श्रील मुकुन्द दत्त
श्री चैतन्य महाप्रभु के सहपाठी और प्रिय गायक
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परिचय
श्री मुकुन्द दत्त नवद्वीप में श्री चैतन्य महाप्रभु के सबसे पहले के मित्रों में से एक थे। वे महाप्रभु के सहपाठी थे। यह उस समय की बात है, जब दोनों में से किसी को भी लोग पवित्र व्यक्ति के रूप में नहीं जानते थे। स्वयं भगवान् के कथन के अनुसार, मुकुन्द ऐसे गायक थे जिनका कीर्तन उन्हें लगभग किसी भी दूसरे व्यक्ति से अधिक भावविभोर करता था। मुकुन्द बंगाल के सुदूर पूर्व में स्थित चटगाँव के एक वैद्य-परिवार से थे। नवद्वीप के भक्तों में केवल मुकुन्द ही जानते थे कि पुण्डरीक विद्यानिधि वास्तव में कौन हैं, और उन्होंने ही गदाधर पण्डित को उनसे मिलवाया। इस प्रकार परम्परा की एक सबसे प्रिय कथा आरम्भ हुई। यह एक गलत धारणा के सुधरने की कथा है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म-स्थान | चाँहरा (बाद के एक विवरण के अनुसार चक्रशाला), पटिया, चटगाँव जिला, बंगाल |
| परिवार | बड़े भाई वासुदेव दत्त; परिवार को अम्बष्ठ वैद्य के रूप में याद किया जाता है |
| भूमिका | श्री चैतन्य महाप्रभु के सहपाठी और प्रिय गायक |
| पहचान | मधुकण्ठ, व्रज के एक गायक (गौर-गणोद्देश-दीपिका 140; चैतन्य-चरितामृत आदि 10.40 तात्पर्य) |
| सबसे प्रसिद्ध कार्य | गदाधर पण्डित का पुण्डरीक विद्यानिधि से परिचय कराना |
| तिरोभाव | ज्येष्ठ पूर्णिमा, स्नान यात्रा का दिन (वर्ष दर्ज नहीं) |
परिचय के शास्त्र प्रमाण (2)
śrī-mukunda-datta śākhā — prabhura samādhyāyī
yāṅhāra kīrtane nāce caitanya-gosāñi
शब्दार्थ
śrī-mukunda-datta: Śrī Mukunda Datta; śākhā: another branch; prabhura: of Lord Śrī Caitanya Mahāprabhu; samādhyāyī: class friend; yāṅhāra: whose; kīrtane: in saṅkīrtana; nāce: dances; caitanya-gosāñi: Śrī Caitanya Mahāprabhu.
मुकुन्द दत्त, भगवान् चैतन्य के सहपाठी, चैतन्य-वृक्ष की एक और शाखा थे। भगवान् चैतन्य उनके गाने पर नृत्य करते थे।
तात्पर्य से: तात्पर्य अंश: "जब भगवान् चैतन्य विद्यार्थी थे, मुकुन्द दत्त उनके सहपाठी थे, और वे प्रायः तार्किक वाद-विवाद में संलग्न रहते थे।"
श्री चैतन्य-चरितामृत का वह मुख्य श्लोक, जिसमें मुकुन्द दत्त को चैतन्य-वृक्ष की एक शाखा और महाप्रभु का सहपाठी बताया गया है।
व्रजे स्थितौ गायकौ यौ मधुकण्ठ मधुव्रतौ ।
मुकुन्द वासुदेवौ तौ दत्तौ गौराङ्ग गायकौ ॥१४०॥
vraje sthitau gāyakau yau
madhukaṇṭha-madhuvratau
mukunda-vāsudevau tau
dattau gaurāṅga-gāyakau
व्रज में मधुकण्ठ और मधुव्रत नामक दो अत्यन्त उत्तम गायक थे। वे चैतन्य-लीला में मुकुन्द और वासुदेव दत्त के रूप में प्रकट हुए, जो भगवान् चैतन्य महाप्रभु के मण्डल में गायक थे।
कवि कर्णपूर मुकुन्द दत्त को व्रज के गायक मधुकण्ठ के रूप में पहचानते हैं (उनके भाई वासुदेव दत्त मधुव्रत हैं)। संस्कृत: गौर-गणोद्देश-दीपिका का सविशेषचिह्न (diacritic) संस्करण; अनुवाद: श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत आदि 10.40 का तात्पर्य।
अध्याय 1
चटगाँव का एक वैद्य-परिवार
दो भाई, चटगाँव का एक गाँव, और भावी श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ विद्यालय की प्रतिद्वन्द्विता

बंगाल के पूर्वी छोर पर स्थित चटगाँव के एक वैद्य-परिवार के दो भाई पढ़ने के लिए नवद्वीप आए। उनमें से एक भाई उस बालक के सहपाठी बने, जो आगे चलकर श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में जाने गए।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म-स्थान | चाँहरा, पटिया थाना, चटगाँव जिला (बाद के एक स्रोत में इसका नाम चक्रशाला दिया गया है) |
| परिवार | अम्बष्ठ वैद्य, उपनाम दत्त |
| बड़े भाई | वासुदेव दत्त, जो आगे चलकर महाप्रभु के सबसे प्रसिद्ध भक्तों में से एक बने |
| विद्यालय | गंगादास पण्डित की टोल, नवद्वीप |
| सहपाठी | निमाई पण्डित, भावी श्री चैतन्य महाप्रभु |
चाँहरा नामक एक गाँव #
श्री चैतन्य-चरितामृत के अपने तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि मुकुन्द दत्त का जन्म चटगाँव जिले के पटिया थाने के अन्तर्गत चाँहरा गाँव में हुआ था। वे यह भी बताते हैं कि यह गाँव पुण्डरीक विद्यानिधि के घर से लगभग बीस मील दूर था। ये वही भक्त हैं जिनसे मुकुन्द ने आगे चलकर गदाधर पण्डित का परिचय कराया। बाद में संकलित एक जीवनी में गाँव का नाम अलग, चक्रशाला, बताया गया है। उसमें यह भी लिखा है कि वहाँ के लोग इस परिवार को अम्बष्ठ वैद्य के रूप में याद करते थे। अम्बष्ठ एक बंगाली समुदाय है, जो परम्परा से चिकित्सा के काम से जुड़ा रहा है। दोनों विवरण गाँव के नाम पर सहमत नहीं हैं, और स्रोतों से यह अन्तर सुलझता नहीं। लेकिन जिला, परिवार का व्यवसाय और पुण्डरीक विद्यानिधि के घर की दूरी, इन तीनों बातों पर दोनों विवरण सहमत हैं। इसलिए यह केवल एक छोटी-सी बात का अन्तर है, कोई वास्तविक विवाद नहीं।
दत्त के अम्बष्ठ वैद्य #
