पर सहमत हैं कि उनका जन्म चैतन्य महाप्रभु के ही वर्ष में, या उसके एक वर्ष के भीतर हुआ था। वे इस बात पर भी सहमत हैं कि बहुत छोटी आयु से ही दोनों एक-दूसरे के साथ रहते थे।
बालक निमाई और गदाधर #
दोनों की आयु लगभग बराबर होना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके अलावा दोनों बालकों में लगभग कुछ भी समान नहीं था। निमाई वाद-विवाद के अपने प्रेम के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत थी। किशोरावस्था तक व्याकरण और तर्कशास्त्र पर उनकी पकड़ इतनी मज़बूत हो गई थी कि नगर का कोई भी विद्वान अपनी इच्छा से उनसे शास्त्रार्थ करने को तैयार नहीं होता था। उन्हें केवल आनन्द के लिए भी तर्क करना अच्छा लगता था। जीवनियाँ बताती हैं कि वे किसी मत का खण्डन करते और फिर उसे उसके रचयिता से भी बेहतर ढंग से दोबारा खड़ा कर देते, केवल यह दिखाने के लिए कि वे ऐसा कर सकते हैं। गदाधर बिल्कुल उलटे स्वभाव के थे। वे शान्त, गम्भीर और शरीर से दुबले-पतले थे, और उन्हें शास्त्रार्थ में कोई रुचि नहीं थी। हर स्रोत इस बात पर ज़ोर देता है कि बचपन से ही उन्हें संसार के साधारण सुखों की कोई परवाह नहीं थी। इसके बजाय वे नवद्वीप के वृद्ध वैष्णवों की ओर खिंचे रहते थे। यह एक छोटा-सा मण्डल था, जो अद्वैत आचार्य के घर पर भागवत पढ़ने और पवित्र नामों का कीर्तन करने के लिए इकट्ठा होता था। उस समय नगर में इस मण्डल का बहुत कम महत्त्व था, क्योंकि वहाँ धार्मिक सम्मान कर्मकाण्डियों और नैयायिकों को ही मिलता था।
मुक्ति के विषय में निमाई का प्रश्न #
वृन्दावन दास ठाकुर उन विद्यार्थी वर्षों की एक घटना सुरक्षित रखते हैं। आज पीछे मुड़कर देखें, तो यह ऐसा लगता है मानो भगवान स्वयं अपने साथ ही एक विनोद कर रहे हों। निमाई की आदत थी कि वे भक्ति-भाव वाले विद्यार्थियों को गली में रोककर ऐसे प्रश्नों में उलझा देते थे, जिनका वे उत्तर नहीं देना चाहते थे। उन्होंने गदाधर से मुक्ति की परिभाषा पूछी। गदाधर ने न्याय के विद्यार्थी की तरह उत्तर दिया: मुक्ति समस्त दुःख की अन्तिम और सम्पूर्ण समाप्ति है। इसके बाद निमाई ने उस परिभाषा को खण्ड-खण्ड कर दिया। कहा जाता है कि वहाँ खड़े भक्त यह सब देख रहे थे। वे सोचने लगे कि यदि ऐसा प्रतिभाशाली युवक कभी भक्त बन जाए, तो कितना अच्छा हो। उस समय तक वे इसकी आशा पूरी तरह छोड़ चुके थे। यही जोड़ी आगे जीवन भर इन दोनों की पहचान बनी रही, बस भूमिकाएँ उलट गईं: एक वे, जो किसी को भी शास्त्रार्थ में हरा सकते थे, और दूसरे वे, जिन्होंने कभी शास्त्रार्थ किया ही नहीं।
ईश्वर पुरी और कृष्ण-लीलामृत #
इसी समय से एक और बात जुड़ी है। ईश्वर पुरी वे वैष्णव संन्यासी थे, जिन्होंने आगे चलकर गया में महाप्रभु को दीक्षा दी। इन्हीं वर्षों में वे कुछ महीने नवद्वीप में रहे। वृत्तान्त कहते हैं कि वे युवा गदाधर के वैराग्य से प्रभावित हुए, और उन्होंने स्वयं उन्हें अपनी रचना कृष्ण-लीलामृत पढ़ाई। यह एक छोटा-सा उल्लेख है। लेकिन इससे पता चलता है कि संकीर्तन आन्दोलन आरम्भ होने से बहुत पहले ही गदाधर माधवेन्द्र पुरी की भक्ति-परम्परा से जुड़ चुके थे। इससे यह भी समझ में आता है कि जब आन्दोलन आरम्भ हुआ, तो उन्हें मनाने की कोई आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी।
आजीवन ब्रह्मचारी #
गदाधर पण्डित ने कभी विवाह नहीं किया। वे जीवन भर ब्रह्मचारी रहे। उस समाज में लगभग हर ब्राह्मण का विवाह स्वाभाविक रूप से हो जाता था, इसलिए यह एक ध्यान खींचने वाली बात थी। इसी के कारण उनका आगे का जीवन वैसा बन सका, जैसा बना: जगन्नाथ पुरी जाना, वहीं रहने का व्रत लेना, और दशकों तक विग्रह-सेवा करना, जिसमें उनका ध्यान बाँटने के लिए कोई गृहस्थी नहीं थी।
पञ्च-तत्त्व में ह्लादिनी शक्ति #
गौड़ीय सिद्धान्त उन्हें पञ्च-तत्त्व के पाँच स्वरूपों में चौथा स्थान देता है, और इस स्थान को बहुत स्पष्ट रूप से समझाता है। कृष्णदास कविराज लिखते हैं कि पाँचों में से तीन, अर्थात् चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु और अद्वैत आचार्य, सभी जीवों के पूज्य हैं। वे लिखते हैं कि चौथे को उनका उपासक समझना चाहिए। एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं कि गदाधर पण्डित कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति के अवतार हैं, और उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। कवि कर्णपुर गौर-गणोद्देश-दीपिका में इससे भी अधिक स्पष्ट बताते हैं। वे कहते हैं कि जो ह्लादिनी शक्ति पहले वृन्दावन की रानी थीं, वही चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में गदाधर पण्डित के रूप में उपस्थित हैं। वे यह भी जोड़ते हैं कि राधारानी की सबसे निकट सखी ललिता का भी कुछ अंश उनमें प्रवेश कर गया है। इसलिए परम्परा उन्हें भगवान का कोई असाधारण रूप से समर्पित मित्र नहीं मानती। परम्परा उन्हें एक पुरुष ब्राह्मण के शरीर में भगवान की अपनी आन्तरिक शक्ति मानती है, अर्थात् शक्तिमान के साथ खड़ी शक्ति। इसी कारण बंगाल के बहुत-से मन्दिरों में केवल गौर की नहीं, बल्कि गौर-गदाधर के विग्रह-युगल की पूजा होती है।
पाठक इस सिद्धान्त को माने या न माने, यह देखने योग्य है कि परम्परा ने इसे किसके माध्यम से कहा। वह भगवान की ह्लादिनी शक्ति को किसी ऐसे व्यक्ति में दिखा सकती थी, जो बाहर से ही असाधारण दिखता। इसके बजाय उसने उन्हें पास की गली के एक शान्त और संकोची बालक में देखा। वे शास्त्रार्थ में निपुण नहीं थे, उन्होंने कभी कुछ स्थापित नहीं किया, और उनका पूरा सार्वजनिक जीवन बस किसी और के साथ खड़े रहने में बीता। नवद्वीप की उन गलियों में आरम्भ हुई यह मित्रता आगे यहाँ वर्णित है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (5)
বড় শাখা,—গদাধর পণ্ডিত–গোসাঞি ।
তেঁহো লক্ষ্মীরূপা, তাঁর সম কেহ নাই ॥ ১৫ ॥
baḍa śākhā, — gadādhara paṇḍita-gosāñi
teṅho lakṣmī-rūpā, tāṅra sama keha nāi
शब्दार्थ
baḍa śākhā: big branch; gadādhara paṇḍita-gosāñi: the descendants or disciplic succession of Gadādhara Paṇḍita; teṅho: Gadādhara Paṇḍita; lakṣmī-rūpā: incarnation of the pleasure potency of Lord Kṛṣṇa; tāṅra: his; sama: equal; keha: anyone; nāi: there is none.
गदाधर पण्डित, चतुर्थ शाखा, श्री कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति के अवतार कहे गए हैं। अतः कोई भी उनकी समानता नहीं कर सकता।
गदाधर पण्डित को चैतन्य-वृक्ष की चतुर्थ शाखा और कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति का अवतार कहा गया है, जिनकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती।
এই তিন তত্ত্ব,—‘সর্বারাধ্য’ করি মানি ।
চতুর্থ যে ভক্ততত্ত্ব,—‘আরাধক’ জানি ॥ ১৫ ॥
ei tina tattva, — ‘sarvārādhya’ kari māni
caturtha ye bhakta-tattva, — ‘ārādhaka’ jāni
शब्दार्थ
ei tina tattva: all three of these truths; sarva-ārādhya: worshipable by all living entities; kari māni: accepting such; caturtha: fourth; ye: who is; bhakta-tattva: in the category of devotees; ārādhaka: worshiper; jāni: I understand.
तीन प्रधान तत्त्व [चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु और अद्वैत प्रभु] समस्त जीवों द्वारा पूज्य हैं, और चतुर्थ तत्त्व [श्री गदाधर प्रभु] को उनके उपासक के रूप में समझा जाना चाहिए।
पञ्च-तत्त्व के तीन प्रधान तत्त्व सबके द्वारा पूज्य हैं; चतुर्थ तत्त्व को उनके उपासक के रूप में समझा जाना चाहिए।
গদাধর–পণ্ডিতাদি প্রভুর ‘শক্তি’–অবতার ।
অন্তরঙ্গ–ভক্ত’ করি’ গণন যাঁহার ॥ ১৭ ॥
gadādhara-paṇḍitādi prabhura ‘śakti’-avatāra
‘antaraṅga-bhakta’ kari’ gaṇana yāṅhāra
शब्दार्थ
gadādhara: Gadādhara; paṇḍita: of the learned scholar; ādi: headed by; prabhura: of the Lord; śakti: potency; avatāra: incarnation; antaraṅga: very confidential; bhakta: devotee; kari’: accepting; gaṇana: counting; yāṅhāra: of whom.
गदाधर पण्डित के नेतृत्व वाले भक्तों को भगवान की आन्तरिक शक्ति के अवतार माना जाना चाहिए। वे भगवान की सेवा में संलग्न अन्तरंग भक्त हैं।
गदाधर पण्डित के नेतृत्व वाले भक्त आन्तरिक शक्ति के अवतार हैं; इससे उनकी स्थिति शक्ति-तत्त्व के रूप में परिभाषित होती है।
গদাধর পণ্ডিতাদি—প্রভুর নিজশক্তি ।
তাঁ’ সবার চরণে মোর সহস্র প্রণতি ॥ ৪১ ॥
gadādhara-paṇḍitādi — prabhura nija-śakti
tāṅ’-sabāra caraṇe mora sahasra praṇati
शब्दार्थ
gadādhara-paṇḍita-ādi: headed by Śrī Gadādhara Paṇḍita; prabhura: of the Supreme Lord; nija-śakti: internal potencies; tāṅ’-sabāra: of all of them; caraṇe: unto the lotus feet; mora: my; sahasra: thousands; praṇati: respectful obeisances.
