श्रील नरहरि सरकार ठाकुर
श्रीखण्ड वैष्णवों के नेता एवं लोचन दास ठाकुर के गुरु
अन्य नाम नरहरि दास, नरहरि सरकार ठाकुर, श्री नरहरि ठाकुर, नरहरि सरकार
“नरहरि और उनके साथी पार्षद भगवान् को चंवर से हवा करते हैं, जबकि संजय, मुकुन्द और वासु घोष संगत में कीर्तन गाते हैं।”
श्री गौर-आरती, श्लोक 4। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर का यह गीत गौड़ीय वैष्णव मन्दिरों में प्रतिदिन गाया जाता है। इसमें श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए नरहरि सरकार ठाकुर की निजी सेवा का नाम लेकर उल्लेख है।
श्रील नरहरि सरकार ठाकुर श्री चैतन्य महाप्रभु की प्रकट लीला के समय उनके पार्षदों में से एक थे। उनका जन्म महाप्रभु से कुछ वर्ष पहले बंगाल के कटवा के निकट श्रीखण्ड ग्राम में एक वैद्य (चिकित्सक) कुल में हुआ था। श्री चैतन्य-चरितामृत उन्हें महाप्रभु के कृपा-वृक्ष की महान शाखाओं में गिनता है। वहीं अपने तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि श्री चैतन्य-मंगल के प्रसिद्ध रचयिता लोचन दास ठाकुर उनके शिष्य थे। वे श्रीखण्ड के बालक-भक्त रघुनन्दन ठाकुर के चाचा भी थे। रघुनन्दन ने ही परिवार के विग्रह गोपीनाथ को अपने हाथों से भोजन कराया था।
यहाँ एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है, क्योंकि गौड़ीय वैष्णव साहित्य में दो बहुत मिलते-जुलते नामों को लंबे समय से एक-दूसरे से भ्रमित किया जाता रहा है। यह पृष्ठ नरहरि सरकार ठाकुर का है। वे श्रीखण्ड के पार्षद थे, जिन्होंने महाप्रभु के अपने जीवन-काल में सेवा की। वे नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर नहीं हैं, जिन्हें घनश्याम दास भी कहा जाता है। नरहरि चक्रवर्ती वृन्दावन में रहने वाले एक रसोइया-पुजारी थे, जो सौ वर्ष से भी अधिक बाद हुए। वे विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की परम्परा के अनुयायी थे और उन्होंने भक्ति-रत्नाकर तथा नरोत्तम-विलास की रचना की। नाम लगभग एक जैसे होने के कारण बाद के कुछ सारांशों में दोनों को एक ही व्यक्ति मान लिया गया है। लेकिन दोनों परम्परा की बिल्कुल अलग पीढ़ियों के थे, जिनके बीच सौ वर्ष से भी अधिक का अन्तर था।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| जन्म | लगभग 1479-80 ई. (शक 1401/1402), श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य से कुछ वर्ष पूर्व |
| जन्मस्थान | श्रीखण्ड, कटवा के निकट, बर्धमान जिला, बंगाल, एक वैद्य (चिकित्सक) कुल में |
| माता-पिता | नारायण दास (पिता) एवं गोयी (माता) |
| भाई | मुकुन्द दास (बड़े भाई) एवं माधव दास; मुकुन्द के पुत्र रघुनन्दन ठाकुर थे |
| पहचान | गोपी मधुमती, वृन्दावन में श्रीमती राधारानी की प्रिय सखी (गौर-गणोद्देश-दीपिका 177) |
| प्रमुख रचनाएँ | श्री कृष्ण-भजनामृत, भक्ति-चन्द्रिका-पटल, श्री चैतन्य-सहस्रनाम, तथा लघु भक्ति-काव्य |
| प्रमुख शिष्य | लोचन दास ठाकुर, श्री चैतन्य-मंगल के रचयिता |
| तिरोभाव | अगहन मास की कृष्ण एकादशी; वर्ष विवादित है (नीचे देखें) |
श्रीखण्ड का एक वैद्य-परिवार #