मुकुन्द के बड़े भाई वासुदेव दत्त थे। गौड़ीय वैष्णव उनके नाम को लगभग उतने ही सम्मान से याद करते हैं, जितने सम्मान से मुकुन्द के नाम को। कृष्णदास कविराज गोस्वामी वासुदेव को चैतन्य-वृक्ष की उन्नीसवीं शाखा कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि उनके गुणों का वर्णन हजार मुखों से भी नहीं किया जा सकता। महाप्रभु ने तीन अलग-अलग अवसरों पर प्रतिज्ञा की कि उनका अपना शरीर केवल वासुदेव को सुख देने के लिए है। दोनों भाई चटगाँव के एक ही वैद्य-परिवार से थे और साथ-साथ नवद्वीप आए थे। महाप्रभु के आरम्भिक पार्षदों में यह एक असामान्य पारिवारिक कथा है। उनमें से अधिकतर भक्त एक-एक करके उनके पास आए थे, न कि ऐसे भाइयों के रूप में जो पहले से एक-दूसरे के प्रति समर्पित हों।
गंगादास पण्डित की टोल के सहपाठी #
चटगाँव के अनेक वैष्णव परिवार नवद्वीप में गंगा के पास आकर बस गए थे। वे यहाँ पढ़ने के लिए और पवित्र गंगा के समीप रहने के लिए आए थे। इसी समुदाय में रहते हुए मुकुन्द ने गंगादास पण्डित की टोल, अर्थात् पाठशाला, में प्रवेश लिया। उसी टोल में निमाई पण्डित नाम के एक बहुत तीव्रबुद्धि विद्यार्थी भी पढ़ते थे। वे स्वयं गंगादास को छोड़कर नवद्वीप के हर अध्यापक से पहले ही आगे निकल चुके थे। जब ये दोनों मिले, तब क्या हुआ, इसका श्री चैतन्य-भागवत कुछ विस्तार से वर्णन करता है। आरम्भ में उनके बीच भक्ति नहीं, बल्कि प्रतिद्वन्द्विता थी। निमाई को तर्क की युक्तियों से मुकुन्द को घेरने में स्पष्ट रूप से आनन्द आता था। दोनों के बीच इतनी बार वाद-विवाद होते थे कि कृष्णदास कविराज गोस्वामी श्री चैतन्य-चरितामृत में मुकुन्द का परिचय देते समय इनका विशेष रूप से उल्लेख करते हैं।
एक प्रशंसा जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते थे #
एक वार्तालाप का वर्णन विशेष रूप से कुछ विस्तार से मिलता है। व्याकरण के एक प्रश्न पर मुकुन्द एक बार फिर घिर गए। इसलिए उन्होंने प्रतियोगिता का विषय ही बदलने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि व्याकरण तो बालकों का विषय है; निमाई इसके बदले अलंकार में उनका उत्तर दें। अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले प्रयोगों का शास्त्र है, जो व्याकरण से कहीं अधिक कठिन है। निमाई ने बड़ी सहजता से ऐसा ही किया। उन्होंने एक पक्ष स्थापित किया, फिर उसका खण्डन किया, और फिर उसे दोबारा स्थापित कर दिया। मुकुन्द को इस पूरे प्रदर्शन में कहीं भी कोई कमी नहीं मिली। बाद में अकेले विचार करते हुए मुकुन्द इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कोई साधारण मनुष्य इतना ज्ञान नहीं रख सकता। लेकिन वे यह बात अपने सहपाठियों के बीच खुलकर नहीं कह सकते थे। उनमें से अधिकतर उस युवा तार्किक की संगति से पूरी तरह बचने का प्रयास करते थे। मुकुन्द ने सोचा, यदि उनका यह प्रतिभाशाली लेकिन थका देने वाला सहपाठी कृष्ण का भक्त भी होता, तो वे फिर कभी उनकी संगति नहीं छोड़ते।
निमाई अभी-अभी एक और वाद-विवाद जीतकर जा रहे थे, और मुकुन्द उन्हें जाते हुए देख रहे थे। उस समय मुकुन्द के पास यह जानने का कोई साधन नहीं था कि आगे क्या होने वाला है। मुकुन्द की यह इच्छा आगे चलकर उनकी कल्पना से भी कहीं बढ़कर पूरी होने वाली थी। उस विद्यालय-प्रांगण में आरम्भ हुई यह मित्रता उन्हें संकीर्तन आन्दोलन के पहले भाव-भरे वर्षों से होते हुए श्रीवास पण्डित के आँगन तक, और अन्त में जगन्नाथ पुरी तक ले जाने वाली थी।
पीछे मुड़कर देखें तो यह आरम्भ बहुत साधारण था। गंगादास पण्डित की टोल में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे लगे कि मुकुन्द दत्त आगे चलकर परम भगवान् के पार्षद बनेंगे। उनके पास केवल एक तेज बुद्धि थी। उन्हें एक ऐसे सहपाठी से बार-बार वाद-विवाद हारने की आदत थी, जिनकी वे मन-ही-मन प्रशंसा करते थे। और उनका परिवार हाल ही में चटगाँव से आया था। परम्परा उनके आरम्भिक वर्षों के साथ कोई शकुन या भविष्यवाणी नहीं जोड़ती। वह केवल एक ऐसी मित्रता का वर्णन करती है, जो समय के साथ इतनी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई, जितना दोनों में से किसी बालक ने सोचा भी नहीं था।
अध्याय 2
वह स्वर जिसे महाप्रभु सुनना पसन्द करते थे
नवद्वीप में संकीर्तन के प्रथम भावोन्मत्त वर्षों में प्रमुख गायक के रूप में मुकुन्द दत्त का स्थान

मुकुन्द दत्त के विषय में सबसे महत्त्वपूर्ण बात कहने के लिए श्री चैतन्य-चरितामृत को अधिक शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती: वे महाप्रभु के सहपाठी थे, और भगवान् चैतन्य उनके गाने पर नृत्य करते थे। संकीर्तन आन्दोलन के आरम्भिक वर्षों में उनके विषय में कही गई प्रायः हर बात इसी एक तथ्य का ही विस्तार है।
गया से लौटने के बाद के गीत #
महाप्रभु की गया-यात्रा के बाद विद्यालय के दिनों का वह वाद-विवाद करने वाला सहपाठी कुछ समय के लिए कथा से ओझल हो जाता है। गया में भगवान् ने ईश्वर पुरी से दीक्षा ली। वे एक बदले हुए व्यक्ति के रूप में नवद्वीप लौटे। वे कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम में इस प्रकार डूबे हुए थे कि उनके पुराने विद्यार्थियों में से कोई भी इसे पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था। मुकुन्द दत्त उन थोड़े-से लोगों में से एक थे, जो इसे समझ सकते थे। वे श्रीमद्भागवतम् के श्लोक सुनाते थे और भगवान् के मन में उमड़ते भावों के अनुरूप कीर्तन गाते थे। सभी विवरण बताते हैं कि इससे महाप्रभु को सच्ची सान्त्वना मिली। उस समय उनके आसपास बहुत कम लोग समझ पाते थे कि उनके साथ क्या हो रहा है। कहा जाता है कि इस काल में मुकुन्द का गायन सुनकर स्वयं अद्वैत आचार्य और ईश्वर पुरी भी उसी भाव में बह गए थे।