मैं भगवान की आन्तरिक शक्तियों को अपना सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ, जिनमें श्री गदाधर प्रभु सर्वप्रमुख हैं।
कृष्णदास कविराज का भगवान की आन्तरिक शक्तियों को प्रणाम, जिनमें गदाधर प्रभु प्रमुख हैं।
শ্রীচৈতন্য, নিত্যানন্দ, অদ্বৈত,—তিন জন ।
শ্রীবাস–গদাধর–আদি যত ভক্তগণ ॥ ১৬৯ ॥
śrī-caitanya, nityānanda, advaita, — tina jana
śrīvāsa-gadādhara-ādi yata bhakta-gaṇa
शब्दार्थ
śrī-caitanya, nityānanda, advaita: Śrī Caitanya Mahāprabhu, Nityānanda Prabhu and Advaita Prabhu; tina: these three; jana: personalities; śrīvāsa-gadādhara: Śrīvāsa and Gadādhara; ādi: etc.; yata: all; bhakta-gaṇa: the devotees.
पञ्च-तत्त्व महामन्त्र का जप करते समय श्री चैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैत, गदाधर और श्रीवास के नाम उनके अनेक भक्तों सहित लेने चाहिए। यही विधि है।
पञ्च-तत्त्व मन्त्र, जिसमें गदाधर का नाम चौथा है; अधिकांश भक्त प्रतिदिन इसी रूप में उनसे परिचित होते हैं।
अध्याय 2
निमाई पण्डित के साथ मित्रता
पहले खेल-साथी, फिर सहपाठी, फिर ऐसा कुछ जिसके लिए जीवनियों के पास कोई साधारण शब्द नहीं था

एक ही आयु के दो बालक, जो गंगा तट पर कुछ ही घरों की दूरी पर रहते हों, स्वाभाविक रूप से बहुत समय साथ बिताते हैं, चाहे उनका स्वभाव मेल खाए या नहीं। गदाई और निमाई आरम्भ से ही साथ थे। वैष्णव जीवनियाँ बताती हैं कि बचपन में वे एक-दूसरे से अलग नहीं होते थे। बंगाल के लोग आज भी उन्हें प्रेम से एक साथ गदाई-गौरांग कहकर पुकारते हैं। यह नाम उसी आरम्भिक काल से चला आ रहा है, बाद के किसी समय से नहीं।
मुक्ति की परिभाषा पूछे जाने पर #
विद्यालय के वर्षों में यह मित्रता कैसी थी, यह वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा दर्ज एक घटना से सबसे अच्छी तरह समझ आता है। निमाई गंगादास पण्डित के टोल में पढ़ रहे थे। किशोरावस्था के मध्य तक नैयायिक के रूप में उनकी प्रसिद्धि नगर के बहुत-से लोगों के लिए परेशानी बन गई थी। वे विद्वानों को मार्ग में रोककर शास्त्रार्थ की चुनौती देते थे। भक्ति-भाव वाले लोगों को चुनौती देने में उन्हें विशेष आनन्द आता था। वे भक्त इस सारे वाद-विवाद को जीवन की व्यर्थ बर्बादी मानते थे, और उनसे बचने के लिए लम्बे रास्ते से घर लौटते थे। मुकुन्द दत्त और श्रीवास पण्डित भी उनसे बचने वालों में थे। लेकिन गदाधर उनके पड़ोसी और मित्र थे, इसलिए वे उनसे बच नहीं सकते थे। एक दिन निमाई ने गदाधर से मुक्ति की परिभाषा पूछी। गदाधर ने न्याय का प्रचलित उत्तर दिया कि मुक्ति सब दुःखों का अन्तिम अन्त है। तब निमाई ने सबके सामने उनके उत्तर को खण्ड-खण्ड कर दिया। कहा जाता है कि वहाँ उपस्थित भक्त मन-ही-मन सोचने लगे कि यदि यह बालक कभी भक्ति की ओर मुड़ जाए, तो कितना महान भक्त बनेगा।
गया-यात्रा के पश्चात् का परिवर्तन #
लगभग 1508 में गया की यात्रा के समय निमाई में महान परिवर्तन आया। इसके बाद जो हुआ, उसका भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा दिया गया संक्षिप्त वर्णन यहाँ उपयोगी है, क्योंकि यह उन्हें वैसा दिखाता है, जैसा उन्हें पहले से जानने वाले लोगों ने देखा। नदिया लौटने पर वे अब न वाद-विवाद करने वाले नैयायिक रहे, न झगड़ालू कर्मकाण्डी, न दूसरों की आलोचना करने वाले वक्ता। वे कृष्ण का नाम सुनकर मूर्च्छित हो जाते थे, और ऐसे व्यवहार करते थे मानो किसी शक्ति के वश में हों। अद्वैत आचार्य, श्रीवास और दूसरे लोग, जो वर्षों से वैष्णव थे, इस परिवर्तन से चकित रह गए। लेकिन नवद्वीप के अधिकांश लोग चकित नहीं, बल्कि लज्जित हुए, और उन्होंने सोचा कि निमाई का मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया है।
शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के घर मूर्च्छा #
भक्तों के बीच गदाधर का स्थान लगभग तुरन्त ही स्पष्ट हो गया। चैतन्य-भागवत उस पहले अवसर का वर्णन करता है, जब शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के घर पर महाप्रभु ने भक्तों के सामने अपनी पहचान प्रकट की। गदाधर आए और चुपचाप एक ओर खड़े रहे। जब उन्होंने भगवान को पवित्र नामों में डूबा हुआ देखा, तो वे मूर्च्छित हो गए। उस समय महाप्रभु ने उनसे जो कहा, उसे परम्परा आज भी याद रखती है। उन्होंने कहा कि गदाधर भाग्यशाली हैं, क्योंकि बचपन से ही उनका मन कृष्ण के चरणों में लगा रहा, जबकि स्वयं महाप्रभु ने अपना मनुष्य-जन्म व्यर्थ विद्या में गँवा दिया। महाप्रभु अभी-अभी परम भगवान के रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए ये विनम्रता के शब्द नहीं थे। परम्परा इन्हें शक्तिमान द्वारा अपनी शक्ति की स्वीकृति के रूप में समझती है।
श्रीवास के आँगन में कीर्तन की रातें #
उन आरम्भिक वर्षों में आन्दोलन का केन्द्र श्रीवास ठाकुर के घर का आँगन था। यह घर गंगा तट पर, निमाई और गदाधर के घरों से लगभग दो सौ गज आगे था। जिस पूरे वर्ष वहाँ बन्द द्वारों के भीतर कीर्तन होता रहा, गदाधर हर रात वहाँ उपस्थित रहे। उन्होंने उस काल के महान प्रकटीकरण अपनी आँखों से देखे। एक रात श्रीवास ने विधिपूर्वक महाप्रभु को स्नान कराया और उनकी वैसे ही पूजा की, जैसे किसी विग्रह की स्थापना के समय की जाती है। एक और रात नित्यानन्द प्रभु आए, और उन्हें पहले षड्भुज रूप और फिर वृन्दावन के द्विभुज गोपाल-रूप का दर्शन कराया गया। इक्कीस घण्टों तक बिना रुके चली वह परमानन्द-अवस्था भी इसी काल की है। कृष्णदास कविराज उसे दर्ज तो करते हैं, पर उसका वर्णन करने का प्रयास नहीं करते। इनमें से किसी भी दृश्य में गदाधर ऐसे दर्शक नहीं थे, जिन्हें संयोग से भीतर आने दिया गया हो। उनके आस-पास के भक्त समझते थे कि उनकी उपस्थिति भी इन दृश्यों को सम्भव बनाने वाली बातों में से एक थी।
इसका कारण यह है कि श्रीवास ठाकुर के घर में गदाधर का एक विशेष और व्यावहारिक दायित्व था। वे ही भगवान को बाहरी चेतना में वापस ला सकते थे। उस काल में महाप्रभु की परमानन्द-अवस्थाएँ जितनी सुन्दर थीं, उतनी ही उग्र भी थीं, और स्वयं उनके लिए संकट भरी भी थीं। एक रात महाप्रभु पुकार-पुकारकर पूछ रहे थे कि कृष्ण कहाँ हैं। गदाधर ने उनसे कहा कि कृष्ण उन्हीं के हृदय में छिपे हैं। यह सुनकर महाप्रभु कृष्ण तक पहुँचने के लिए अपनी ही छाती नोचने लगे। गदाधर को उनके हाथ पकड़कर उन्हें रोकना पड़ा। उन्होंने कहा कि कृष्ण शीघ्र ही आएँगे और उन्हें धैर्य रखना चाहिए। यह देखकर शचीदेवी ने गदाधर से अनुरोध किया कि वे सदा उनके पुत्र के पास ही रहें। व्यवहार में गदाधर अगले छब्बीस वर्षों तक ऐसा ही करते रहे।
माला गूँथना और चन्दन घिसना #
