मन तुमि भालबास कामेर तरङ्ग
मन तुमि भालबास कामेर तरङ्ग
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मन तुमि भालबास कामेर तरङ्ग
मन तुमि सन्न्यासी साजिते केनो चाओ
मन तोरे बोलि ए बारता
मन रे धन-मद नितान्त असार
मन रे, केनो आर बर्ण अभिमान
मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब
मन रे, केनो मिछे भजिछो असार?
मन रे, तुमि बोरो सन्दिग्ध-अन्तर
मन, केनो ए संशोय
मन, जोगी हो'ते तोमार बासना
मन, तुमि पडिले कि छार?
मन, तुमि बोडै पामोर
मनेर् माला जप्बि जखन्, मन,
महाभाब-चिन्तामणि उद्भाबित-तनु-खानि
मानुष-भजन् कोर्छो, ओ भाइ, भावेर् गान् धोरे'
हरि हे
मृत शिशु लो'ये तबे भकत-बत्सल
यदा हि जीव-विज्ञानं पूर्णम् आसीन् मही-तले
येषां रागोदितः कृष्णे श्रद्धा वा विमलोदिता
योग-पीठोपरि-स्थित, अष्ट-सखी-सुवेष्टित,
यौवने जखोन, धन-उपार्जने,
रति प्रेम स्नेह मान प्रणय ओ रागाख्यान
रत्य्-आस्वाद हेतु जत बिभाब नामेते ख्यात
रस-तत्त्व नित्य जैछे ब्रज-तत्त्व नित्य तैछे
रसिक-नागरी- गण-शिरोमणि
रसेर आधार जिनि ताँर चित्ते रस-खनि
राधा-कृष्ण-गुण-गान मिथासक्ति सम्बर्धन
राधा-बल्लभ माधब श्री-पति मुकुन्द
राधा-बल्लभ राधा-बिनोद
राधा-भजने जदि मति नाहि भेला
राधिका-चरण-पद्म सकल-श्रेयेर सद्म
भाइ रे
रूपानुग तत्त्व-सार बुझिते अकङ्ख जाँर
वन्दे वृन्दाटवी-चन्द्रं
विषय-विमूढ आर् मायावादी जन्
व्यासेन व्रज-लीलायां नित्य-तत्त्वं प्रकाशितम्
भाइ रे
शत-कोटि गोपी माधब-मन
शरीरेर सुखे मन देहो जलञ्जलि
हरि हे
शुनो हे रसिक-जन कृष्ण-गुण अगणन
श्रद्धा-देबि नाम जार दुइति स्वभाब तार
श्री उज्ज्वल रस सार स्वभाबतः द्वि-प्रकार
श्री-कृष्ण-चैतन्य अद्वैत प्रभु नित्यानन्द
श्री-कृष्ण-तत्त्व-निर्देशे कृपा यस्य प्रयोजनम्
श्री-कृष्ण-बिरहे राधिकार दास
श्री-कृष्ण-सङ्कीर्तने जदि मानस तोहार
श्री-कृष्णे सेबिबो बोलि' गृह छाडि' कुञ्जे चोलि'