श्रीवास के आँगन में कीर्तन का नेतृत्व #
जब नवद्वीप में श्रीवास पण्डित के घर पर संकीर्तन आन्दोलन ने बल पकड़ा, तब मुकुन्द दत्त उसके नियमित नेताओं में से एक बन गए। एकादशी की सुबह भक्त अलग-अलग कीर्तन-मण्डलियों में बँट जाते थे। एक मण्डली का नेतृत्व श्रीवास पण्डित करते थे और दूसरी का मुकुन्द। साधारण संध्याओं में जब मुकुन्द श्रीवास के आँगन में गाते थे, तो महाप्रभु विशेष रूप से उन्हीं के स्वर पर नृत्य करते थे। कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने इस बात को मुकुन्द का सबसे मुख्य गुण मानकर, उनके बारे में और किसी भी बात से पहले, लिखना उचित समझा।
सत-प्रहरीय के इक्कीस घण्टे #
मुकुन्द के स्वर से सबसे अधिक जुड़ी घटना सत-प्रहरीय-भाव है। इस असाधारण अवसर पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने लगातार इक्कीस घण्टे तक दिव्य भावों का प्रकाश दिखाया। मुकुन्द दत्त ने अपने गायन से इस पूरे प्रसंग का आरम्भ किया। बाद में, इसी प्रसंग के अंग के रूप में जब विधिवत् स्नान हुआ, तब उन्होंने फिर से गाया। उनके चारों ओर के भक्त, जो कुछ देख रहे थे उसे सह न पाकर, रोने या नाचने लगते थे। परम्परा में सम्मान के इस स्थान का बहुत महत्त्व है। भगवान् के नवद्वीप-काल में दिव्य भावों के सबसे प्रसिद्ध प्रदर्शनों में से एक यह प्रसंग था, और इसमें अनेक भक्त उपस्थित थे। फिर भी मुकुन्द का ही गायन था, जिसने इसे आरम्भ भी किया और इसके सबसे गम्भीर क्षण को भी सँभाला।
लक्ष्मी के रूप में नृत्य #
एक और रात, चन्द्रशेखर आचार्य के घर पर, महाप्रभु ने स्वयं को लक्ष्मी-देवी के वेश में सजाया और एकत्र भक्तों के सामने नृत्य किया। यह उनकी नवद्वीप-लीलाओं में सबसे चकित करने वाली और कोमल लीलाओं में से एक है। उस संध्या का पहला गीत भी मुकुन्द दत्त ने ही आरम्भ किया। कथा में यहाँ तक आते-आते यह संयोग कम और एक नियम अधिक लगता है। जब भी भक्तों को कीर्तन आरम्भ करने के लिए किसी स्वर की आवश्यकता होती थी, तो मुकुन्द ही उसे आरम्भ करते थे। आनन्द के अवसरों में भी ऐसा होता था, और भगवान् की आरम्भिक लीलाओं में सबसे अनोखी और अन्तरंग लीला में भी।
खड़जाठिया बेटा #
इन सब बातों से यह नहीं समझना चाहिए कि मुकुन्द बिल्कुल सरल और सीधे स्वभाव के व्यक्ति थे। श्री चैतन्य-भागवत बताता है कि महाप्रभु कभी-कभी उन्हें आधे खेल में और आधे गम्भीरता से डाँटते थे। वे उन्हें खड़जाठिया बेटा कहते थे, जो डाँटने के लिए प्रयोग होने वाला एक बंगाली शब्द है। इसका कारण यह था कि मुकुन्द केवल श्रीवास के आँगन के शुद्ध वैष्णवों की सभाओं में ही नहीं, बल्कि हर प्रकार के अभक्तों की सभाओं में भी जाते रहते थे। यह मुकुन्द के स्वभाव की चंचलता का पहला संकेत है। यही चंचलता आगे चलकर उन्हें एक साधारण डाँट से कहीं अधिक गम्भीर संकट में डालने वाली थी। यही भक्ति-देवी के प्रति अपराध का विषय है, जो उनके बारे में कही गई सबसे नाटकीय घटना है।
बाद में, जब महाप्रभु सन्न्यास ले चुके थे, तब भी मुकुन्द के बारे में उनके अपने शब्दों में यही दोनों पक्ष दिखाई देते थे। उनके मन में मुकुन्द की भक्ति के प्रति गहरा स्नेह था। साथ ही वे खुलकर यह भी मानते थे कि मुकुन्द उस भक्ति के योग्य बनने के लिए भीतर-ही-भीतर संघर्ष करते थे। जगन्नाथ पुरी में, दक्षिण भारत की यात्रा पर निकलने से ठीक पहले, महाप्रभु ने भक्तों को बताया कि मुकुन्द उन्हें सन्न्यास के कठोर नियमों का पालन करते देखकर ही दुःखी हो जाते थे। इन नियमों में भूमि पर सोना और शीत ऋतु में भी दिन में तीन बार स्नान करना शामिल था। महाप्रभु ने कहा कि मुकुन्द का यह मौन दुःख देखकर वे स्वयं दुगुने दुःखी हो जाते थे। यह एक छोटी-सी बात है, लेकिन यह वह कहती है जो कोई औपचारिक प्रशंसा नहीं कह सकती। मुकुन्द की युवावस्था में चाहे जितनी चंचलता रही हो, अन्त तक महाप्रभु ने उनमें ऐसी सजग भक्ति अनुभव की, जो भगवान् के उस हर कष्ट को भी पहचान लेती थी, जिसे वे स्वयं छिपाने का प्रयास करते थे।
दूसरे शब्दों में, मुकुन्द दत्त के पास अर्पित करने के लिए केवल उनका स्वर ही नहीं था। लेकिन सम्भवतः यही वह वरदान है जिसे परम्परा सबसे सहजता से याद करती है। इसका कारण यह है कि जैसे ही वे गाने के लिए मुँह खोलते, यह वरदान स्वयं प्रकट हो जाता था। वह भी एक ऐसे आँगन में, जो ऐसे लोगों से भरा था जो उसे सुनते-सुनते कभी नहीं थकते थे।
अध्याय 3
भक्ति-देवी के प्रति अपराध
क्यों महाप्रभु ने एक बार मुकुन्द दत्त को द्वार पर ही खड़ा छोड़ दिया, और वह कृपा जो इसके बाद आई

मुकुन्द दत्त एक गुणी गायक थे, लेकिन उनकी एक आदत अन्त में उनके लिए संकट का कारण बनी। वे एक साथ एक से अधिक जगत में अपना स्थान बनाए रखना चाहते थे। भक्तों के बीच वे भक्ति की महिमा गाते थे। लेकिन बिलकुल अलग प्रकार के दार्शनिकों के बीच वे किसी और ही विषय पर चर्चा करते थे। महाप्रभु से कुछ भी छिपा नहीं रहता था, और उन्होंने मुकुन्द को इसके लिए उत्तरदायी ठहराया। उन्होंने जिस ढंग से ऐसा किया, वह मुकुन्द के जीवन की सबसे अधिक उद्धृत की जाने वाली घटनाओं में से एक बन गई।
दोनों संसारों में एक पैर #