इसके अलावा, नवद्वीप-काल में उनकी सेवाएँ घरेलू और निजी प्रकार की थीं। वे भगवान के लिए वन के फूलों की मालाएँ गूँथते, उनके शरीर के लिए चन्दन घिसते, और उनके कक्ष और शय्या की देखभाल करते थे। जीवनी-लेखक जान-बूझकर यह तुलना करते हैं: जैसे राधारानी वृन्दावन में कृष्ण को वस्त्र और आभूषणों से सजाती थीं, वैसे ही गदाधर नदिया में गौरांग को सजाते-सँवारते थे। वृत्तान्तों के अनुसार वे हर घटना में उपस्थित रहे। जगाई और माधाई के उद्धार के बाद गंगा में हुई जल-क्रीड़ा में, श्रीवास के आँगन के महान प्रकटीकरणों में, काज़ी के घर तक की रात्रि-यात्रा में, और कटवा में जब भगवान ने संन्यास लिया, तब भी वे वहाँ थे।
चन्द्रशेखर आचार्य के घर का नाटक #
उन वर्षों की एक घटना विशेष स्नेह से स्मरण की जाती है। चन्द्रशेखर आचार्य के घर पर कृष्ण-लीलाओं का एक नाटक खेला गया। इसमें महाप्रभु ने स्वयं रुक्मिणी की भूमिका निभाई, श्रीवास ने नारद मुनि की, और हरिदास ठाकुर ने गाँव के कोतवाल की। दूसरे अंक में गदाधर भी स्त्री-वेश में आए। तब महाप्रभु ने कहा कि गदाधर आध्यात्मिक जगत में उनके अपने परिवार के हैं। गाँव के एक नाटक के बीच यह एक हल्की-सी बात थी, लेकिन परम्परा ने इसे कभी हल्के में नहीं लिया।
गौर और गदाधर की सम्मिलित पूजा #
जीवनी-लेखक मानते हैं कि दोनों की एक साथ पूजा करने की प्रथा भी इसी काल से आरम्भ हुई, जो आज भी पूरे बंगाल में चलती है। परम्परा मानती है कि राधा और कृष्ण ही गौर और गदाधर के रूप में नवद्वीप आए। परम्परा की दृष्टि में, गंगा के किनारे जिन कुंजों में ये युवक बैठकर गाते थे, वहाँ वही लीला आगे चल रही थी, बस नाम बदल गए थे। चाहे इसे धर्मशास्त्र के रूप में पढ़ा जाए, या एक असाधारण मित्रता को याद रखने के समाज के ढंग के रूप में, इससे गौड़ीय चित्रों और मन्दिर-विग्रहों की एक बात समझ में आती है, जो अन्यथा विचित्र लग सकती है। श्री चैतन्य महाप्रभु को प्रायः अकेले नहीं दिखाया जाता।
कटवा में संन्यास के पश्चात् #
फिर जनवरी 1510 में भगवान ने चौबीस वर्ष की आयु में कटवा में संन्यास ग्रहण किया, और नवद्वीप का वह गृहस्थ-जीवन सबके लिए समाप्त हो गया। बाद में नित्यानन्द प्रभु को प्रचार के लिए बंगाल वापस भेजा गया। अद्वैत आचार्य शान्तिपुर में अपने घर पर ही रहे। श्रीवास कुमारहट्ट चले गए और वर्ष में एक बार दक्षिण आते थे। गदाधर महाप्रभु के पीछे-पीछे जगन्नाथ पुरी चले गए और जीवन भर वहीं रहे। इसका वर्णन एक अन्य पृष्ठ पर है।
गौड़ीय सिद्धान्त इस मित्रता को एक सुखद संयोग नहीं, बल्कि एक आवश्यकता मानता है। इस समझ के अनुसार श्री चैतन्य महाप्रभु वे कृष्ण हैं, जिन्होंने राधारानी का वर्ण और आन्तरिक भाव धारण किया है, ताकि वे भक्त की ओर से अपनी ही मधुरता का स्वाद ले सकें। यदि ऐसा है, तो जिस शक्ति के द्वारा वे यह स्वाद लेते हैं, उसे वृन्दावन में पीछे नहीं छोड़ा जा सकता। उसे उपस्थित रहना ही होगा, और ऐसे रूप में उपस्थित रहना होगा, जो न उनसे प्रतिस्पर्धा करे, न लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचे। गदाधर पण्डित वही उपस्थिति हैं। इसी कारण बंगाल के मन्दिर प्रायः अकेले स्वरूप के बजाय युगल की पूजा करते हैं। इसी कारण महाप्रभु का एक नाम सीधे गदाधर-प्राणनाथ है, अर्थात् गदाधर के प्राण और आत्मा। गदाधर ने विधिवत दीक्षा कैसे और किससे प्राप्त की, यह यहाँ बताया गया है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (5)
পণ্ডিতের ভাব-মুদ্রা কহন না যায় ।
গদাধর-প্রাণনাথ’ নাম হৈল যায় ॥ ১৬৩ ॥
paṇḍitera bhāva-mudrā kahana nā yāya
‘gadādhara-prāṇa-nātha’ nāma haila yāya
शब्दार्थ
paṇḍitera: of Gadādhara Paṇḍita; bhāva-mudrā: characteristics and ecstatic love; kahana nā yāya: cannot be described; gadādhara-prāṇa-nātha: the Lord of the life of Gadādhara; nāma: name; haila: became; yāya: goes.
गदाधर पण्डित के गुणों और उनके परमानन्द-प्रेम का वर्णन कोई नहीं कर सकता। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु का एक अन्य नाम गदाधर-प्राणनाथ है, अर्थात "गदाधर पण्डित के प्राण और आत्मा"।
महाप्रभु को गदाधर-प्राणनाथ कहा जाता है, गदाधर पण्डित के प्राण और आत्मा, क्योंकि उनके परमानन्द-प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता।
পণ্ডিতে প্রভুর প্রসাদ কহন না যায় ।
গদাইর গৌরাঙ্গ’ বলি’ যাঁরে লোকে গায় ॥ ১৬৪ ॥
paṇḍite prabhura prasāda kahana nā yāya
‘gadāira gaurāṅga’ bali’ yāṅre loke gāya
शब्दार्थ
paṇḍite: upon Gadādhara Paṇḍita; prabhura: of Śrī Caitanya Mahāprabhu; prasāda: mercy; kahana nā yāya: no one can explain; gadāira gaurāṅga: the Gaurāṅga of Gadādhara Paṇḍita; bali’: as; yāṅre: whom; loke gāya: people say.
भगवान गदाधर पण्डित पर कितने दयालु हैं, यह कोई नहीं कह सकता, परन्तु लोग भगवान को गदाइर गौरांग के नाम से जानते हैं, अर्थात "वह गौरांग जो गदाधर पण्डित के हैं"।
लोग भगवान को गदाइर गौरांग के नाम से जानते हैं, वह गौरांग जो गदाधर के हैं।
প্রভুর অভিষেক তবে করিল শ্রীবাস ।
খাটে বসি’ প্রভু কৈলা ঐশ্বর্য প্রকাশ ॥ ১১ ॥
prabhura abhiṣeka tabe karila śrīvāsa
khāṭe vasi’ prabhu kailā aiśvarya prakāśa
शब्दार्थ
prabhura: of the Lord; abhiṣeka: worship; tabe: after that; karila: did; śrīvāsa: Śrīvāsa; khāṭe: on the cot; vasi’: sitting; prabhu: Lord Śrī Caitanya Mahāprabhu; kailā: did; aiśvarya: opulence; prakāśa: manifestation.
तब श्रीवास ठाकुर ने अभिषेक की विधि से भगवान चैतन्य महाप्रभु की पूजा की। खाट पर बैठे हुए, भगवान ने दिव्य ऐश्वर्य प्रदर्शित किया।
श्रीवास के घर में अभिषेक, नवद्वीप के महान् प्रकटीकरणों में से एक, जिसमें गदाधर उपस्थित थे।
তবে আচার্যের ঘরে কৈল কৃষ্ণলীলা ।
রুক্মিণী–স্বরূপ প্রভু আপনে হইলা ॥ ২৪১ ॥
tabe ācāryera ghare kaila kṛṣṇa-līlā
rukmiṇī-svarūpa prabhu āpane ha-ilā
शब्दार्थ
tabe: thereafter; ācāryera: of Śrī Candraśekhara Ācārya; ghare: in the house; kaila: performed; kṛṣṇa-līlā: pastimes of Lord Kṛṣṇa; rukmiṇī: of Rukmiṇī; svarūpa: form; prabhu: the Lord; āpane: personally; ha-ilā: became.
इसके पश्चात् चन्द्रशेखर आचार्य के घर में कृष्ण-लीलाओं का एक नाट्य-प्रदर्शन किया गया। भगवान ने स्वयं रुक्मिणी की भूमिका निभाई, जो कृष्ण की रानियों में सर्वप्रमुख हैं।
चन्द्रशेखर आचार्य के घर का नाटक जिसमें महाप्रभु ने रुक्मिणी की भूमिका निभाई।
পুনঃ পুনঃ পিয়াইয়া হয় মহামত্ত ।
নাচে, কান্দে, হাসে, গায়, যৈছে মদমত্ত ॥ ২২ ॥
punaḥ punaḥ piyāiyā haya mahāmatta
nāce, kānde, hāse, gāya, yaiche mada-matta
शब्दार्थ
punaḥ punaḥ: again and again; piyāiyā: causing to drink; haya: becomes; mahā-matta: highly ecstatic; nāce: dances; kānde: cries; hāse: laughs; gāya: chants; yaiche: as if; mada-matta: one is drunk.
