- पद 7अर्थतुलसी के दर्शन से मेरे प्राण शांत हो जाते हैं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे माधव को प्रिय हैं। और गौर को प्रिय शाक का सेवन करके मैं अपने जीवन को सफल मानता हूँ।
“तुलसी” के परिणाम
23 भजन · 11 पद अर्थ में
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- पद 3अर्थमैं फूलों की माला गूँथूँगी, जिनके बीच तुलसी की मंजरियाँ रत्नों जैसी सजी होंगी।
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- पद 4अर्थआपके प्रसाद से ही मैं अपने शरीर का पोषण करूँगा। आपको चढ़ाई गई तुलसी की पत्तियों और मंजरियों की सुगंध का आनंद लूँगा।
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- पद 4अर्थहे भाई, अगुरु और चन्दन न हो तो मिट्टी का तिलक लगा ले। हार के बदले तुलसी-माला पहन। इस तरह कामनाओं के फंदे और सुख-भोग के बुरे विलास को घटा, और संसार की आग से छूट जा।
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- पद 4अर्थतुलसी, भक्ति के चिह्न, और भक्तों का दर्शन भी उद्दीपनों में सम्मिलित हैं, जो भक्ति-रस के अमृत का आस्वादन कराते हैं। यह सब श्रील रूप गोस्वामी और श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा सिखाया गया है।
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- पद 5अर्थ. . . पक्षी, भ्रमर, मृग तथा अन्य पशु, वन-कुंज, तुलसी, फूलों वाली लताएँ, कर्णिकार वृक्ष, कदम्ब वृक्ष तथा अन्य वृक्ष, और वृन्दावन का समस्त वैभव, ये सब भगवान कृष्ण से सम्बन्धित वस्तुएँ हैं। ये उद्दीपन रसों को अत्यंत सुन्दर बना देते हैं।
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- पद 1अर्थ…में तू गृहस्थों से भी अधिक भोगी है। इसके अलावा तू दिखावे के लिए लंगोटी पहनता और हाथ में तुलसी-माला रखता है, पर बोझ ढोने वाले पशु की तरह विभिन्न स्त्रियों को अपनी सेवा-दासी बनाने के फंदे में फँसाने का भार उठाता है।…
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- पद 2अर्थवे बार-बार तुलसी अर्पित करते रहे। बार-बार वे गरज कर पुकारते रहे। इस प्रकार अद्वैत आचार्य भगवान गौर को नवद्वीप में ले आए। इस प्रकार उन्होंने सबको जन्म-मृत्यु के संसार से तार दिया।
1 पद अर्थ में
- पद 1अर्थ…जय! श्री राधा-कृष्ण, गोप-गोपी, गौ, गोवर्धन, वृन्दावन, राधा-कुण्ड और यमुनाजी की जय! श्री तुलसी देवी की जय! श्री गंगाजी की जय! श्री सुरभि-कुंज की जय! श्री नामहट्ट की जय! श्री भक्ति देवी की जय! श्री गायक, श्रोता और भक्तवृन्द की जय!…