परम्परा के वर्णन के अनुसार मुकुन्द का दोष अविश्वास नहीं था। उनका दोष यह था कि वे बिना सोचे-समझे हर प्रकार के विचारकों की संगति करते थे। वे श्रीवास पण्डित के आँगन में भक्तों से भक्ति की बात करते थे। फिर वे जाकर कर्मियों से सांसारिक विषयों पर वाद-विवाद करते थे। सबसे गम्भीर बात यह थी कि वे मायावादी निर्विशेषवादियों के साथ बैठकर योग-वासिष्ठ-रामायण पर उनके प्रवचन सुनते थे। यह ग्रन्थ उसी दर्शन से भरा हुआ है, जिसका विरोध करने में महाप्रभु ने अपना पूरा जीवन लगाया। यह वही चंचलता थी जो गायक के पृष्ठ पर बताई गई खड़जाठिया बेटा वाली डाँट में पहले ही दिख चुकी थी। अन्तर केवल इतना था कि अब यह इतनी बढ़ गई थी कि इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था। परम्परा कहती है कि वास्तव में वे भक्ति को कई विचार-सम्प्रदायों में से बस एक सम्प्रदाय मान रहे थे, मानो वे सभी समान रूप से सही हों। वे यह नहीं मान रहे थे कि भक्ति वास्तव में कई मतों में से एक नहीं, बल्कि अपने-आप में एकमात्र और अनोखी वस्तु है। वे भक्तों के सामने भक्ति की महिमा गाते, कर्मियों से सांसारिक बातों पर तर्क करते, और मायावादियों के साथ निर्विशेषवाद पर चर्चा करते, मानो एक ही व्यक्ति सच्चे मन से इन तीनों प्रकार के श्रोताओं में शामिल हो सकता हो। इसी को स्वयं भक्ति-देवी के प्रति अपराध के रूप में याद किया जाता है।
द्वार पर ही खड़े छोड़ दिए गए #
यह सुधार महाप्रभु की महाप्रकाश-लीला के समय श्रीवास आँगन में हुआ। उस असाधारण अवसर पर भगवान् ऐसे बैठे थे, मानो स्वयं विष्णु के सिंहासन पर विराजमान हों। वे भक्तों को एक-एक करके अपने पास बुलाते थे, और हर भक्त के हृदय में जो था, उसके अनुसार उसे आशीर्वाद देते थे। मुकुन्द दत्त को बाहर ही खड़ा रहने दिया गया। दूसरे भक्तों ने उनकी ओर से महाप्रभु से विनती की। तब महाप्रभु ने ठीक-ठीक कारण बताया, उन शब्दों में जिन्हें श्रील प्रभुपाद ने आगे चलकर सुरक्षित रखा: "मैं शीघ्र ही मुकुन्द दत्त से प्रसन्न नहीं होऊँगा, क्योंकि यद्यपि वह भक्तों के बीच भक्ति का वर्णन करता है, तथापि वह फिर मायावादियों के पास जाकर उनसे योग-वासिष्ठ-रामायण सुनता है, जो मायावाद के दर्शन से परिपूर्ण है। इसीलिए मैं उससे अत्यन्त अप्रसन्न हूँ।" मुकुन्द बाहर खड़े होकर यह सब सुन रहे थे। आश्चर्य की बात है कि वे प्रसन्न थे। वे इसलिए प्रसन्न थे कि भगवान् के इन शब्दों से यह आशा तो बनी रही कि भले ही अभी नहीं, पर समय आने पर वे उनसे प्रसन्न होंगे।
एक करोड़ जन्म #
श्री चैतन्य-भागवत का अधिक विस्तृत विवरण इस प्रसंग को और आगे ले जाता है और इसे कहीं अधिक मार्मिक बना देता है। महाप्रभु की डाँट से मुकुन्द को असहनीय पीड़ा हुई। उन्होंने प्रायश्चित्त के रूप में अपना शरीर त्याग देने का निश्चय किया। उन्होंने श्रीवास पण्डित के द्वारा भगवान् से पुछवाया कि क्या किसी भावी जन्म में भी उन्हें भगवान् की कृपा मिलने की कोई आशा है। महाप्रभु ने उत्तर दिया कि मुकुन्द को यह कृपा एक करोड़ जन्मों के बाद मिलेगी। मुकुन्द निराश नहीं हुए। बल्कि वे जहाँ खड़े थे, वहीं नाचने लगे और बार-बार कहने लगे कि भगवान् का वचन कभी असत्य नहीं हो सकता। वे प्रसन्न थे, क्योंकि एक करोड़ जन्मों का अर्थ भी यही था कि कृपा एक दिन अवश्य मिलेगी; यह 'कभी नहीं' के समान नहीं था।
एक ऋण जो तुरन्त माफ़ हुआ #
उसी क्षण महाप्रभु की कृपा उस दण्ड से भी बढ़कर हो गई, जो उन्होंने स्वयं अभी-अभी दिया था। मुकुन्द को एक ऐसी प्रतिज्ञा पर विश्वास था, जिसमें उनके लिए आशा करने को लगभग कुछ भी नहीं था। उनके इस विश्वास से भगवान् का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने मुकुन्द को तुरन्त उस अपराध से मुक्त कर दिया और वहीं उन्हें अपना ऐश्वर्यपूर्ण रूप दिखाया। अपनी पहली डाँट को पूरी तरह पलटते हुए, उन्होंने घोषणा की कि वे सदा मुकुन्द की जिह्वा पर निवास करेंगे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वे जहाँ कहीं भी प्रकट होंगे, वहाँ मुकुन्द को उनके लिए गाने का स्थान मिलेगा। परम्परा यह कथा बार-बार सुनाती है। इसे इस बात के प्रमाण के रूप में सुनाया जाता है कि भगवान् का दिया हुआ कोई भी दण्ड, चाहे वह कितना ही कठोर हो, उनके प्रति सच्ची श्रद्धा के सामने एक क्षण भी नहीं टिक सकता।
मुकुन्द को बाहर खड़ा रखने के बाद उन्हें किस प्रकार क्षमा किया गया, इसका वर्णन दो स्रोत थोड़े अलग ढंग से करते हैं। श्रील प्रभुपाद के तात्पर्य में भगवान् तब सहज ही नरम हो जाते हैं, जब वे देखते हैं कि मुकुन्द मायावादियों का साथ सदा के लिए छोड़ रहे हैं। चैतन्य-भागवत की अधिक विस्तृत कथा एक करोड़ जन्मों के दण्ड पर हुए नाटकीय संवाद तक पहुँचती है। लेकिन परिणाम के बारे में दोनों में से कोई भी विवरण सन्देह नहीं छोड़ता। जो भक्त पहले मायावादी ग्रन्थ और भक्ति-ग्रन्थ में भेद नहीं कर पाते थे, इसके बाद उन्हें मुख्य रूप से इस प्रतिज्ञा के लिए याद किया जाता है कि उनका स्वर सदा महाप्रभु का ही रहेगा। यह प्रतिज्ञा उनके शेष जीवन-भर सत्य सिद्ध हुई। इसका एक स्पष्ट उदाहरण गदाधर पण्डित का पुण्डरीक विद्यानिधि से परिचय में बताई गई कथा है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)
mukunda-dattere kaila daṇḍa-parasāda
khaṇḍila tāhāra cittera saba avasāda
शब्दार्थ
mukunda-dattere: unto Mukunda Datta; kaila: did; daṇḍa: punishment; parasāda: benediction; khaṇḍila: vanquished; tāhāra: his; cittera: of the mind; saba: all kinds of; avasāda: depressions.
भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुकुन्द दत्त को दण्ड देकर आशीर्वाद दिया और इस प्रकार उनके सम्पूर्ण मानसिक विषाद को नष्ट कर दिया।
तात्पर्य से: तात्पर्य अंश: "मैं शीघ्र ही मुकुन्द दत्त से प्रसन्न नहीं होऊँगा, क्योंकि यद्यपि वह भक्तों के बीच भक्ति का वर्णन करता है, तथापि वह फिर मायावादियों के पास जाकर उनसे योग-वासिष्ठ-रामायण सुनता है, जो मायावाद के दर्शन से परिपूर्ण है।"
श्रील प्रभुपाद का तात्पर्य, जिसमें बताया गया है कि मुकुन्द दत्त को कुछ समय के लिए महाप्रभु की महाप्रकाश-लीला के आशीर्वादों से क्यों वंचित रखा गया। यही घटना यहाँ पूरे विस्तार से बताई गई है।
अध्याय 4
गदाधर पण्डित का पुण्डरीक विद्यानिधि से परिचय
नवद्वीप का वह एकमात्र भक्त जो जानता था कि पुण्डरीक विद्यानिधि का ऐश्वर्य वास्तव में क्या छिपाए हुए है

नवद्वीप में केवल मुकुन्द दत्त ही जानते थे कि पुण्डरीक विद्यानिधि के धन और सांसारिक जीवन के पीछे वास्तव में क्या छिपा है। और मुकुन्द ने ही एक साधारण दिन यह निश्चय किया कि गदाधर पण्डित नाम के एक युवा ब्रह्मचारी को भी यह जानना चाहिए।
नवद्वीप से छिपाया गया एक रहस्य #
पुण्डरीक विद्यानिधि चटगाँव से नवद्वीप एक धनी और भोग-विलासी सांसारिक व्यक्ति के वेश में आए थे। उन्होंने स्वयं को इससे अलग दिखाने का कोई प्रयास भी नहीं किया। वहाँ लगभग कोई भी इस बाहरी रूप के पीछे नहीं देख पाता था। लेकिन मुकुन्द दत्त देख पाते थे। वे स्वयं चटगाँव में रह चुके थे। वे पुण्डरीक विद्यानिधि को तब से जानते थे, जब दोनों में से कोई भी गंगा के पास आकर नहीं बसा था। और इस बाहरी रूप के पीछे इससे भी गहरा एक सत्य छिपा था। कवि कर्णपूर की गौर-गणोद्देश-दीपिका पुण्डरीक को, आश्चर्यजनक रूप से, वृषभानु महाराज के रूप में पहचानती है। वृषभानु महाराज कृष्ण की अपनी लीलाओं में श्रीमती राधारानी के पिता हैं। इसी कारण स्वयं महाप्रभु कभी-कभी रो पड़ते थे और उन्हें "पिता" कहकर पुकारते थे। तकियों के सहारे लेटे हुए, पान और सेवकों से घिरे उस व्यक्ति को बाहर से देखकर इसमें से कुछ भी पता नहीं चलता था। मुकुन्द ने यह बात अधिकतर अपने तक ही रखी। वे उस दिन की प्रतीक्षा करते रहे, जब उन्हें लगा कि कोई और भी इस सत्य को देखने के लिए तैयार है।
गदाधर को उनसे मिलाने ले जाना #
वह व्यक्ति गदाधर पण्डित थे, जो बीस वर्ष के एक ब्रह्मचारी थे। बचपन से ही उन्हें सुख-सुविधा की कोई परवाह नहीं थी, और स्वभाव से वे बाहरी बातों को गम्भीरता से लेते थे। एक दिन मुकुन्द ने उनसे कहा कि वे उन्हें एक बहुत ही असाधारण वैष्णव से मिलवाने ले जा रहे हैं, और वे उन्हें अपने साथ ले गए। वहाँ गदाधर ने देखा कि एक व्यक्ति चँदोवे के नीचे एक मूल्यवान शय्या पर लेटे हुए हैं। उनकी चादरों को दूध के फेन जैसा सफेद बताया गया है। पास ही एक रत्नजड़ित पेटी में सुगन्धित पान रखा था, और सेवक उन्हें पंखा झल रहे थे। मुकुन्द ने जो कहा था, उससे गदाधर इनमें से किसी भी बात का मेल नहीं बिठा पा रहे थे। उनके चेहरे पर शंका साफ दिखाई दे रही थी।
वह श्लोक जिसने छद्म वेश को तोड़ दिया #
मुकुन्द ने यह देखा, और वही एक काम किया जिससे यह शंका दूर हो सकती थी। उन्होंने ऊँचे स्वर में श्रीमद्भागवतम् के तृतीय स्कन्ध से उद्धव का कहा हुआ एक श्लोक सुनाया। उसमें उद्धव आश्चर्य करते हैं कि कृष्ण ने पूतना राक्षसी को भी धाय माता का पद दे दिया, जबकि वह अपने स्तन पर विष लगाकर उन्हें मारने आई थी। वे पूछते हैं कि इससे अधिक दयालु शरण और कहाँ मिल सकती है। पुण्डरीक विद्यानिधि पर इसका प्रभाव तुरन्त हुआ। वे चीख उठे, भूमि पर गिर पड़े, और उनमें वे सभी भाव-लक्षण प्रकट हुए जिनका वर्णन वैष्णव ग्रन्थों में मिलता है। वे सुन्दर बिछावन को नोचने लगे और विलाप करने लगे कि भगवान् ने उन्हें अपनी कृपा से वंचित रखा है। फिर वे घण्टों तक मूर्च्छित पड़े रहे। केवल मुकुन्द ही जानते थे कि कौन-सा श्लोक ऐसा प्रभाव डालेगा, और उन्होंने वही श्लोक चुना। उस एक श्लोक ने पुण्डरीक का पूरा छद्म वेश उतार दिया। यह सब गदाधर के सामने हुआ। गदाधर ने बाहरी दिखावे को वैसा ही परखा था जैसा वह दिखता था, लेकिन उसके नीचे जो छिपा था, उसे वे बिल्कुल नहीं देख पाए थे।
इसका परिणाम क्या हुआ #
गदाधर तुरन्त समझ गए कि एक भक्त को उसकी बाहरी परिस्थितियों से परखकर उनसे एक गम्भीर अपराध हुआ है। इसका उपाय यह था कि वे उन्हीं व्यक्ति से दीक्षा लें, जिन्हें उन्होंने गलत समझा था। यह उपाय महाप्रभु के मार्गदर्शन से, और मुकुन्द के श्लोक-पाठ ने अभी-अभी जो सत्य प्रकट किया था, उसके प्रभाव से सामने आया। जब पुण्डरीक विद्यानिधि सामान्य चेतना में लौटे, तो उन्होंने अभी-अभी हुई घटना का कोई संकेत नहीं दिया। इस पर अमल करने से पहले गदाधर यह विचार लेकर फिर मुकुन्द के पास गए। एक विवरण बताता है कि यह अनुरोध सुनकर मुकुन्द बहुत प्रसन्न हुए। इस विवरण के अनुसार मुकुन्द स्वयं यह अनुरोध पुण्डरीक विद्यानिधि के पास ले गए। पुण्डरीक विद्यानिधि ने प्रसन्न होकर दीक्षा की तिथि निश्चित कर दी, और महाप्रभु ने भी अपनी स्वीकृति दे दी। निश्चित दिन पुण्डरीक विद्यानिधि ने गदाधर पण्डित को दीक्षा दी और वे जीवन-भर उनके गुरु रहे। वर्षों बाद जगन्नाथ पुरी में दूसरी बार दीक्षा भी हुई। कथा के इस पक्ष का सबसे पूरा विवरण गदाधर पण्डित के अपने पृष्ठ, पुण्डरीक विद्यानिधि से दीक्षा, पर दिया गया है। वहाँ यह भी बताया गया है कि इसका वर्णन करने वाले चैतन्य-चरितामृत के दो अंश आपस में कैसे मेल खाते हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि परम्परा के अनुसार यह घटना किसी वैष्णव को बाहरी रूप से परखने के बारे में क्या सिखाती है।
इस कथा में मुकुन्द दत्त की भूमिका यहीं समाप्त होती है। उन्होंने परिचय कराया और वह एक श्लोक सुनाया जो सबसे महत्त्वपूर्ण था, और फिर वे पीछे हट गए। उनके जीवन में यही ढंग बार-बार दिखाई देता है। वे लगभग कभी किसी लीला के मुख्य पात्र नहीं होते। वे उस मित्र की तरह हैं, जो लीला के ठीक पास खड़े रहते हैं। उनके पास ज्ञान की वह एक बात, या शास्त्र की वह एक पंक्ति होती है, जिसकी उस क्षण को सचमुच आवश्यकता होती है। यहाँ भी फिर से ऐसा ही होता है। सच पूछें तो यह कथा गदाधर पण्डित और पुण्डरीक विद्यानिधि की है। फिर भी मुकुन्द के बिना ये दोनों कभी एक-दूसरे से नहीं मिल पाते।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)
अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी ।
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥
aho bakī yaṁ stana-kāla-kūṭaṁ
jighāṁsayāpāyayad apy asādhvī
lebhe gatiṁ dhātry-ucitāṁ tato 'nyaṁ
kaṁ vā dayāluṁ śaraṇaṁ vrajema
शब्दार्थ
aho: alas; bakī: the she-demon (Pūtanā); yam: whom; stana: of her breast; kāla: deadly; kūṭam: poison; jighāṁsayā: out of envy; apāyayat: nourished; api: although; asādhvī: unfaithful; lebhe: achieved; gatim: destination; dhātrī-ucitām: just suitable for the nurse; tataḥ: beyond whom; anyam: other; kam: who else; vā: certainly; dayālum: merciful; śaraṇam: shelter; vrajema: shall I take.