श्री पञ्च-तत्त्व स्वयं बार-बार नृत्य करते रहे और इस प्रकार भगवत्प्रेम रूपी अमृत का पान सुगम बनाया। वे उन्मत्त पुरुषों की भाँति नाचे, रोए, हँसे और कीर्तन करते रहे, और इस प्रकार भगवत्प्रेम बाँटा।
पञ्च-तत्त्व के सदस्य साथ मिलकर नाचे, रोए, हँसे और कीर्तन किया और इस प्रकार भगवत्प्रेम बाँटा, वह सामूहिक कार्य जिसमें गदाधर के नवद्वीप-वर्ष व्यतीत हुए।
अध्याय 3
पुण्डरीक विद्यानिधि से दीक्षा
एक युवा तपस्वी साज-सामान देखकर एक भक्त को गलत आँकता है, और उसकी भूल सुधरती है
नवद्वीप के वर्षों में किसी समय चैतन्य महाप्रभु को रोते हुए और एक ऐसे व्यक्ति को पुकारते हुए सुना गया, जिनसे वहाँ उपस्थित किसी भी भक्त की भेंट नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि पुण्डरीक उनके पिता हैं, और पूछा कि वे उन्हें फिर कब देखेंगे। भक्तों ने पूछा कि ये कौन हैं। उन्हें बताया गया कि पुण्डरीक विद्यानिधि नाम के एक महान वैष्णव शीघ्र ही नवद्वीप आने वाले हैं।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| जन्मस्थान | चट्टग्राम जिले में हाथाजारी के निकट मेखल |
| पिता | बनेश्वर, अथवा एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी |
| माता | गंगादेवी |
| समुदाय | वारेन्द्र ब्राह्मण |
| कृष्ण-लीलाओं में पहचान | वृषभानु, श्रीमती राधारानी के पिता |
| महाप्रभु द्वारा प्रदत्त उपाधि | प्रेमनिधि |
पुण्डरीक विद्यानिधि कौन थे #
महाप्रभु के बहुत-से पार्षदों की तरह पुण्डरीक विद्यानिधि भी पूर्वी बंगाल से थे। वे चट्टग्राम जिले में हाथाजारी के निकट मेखल के रहने वाले थे। उनके पिता का नाम बनेश्वर, अथवा एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी, बताया गया है, और माता का नाम गंगादेवी। यह परिवार वारेन्द्र ब्राह्मणों का था। वारेन्द्र और राढ़ीय समूहों के बीच समय-समय पर झगड़े होते रहते थे, और ऐसे ही किसी झगड़े में इस परिवार को जाति से बाहर कर दिया गया था। इसलिए विद्वान होते हुए भी इस परिवार को समाज में उतना सम्मान नहीं मिलता था, जितना मिलना चाहिए था। कवि कर्णपुर उन्हें कृष्ण की वृन्दावन-लीलाओं में श्रीमती राधारानी के पिता वृषभानु के रूप में पहचानते हैं। इसी कारण महाप्रभु ने उन्हें पिता कहकर पुकारा और उन्हें प्रेमनिधि की उपाधि दी। कृष्णदास कविराज उन्हें चैतन्य-वृक्ष की तीसरी महान शाखा कहते हैं। वे यह भी दर्ज करते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में भगवान कभी-कभी रो पड़ते थे।
जब वे नवद्वीप आए, तब इनमें से कुछ भी दिखाई नहीं देता था। पुण्डरीक विद्यानिधि एक धनी सांसारिक व्यक्ति के रूप में नवद्वीप आए, और उन्होंने स्वयं को कुछ और दिखाने का कोई प्रयास नहीं किया। मुकुन्द दत्त चट्टग्राम में रह चुके थे और उन्हें जानते थे। एक दिन उन्होंने गदाधर से कहा कि वे उन्हें एक बहुत असाधारण वैष्णव से मिलवाने ले जा रहे हैं, और वे गदाधर को अपने साथ ले गए।
ऐश्वर्य पर गदाधर की निराशा #
गदाधर ने देखा कि एक व्यक्ति तीन परतों वाले चंदोवे के नीचे एक महँगी शय्या पर लेटे हैं। वृत्तान्तों के अनुसार चादरें दूध के झाग जैसी सफ़ेद थीं। हाथ की पहुँच में एक रत्नजड़ित डिब्बे में सुगन्धित पान रखा था, दोनों ओर पीतल की पीकदानियाँ थीं, और दो सेवक उन्हें पंखा झल रहे थे। पुण्डरीक ने उनका प्रेम से स्वागत किया और बातचीत की। गदाधर उस समय बीस वर्ष के ब्रह्मचारी थे। बचपन से ही उन्हें सुख-सुविधा की कोई परवाह नहीं थी, और स्वभाव से वे बाहरी रूप को गम्भीरता से लेते थे। इसलिए उन्हें जो बताया गया था, उसका मेल वे इन सब बातों से नहीं बैठा पाए। श्रील प्रभुपाद इस प्रसंग का सार देते हुए युवक की भूल को साफ शब्दों में कहते हैं: गदाधर पण्डित ने पहले-पहल पुण्डरीक विद्यानिधि को एक साधारण धन-सम्पन्न व्यक्ति समझ लिया।
पूतना विषयक श्लोक और उसका प्रभाव #
मुकुन्द ने उनके मुख पर सन्देह देखा। तब उन्होंने वह काम किया, जिससे यह सन्देह तुरन्त दूर हो सकता था। उन्होंने भागवत के तृतीय स्कन्ध का वह श्लोक ऊँचे स्वर में पढ़ा, जिसमें उद्धव आश्चर्य करते हैं कि कृष्ण ने डायन पूतना को धाय का पद दिया। पूतना अपने स्तनों पर विष लगाकर उन्हें मारने आई थी। उद्धव पूछते हैं कि इससे अधिक दयालु शरण और कहाँ मिल सकती है। इस श्लोक का पुण्डरीक विद्यानिधि पर तुरन्त और पूरा प्रभाव पड़ा। वे चीख उठे और भूमि पर गिर पड़े। वैष्णव ग्रन्थों में बताए गए परमानन्द के सभी लक्षण उनके शरीर पर प्रकट हो गए। उन्होंने सुन्दर बिछौने को फाड़ डाला और विलाप करने लगे कि भगवान अनन्त दयालु हैं, फिर भी उन्होंने अपनी दया उनसे रोक रखी है। कई लोग मिलकर भी उन्हें सँभाल नहीं पाए। जब यह आवेग अन्त में शान्त हुआ, तो वे कुछ घण्टों तक अचेत रहे।
महाप्रभु का सुधार और दीक्षा #
गदाधर तुरन्त समझ गए कि उन्होंने क्या किया है। यह केवल उनके मन की एक निजी भूल नहीं थी। वैष्णव दृष्टि से यह एक भक्त के चरणों में किया गया अपराध था, और परम्परा ऐसे दोष को सबसे गम्भीर मानती है। इसका उपाय महाप्रभु से मिला। यहाँ स्रोत घटनाओं का क्रम थोड़ा अलग ढंग से बताते हैं। श्रील प्रभुपाद की टिप्पणी के अनुसार चैतन्य महाप्रभु ने गदाधर को सुधारा, और इसी के कारण गदाधर पुण्डरीक विद्यानिधि के शिष्य बने। चैतन्य-भागवत के विस्तृत वृत्तान्त के अनुसार, पढ़े गए श्लोक ने ही गदाधर को उनकी भूल दिखा दी। बाद में महाप्रभु ने गदाधर को सलाह दी कि इस अपराध से मुक्त होने का उपाय यह है कि वे उन्हीं से दीक्षा लें, जिनका उन्होंने गलत आकलन किया था। दोनों वृत्तान्त सभी महत्त्वपूर्ण बातों पर सहमत हैं। जब पुण्डरीक विद्यानिधि बाहरी चेतना में लौटे, तो वे फिर से शान्त थे, और उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया कि अभी क्या हुआ था। इसके बाद उन्होंने गदाधर पण्डित को दीक्षा दी, और वे जीवन भर उनके दीक्षा गुरु रहे।
जगन्नाथ पुरी में दूसरी दीक्षा #
इस कथा का अन्तिम भाग जगन्नाथ पुरी में है। कृष्णदास कविराज दर्ज करते हैं कि बाद के एक वर्ष में जब दूसरे बंगाली भक्त घर लौट गए, तब भी पुण्डरीक विद्यानिधि पुरी में ही रुके रहे। वे यह भी दर्ज करते हैं कि पुण्डरीक स्वरूप दामोदर गोस्वामी के घनिष्ठ मित्र थे, और उन्होंने गदाधर पण्डित को दूसरी बार दीक्षा दी। इसी प्रसंग में कृष्णदास कविराज एक और घटना भी दर्ज करते हैं। ओडन-षष्ठी के दिन पुण्डरीक विद्यानिधि ने देखा कि भगवान जगन्नाथ को कलफ लगा वस्त्र पहनाया गया है। इस पर उन्होंने मन में मन्दिर के सेवकों की आलोचना की। उसी रात जगन्नाथ और बलराम उनके पास आए और मुस्कुराते हुए उनके गालों पर तब तक थप्पड़ मारते रहे, जब तक गाल सूज नहीं गए। पुण्डरीक मन-ही-मन इससे बहुत प्रसन्न थे। इस प्रकार परम्परा उन्हें दोषरहित नहीं दिखाती। वह उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाती है, जिनकी भक्ति सच्ची थी, पर जिनके बाहरी रूप को देखकर लोग उनके बारे में दोनों ही तरह से गलत अनुमान लगा सकते थे।
बाह्य वैराग्य कसौटी क्यों नहीं है #
परम्परा इस प्रसंग से एक विशेष शिक्षा लेती है, और इसे आधा ही समझ लेना आसान है। शिक्षा यह नहीं है कि धन कोई योग्यता है, या वैराग्य का कोई महत्त्व नहीं है। स्वयं गदाधर पण्डित ने जीवन के अन्त तक तपस्वी जीवन जिया, और पुरी में रहने का ऐसा व्रत लिया जिसे उन्होंने कभी नहीं तोड़ा। शिक्षा यह है कि बाहरी वैराग्य किसी वैष्णव को मापने का सही तरीका नहीं है, क्योंकि वह गलत चीज़ को मापता है। मुकुन्द के श्लोक ने रेशम के नीचे छिपे किसी सादे व्यक्ति को प्रकट नहीं किया। रेशम तो सचमुच था। श्लोक ने हृदय की एक ऐसी अवस्था प्रकट की, जिसका रेशम से कोई सम्बन्ध ही नहीं था। इससे जुड़ा दोष है, किसी भक्त को उसकी बाहरी परिस्थितियों से आँकना। वैष्णव साहित्य में इसे केवल भूल नहीं, बल्कि अपराध कहा गया है। इस बात को समझाने के लिए यही घटना सबसे अधिक बार सुनाई जाती है।
ऐसा लगता है कि गदाधर ने यह शिक्षा अपने बारे में भी सीख ली थी। पुरी में जीवन के अन्तिम भाग में विद्वान वल्लभ भट्ट ने उनसे दीक्षा के लिए बहुत आग्रह किया। गदाधर ने मना कर दिया और कहा कि गुरु के रूप में कार्य करना उनके लिए सम्भव नहीं है। उन्होंने उस शिष्य को बाद में ही स्वीकार किया, जब महाप्रभु ने अनुमति दी। जो व्यक्ति कभी दूसरे वैष्णव को आँकने में बहुत जल्दी कर बैठे थे, वे अब स्वयं को आँकने में बहुत धीमे हो गए थे। पुरी में उनकी लम्बी सेवा का वर्णन यहाँ है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (5)
পুণ্ডরীক বিদ্যানিধি—বড়শাখা জানি ।
যাঁর নাম লঞা প্রভু কান্দিলা আপনি ॥ ১৪ ॥
puṇḍarīka vidyānidhi — baḍa-śākhā jāni
yāṅra nāma lañā prabhu kāndilā āpani
शब्दार्थ
puṇḍarīka vidyānidhi: Puṇḍarīka Vidyānidhi; baḍa-śākhā: another big branch; jāni: I know; yāṅra nāma: whose name; lañā: taking; prabhu: the Lord; kāndilā: cried; āpani: Himself.
पुण्डरीक विद्यानिधि, यह तीसरी बड़ी शाखा, श्री चैतन्य महाप्रभु को इतने प्रिय थे कि उनकी अनुपस्थिति में स्वयं महाप्रभु कभी-कभी रो पड़ते थे।
पुण्डरीक विद्यानिधि को तीसरी महान् शाखा कहा गया है; तात्पर्य में गदाधर के आरम्भिक गलत आकलन, महाप्रभु के सुधार, और उनके शिष्य बनने का वर्णन है।
अहो बकी यं स्तनकालकूटं
जिघांसयापाययदप्यसाध्वी ।
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं
कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥ २३ ॥
aho bakī yaṁ stana-kāla-kūṭaṁ
jighāṁsayāpāyayad apy asādhvī
lebhe gatiṁ dhātry-ucitāṁ tato ’nyaṁ
kaṁ vā dayāluṁ śaraṇaṁ vrajema
शब्दार्थ
aho: alas; bakī: the she-demon (Pūtanā); yam: whom; stana: of her breast; kāla: deadly; kūṭam: poison; jighāṁsayā: out of envy; apāyayat: nourished; api: although; asādhvī: unfaithful; lebhe: achieved; gatim: destination; dhātrī-ucitām: just suitable for the nurse; tataḥ: beyond whom; anyam: other; kam: who else; vā: certainly; dayālum: merciful; śaraṇam: shelter; vrajema: shall I take.