नरहरि सरकार ठाकुर का जन्म श्रीखण्ड में एक बंगाली वैद्य-परिवार में हुआ। वैद्य बंगाल की पारम्परिक चिकित्सक-जाति है। वे नारायण दास और गोयी के पुत्र थे। उनके दो भाई थे। सबसे बड़े भाई मुकुन्द दास कुछ समय तक गौड़ में मुस्लिम शासक के राजवैद्य रहे। दूसरे भाई माधव दास थे। यह भी दर्ज है कि नरहरि स्वयं भी कुछ समय के लिए उसी नगर में राजवैद्य रहे। इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह भक्ति-सेवा की ओर मुड़ गया। मुकुन्द दास के पुत्र रघुनन्दन अपने चाचा के निकट पले-बढ़े, और चाचा ने बड़े स्नेह से उनकी देखभाल की। श्री चैतन्य-चरितामृत में श्रीखण्ड के महान भक्तों की सूची केवल इसी परिवार तक सीमित नहीं है। उसमें चिरञ्जीव और सुलोचन का नाम भी श्रीखण्ड के निवासियों के रूप में आता है। चिरञ्जीव के दो पुत्र, रामचन्द्र कविराज और कवि गोविन्द दास कविराज, आगे चलकर स्वयं प्रसिद्ध वैष्णव बने। इस प्रकार श्रीखण्ड में भक्तों का एक नहीं, बल्कि कई परिवार थे, जो विवाह और दूसरे सम्बन्धों से एक-दूसरे से जुड़े थे।
श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में प्रवेश #
महाप्रभु से मिलने से पहले ही नरहरि राधा-कृष्ण की लीलाओं पर भक्ति-पद रचने लगे थे। परम्परा के अनुसार वे गदाधर पण्डित के माध्यम से भगवान् के निजी संग में आए, क्योंकि गदाधर पण्डित सदा महाप्रभु के साथ रहते थे। इस मण्डली में आने के बाद नरहरि की कविता स्वयं गौरांग की ओर मुड़ गई। उनकी निजी सेवा थी कीर्तन के समय भगवान् को चंवर से हवा करना। यह एक छोटी और विनम्र सेवा थी। फिर भी जब भी भक्तिविनोद ठाकुर की श्री गौर-आरती गाई जाती है, गौड़ीय वैष्णव उन्हें इसी सेवा के कारण स्मरण करते हैं, क्योंकि उस गीत में भगवान् को चंवर डुलाने वालों में नरहरि का नाम आता है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी नरहरि को ठीक श्रीखण्ड के भक्तों के बीच स्थान देते हैं। उनके अनुसार मुकुन्द दास और रघुनन्दन मिलकर कृपा-वृक्ष की उनतालीसवीं शाखा हैं, नरहरि स्वयं चालीसवीं शाखा हैं, और चिरञ्जीव तथा सुलोचन इकतालीसवीं और बयालीसवीं शाखा हैं।
मधु-पुष्करिणी और गौरांग देव-विग्रह #
श्रीखण्ड के उनके वर्षों की दो लीलाएँ आज भी विशेष स्नेह से सुनाई जाती हैं। पहली लीला में नित्यानन्द प्रभु नरहरि के घर पधारे और खेल-खेल में पूछा कि उनका मधु कहाँ है। यह नरहरि की गोपनीय पहचान की ओर संकेत था। गौर-गणोद्देश-दीपिका के अनुसार वे गोपी मधुमती हैं, जो श्रीमती राधारानी की प्रिय सखी थीं। परम्परा के अनुसार कृष्ण-लीला में उनकी सेवा राधा और गोविन्द के लिए मधु लाना है। नरहरि पास के एक तालाब पर गए और उसके जल से एक घड़ा भर लाए। वह जल स्वयं मधु बन गया, और नित्यानन्द प्रभु तथा उनके साथियों ने उसे पिया। बाद में यह तालाब मधु-पुष्करिणी, अर्थात् मधु का तालाब, के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रीखण्ड में यह आज भी दिखाया जाता है। दूसरी लीला में महाप्रभु ने स्वप्न में नरहरि को आज्ञा दी कि वे उनके भाव-विभोर नृत्य-रूप के तीन विग्रह गढ़ें। नरहरि ने ऐसा ही किया। ये तीन विग्रह श्रीखण्ड, कटवा और गंगानगर में स्थापित किए गए, जहाँ भक्त आज भी उनकी सेवा-पूजा करते हैं। दोनों लीलाओं का विस्तृत वर्णन मधु-पुष्करिणी और गौरांग देव-विग्रह में दिया गया है।