हाय, मैं उनसे अधिक दयालु किसकी शरण ग्रहण करूँ, जिन्होंने एक राक्षसी [पूतना] को, यद्यपि वह विश्वासघातिनी थी और अपने स्तन से चूसे जाने के लिए घातक विष तैयार करके लाई थी, माता का पद प्रदान किया?
वह श्लोक जो मुकुन्द दत्त ने गदाधर पण्डित को सुनाया (पूतना के प्रति कृष्ण की कृपा पर उद्धव का विस्मय)। इस श्लोक ने पुण्डरीक विद्यानिधि के बाहरी छद्म वेश को तुरन्त तोड़ दिया।
अध्याय 5
सन्न्यास और जगन्नाथ पुरी के वर्ष
कटवा से पूर्व की रात्रि से लेकर पुरी में भगवान् के दर्शन हेतु प्रतिवर्ष की यात्राओं के एक दशक तक

जब महाप्रभु संसार को त्यागने की अपनी इच्छा को और नहीं रोक सके, तो किसी और को बताने से पहले वे सबसे पहले मुकुन्द दत्त के घर गए। यहीं से उस दशक का आरम्भ हुआ, जिसमें मुकुन्द जगन्नाथ पुरी में भगवान् के जीवन के लगभग हर बड़े मोड़ पर उपस्थित रहने वाले थे।
कटवा से पूर्व की रात्रि #
महाप्रभु का निश्चय सुनकर मुकुन्द ने उनसे प्रतीक्षा करने की विनती की। उन्होंने कहा कि सन्न्यास लेने से पहले वे कुछ दिन और संकीर्तन आन्दोलन चलाते रहें। इस विनती से महाप्रभु का मन नहीं बदला। लेकिन इसी के कारण आगे की घटनाओं के केन्द्र में मुकुन्द को स्थान मिला। नित्यानन्द प्रभु ने गदाधर पण्डित, चन्द्रशेखर आचार्य और मुकुन्द दत्त को बताया कि सन्न्यास अवश्य होगा। ये सब कटवा गए और समारोह के लिए आवश्यक कीर्तन तथा सामग्री की व्यवस्था की। समारोह के समय महाप्रभु के साथ कौन थे, यह श्री चैतन्य-चरितामृत स्वयं बहुत स्पष्ट शब्दों में बताता है। जब महाप्रभु ने सन्न्यास लिया, तब तीन व्यक्ति सब आवश्यक काम सँभालने के लिए उनके साथ थे: नित्यानन्द प्रभु, चन्द्रशेखर आचार्य, और मुकुन्द दत्त।
जलेश्वर में टूटा हुआ दण्ड #
सन्न्यास के बाद मुकुन्द भगवान् के सबसे निकट के छोटे मण्डल के साथ उनके पीछे-पीछे जगन्नाथ पुरी की ओर चले। जलेश्वर में नित्यानन्द प्रभु ने महाप्रभु का सन्न्यास-दण्ड तोड़ दिया। यह घटना बहुत प्रसिद्ध है। यह भगवान् के त्याग के नए प्रतीक के प्रति प्रेम से भरा एक साहसी कार्य था, और मुकुन्द दत्त ने इसे अपनी आँखों से होते देखा। इसके बाद, बंगाल लौट जाने पर भी, मुकुन्द हर वर्ष महाप्रभु के दर्शन के लिए पुरी जाते रहे। परम्परा इस नियम को बिना कुछ जोड़े, सीधे शब्दों में लिखती है, मानो हर वर्ष की इस तीर्थयात्रा का साधारण तथ्य ही बता देता हो कि भगवान् के प्रति उनका लगाव कितना गहरा था।
सार्वभौम भट्टाचार्य को भगवान् की सूचना देना #
इन आरम्भिक यात्राओं में से एक में मुकुन्द नित्यानन्द प्रभु और बाकी मण्डली के साथ पुरी पहुँचे। वहाँ उनकी भेंट फिर से गोपीनाथ आचार्य से हुई, जो उनके पुराने परिचित थे। मुकुन्द ने ही उन्हें विस्तार से बताया कि महाप्रभु ने सन्न्यास ले लिया है और भगवान् जगन्नाथ के दर्शन के लिए आए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मण्डली अभी-अभी उन्हें खोजती हुई पहुँची है। गोपीनाथ आचार्य ने महाप्रभु के वास्तविक स्वरूप को तुरन्त पहचान लिया। वे मुकुन्द को अपने साथ अपने साले, महान् तार्किक सार्वभौम भट्टाचार्य के घर ले गए, जहाँ महाप्रभु ठहरे हुए थे। बाद में जब सार्वभौम ने कुछ ऐसी दार्शनिक बातें कहीं जिनसे भक्तों को दुःख हुआ, तो गोपीनाथ आचार्य और मुकुन्द दत्त दोनों ने मिलकर आपत्ति की। महाप्रभु ने उन दोनों को कोमलता से सुधारा। उन्होंने सार्वभौम की निष्ठा का पक्ष लिया, जबकि अगले कुछ दिनों में वे स्वयं सार्वभौम को मायावाद के दर्शन से सदा के लिए मुक्त करने का प्रयास कर रहे थे। यह एक छोटी-सी घटना मुकुन्द के दो पक्ष एक साथ दिखाती है। वे भगवान् के सम्मान की रक्षा के लिए उत्सुक रहते थे, और जब यह उत्साह सीमा से आगे बढ़ जाता, तो वे सुधारे जाने के लिए भी तैयार रहते थे।
गंगा की ओर: एक मुस्लिम सूबेदार का मार्गदर्शन #
वर्षों बाद, वृन्दावन की ओर जाते हुए मार्ग में, महाप्रभु की मण्डली को एक मुस्लिम सूबेदार मिला। वह भगवान् को देखते ही आँसू बहाते हुए भूमि पर गिर पड़ा और सेवा करने की अनुमति माँगने लगा। तब मुकुन्द दत्त ने ही आगे बढ़कर एक व्यावहारिक अनुरोध किया। उन्होंने सूबेदार से कहा कि वह महाप्रभु को आगे गंगा के तट तक पहुँचने में सहायता करे। सूबेदार ने प्रसन्न होकर ऐसा ही किया। उसने अगली सुबह नावें भेजीं और दूसरे तट पर स्वयं भगवान् का स्वागत किया। यह एक छोटा-सा क्षण है, जो सूबेदार के अपने नाटकीय हृदय-परिवर्तन के सामने आसानी से अनदेखा रह जाता है। लेकिन यह मुकुन्द का एक ऐसा पक्ष दिखाता है, जो उनकी कथा में और कहीं नहीं दिखता। वे ऐसे वाक्पटु पार्षद थे, जिन पर दूसरे भक्त अधिकारियों और अजनबियों से साफ और प्रभावी ढंग से बात करने के लिए भरोसा कर सकते थे।
जगन्नाथ के रथ के समक्ष कीर्तन का नेतृत्व #
