श्री गुरु श्री गौरचन्द्र बृन्दाबने जुब द्वन्द्व
श्री-गुरु श्री-गौरचन्द्र बृन्दाबने जुब-द्वन्द्व
गीतमाला (भक्तिविनोद ठाकुर) से।
रूपानुग भजन दर्पण, यानी रूपानुगों, अर्थात् रूप गोस्वामी के अनुयायियों, के भजन के सामने रखा गया दर्पण, उनतीस गीतों के साथ गीतमाला का दूसरा सबसे बड़ा खंड है। जहाँ पुस्तक में पहले आए कार्पण्य पञ्जिका ने रूप गोस्वामी की स्तवमाला से एक ही प्रार्थना ली थी, वहीं यह खंड उनकी शिक्षा को अधिक व्यापक रूप में लेता है। यह क्रम से उस साधना का वर्णन करता है जिसके द्वारा उनकी परंपरा में चलने वाला भक्त धीरे-धीरे माधुर्य-लीला में, यानी वृन्दावन में राधा और गोविन्द की अंतरंग, प्रेममयी लीलाओं में, प्रवेश करता है। भक्तिविनोद ठाकुर अपनी एक पहले की पूरी गीत-पुस्तक, कल्याण-कल्पतरु, मुख्य रूप से अनुशासित शिक्षा और आत्म-निरीक्षण को समर्पित कर चुके थे। गीतमाला का यह खंड उससे आगे की बात उठाता है। यह ऐसे पाठक को संबोधित है जो साधना में पहले से स्थिर है, और उसे उस विशेष, विस्तृत भीतरी साधना की ओर ले जाता है जिसे रूपानुग सिद्धान्त आवश्यक मानता है, इससे पहले कि कोई साधक उस अंतरंग सेवा के योग्य माना जा सके जिसका वर्णन गीतमाला के अंतिम खंड, सिद्धि लालसा, में है।
29 भजन
श्री-गुरु श्री-गौरचन्द्र बृन्दाबने जुब-द्वन्द्व
बहु-जन्म-भाग्य-बशे चिन्मोय मधुर रसे
जोग जाग सब छार श्रद्धा सकलेर सार
छाडि' अन्य अभिलाष ज्ञान-कर्म-सहाबास
श्रद्धा-देबि नाम जार दुइति स्वभाब तार
रूपानुग तत्त्व-सार बुझिते अकङ्ख जाँर
रसेर आधार जिनि ताँर चित्ते रस-खनि
जेइ रति जन्मे जार सेइ मत रस तार
मधुरेर स्थायी भाब लभे जते अबिर्भाब
रति प्रेम स्नेह मान प्रणय ओ रागाख्यान
रत्य्-आस्वाद हेतु जत बिभाब नामेते ख्यात
श्री-नन्दानन्दन धन तदीय बल्लभा-गण
सु-रम्य मधुर-स्मित सर्ब-सल्-लखणान्वित
सु-रम्यादि गुण-गण होइयाछे बिभूषण
श्री-कृष्णे सेबिबो बोलि' गृह छाडि' कुञ्जे चोलि'
नायिकार शिरोमणि ब्रजे राधा ठाकुराणी
राधा-कृष्ण-गुण-गान मिथासक्ति सम्बर्धन
पञ्च-सखी मध्ये चार नित्य-सिद्ध राधिकार
परम चैतन्य हरि ताँर शक्ति बनेश्वरी
कृष्ण कृष्ण-भक्त-गण गुण नाम सु-चरित
बिभाबित रति जबे क्रियापर हो'ये तबे
स्थायी भाबाबिष्ट चित्त पाइया बिभाब-बित्त
निर्बेद बिषाद मद दैन्य ग्लानि श्रमोन्माद
साधारणि समञ्जसा स्थायी लाभे भाब दशा
श्री उज्ज्वल रस सार स्वभाबतः द्वि-प्रकार
दर्शन आश्लेषन्वित आनुकूल्य सेबाश्रीत
सन्दर्शन संस्पर्शन जल्प बर्त्म-निरोधन
रस-तत्त्व नित्य जैछे ब्रज-तत्त्व नित्य तैछे
कृष्णेर जतेक खेला तार मध्ये नर-लीला