कवि कर्णपुर गौर-गणोद्देश-दीपिका के श्लोक 177 में यह पहचान देते हैं:
पुरा मधुमती प्राणसखी वृन्दावने स्थिता ।
अधुना नरहर्याख्यः सरकारः प्रभोः प्रियः ॥
"श्रीमती राधारानी की प्रिय सखी, व्रज-गोपी मधुमती-देवी, नरहरि सरकार के रूप में प्रकट हुईं, जो भगवान चैतन्य के अत्यन्त प्रिय थे।" (गौर-गणोद्देश-दीपिका 177)
श्रीखण्ड वैष्णवों के नेता #
श्रीखण्ड में नरहरि अकेले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वहाँ के मान्य नेताओं में से एक थे। लगभग हर वर्ष श्रीखण्ड की मण्डली यात्रा करती थी, जिसमें मुकुन्द दास, नरहरि और रघुनन्दन भी होते थे। वे पहले शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के घर जाते, जहाँ एक बड़ा समागम होता था। इसके बाद वे चातुर्मास्य के लिए जगन्नाथ पुरी जाते। श्री चैतन्य-चरितामृत बताता है कि रथ-यात्रा उत्सव में खण्ड के निवासियों ने अपनी अलग कीर्तन-मण्डली बनाई थी, जिसमें "नरहरि प्रभु और रघुनन्दन" साथ-साथ नृत्य करते थे। रघुनन्दन ठाकुर की जीवन-कथा में बताया गया है कि महाप्रभु ने श्रीखण्ड के तीन प्रमुख व्यक्तियों को तीन अलग-अलग कर्तव्य सौंपे थे। मुकुन्द को ईमानदारी से धन कमाना था, रघुनन्दन को परिवार के विग्रह की सेवा करनी थी, और नरहरि को केवल सदा भक्तों के संग में रहना था। इन यात्राओं और इस साझा भक्ति-जीवन का विस्तृत वर्णन श्रीखण्ड वैष्णवों के नेता में दिया गया है।

लोचन दास ठाकुर के गुरु #
नरहरि की सबसे स्थायी देन एक ही शिष्य के माध्यम से आगे बढ़ी। पास के कोग्राम गाँव से युवा लोचन दास श्रीखण्ड आए। नरहरि ने उन्हें स्वीकार किया और स्वयं उन्हें कीर्तन की कला सिखाई। समय आने पर उन्होंने लोचन दास को एक विशेष आज्ञा दी। उन्हें महाप्रभु के जीवन और लीलाओं का पूरा वृत्तान्त संस्कृत में नहीं, बल्कि बंगाली में रचना था। इसी आज्ञा से श्री चैतन्य-मंगल की रचना हुई, जो 1537 ई. में पूरी हुई। कृष्णदास कविराज गोस्वामी की श्री चैतन्य-चरितामृत के साथ यह आज भी महाप्रभु की दो प्रमुख काव्य-जीवनियों में से एक मानी जाती है। इस शिष्यत्व की पूरी कथा लोचन दास ठाकुर के अपने पृष्ठ नरहरि सरकार ठाकुर के अधीन शिष्यत्व में और लोचन दास ठाकुर के गुरु में दी गई है। उसमें वे अनेक स्थान भी शामिल हैं, जहाँ लोचन दास ठाकुर स्वयं कहते हैं कि वे अपने गुरु पर ही निर्भर हैं।
उनकी अपनी भक्ति-रचनाएँ #
लोचन दास ठाकुर को शिष्य बनाने से पहले ही नरहरि स्वयं संस्कृत और बंगाली के एक मान्य कवि थे। कई रचनाएँ उनकी मानी जाती हैं: श्री कृष्ण-भजनामृत, भक्ति-चन्द्रिका-पटल, श्री चैतन्य-सहस्रनाम, और शचीनन्दनाष्टक तथा राधाष्टक जैसी छोटी कविताएँ। इन रचनाओं का अध्ययन करने वाले साहित्य-इतिहासकारों ने एक आरम्भिक काव्य-धारा पहचानी है, जिसमें महाप्रभु के अपने रूप-सौन्दर्य का गहरा ध्यान किया गया है। इसे कभी-कभी "गौर-नागर" भाव कहा जाता है। सच्चाई को ठीक से रखने के लिए यहाँ दो बातें कहना आवश्यक है। पहली, यह कहीं दर्ज नहीं है कि नरहरि या लोचन दास ठाकुर ने उस भाव पर आधारित कोई साधना सिखाई हो। दूसरी, पूरी तरह विकसित "गौरांग-नागरी" धारा बाद में कुछ अलग मण्डलियों में पनपी। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने उसे दृढ़ता से अस्वीकार किया और उसे परम्परा द्वारा पहचाने गए अपसम्प्रदायों, अर्थात् भटकी हुई शाखाओं, में गिना। नरहरि के बारे में श्री चैतन्य-चरितामृत के जो वचन ऊपर दिए गए हैं, उनमें ऐसी कोई शंका नहीं है। वह उन्हें साफ शब्दों में महाप्रभु के कृपा-वृक्ष की महान और शुद्ध शाखाओं में से एक बताता है। अधिक विवरण रचनाएँ, तिरोभाव और एक परवर्ती विवाद का ईमानदार उल्लेख में दिया गया है।