पुरी में मुकुन्द ने वहाँ एकत्र अन्तरंग मण्डल में अपना स्थान लिया। इस मण्डल में स्वरूप दामोदर गोस्वामी, रामानन्द राय और हरिदास ठाकुर भी थे। रथ-यात्रा के समय भगवान् जगन्नाथ के रथ के आगे सात संकीर्तन-मण्डलियाँ कीर्तन करती थीं। उनमें से तीसरी मण्डली का नेतृत्व मुकुन्द करते थे। हरिदास ठाकुर उस मण्डली के मुख्य नर्तक थे। पुरी-काल के अधिक विस्तृत विवरणों के अनुसार, मुकुन्द उस समय भी उपस्थित थे जब रघुनाथ दास गोस्वामी पहली बार महाप्रभु के दर्शन के लिए आए। वे तब भी उपस्थित थे, जब वृद्ध ब्रह्मानन्द भारती भगवान् के दर्शन के लिए आए। इस दशक का आरम्भ सन्न्यास को टालने की एक विनती से हुआ था। इसके अन्त तक पुरी में भगवान् के जीवन की लगभग हर घटना में मुकुन्द की कोई न कोई भूमिका रही। वे कभी किसी घटना के केन्द्र में नहीं थे, फिर भी लगभग सभी में उपस्थित थे।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (2)
mukunda hayena duḥkhī dekhi' sannyāsa-dharma
tina-bāre śīte snāna, bhūmite śayana
antare duḥkhī mukunda, nāhi kahe mukhe
ihāra duḥkha dekhi' mora dvi-guṇa haye duḥkhe
शब्दार्थ
mukunda: Mukunda; hayena: becomes; duḥkhī: unhappy; dekhi': seeing; sannyāsa-dharma: regulative principles of the renounced order; tina-bāre: three times; śīte: in winter; snāna: bath; bhūmite: on the ground; śayana: lying down; antare: within himself; nāhi kahe mukhe: does not say; ihāra duḥkha: his unhappiness; mora: My; dvi-guṇa: twice; duḥkhe: unhappiness.
"सन्न्यासी होने के नाते मेरा यह कर्तव्य है कि मैं भूमि पर शयन करूँ और शीत ऋतु में भी दिन में तीन बार स्नान करूँ। किन्तु मेरी इस कठोर तपस्या को देखकर मुकुन्द अत्यन्त दुःखी हो जाता है। निःसन्देह, मुकुन्द कुछ कहता नहीं, परन्तु मैं जानता हूँ कि वह मन-ही-मन अत्यन्त दुःखी है, और उसे दुःखी देखकर मैं दुगुना दुःखी हो जाता हूँ।"
महाप्रभु के अपने शब्द, जो उन्होंने अपनी दक्षिण भारत यात्रा के समय कहे। इनमें भगवान् की तपस्या पर मुकुन्द दत्त के मौन दुःख का वर्णन है। यहाँ दिया गया उद्धरण इसी से लिया गया है।
saṅge nityānanda, candraśekhara ācārya
mukunda-datta, — ei tina kaila sarva kārya
शब्दार्थ
saṅge: in His company; nityānanda: Nityānanda Prabhu; candraśekhara ācārya: Candraśekhara Ācārya; mukunda-datta: Mukunda Datta; ei tina: these three; kaila: performed; sarva: all; kārya: necessary activities.
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सन्न्यास ग्रहण किया, तब तीन महापुरुष उनके साथ सभी आवश्यक कार्य सम्पन्न करने के लिए उपस्थित थे। वे थे नित्यानन्द प्रभु, चन्द्रशेखर आचार्य और मुकुन्द दत्त।
उन तीन भक्तों के नाम बताता है जिन्होंने कटवा में महाप्रभु के सन्न्यास के लिए कीर्तन और सामग्री की व्यवस्था की, जिनमें मुकुन्द दत्त भी सम्मिलित थे।
अध्याय 6
तिरोभाव और विरासत
स्नान यात्रा के दिन स्मरण किए जाने वाले एक गायक, और वह परिवार जिसने महाप्रभु को अपने दो अत्यन्त प्रिय भक्त प्रदान किए

किसी भी स्रोत में मुकुन्द दत्त के जन्म या मृत्यु का वर्ष दर्ज नहीं है। इसके बदले जो बचा है, वह है गौड़ीय वैष्णव पंचांग की एक तिथि, पुरी में एक समाधि-स्थल, स्वयं कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी एक आध्यात्मिक पहचान, और एक भाई, जिनकी ख्याति अन्त में उनकी अपनी ख्याति के बराबर हो गई।
स्नान यात्रा का दिन #
परम्परा मुकुन्द दत्त का तिरोभाव ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन मानती है। यह स्वयं स्नान यात्रा का दिन है, जो पुरी में भगवान् जगन्नाथ का वार्षिक स्नान-उत्सव है। यह बात दो स्थानों पर अलग-अलग दर्ज है। श्रील भक्ति वल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा संकलित एक जीवनी इसे सीधे कहती है। और १९७६ में डेट्रॉइट में हुई एक कमरा-वार्ता में श्रील प्रभुपाद के अपने शिष्य माधवानन्द दास को, लगभग बातों-बातों में, यों ही इसका उल्लेख करते हुए सुना जा सकता है। उन्होंने बताया था कि वह दिन स्नान यात्रा का था, जो मुकुन्द दत्त और श्रीधर पण्डित का तिरोभाव-दिवस है, और श्यामानन्द गोस्वामी का तिरोभाव अगले दिन पड़ता था। ये दोनों स्रोत बहुत अलग प्रकार के हैं। एक औपचारिक जीवनी है, और दूसरा दशकों बाद टेप पर दर्ज हुई एक सहज टिप्पणी है। फिर भी दोनों एक ही तिथि पर सहमत हैं। जिस तिरोभाव का वर्ष ही दर्ज नहीं है, उसके लिए इससे अधिक पुष्टि की आशा करना कठिन है।
चौंसठ समाधियाँ #
