गुरुदेवे व्रज वने व्रज भूमि
गुरुदेवे, व्रज-वने, व्रज-भूमि-वासी जने,
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157 भजन · पृष्ठ 2 / 4
गुरुदेवे, व्रज-वने, व्रज-भूमि-वासी जने,
गुरौ गोष्ठे गोष्ठालयिषु सुजने भूसुर-गणे
गोपीनाथ आमार उपाय नाइ
गोपीनाथ घुचाओ सोंसार-ज्वाला
गोपीनाथ मम निबेदन शुनो
गौरा पहु ना भजिया गोइनु
गौराङ्ग करुणा कोरो, दीन हीन जने
गौराङ्ग तुमि मोरे दया ना छाडिह
गौराङ्गेर दुटि पद, जार् धन सम्पद,
जा कि कृपा पान्गु गिरि लाङ्गे
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं
(किब) जय जय गोराचान्देर् आरतिको शोभा
जय जय जगन्नाथ शचीर नन्दन्
जय जय राधा कृष्ण जुगल-मिलन
जय जय श्री-कृष्ण-चैतन्य नित्यानन्द
जय नरसिंह श्री नरसिंह
जय राधा गिरि-वर धारि
(जय) राधा-माधव (जय) कुञ्ज-बिहारी
जय राधे, जय कृष्ण, जय वृन्दावन्
जय राधे जय राधे राधे
गोप्य ऊचुः
जीव् जागो, जीव् जागो, गौरचान्द बोले
जे आनिलो प्रेम-धन कोरुणा प्रचुर्
ठाकुर वैष्णव-गण करि एइ निबेदन
ठाकुर वैष्णव-पद अवनीर सु-सम्पद
तुमि सर्वेश्वरेश्वर, ब्रजेन्द्र-कुमार!
सतां निन्दा नाम्नः परमम् अपराधं वितनुते
दुर्लभ मानब-जन्म लभिया सोंसारे
दुष्ट मन! तुमि किसेर् वैष्णव?
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे
दोयाल् निताइ चैतन्य बोले नाच रे आमार मन
धन मोर नित्यानन्द पति मोर गौरचन्द्र
धुले धुले गोरा चाँद
न योग-सिद्धिर् न ममास्तु मोक्षो
नदीया-गोद्रुमे नित्यानन्द महाजन
नमस् ते नरसिंहाय
नमामीश्वरं सच्-चिद्-आनन्द-रूपं
नमो नमः तुलसी कृष्ण-प्रेयसि नमो नमः
नव गौर-वरं नव-पुष्प-शरं
नारद मुनि, बाजाय् वीणा
हरि हे
निज-पति-भुज-दण्डच्-छत्र-भावं प्रपद्य
निताइ गुण-मणि आमार् निताइ गुण-मणि
निताइ नाम् हाटे, ओ के जाबिरे भाइ, आय् छुटे
निताइ-पद-कमल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल
(जय) श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु नित्यानन्द
परम कोरुण, पहू दुइ जन
हरि हे!