अहो! उस पूतना को भी, जो स्वयं कपटी थी और जिसने कृष्ण को मार डालने की इच्छा से अपने स्तन में विष लगाकर उन्हें पान कराया, माता के योग्य परम गति प्राप्त हुई। तो फिर ऐसे दयालु भगवान के अतिरिक्त मैं और किसकी शरण लूँ?
उद्धव का वह श्लोक, जिसमें उस दया का वर्णन है जिसने पूतना को धाय का पद दिया। यही श्लोक मुकुन्द दत्त ने पढ़ा था, और इसी से पुण्डरीक विद्यानिधि का बाहरी आवरण हट गया।
গদাধর-পণ্ডিতে তেঁহো পুনঃ মন্ত্র দিল ।
ওড়ন-ষষ্ঠীর দিনে যাত্রা যে দেখিল ॥ ৭৮ ॥
gadādhara-paṇḍite teṅho punaḥ mantra dila
oḍana-ṣaṣṭhīra dine yātrā ye dekhila
शब्दार्थ
gadādhara-paṇḍite: unto Gadādhara Paṇḍita; teṅho: Puṇḍarīka Vidyānidhi; punaḥ: again, the second; mantra: initiation; dila: gave; oḍana-ṣaṣṭhīra dine: on the day of performing the Oḍana-ṣaṣṭhī function; yātrā: festival; ye: indeed; dekhila: he saw.
पुण्डरीक विद्यानिधि ने गदाधर पण्डित को दूसरी बार दीक्षा दी, और ओदन-षष्ठी के दिन पुण्डरीक विद्यानिधि ने उस उत्सव को देखा।
पुण्डरीक विद्यानिधि ने जगन्नाथ पुरी में गदाधर पण्डित को दूसरी बार दीक्षा दी।
পণ্ডিতের ঠাঞি চাহে মন্ত্রাদি শিখিতে ।
পণ্ডিত কহে, — “এই কর্ম নহে আমা হৈতে ॥ ১৫০ ॥
paṇḍitera ṭhāñi cāhe mantrādi śikhite
paṇḍita kahe, — “ei karma nahe āmā haite
शब्दार्थ
paṇḍitera ṭhāñi: from Gadādhara Paṇḍita; cāhe: wanted; mantra-ādi śikhite: to be initiated; paṇḍita kahe: Gadādhara Paṇḍita said; ei karma: this work; nahe āmā haite: is not possible for me.
वल्लभ भट्ट गदाधर पण्डित से दीक्षा लेना चाहते थे, किन्तु गदाधर पण्डित ने मना करते हुए कहा, "गुरु के रूप में कार्य करना मेरे लिए सम्भव नहीं है।
गदाधर पण्डित वल्लभ भट्ट को दीक्षा देने से मना करते हैं, क्योंकि गुरु के रूप में कार्य करना उनके लिए सम्भव नहीं है।
তাহাঁই বল্লভ-ভট্ট প্রভুর আজ্ঞা লৈল ।
পণ্ডিত-ঠাঞি পূর্বপ্রার্থিত সব সিদ্ধি হৈল ॥ ১৭১ ॥
tāhāṅi vallabha-bhaṭṭa prabhura ājñā laila
paṇḍita-ṭhāñi pūrva-prārthita saba siddhi haila
शब्दार्थ
tāhāṅi: there; vallabha-bhaṭṭa: Vallabha Bhaṭṭa; prabhura ājñā: the permission of Śrī Caitanya Mahāprabhu; laila: took; paṇḍita-ṭhāñi: from Gadādhara Paṇḍita; pūrva-prārthita: as previously petitioned; saba siddhi haila: everything was perfectly executed.
वहाँ वल्लभ भट्ट ने भगवान चैतन्य महाप्रभु से अनुमति ली, और गदाधर पण्डित से दीक्षा प्राप्त करने की उनकी इच्छा इस प्रकार पूर्ण हुई।
महाप्रभु की अनुमति से वल्लभ भट्ट की दीक्षा अन्ततः स्वीकृत हुई।
अध्याय 4
टोटा गोपीनाथ की सेवा
पवित्र स्थान न छोड़ने का व्रत, समुद्र के किनारे एक उद्यान में एक विग्रह, और चौबीस वर्षों तक ऊँचे स्वर में पढ़ा गया भागवत

1510 के आरम्भ में चैतन्य महाप्रभु ने कटवा में संन्यास ग्रहण किया, और इसके कुछ समय बाद वे जगन्नाथ पुरी में बस गए। तब नवद्वीप में उनके चारों ओर बना समुदाय बिखर गया। यह समुदाय फिर से बना, लेकिन अब इसके सदस्य एक-दूसरे से दूर-दूर रहते थे। बाद में नित्यानन्द प्रभु को प्रचार के लिए बंगाल वापस भेजा गया, और उन्होंने शेष जीवन वहीं बिताया। अद्वैत आचार्य ने गंगा तट पर शान्तिपुर में अपना गृहस्थ-जीवन और अपना घर बनाए रखा। श्रीवास ठाकुर महाप्रभु के बिना नवद्वीप में रह नहीं सके, क्योंकि महाप्रभु ही वहाँ के केन्द्र थे। इसलिए वे कुमारहट्ट चले गए, और हर वर्ष रथ-यात्रा के लिए बंगाली दल के साथ दक्षिण आते थे। गदाधर पण्डित पुरी गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे।
क्षेत्र-संन्यास का व्रत #
उन्होंने इस निर्णय को औपचारिक रूप देने के लिए वह व्रत लिया, जिसे परम्परा क्षेत्र-संन्यास कहती है। यह दण्ड धारण करके घूमते रहने वाला संन्यास नहीं है। यह उस व्यक्ति का व्रत है, जो गृहस्थ-जीवन छोड़कर किसी पवित्र स्थान में, जैसे जगन्नाथ पुरी, नवद्वीप या मथुरा में, स्थायी रूप से रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता। सार्वभौम भट्टाचार्य भी पुरी में इसी व्रत के अनुसार रहते थे। भक्तिविनोद ठाकुर इसे इस युग के लिए संन्यास का सबसे उपयुक्त रूप मानते थे। कुछ वृत्तान्त बस इतना कहते हैं कि गदाधर ने संन्यास लिया। उन्होंने कभी विवाह नहीं किया था, इसलिए व्यवहार में इन दोनों बातों में बहुत थोड़ा अन्तर था। यह व्रत वास्तव में उन्हें एक स्थान से बाँधता था: वे क्षेत्र की सीमा के भीतर ही देह त्यागेंगे।

उद्यान और टोटा गोपीनाथ का विग्रह #
महाप्रभु ने इसके साथ उन्हें एक सेवा भी दी। कृष्णदास कविराज दर्ज करते हैं कि गदाधर पण्डित भगवान के पास ही रहे, और उन्हें जगन्नाथ मन्दिर के दक्षिण-पश्चिम में यमेश्वर में रहने का स्थान दिया गया। वहाँ एक छोटा-सा उद्यान था और बालू का एक तट था, जिसे यमेश्वर टोटा कहते थे। टोटा शब्द का अर्थ बस उद्यान है। उनकी देखरेख वाले विग्रह का नाम इसी उद्यान से पड़ा: टोटा गोपीनाथ, अर्थात् उद्यान के गोपीनाथ। अगले चौबीस वर्षों तक उस विग्रह की सेवा ही गदाधर पण्डित का पूरा बाहरी कार्य रहा। चैतन्य-भागवत इससे जुड़ी एक घरेलू कथा बताता है। जब गदाधर ने सुना कि नित्यानन्द प्रभु पुरी आए हैं, तो उन्होंने उन्हें विग्रह का प्रसाद पाने के लिए बुलाया। नित्यानन्द भोग के लिए बंगाल से बढ़िया चावल लाए। गदाधर ने उसे अपने ही उद्यान की भाजी और सब्ज़ियों के साथ पकाया। जब भोग अर्पित किया जा रहा था, तभी महाप्रभु बिना बताए आ पहुँचे, और इस प्रकार तीनों ने साथ बैठकर प्रसाद पाया।

भगवान को भागवत पढ़कर सुनाना #
दूसरी सेवा थी पाठ करना, और पुरी के वर्ष मुख्य रूप से इसी के लिए याद किए जाते हैं। महाप्रभु एक मील दूर काशी मिश्र के घर के उन कमरों में रहते थे, जिन्हें आगे चलकर गम्भीरा कहा गया। वे नियमित रूप से गदाधर पण्डित से भागवत का पाठ सुनने आते थे। गदाधर उन्हें पढ़ा नहीं रहे थे। वे ऐसे श्रोता को पढ़कर सुना रहे थे, जो उस ग्रन्थ को उनसे कहीं अधिक अच्छी तरह जानते थे। इस पाठ का उद्देश्य एक भाव जगाना था। परम्परा उन सभाओं की एक बात याद रखती है। वृत्तान्तों के अनुसार पाठ करते समय गदाधर लगातार रोते रहते थे। कहा जाता था कि अन्त में उनके आँसुओं से उनके हाथ की पाण्डुलिपि के अक्षर धुल गए, और वह पढ़ने योग्य नहीं रही। चाहे कोई इसे भौतिक तथ्य माने, या भक्तों का यह बताने का ढंग माने कि वह पाठ कैसा था, गौड़ीय जगत गदाधर पण्डित का यही चित्र अपने मन में रखता है। इस चित्र में वे एक उद्यान में बैठे ऐसी पुस्तक पढ़ रहे हैं, जिसके अक्षर वे अब देख नहीं सकते, और ऐसे श्रोता को सुना रहे हैं, जिन्हें उसकी कोई आवश्यकता नहीं है।
टूटा हुआ व्रत और कटक में विदाई #
