मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब
मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब
भक्ति-जीवन पर सीख देने वाले भजन, जो अक्सर अपने ही मन को सम्बोधित होते हैं।
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मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब
मन रे, केनो मिछे भजिछो असार?
मन रे, तुमि बोरो सन्दिग्ध-अन्तर
मन, केनो ए संशोय
मन, जोगी हो'ते तोमार बासना
मन, तुमि पडिले कि छार?
मन, तुमि बोडै पामोर
रति प्रेम स्नेह मान प्रणय ओ रागाख्यान
रत्य्-आस्वाद हेतु जत बिभाब नामेते ख्यात
रस-तत्त्व नित्य जैछे ब्रज-तत्त्व नित्य तैछे
रसेर आधार जिनि ताँर चित्ते रस-खनि
राधा-कृष्ण-गुण-गान मिथासक्ति सम्बर्धन
रूपानुग तत्त्व-सार बुझिते अकङ्ख जाँर
श्रद्धा-देबि नाम जार दुइति स्वभाब तार
श्री उज्ज्वल रस सार स्वभाबतः द्वि-प्रकार
श्री-कृष्णे सेबिबो बोलि' गृह छाडि' कुञ्जे चोलि'
श्री-गुरु श्री-गौरचन्द्र बृन्दाबने जुब-द्वन्द्व
श्री-नन्दानन्दन धन तदीय बल्लभा-गण
सन्दर्शन संस्पर्शन जल्प बर्त्म-निरोधन
साधारणि समञ्जसा स्थायी लाभे भाब दशा
सु-रम्य मधुर-स्मित सर्ब-सल्-लखणान्वित
सु-रम्यादि गुण-गण होइयाछे बिभूषण
स्थायी भाबाबिष्ट चित्त पाइया बिभाब-बित्त