तिरोभाव और विरासत #
नरहरि सरकार ठाकुर का तिरोभाव अगहन मास की कृष्ण एकादशी को हुआ। वर्ष के बारे में स्रोतों में बड़ा मतभेद है। कुछ इसे लगभग 1540 ई. बताते हैं, जबकि कुछ के अनुसार यह 1582 ई. जितना बाद में हुआ। हम यह अन्तर यहाँ ईमानदारी से बता रहे हैं और किसी एक मत को चुनने का प्रयास नहीं कर रहे। परम्परा के अनुसार उनकी समाधि राधा-कुण्ड में है। भक्ति-रत्नाकर के अनुसार, उनके शिष्य लोचन दास ठाकुर अपने गुरु के तिरोभाव-महोत्सव में उपस्थित थे और आए हुए अतिथियों को चन्दन और मालाएँ बाँट रहे थे। नरहरि अपने पीछे केवल एक समाधि-स्थल नहीं छोड़ गए। उनकी इच्छा थी कि सामान्य बंगाली पाठक भी महाप्रभु की लीलाओं में प्रवेश कर सकें। लोचन दास ठाकुर की श्री चैतन्य-मंगल ने नरहरि की इस इच्छा को पूरे गौड़ीय वैष्णव जगत तक पहुँचाया। उधर श्रीखण्ड में उनके भतीजे रघुनन्दन की विग्रह-सेवा की परम्परा पीढ़ियों तक चलती रही। आज भी जहाँ कहीं गौड़ीय वैष्णव मन्दिर-सेवा के आरम्भ में भक्तिविनोद ठाकुर की श्री गौर-आरती गाते हैं, वहाँ उनका नाम लिया जाता है।
एक दृष्टि में
- श्रीखण्ड के एक वैद्य-चिकित्सक-पुत्र, जिन्हें श्री चैतन्य-चरितामृत में सीधे महाप्रभु के कृपा-वृक्ष की चालीसवीं महान शाखा कहा गया है।
- गदाधर पण्डित के माध्यम से महाप्रभु की निजी सेवा में आए और भगवान् को चंवर से हवा करने की सेवा के लिए प्रसिद्ध हुए; भक्तिविनोद ठाकुर की श्री गौर-आरती में आज भी इस सेवा के साथ उनका नाम गाया जाता है।
- लोचन दास ठाकुर के गुरु, जिन्हें उन्होंने स्वयं श्री चैतन्य-मंगल रचने की आज्ञा दी।
- रघुनन्दन ठाकुर के चाचा और मुकुन्द दास के छोटे भाई; ये सब मिलकर श्रीखण्ड के वैष्णव मण्डल के केन्द्र में एक भक्ति-परिवार थे।
- बहुत बाद के नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर (घनश्याम दास) से भ्रमित न हों, जो वृन्दावन में रहते थे और भक्ति-रत्नाकर के रचयिता थे।
शास्त्र प्रमाण
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Verse 177 Gaura-ganoddesha-dipika
अन्य शास्त्र प्रमाण:
khandavasi mukunda-dasa, sri-raghunandana
narahari-dasa, ciranjiva, sulocana
ei saba mahasakha -- caitanya-krpadhama
prema-phala-phula kare yahan tahan dana
शब्दार्थ
khanda-vasi mukunda-dasa -- Mukunda dasa, a resident of Srikhanda; sri-raghunandana -- Raghunandana; narahari-dasa -- Narahari dasa; ciranjiva -- Ciranjiva; sulocana -- Sulocana; ei saba -- all of them; maha-sakha -- great branches; caitanya-krpa-dhama -- of Lord Sri Caitanya Mahaprabhu, the reservoir of mercy; prema -- love of God; phala -- fruit; phula -- flower; kare -- does; yahan -- anywhere; tahan -- everywhere; dana -- distribution.