परम्परा के अनुसार मुकुन्द दत्त की समाधि जगन्नाथ पुरी के उस क्षेत्र में है, जिसे चौंसठ समाधियों के नाम से जाना जाता है। वहाँ महाप्रभु की अपनी पीढ़ी के कई अन्य भक्तों के स्मारक भी हैं। जैसे उनकी तिथि के साथ कोई वर्ष नहीं दिया गया है, वैसे ही इस समाधि के साथ भी कोई वर्ष नहीं दिया गया है। लेकिन यह स्थान स्वयं कुछ बताता है। यह मुकुन्द के विश्राम-स्थल को भगवान् के सबसे निकट के बंगाली पार्षदों के बीच रखता है। यह उसी तीर्थ-नगर में है, जहाँ वे अपने जीवन के एक दशक तक हर वर्ष केवल महाप्रभु के दर्शन के लिए लौटते रहे। इससे पहले इसी नगर में उन्होंने गोपीनाथ आचार्य के साथ खड़े होकर सार्वभौम भट्टाचार्य के सामने महाप्रभु के सम्मान की रक्षा की थी। बाद में इसी नगर से वे भगवान् के साथ वृन्दावन की ओर निकले। मार्ग में, उड़ीसा की सीमा पर, उन्होंने भगवान् के लिए सुरक्षित मार्ग की व्यवस्था करने में एक मुस्लिम सूबेदार की सहायता की। ये दोनों घटनाएँ सन्न्यास और जगन्नाथ पुरी के वर्ष पर बताई गई हैं।
उनके भाई वासुदेव दत्त #
मुकुन्द के परिवार की महाप्रभु-सेवा उनके साथ ही समाप्त नहीं हुई। उनके बड़े भाई वासुदेव दत्त आगे चलकर पूरे चैतन्य-चरितामृत के सबसे प्रसिद्ध भक्तों में से एक बने। ये वही भक्त हैं, जिनके बारे में महाप्रभु ने तीन बार प्रतिज्ञा की कि उनका अपना शरीर केवल वासुदेव को सुख देने के लिए है। वासुदेव यह भी चाहते थे कि हर जीव के पाप-कर्मों का फल वे स्वयं अपने ऊपर ले लें, ताकि महाप्रभु उन सबका उद्धार कर सकें। वासुदेव दत्त ने आगे चलकर यदुनन्दन आचार्य को दीक्षा दी। यदुनन्दन आचार्य आगे रघुनाथ दास गोस्वामी के गुरु बने। इस प्रकार चटगाँव के दोनों दत्त भाइयों से जुड़ी गुरुओं की एक कड़ी एक पीढ़ी बाद वृन्दावन के छह गोस्वामियों में से एक की गुरु-परम्परा तक पहुँचती है। वासुदेव दत्त ने वृन्दावन दास ठाकुर के जन्म-स्थान के पास मामगाछी में मदन-गोपाल का एक मन्दिर भी स्थापित किया। जब से श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने नवद्वीप-परिक्रमा आरम्भ की और इस मन्दिर को परिक्रमा के नियमित पड़ावों में से एक बनाया, तब से गौड़ीय मठ इस मन्दिर की देखभाल करता आ रहा है।
मधुकण्ठ, व्रज के गायक #
कवि कर्णपूर की गौर-गणोद्देश-दीपिका मुकुन्द दत्त को इस एक जीवन से परे का एक नाम भी देती है। कवि कर्णपूर कहते हैं कि स्वयं कृष्ण की वृन्दावन-लीलाओं में मुकुन्द और वासुदेव दत्त मधुकण्ठ और मधुव्रत थे। ये दो गायक थे, जिनके स्वर तब भी व्रज के थे, जब इन दोनों भाइयों में से किसी का भी चटगाँव में जन्म नहीं हुआ था। मुकुन्द के लिए इससे अधिक उपयुक्त पहचान की कल्पना करना कठिन है। बालक के रूप में वे गंगादास पण्डित की टोल में अपने सहपाठी से वाद-विवाद हार जाते थे। गायक के रूप में उनका स्वर ही श्री चैतन्य महाप्रभु को नचाने के लिए पर्याप्त था। कुछ समय के लिए गलत संगति के कारण वे भगवान् की कृपा से वंचित रहे, और यह घटना बहुत प्रसिद्ध है। और नवद्वीप में केवल वही ऐसे व्यक्ति थे, जो जानते थे कि गदाधर पण्डित को कौन-सा एक श्लोक सुनाया जाए। उसी श्लोक ने गदाधर का जीवन बदल दिया। इन सभी भूमिकाओं में उनका वह कण्ठ, जिसे परम्परा मधु के समान मधुर कहती है, सदा सबसे महत्त्वपूर्ण बना रहा।
मुकुन्द दत्त का कोई चित्र किसी स्वतन्त्र ऐतिहासिक अभिलेख में सुरक्षित नहीं है। कोई विद्वान् उनके जन्म या मृत्यु का वर्ष निश्चित नहीं कर सकता। पाँच सौ वर्षों से उनके बारे में जो कुछ बचा है, उसे केवल स्मृति और पाण्डुलिपियों ने सँभाला है। जो बचा है, वह एक सीधा-सा तथ्य है, जिसे ग्रन्थ-दर-ग्रन्थ दोहराया गया है। जब ये भक्त गाने के लिए अपना मुख खोलते थे, तो स्वयं परम भगवान् भी स्थिर नहीं रह पाते थे।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)
vāsudeva datta — prabhura bhṛtya mahāśaya
sahasra-mukhe yāṅra guṇa kahile nā haya
शब्दार्थ
vāsudeva datta: Vāsudeva Datta; prabhura: of Lord Śrī Caitanya Mahāprabhu; bhṛtya: servant; mahāśaya: great personality; sahasra-mukhe: with thousands of mouths; yāṅra: whose; guṇa: qualities; kahile: describing; nā: never; haya: becomes fulfilled.
वासुदेव दत्त, श्री चैतन्य-वृक्ष की उन्नीसवीं शाखा, एक महान् व्यक्तित्व और भगवान् के अत्यन्त घनिष्ठ भक्त थे। उनके गुणों का वर्णन सहस्रों मुखों से भी सम्भव नहीं था।
तात्पर्य से: तात्पर्य अंश: "वासुदेव दत्त, मुकुन्द दत्त के भाई, चट्टग्राम के ही निवासी थे।"
वासुदेव दत्त को मुकुन्द दत्त के बड़े भाई के रूप में बताता है। यहाँ दत्त-परिवार की व्यापक विरासत का जो विवरण दिया गया है, उसका यह मुख्य आधार है।
- Sri Chaitanya-charitamrita, Adi-lila 10.40-42 (Bhaktivedanta VedaBase)
- Sri Chaitanya-charitamrita, Adi-lila 17.65, purport (Bhaktivedanta VedaBase)
- Sri Chaitanya-charitamrita, Madhya-lila 6-7, 10, 16, Antya-lila 6 (Bhaktivedanta VedaBase)
- Mukunda Datta – Biography, Gaudiya History
- Mukunda Datta, Gaudiya History (alternate retelling)
- Sri Mukunda Datta Thakura, in Sri Chaitanya: His Life and Associates by Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
- Interview with Jackie Vaughn, State Representative, 12 June 1976, Detroit (Bhaktivedanta VedaBase)
