श्री गुरु बैष्णब कृपा कोत दिने हबे
श्री-गुरु-बैष्णब-कृपा कोत दिने हबे
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श्री-गुरु-बैष्णब-कृपा कोत दिने हबे
श्री-गुरु श्री-गौरचन्द्र बृन्दाबने जुब-द्वन्द्व
भाइ रे
तुँहु दोया-सागर तारयिते प्राणी
श्री-नन्दानन्दन धन तदीय बल्लभा-गण
हरि हे!
श्री-रूप-बदने श्री-सचि-कुमार
श्री रूप मञ्जरी कबे मधुर बचने
श्रीबास-बचन श्रबण कोरिया
श्रीबासे कोहेन प्रभु तुँहु मोर दास
श्रीबासेर प्रति चैतन्य-प्रसाद
सखि गो, केमते धरिबो पराण
हरि हे!
सन्दर्शन संस्पर्शन जल्प बर्त्म-निरोधन
सबु मेलि' बालक-भाग बिचारि'
साधारणि समञ्जसा स्थायी लाभे भाब दशा
साधु-सङ्ग ना होइलो हाय
सु-रम्य मधुर-स्मित सर्ब-सल्-लखणान्वित
सु-रम्यादि गुण-गण होइयाछे बिभूषण
हरि हे
स्थायी भाबाबिष्ट चित्त पाइया बिभाब-बित्त
'हरि' बोले' मोदेर गौर एलो
(हरे) हरये नमः कृष्ण जादबाय नमः
हा हा कबे गौर-निताइ
हा हा मोरा गौर-किशोर
हेनो काले कबे बिलास मञ्जरी
हरि हे
हो'ये विषये आवेश, पे'ले, मन, जातना अशेष