भब सागर बर दुरतर दुरग्रह
भब सागर बर दुरतर दुरग्रह
गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन (नरहरि दास) से।
घनश्याम दास की छाप वाले गौर-चन्द्रिका के छह भजन। इनमें से कई में इस शैली की आम खगोलीय कल्पना है: नवद्वीप का चन्द्रमा उगता है, ग्रहण में आता है और फिर मुक्त होता है। यह फाल्गुन पूर्णिमा पर चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य का वर्णन करने का पारम्परिक ढंग है। उनके जन्म की पारम्परिक तिथि के अनुसार उस रात सचमुच चन्द्रग्रहण हुआ था।
6 भजन
भब सागर बर दुरतर दुरग्रह
आजु पूर्णिमा साज समये राहु शशी गरासि
पूर्णिमा-प्रतिपद-सन्धि समय पा-इ राहु गरासल गगन-शशी
जगन्नाथ मिश्रेर भबने
को कहे अपरूप प्रेम-सुधा-निधि
आहा मरि मरि देख आङ्खि भरि