श्रीखण्डवासी मुकुन्द और उनके पुत्र रघुनन्दन वृक्ष की उनतालीसवीं शाखा थे, नरहरि चालीसवीं शाखा थे, चिरञ्जीव इकतालीसवीं तथा सुलोचन बयालीसवीं शाखा थे। ये सभी श्री चैतन्य महाप्रभु के परम कृपामय वृक्ष की महान शाखाएँ थीं। इन्होंने सर्वत्र प्रेम के फल और पुष्प वितरित किए।
तात्पर्य से: तात्पर्य का अंश: "नरहरि दास सरकार एक अत्यन्त प्रसिद्ध भक्त थे। श्री चैतन्य-मंगल के प्रसिद्ध रचयिता लोचन दास ठाकुर उनके शिष्य थे।"
श्री चैतन्य महाप्रभु के पार्षदों में नरहरि सरकार ठाकुर के स्थान का तथा लोचन दास ठाकुर के साथ उनके गुरु-शिष्य सम्बन्ध का प्रमुख शास्त्रीय आधार।
narahari-adi kori' camara dhulaya
sanjaya-mukunda-vasu-ghosa-adi gaya
नरहरि सरकार तथा अन्य पार्षद भगवान् को चंवर (चामर) से हवा करते हैं, जबकि संजय पण्डित, मुकुन्द दत्त एवं वासु घोष के नेतृत्व में भक्तगण संगत में कीर्तन गाते हैं।
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के स्वरचित आरती-गीत की एक पंक्ति, जो गौड़ीय वैष्णव मन्दिरों में प्रतिदिन गाई जाती है तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में नरहरि सरकार ठाकुर की व्यक्तिगत सेवा का नामोल्लेख करती है; इसी पंक्ति से यहाँ प्रयुक्त उद्धरण लिया गया है।
- Sri Chaitanya-charitamrita, Adi-lila 10.78-79, with Prabhupada's purport
- Sri Chaitanya-charitamrita, Madhya-lila 13.46
- Narahari Sarakara Thakura - Biography, Gaudiya History
- Narahari Sarakara Thakura, Gaudiya History
- Narahari Sarakara Thakura, Gaudiya History (part 2)
- Narahari Chakravarti Thakura, Gaudiya History (for disambiguation)
- The Sacred Legacy of Srikhanda: Narahari Sarakara Thakura, ISKCON Bangalore
- Narahari Sarkar, Mukunda Das & Raghunandana, The Gaudiya Treasures of Bengal
- Srila Narahari Sarkar Thakura, Shyam Das Baba
- Srila Narahari Sarakara Thakura - Disappearance, ISKCON Desire Tree
- Narahari Sarakara Thakura, Stephen Knapp
- Gaura Arati lyrics (verse 4, camara service), lyricstranslate.com
- Gaura Arati, Sri Krishna Balaram Mandir
- Gaura-Nagara Bhava, Swami Tripurari (context on the apasampradaya note)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रील नरहरि सरकार ठाकुर का जन्म कब हुआ था?
श्रील नरहरि सरकार ठाकुर का प्राकट्य लगभग 1479-80 ई. (शक 1401/1402), श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य से कुछ वर्ष पूर्व में, श्रीखण्ड, कटवा के निकट, बर्धमान जिला, बंगाल में हुआ।
श्रील नरहरि सरकार ठाकुर का तिरोभाव कब और कहाँ हुआ?
श्रील नरहरि सरकार ठाकुर का तिरोभाव अगहन मास की कृष्ण एकादशी; ठीक वर्ष विवादित है, स्रोतों में लगभग 1540 से 1582 ई. तक की तिथियाँ मिलती हैं, श्रीखण्ड, बंगाल; समाधि परम्परा अनुसार राधा-कुण्ड में स्थित है में हुआ।
श्रील नरहरि सरकार ठाकुर की प्रमुख लीलाएँ कौन-सी हैं?
यहाँ इन लीलाओं पर पृष्ठ उपलब्ध हैं: जन्म और महाप्रभु की सेवा में प्रवेश, मधु-पुष्करिणी और गौरांग देव-विग्रह, श्रीखण्ड वैष्णवों के नेता, लोचन दास ठाकुर के गुरु, रचनाएँ, तिरोभाव और एक परवर्ती विवाद का ईमानदार उल्लेख।