यह व्रत उनके लिए कितना कठिन था, यह एक घटना से पता चलता है, और कृष्णदास कविराज इसे विस्तार से बताते हैं। 1516 में महाप्रभु वृन्दावन जाने के उद्देश्य से पुरी से निकले। गदाधर पण्डित भी उनके साथ चलने लगे, लेकिन उन्हें रोक दिया गया। उन्हें अपना क्षेत्र-संन्यास नहीं छोड़ना था। उन्होंने उत्तर दिया कि भगवान जहाँ ठहरें, वहीं जगन्नाथ पुरी है, और उनका तथाकथित व्रत नरक में जाए। जब उनसे कहा गया कि वे रुककर गोपीनाथ की सेवा करें, तो उन्होंने उत्तर दिया कि भगवान के चरणों का दर्शन मात्र करना ही गोपीनाथ की लाखों गुनी सेवा है। उन्हें दल के साथ यात्रा करने की अनुमति नहीं मिली। इसलिए वे अकेले चलते रहे, दल के साथ-साथ लेकिन उससे अलग। कटक में भगवान ने उन्हें अपने पास बुला लिया। कृष्णदास कविराज कहते हैं कि इन दोनों के बीच के प्रेम को कोई नहीं समझ सकता। वे यह भी कहते हैं कि गदाधर ने अपना व्रत और विग्रह-सेवा ऐसे छोड़ दी, जैसे कोई तिनका फेंक देता है। महाप्रभु प्रसन्न थे, लेकिन यह दिखाना नहीं चाहते थे। उन्होंने गदाधर का हाथ पकड़ा और प्रेम भरे क्रोध में उनसे बात की। उन्होंने कहा कि व्रत टूट गया है और सेवा छूट गई है, और पूछा कि गदाधर अपना सुख चाहते हैं या भगवान का। फिर वे नाव में बैठ गए, और गदाधर पण्डित तट पर अचेत होकर गिर पड़े। सार्वभौम भट्टाचार्य को उन्हें होश में लाने के लिए छोड़ा गया। उन्होंने गदाधर से उठने को कहा, क्योंकि भगवान की लीलाएँ ऐसी ही होती हैं, और वे उन्हें वापस पुरी ले गए। ग्रन्थ कहता है कि वे दोनों शोक से भरे हुए थे।
इस घटना पर भगवान ने अपना निर्णय बाद में सुनाया, जब यात्रा छोड़ दी गई थी और वे पुरी लौट आए थे। उन्होंने सबके सामने कहा कि वे गदाधर पण्डित को पीछे छोड़ गए थे, और इससे गदाधर दुःखी हो गए थे। महाप्रभु ने कहा कि इसी कारण वे स्वयं वृन्दावन नहीं जा सके।
वल्लभ भट्ट और भगवान की बनावटी शीतलता #
यहाँ एक और प्रसंग आता है, क्योंकि परम्परा इसी से गदाधर के स्वभाव को समझाती है। पुरी के अन्तिम वर्षों में वेदान्ती वल्लभ भट्ट आए। उन्होंने देखा कि महाप्रभु उनकी विद्वत्ता में रुचि नहीं ले रहे, इसलिए वे गदाधर से मित्रता बढ़ाने लगे। वे बार-बार आते और गदाधर को अपनी टीका विस्तार से पढ़कर सुनाते, चाहे गदाधर सुनना चाहें या नहीं। महाप्रभु ने यह जताया कि वे गदाधर से भी अप्रसन्न हैं। गदाधर ने कुछ भी गलत नहीं किया था, फिर भी वे बहुत डर गए। कृष्णदास कविराज बताते हैं कि भगवान क्या कर रहे थे। वे गदाधर का प्रेम भरा क्रोध देखना चाहते थे, लेकिन कभी उसे जगा नहीं पाए। गदाधर को सदा यह ध्यान रहता था कि महाप्रभु कौन हैं, और यही जागरूकता उस क्रोध को कभी आने नहीं देती थी। ग्रन्थ कहता है कि उनका प्रेम वैसा था, जैसा रुक्मिणी का कृष्ण के प्रति था: इतना श्रद्धापूर्ण कि उसमें झगड़े के लिए स्थान नहीं था। इसलिए भगवान ने इसके बजाय उनसे रूखे होने का अभिनय किया। गदाधर उनके चरणों में रो पड़े, भगवान ने उन्हें गले लगा लिया, और सारी बात वहीं समाप्त हो गई। यह एक छोटा-सा घरेलू प्रसंग है। फिर भी इसी प्रसंग के कारण महाप्रभु के दो नाम गदाधर-प्राणनाथ और गदाई-गौरांग पड़े।
पुरी के वर्षों का सार क्या था #
गौड़ीय वैष्णव पुरी के वर्षों को एक विशेष प्रकार के धार्मिक जीवन का आदर्श मानते हैं। गदाधर पण्डित ने किसी को उपदेश नहीं दिया, किसी का धर्म नहीं बदलवाया, अपने नाम से कोई ऐसा ग्रन्थ नहीं लिखा जो आज तक बचा हो, और कटक तक की उस एक यात्रा को छोड़कर वे कभी पुरी से बाहर नहीं गए। धार्मिक जीवन को मापने के सामान्य मापदण्डों से देखें, तो उनके पास दिखाने को कुछ भी नहीं था। उन्होंने विग्रह की सेवा की, भोजन पकाया, पाठ किया, और बस वहीं रहे। कृष्णदास कविराज उनके जीवन का सार यह कहकर देते हैं कि वे अपने सौम्य आचरण, ब्राह्मण-गुणों और स्थिर प्रेम के लिए सब जगह प्रसिद्ध थे। इन शब्दों में परम्परा अपना सोचा-समझा निर्णय देती है कि इतना ही पर्याप्त था। उन वर्षों के अन्त में क्या हुआ, यह यहाँ बताया गया है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (5)
গদাধর-পণ্ডিত রহিলা প্রভুর পাশে ।
যমেশ্বরে প্রভু যাঁরে করাইলা আবাসে ॥ ১৮৩ ॥
gadādhara-paṇḍita rahilā prabhura pāśe
yameśvare prabhu yāṅre karāilā āvāse
शब्दार्थ
gadādhara-paṇḍita: Gadādhara Paṇḍita; rahilā: remained; prabhura pāśe: along with Śrī Caitanya Mahāprabhu; yameśvare: at Yameśvara; prabhu: Śrī Caitanya Mahāprabhu; yāṅre: unto whom; karāilā: made to take; āvāse: residence.
गदाधर पण्डित श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ ही रहे, और उन्हें यमेश्वर में रहने के लिए एक स्थान दिया गया।
गदाधर पण्डित भगवान के साथ रहे और उन्हें यमेश्वर में एक निवास दिया गया; तात्पर्य में यमेश्वर टोटा नामक उद्यान और तट का वर्णन है।
গদাধর-পণ্ডিত যবে সঙ্গেতে চলিলা ।
ক্ষেত্র-সন্ন্যাস না ছাড়িহ’ — প্রভু নিষেধিলা ॥ ১৩০ ॥
gadādhara-paṇḍita yabe saṅgete calilā
‘kṣetra-sannyāsa nā chāḍiha’ — prabhu niṣedhilā
शब्दार्थ
gadādhara-paṇḍita: Gadādhara Paṇḍita; yabe: when; saṅgete: with Śrī Caitanya Mahāprabhu; calilā: started to go; kṣetra-sannyāsa: the renounced order of life at a holy place of pilgrimage; nā chāḍiha: do not give up; prabhu niṣedhilā: Lord Śrī Caitanya Mahāprabhu forbade.
जब गदाधर पण्डित भगवान के साथ जाने लगे, तो उन्हें रोक दिया गया और अपना क्षेत्र-संन्यास व्रत न त्यागने को कहा गया।
गदाधर को भगवान के साथ जाने से रोका गया और अपना क्षेत्र-संन्यास व्रत न त्यागने को कहा गया; तात्पर्य में उस व्रत की परिभाषा दी गई है।
পণ্ডিতের গৌরাঙ্গ-প্রেম বুঝন না যায় ।
প্রতিজ্ঞা’, ‘শ্রীকৃষ্ণ-সেবা’ ছাড়িল তৃণপ্রায় ॥ ১৩৭ ॥
paṇḍitera gaurāṅga-prema bujhana nā yāya
‘pratijñā’, ‘śrī-kṛṣṇa-sevā’ chāḍila tṛṇa-prāya
शब्दार्थ
paṇḍitera: of Gadādhara Paṇḍita; gaurāṅga-prema: the love for Śrī Caitanya Mahāprabhu; bujhana: understanding; nā yāya: is not possible; pratijñā: a vow; śrī-kṛṣṇa-sevā: the service of the Lord; chāḍila: gave up; tṛṇa-prāya: almost like straw.
गदाधर पण्डित और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच के प्रेमपूर्ण आत्मीय सम्बन्ध को कोई नहीं समझ सकता। गदाधर पण्डित ने अपना व्रत और गोपीनाथ की सेवा उसी प्रकार त्याग दी जैसे कोई तिनके को त्याग देता है।
उन दोनों के बीच की आत्मीयता को कोई नहीं समझ सकता; गदाधर ने व्रत और सेवा को तिनके की भाँति त्याग दिया।
গদাধরে ছাড়ি’ গেনু, ইঁহো দুঃখ পাইল ।
সেই হেতু বৃন্দাবন যাইতে নারিল ॥” ২৭৮ ॥
gadādhare chāḍi’ genu, iṅho duḥkha pāila
sei hetu vṛndāvana yāite nārila
शब्दार्थ
gadādhare chāḍi’: leaving aside Gadādhara Paṇḍita; genu: I went; iṅho: Gadādhara Paṇḍita; duḥkha pāila: became unhappy; sei hetu: for that reason; vṛndāvana: to Vṛndāvana-dhāma; yāite nārila: I was unable to go.
"मैंने गदाधर पण्डित को यहाँ छोड़ दिया, और वे अत्यन्त दुःखी हो गए। इसी कारण मैं वृन्दावन नहीं जा सका।"
भगवान का अपना यह कथन कि वे वृन्दावन नहीं जा सके क्योंकि गदाधर दुःखी हो गए थे।
পণ্ডিতের সৌজন্য, ব্রহ্মণ্যতা-গুণ ।
দৃঢ় প্রেমমুদ্রা লোকে করিলা খ্যাপন ॥ ১৬৬ ॥
paṇḍitera saujanya, brahmaṇyatā-guṇa
dṛḍha prema-mudrā loke karilā khyāpana
शब्दार्थ
paṇḍitera saujanya: the gentle behavior of Gadādhara Paṇḍita; brahmaṇyatā-guṇa: the attributes of a perfect brāhmaṇa; dṛḍha: firm; prema-mudrā: characteristic of love; loke: people; karilā khyāpana: proclaimed.
