सनकादि मुनि गँए चाहि बुले देब गँए
सनकादि मुनि-गँए चाहि बुले देब-गँए
गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन (नरहरि दास) से।
शेखर दास की छाप वाले आठ भजन, जो यहाँ के भरे-पूरे अध्यायों में से एक है। इनमें गौरांग के दर्शन के लिए ऋषियों के इकट्ठा होने का वर्णन भी है, और कई ऐसे पद भी जो दोहराए गए बंगाली विशेषणों पर बने हैं, जैसे सुन्दर सुन्दर, अतुल अतुल। इस पदावली परम्परा में केवल दोहराव से विस्मय जगाने की यह शैली आम है।
8 भजन
सनकादि मुनि-गँए चाहि बुले देब-गँए
गौराङ्ग रसेर नदी प्रेमेर तरङ्ग
जगन्नाथ मिश्रेर सुकृति बीज हैते
हाटेर पत्तन श्री-शचीनन्दन
नाचत नगरे नागर गौर हेरि मूरति मदन भोर
मधुर मधुर गौर-किशोर, मधुर मधुर नाट
सुन्दर सुन्दर गौराङ्ग सुन्दर, सुन्दर सुन्दर रूप
अतुल अतुल गौराङ्गेर रूप, अतुल ताहार आभा