'गौराङ्ग' बोलिते हबे
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
श्रीमान जय शचीनन्दन प्रभु की 157 रिकॉर्डिंग। ऑडियो इस्कॉन डिज़ायर ट्री के सौजन्य से चलता है।
157 भजन · पृष्ठ 1 / 4
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
'राधा-कृष्ण' बोल् बोल् बोलो रे सोबाइ
अक्रोध परमानन्द नित्यानन्द राय्
अनादि' करम-फले, पडि' भवार्णर जले,
दीव्यद्-वृन्दारण्य-कल्प-द्रुमाधः
अम्बुदाञ्जनेन्द्र-नील-निन्दि-कान्ति-डम्बरः
अरे भाइ! भज मोर गौराङ्ग-चरण
अवतार-सार, गोरा-अवतार, केन ना भजिलि ता'रे
आत्म-निवेदन, तुवा पदे कोरि’,
आमार जीवन, सदा पापे रत,
आमार निताइ मिले ना भोला मन
(आमि) जमुना-पुलिने, कदम्ब-कानने,
आमि तो' दुर्जन अति सदा दुराचार
आर केनो माया-जाले पर्डितेछो जीब-मीन
ईश्वरः परमः कृष्णः
उग्रं वीरं महा-विष्णुं
उज्ज्वल-वरण-गौर-वर-देहं
उदिलो अरुण पूरब-भागे,
एइ-बारो करुणा कोरो वैष्णव गोसाइ
एखोन बुझिनु प्रभु! तोमार चरण
(प्रभु हे!)
ओरे मन भालो नाहि लागे ए सोंसार
ओहे!
कदाचित् कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीतक-रवो
कबे गौर-बने, सुरधुनी-तटे,
कबे मुइ बैष्णबे चिनिबो हरि हरि
कबे श्री-चैतन्य मोरे कोरिबेन दोया
कबे ह'बे बोलो से-दिन आमार्
कबे ह'बे हेनो दशा मोर
कलि-कुक्कुर्-कदन् जदि चाओ (हे)
कि जानि कि बले, तोमार धामेते,
कि-रूपे पाइब सेवा मुइ दुराचार
कुङ्कुमाक्त-काञ्चनाब्ज-गर्व-हारि-गौरभा
कुसुमित वृन्दावने, नाचतो शिखि-गणे,
कृपा कोरो' बैष्णब ठाकुर
कृष्ण जिनका नाम है, गोकुल जिनका धाम है
यद् अपि समाधिषु विधिर् अपि पश्यति
कृष्ण-प्रेम-मयी राधा
कृष्ण होइते चतुर्-मुख, होय् कृष्ण-सेवोन्मुख,
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे!
कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
पखि ना जानि कोन् अपराधे
केशव! तुवा जगत विचित्र
गाङ्गेय-चाम्पेय-तडिद्-विनिन्दि
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
गुरुदेव्!
गुरुदेव्!