गदाधर पण्डित सम्पूर्ण विश्व में अपने सौम्य आचरण, अपने ब्राह्मण-गुणों और श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति अपने स्थिर प्रेम के लिए विख्यात हैं।
गदाधर पण्डित सौम्य आचरण, ब्राह्मण-गुणों और स्थिर प्रेम के लिए विख्यात, उनके जीवन का सार-निर्णय।
अध्याय 5
गदाधर पण्डित का अन्तर्धान
भगवान के ग्यारह मास पश्चात्, उसी उद्यान में जहाँ उन्होंने सेवा की थी, लगभग उनचास वर्ष की आयु में

श्री चैतन्य महाप्रभु की प्रकट लीलाएँ सन् 1534 में जगन्नाथ पुरी में समाप्त हुईं। उस समय वे अपने अड़तालीसवें वर्ष में थे। यह कैसे हुआ, इस विषय में परम्परा बहुत कम बताती है। कृष्णदास कविराज के पास इसका वर्णन करने का पूरा कारण था, और वे उन लोगों से बात भी कर सकते थे जो उस समय वहाँ उपस्थित थे। फिर भी उन्होंने महाप्रभु के प्रस्थान का वर्णन किए बिना ही चैतन्य-चरितामृत को समाप्त कर दिया। जो वृत्तान्त प्रचलित हैं, उनके भी एक से अधिक रूप हैं। कुछ के अनुसार यह समुद्र में हुआ, कुछ के अनुसार गुण्डिचा मन्दिर में, और कुछ कहते हैं कि महाप्रभु भगवान जगन्नाथ में समा गए। गौड़ीय परम्परा में जो वृत्तान्त मानक बन गया है, वही भक्तिविनोद ठाकुर भी देते हैं। इसके अनुसार, अठारह वर्ष अधिकतर काशी मिश्र के घर में बिताने के बाद महाप्रभु टोटा गोपीनाथ के मन्दिर में संकीर्तन के समय अन्तर्धान हो गए। अर्थात् वे उसी उद्यान में अन्तर्धान हुए, जहाँ गदाधर पण्डित ने चौबीस वर्षों तक विग्रह की सेवा की थी, और उसी विग्रह के सामने, जो महाप्रभु ने उन्हें दिया था।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| अन्तर्धान की तिथि | शक 1456 के ज्येष्ठ मास की अमावस्या, अर्थात् 1535 |
| स्थान | जगन्नाथ पुरी |
| आयु | लगभग उनचास वर्ष (वे लगभग भगवान की ही आयु के थे, और उनके ग्यारह मास बाद गए) |
| महाप्रभु के बाद का समय | लगभग ग्यारह मास |
| अवशेष | वृन्दावन में वंशी गोपाल मन्दिर के निकट एक समाधि में प्रतिष्ठित एक दन्त-अवशेष |
वियोग के मास #
महाप्रभु का प्रस्थान चाहे जैसे भी हुआ हो, पीछे रह गए गदाधर पण्डित। इसके बाद के महीनों के विषय में स्रोत जो कुछ बताते हैं, उन सबका सार एक ही है। वे इस दुःख से उबर नहीं पाए, और उन्होंने उबरने का प्रयास भी नहीं किया। नरहरि चक्रवर्ती ने बाद में भक्ति-रत्नाकर में उनका वर्णन किया है। उसमें गदाधर पण्डित एक वृद्ध पुरुष की तरह आँखें बन्द किए बैठे हैं और गौरसुन्दर का नाम दोहरा रहे हैं। उनकी साँस अग्नि की तरह गर्म चलती थी और उनका शरीर मुश्किल से हिलता था। नरहरि उनके अब तक जीवित रहने का केवल एक ही कारण बताते हैं। वे श्रीनिवास आचार्य को अपनी कृपा देने की प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीनिवास वह युवा वैष्णव थे, जो आगे चलकर गौड़ीय साहित्य को बंगाल वापस ले जाने वाले थे। भक्ति-रत्नाकर का निष्कर्ष यह है कि उस वियोग में गदाधर पण्डित ने क्या सहा, यह भगवान के सिवा और कोई नहीं जान सकता।
टोटा गोपीनाथ बैठे हुए विग्रह क्यों हैं #
वे लगभग भगवान की ही आयु के थे, इसलिए महाप्रभु के प्रस्थान के समय वे लगभग अड़तालीस वर्ष के थे। वृत्तान्त कहते हैं कि बचे हुए समय में वे बहुत जल्दी वृद्ध हो गए। इसी समय से जुड़ी विग्रह की एक परम्परा है, जो तीर्थयात्रियों को बहुत प्रिय है। इसे उसके सही रूप में ही बताना चाहिए: यह एक स्थानीय मन्दिर-परम्परा है, और इस पर मतभेद भी है। कहा जाता है कि गदाधर इतने दुर्बल हो गए थे कि वे गोपीनाथ के गले में माला डालने के लिए अपनी भुजाएँ पर्याप्त ऊँची नहीं उठा पाते थे। इसलिए अपने सेवक की सेवा सम्भव बनाने के लिए विग्रह स्वयं बैठ गए। टोटा गोपीनाथ वास्तव में कृष्ण का बैठा हुआ रूप हैं। ऐसा रूप इतना दुर्लभ है कि दर्शन करने वालों का ध्यान तुरन्त इस पर जाता है। मन्दिर इसकी यही व्याख्या देता है।
पुरी में उनका अन्तर्धान #
गदाधर पण्डित महाप्रभु के बाद लगभग ग्यारह मास तक जीवित रहे। वे शक वर्ष 1456 के ज्येष्ठ मास की अमावस्या को, अर्थात् 1535 में, पुरी में अन्तर्धान हो गए। कुछ वृत्तान्त कहते हैं कि वे अपने विग्रह में प्रवेश कर गए, जैसा माना जाता है कि उनसे पहले भगवान ने भी किया था। उनका एक दन्त-अवशेष वृन्दावन में वंशी गोपाल मन्दिर के निकट एक समाधि में प्रतिष्ठित है।
श्रीनिवास आचार्य को कृपा प्रदान करने की प्रतीक्षा #
यहाँ श्रीनिवास आचार्य के बारे में थोड़ा बताना आवश्यक है, क्योंकि वे दो युगों को जोड़ने वाली कड़ी हैं। श्रीनिवास बंगाल के एक युवक थे, जो महाप्रभु के पार्षदों से मिलने निकले थे। लेकिन वे हर बार देर से पहुँचे। भक्ति-रत्नाकर में अधिकतर इन्हीं छूटी हुई भेंटों का वर्णन है। जब वे पुरी पहुँचे, तो महाप्रभु जा चुके थे और समुद्र के किनारे हरिदास ठाकुर की समाधि पहले से बनी हुई थी। कहा जाता है कि गदाधर पण्डित विशेष रूप से उन्हीं की प्रतीक्षा में जीवित रहे। यह परम्परा का यह बताने का ढंग है कि शिक्षा को आगे सौंपने का क्रम टूटा नहीं। नवद्वीप-मण्डल के अन्तिम सदस्य गदाधर पण्डित ने जान-बूझकर अगली पीढ़ी को कुछ सौंपा। यही पीढ़ी वृन्दावन के साहित्य को एकत्र करके बंगाल वापस ले जाने वाली थी।
गदाधर परिवार और उसके विवादित दावे #
वे अपने पीछे एक परम्परा छोड़ गए। गदाधर परिवार चैतन्य महाप्रभु से चली पारम्परिक शाखाओं में से एक है, जो अद्वैत परिवार और अन्य शाखाओं की तरह आज तक बिना टूटे चली आ रही है। यह परम्परा उनके जिन शिष्यों से आगे चली, उनमें भूगर्भ गोस्वामी के बारे में सबसे अधिक जानकारी दर्ज है। इस परम्परा के कुछ लोग मानते हैं कि रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी ने स्वयं गदाधर पण्डित से दीक्षा ली थी। इसके प्रमाण में वे साधन-दीपिका के एक श्लोक का और गदाधराष्टक के रचयिता के बारे में दी गई जानकारी का उल्लेख करते हैं। लेकिन दूसरे लोग, जिनमें इस दावे के पक्ष में झुकाव रखने वाले विद्वान भी शामिल हैं, मानते हैं कि यह प्रमाण निर्णायक नहीं है। वे यह भी मानते हैं कि अधिक प्रचलित मत के अनुसार रूप और सनातन की दीक्षा कहीं और हुई थी। इसलिए इस प्रश्न को खुला छोड़ना ही ईमानदारी है। जिस बात पर कोई विवाद नहीं है, वह यह है कि बंगाल के बहुत-से मन्दिरों की मुख्य वेदी पर केवल गौरांग की नहीं, बल्कि गौर-गदाधर की पूजा होती है। यह भी कहा जाता है कि वृन्दावन में स्थापित श्रीमती राधारानी का पहला विग्रह उन्हीं ने वहाँ भेजा था।
विरह और उन महीनों का अर्थ #
गौड़ीय चिन्तन में उन ग्यारह महीनों का अपना एक स्थान है, जिस पर ध्यान न जाना सरल है। इस परम्परा में वियोग, अर्थात् विरह, को भक्ति की विफलता नहीं माना जाता। बल्कि इसे भक्ति की सबसे तीव्र अवस्था माना जाता है। इस आन्दोलन का साहित्य अधिकतर वियोग का ही साहित्य है। गम्भीरा में महाप्रभु के अपने अन्तिम वर्षों का वर्णन भी ठीक इसी भाव में किया गया है, और वृन्दावन में गोस्वामियों के गीतों का भी। इसलिए जब नरहरि चक्रवर्ती 1534 और 1535 में गदाधर पण्डित की दशा का वर्णन करते हैं, तो परम्परा उसमें ऐसे टूटे हुए वृद्ध को नहीं देखती, जो अपना दुःख सह न सका। वह उसमें वही सम्बन्ध देखती है, जो तब भी चल रहा था, बस उस एकमात्र रूप में जो उसके लिए बचा था, अर्थात् विरह के रूप में। यह व्याख्या कोई माने या न माने, लेकिन इसी कारण परम्परा उन ग्यारह महीनों को दर्ज करती है। वह उन्हें एक दुःखद अन्त मानकर छोड़ नहीं देती।
परम्परा उनमें क्या सम्मानित करती है #
परम्परा उनमें जिस बात का सम्मान करती है, वह सामान्य बात नहीं है। इसलिए उसे साफ-साफ कहना उचित है। गदाधर पण्डित ने कोई संस्था स्थापित नहीं की। उनके नाम से लिखा हुआ कुछ भी आज तक नहीं पहुँचा। उन्होंने किसी को उपदेश नहीं दिया और 1510 के बाद कहीं यात्रा नहीं की। किसी धार्मिक जीवन को मापने के सामान्य मापदण्डों से देखें, तो उनके पास दिखाने के लिए कुछ भी नहीं था। वे महाप्रभु के ठीक समवयस्क और पड़ोसी थे। महाप्रभु जहाँ गए, वे भी वहाँ गए। जब महाप्रभु स्वयं को नोचते थे, तब उन्होंने उनके हाथ थामे। उन्होंने महाप्रभु को पढ़कर सुनाया, उनके लिए भोजन पकाया, और सदा उनके साथ बने रहे। एक बार इस क्रम को तोड़कर भगवान के साथ वृन्दावन जाने का अवसर आया। गदाधर ने उसे तुरन्त स्वीकार किया, लेकिन उन्हें वापस भेज दिया गया। बाद में भगवान ने सबके सामने कहा कि गदाधर का दुःख ही वह कारण था, जिससे वह यात्रा कभी नहीं हो सकी।
गौड़ीय सिद्धान्त इस बात को यह कहकर समझाता है कि ह्लादिनी शक्ति, अर्थात् भगवान की आनन्द-शक्ति, यही करती है। पञ्च-तत्त्व के तीन प्रधान तत्त्व पूज्य हैं, और चौथा तत्त्व उपासक है। श्री चैतन्य महाप्रभु एक विशेष प्रेम का स्वाद लेने के लिए संसार में आए थे। उस प्रेम का स्वाद किसी के माध्यम से ही लिया जाना था। यह स्वाद किसी सिद्धान्त के माध्यम से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के माध्यम से लिया जाता है। वह व्यक्ति एक ओर खड़ा रहता है और बिना किसी दिखावे के बहुत लम्बे समय तक छोटे-छोटे कार्य भली-भाँति करता रहता है। संसार भर के गौड़ीय वैष्णव महामन्त्र से पहले पञ्च-तत्त्व मन्त्र का जप करते हैं। जब भी यह मन्त्र जपा जाता है, गदाधर का नाम पाँचों में चौथा होता है। यह वही स्थान है, जो उनके सम्पूर्ण जीवन में रहा: भगवान के बाद, भक्तों से पहले, और किसी भी छोर पर नहीं।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (4)
এই ত’ কহিলুঁ হরিদাসের বিজয় ।
যাহার শ্রবণে কৃষ্ণে দৃঢ়ভক্তি হয় ॥ ১০১ ॥
ei ta’ kahiluṅ haridāsera vijaya
yāhāra śravaṇe kṛṣṇe dṛḍha-bhakti haya
शब्दार्थ
ei ta’: thus; kahiluṅ: I have spoken; haridāsera: of Haridāsa Ṭhākura; vijaya: victory; yāhāra śravaṇe: by hearing which; kṛṣṇe: unto Lord Kṛṣṇa; dṛḍha-bhakti: firm devotional service; haya: becomes.
इस प्रकार मैंने हरिदास ठाकुर के विजयी महाप्रयाण के विषय में कहा है। जो कोई भी इस वर्णन को सुनेगा, वह निश्चय ही अपने मन को कृष्ण की भक्ति-सेवा में दृढ़तापूर्वक स्थिर कर लेगा।
तात्पर्य में जगन्नाथ पुरी के टोटा गोपीनाथ मन्दिर और उसके तथा समुद्र के बीच की भूमि का स्थान बताया गया है। यही अन्तिम वर्षों की पृष्ठभूमि है।
তাঁর শিষ্য–উপশিষ্য,—তাঁর উপশাখা ।
এইমত সব শাখা–উপশাখার লেখা ॥ ১৬ ॥
tāṅra śiṣya-upaśiṣya, — tāṅra upaśākhā
eimata saba śākhā-upaśākhāra lekhā
शब्दार्थ
tāṅra: his; śiṣya: disciples; upaśiṣya: granddisciples and admirers; tāṅra: his; upaśākhā: subbranches; eimata: in this way; saba: all; śākhā: branches; upaśākhāra: subbranches; lekhā: to describe by writing.
उनके शिष्य और प्रशिष्य उनकी उप-शाखाएँ हैं। उन सबका वर्णन करना कठिन होगा।
गदाधर पण्डित के शिष्य और प्रशिष्य उनकी उप-शाखाएँ हैं। ये इतनी अधिक हैं कि उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। यही गदाधर परिवार का शास्त्रीय आधार है।
এই তিন তত্ত্ব,—‘সর্বারাধ্য’ করি মানি ।
চতুর্থ যে ভক্ততত্ত্ব,—‘আরাধক’ জানি ॥ ১৫ ॥
ei tina tattva, — ‘sarvārādhya’ kari māni
caturtha ye bhakta-tattva, — ‘ārādhaka’ jāni
शब्दार्थ
ei tina tattva: all three of these truths; sarva-ārādhya: worshipable by all living entities; kari māni: accepting such; caturtha: fourth; ye: who is; bhakta-tattva: in the category of devotees; ārādhaka: worshiper; jāni: I understand.
तीन प्रधान तत्त्व [चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु और अद्वैत प्रभु] समस्त जीवों द्वारा पूज्य हैं, और चतुर्थ तत्त्व [श्री गदाधर प्रभु] को उनके उपासक के रूप में समझा जाना चाहिए।
तीन प्रधान तत्त्व पूज्य हैं और चौथा तत्त्व उनका उपासक है। यही गदाधर के सम्पूर्ण जीवन का सैद्धान्तिक सार है।
শ্রীচৈতন্য, নিত্যানন্দ, অদ্বৈত,—তিন জন ।
শ্রীবাস–গদাধর–আদি যত ভক্তগণ ॥ ১৬৯ ॥
śrī-caitanya, nityānanda, advaita, — tina jana
śrīvāsa-gadādhara-ādi yata bhakta-gaṇa
शब्दार्थ
śrī-caitanya, nityānanda, advaita: Śrī Caitanya Mahāprabhu, Nityānanda Prabhu and Advaita Prabhu; tina: these three; jana: personalities; śrīvāsa-gadādhara: Śrīvāsa and Gadādhara; ādi: etc.; yata: all; bhakta-gaṇa: the devotees.
पञ्च-तत्त्व महामन्त्र का जप करते समय श्री चैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैत, गदाधर और श्रीवास के नाम उनके अनेक भक्तों सहित लेने चाहिए। यही विधि है।
पञ्च-तत्त्व मन्त्र, जिसमें महामन्त्र से पहले गदाधर का नाम चौथे स्थान पर जपा जाता है।
उपसंहार
नवद्वीप में प्राकट्य और बाल्यकाल #
उनका प्राकट्य लगभग 1486 में नवद्वीप में हुआ, उसी वर्ष जिसमें महाप्रभु प्रकट हुए। वे माधव मिश्र और रत्नावती देवी के पुत्र थे। उनका परिवार चट्टग्राम से आया था। वे और निमाई पास-पास रहते थे और ठीक एक ही आयु के थे। जीवनियाँ बताती हैं कि वे पहले साथ खेलते थे और फिर साथ पढ़ते थे। लेकिन बचपन से ही गदाधर का स्वभाव बिल्कुल अलग था। निमाई प्रतिभाशाली थे, उन्हें तर्क करना अच्छा लगता था और वे शब्दों की लड़ाई के लिए सदा तैयार रहते थे। गदाधर सौम्य और शान्त थे, और उनमें तभी से भक्ति थी। जब निमाई गलियों में पण्डितों को शास्त्रार्थ में हरा रहे होते थे, तब गदाधर नगर के वृद्ध वैष्णवों की संगति की ओर खिंचे चले जाते थे।

पुण्डरीक विद्यानिधि से दीक्षा #
उन्होंने पुण्डरीक विद्यानिधि से दीक्षा प्राप्त की। चैतन्य-भागवत (मध्य-खण्ड, अध्याय 7) यह प्रसंग विस्तार से बताता है, और श्रील प्रभुपाद ने चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 10.14 के अपने तात्पर्य में इसका सार दिया है। जब गदाधर पहली बार पुण्डरीक विद्यानिधि से मिले, तो वे निराश हुए। पुण्डरीक विद्यानिधि बहुत वैभव में रहते थे और संसार त्यागने वाले व्यक्ति जैसे नहीं दिखते थे। लेकिन महाप्रभु ने गदाधर की इस धारणा को सुधारा। उन्होंने बताया कि पुण्डरीक के बाहरी वैभव के नीचे गहरी भक्ति छिपी है। गदाधर को अपनी भूल पर पछतावा हुआ, और उन्होंने विनम्र होकर पुण्डरीक विद्यानिधि को अपना दीक्षा गुरु स्वीकार किया। परम्परा बार-बार इस शिक्षा पर लौटती है कि बाहरी वैराग्य किसी वैष्णव को परखने की कसौटी नहीं है।
भगवान के साथ जगन्नाथ पुरी जाना #
जब महाप्रभु ने संन्यास स्वीकार कर नवद्वीप त्याग दिया, तब गदाधर पण्डित उनके साथ चले गए और फिर कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। वे जगन्नाथ पुरी में बस गए और शेष जीवन वहीं टोटा गोपीनाथ की विग्रह-सेवा करते हुए रहे। पुरी में उनकी यह निरन्तर उपस्थिति उन्हें बाकी सबसे अलग करती है। नित्यानन्द प्रभु को प्रचार के लिए बंगाल भेजा गया। अद्वैत आचार्य ने शान्तिपुर में अपना गृहस्थ-जीवन बनाए रखा। श्रीवास ठाकुर हर वर्ष बंगाली भक्तों के दल के साथ आते-जाते रहे। लेकिन गदाधर वहीं रहे। वैष्णव इसे भगवान की अपनी ह्लादिनी शक्ति का स्वाभाविक आचरण मानते हैं, जो भगवान से कभी दूर नहीं जाती।
चैतन्य-चरितामृत आदि 10.15 यह पहचान स्पष्ट शब्दों में बताता है: "चौथी शाखा, गदाधर पण्डित, को श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति का अवतार बताया गया है। इसलिए कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता।" अपने तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद इसका प्रमाण कवि कर्णपूर की गौर-गणोद्देश-दीपिका (श्लोक 147) से देते हैं:
श्रीराधा प्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी ।
सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः ॥
"श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति, जो पहले वृन्दावनेश्वरी के नाम से जानी जाती थीं, अब भगवान चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में श्री गदाधर पण्डित के रूप में प्रकट हैं।" (गौर-गणोद्देश-दीपिका 147, श्रील प्रभुपाद द्वारा चैतन्य-चरितामृत आदि 10.15 के तात्पर्य में अनूदित)
आँसुओं से घिसा हुआ भागवत #
महाप्रभु के साथ गदाधर का सम्बन्ध विशेष रूप से आत्मीय था। पुरी के अन्तिम वर्षों में महाप्रभु गदाधर पण्डित को ही कृष्ण-कथा पढ़कर सुनाते थे और उनसे कृष्ण की बातें करते थे। वर्णन है कि वियोग की रातों में गदाधर भी उनके साथ रोते थे। कहा जाता है कि उन्होंने महाप्रभु को भागवत इतनी बार पढ़कर सुनाया कि पाण्डुलिपि के अक्षर गदाधर के आँसुओं से घिस गए।
टोटा गोपीनाथ और उनकी स्मृति किस रूप में शेष है #
पुरी में गदाधर पण्डित टोटा गोपीनाथ के विग्रह की सेवा करते थे। परम्परा के अनुसार, श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसी विग्रह के सामने अपनी प्रकट लीलाओं का समापन किया था। गदाधर इसके बाद अधिक समय तक इस संसार में नहीं रहे। गौड़ीय वैष्णव उन्हें स्थिर, शान्त और आजीवन सेवा के आदर्श के रूप में सम्मान देते हैं। वे ऐसे भक्त थे, जिन्होंने न दूर-दूर तक प्रचार किया, न विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ लिखे। उनकी विशेषता बस इतनी है कि वे एक बार भी महाप्रभु से दूर नहीं गए।
आगे पढ़ें #
उनके चरित्र पर एक भक्तिपूर्ण चिन्तन भी उपलब्ध है, श्री गदाधर पण्डित: भक्ति का कोमल हृदय।
