शचि सुत गौर हरि नबद्वीपे अबतारि
शचि-सुत गौर-हरि नबद्वीपे अबतारि
गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन (नरहरि दास) से।
गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन संग्रह के इस अध्याय में इकट्ठे नरहरि दास के सत्तावन भजन पदावली-कीर्तन परम्परा के हैं। यह बंगाली भक्ति-काव्य का वह भण्डार है, जिसे ऐसे कवियों ने रचा जो चैतन्य महाप्रभु के अपने जीवन-काल के निकट थे या उसके कुछ ही बाद लिख रहे थे। उनके समकालीनों में गोविन्द दास, बलराम दास, लोचन दास और वासुदेव घोष जैसे कवि थे, जिनमें से कई के इसी पुस्तक में अपने अलग अध्याय हैं। यहाँ के भजन अधिकतर गौर-चन्द्रिका हैं, यानी फाल्गुन पूर्णिमा पर नवद्वीप में चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य का उत्सव मनाने वाले पद: शची देवी के घर का आनन्द, पुत्र के जन्म पर जगन्नाथ मिश्र की खुशी, उस रात पूरे नगर का विस्मय। यहाँ एक सच्ची अनिश्चितता को साफ़ कहना ज़रूरी है, ताकि जितना ज्ञात है उससे अधिक दावा न हो। यह अच्छी तरह प्रमाणित है कि पदावली परम्परा में बहुत मिलते-जुलते नामों वाले कवि हुए हैं, जो कभी-कभी अपने पदों में एक से अधिक भणिता लगाते थे। इस साइट के अपने रचयिता-अभिलेखों में भी इन नरहरि दास के साथ एक नरहरि सरकार अलग से दर्ज हैं। इन सत्तावन भजनों के कवि क्या वही ऐतिहासिक व्यक्ति हैं जो श्रीखण्ड के नरहरि सरकार ठाकुर थे, चैतन्य महाप्रभु के प्रसिद्ध प्रत्यक्ष पार्षद, इसकी पुष्टि यह साइट नहीं कर सकती। भजन यहाँ उसी नाम से दिए गए हैं जिस नाम से मूल संग्रह उन्हें देता है।
57 भजन
शचि-सुत गौर-हरि नबद्वीपे अबतारि
अनुपम गोर अबतार
गौराङ्ग के जाने महिमा तोमार
पाशरा ना याय आमार गौरचान्देर लीला
फाल्गुन-पूर्णिमा मङ्गलेर सीमा
परम शुभ शची-गभे बिलसत गौर गोकुल नाह
जय जय जय मङ्गल-रब, फाल्गुन-पूर्णिमा-निशि नब शोभित
भुबन-मनो-चोरा गोकुल-पति गोरा
नदीयार नारी पुरुष सुकृति मानि
जगन्नाथ मिश्र महा-सुखे
शची ठाकुराणी चारु छान्दे
निशि परभात समये ये-रूप आनन्द शचीर घरे
आहा मरि मरि गौराङ्गचान्देर चरिते केब न झुरे
शुन हे सु-मति अति निरजने कहिये गुपत कथा
आजु शुभ-क्षणे पोहा-इल निशि
अद्वैत-घरणी सीता ठाकुराणी केबल रसेर राशि
श्रीबास-बनिता अति सु-चरित स्नेहेर मूरति येन
रजनी-प्रभाते शची-देबी चिते आनन्देर नाहि ओर
आजु कि आनन्द श्री-शची-भुबने रजनी-प्रभात-काले
नदीयार अति पुण्यबती पति
नाचे आरे बाप बिश्वम्भर
रङ्गे नाचये शचीर बाला
आजि आङ्गिन पर नदीया बालक साञे
गौरसुन्दर परम शुभ-क्षणे धरल यज्णोपबीत
बल्लभ-दुहिता लक्ष्मी सु-चरिता
कि आनन्द नदीया-नगरे
श्री-शची-अलय अति शोभमय
शोभामय शचीर अङ्गने
आजु स्नेहेते बिह्वोल हैया
अधिबास निशि पोहा-इले
किबा श्री-शची-भबन माझे
आजु कत ना आनन्द मने
बेश बना-इया सहचरे
आजु गो-धूलि समय शुभ-क्षण, गौर गुण मणि भुबन मोहन,
गौरचन्देर बिबाह देखिबारे
बल्लभ भबने गौर राय
गोरा गुण-मणि प्राण प्रिया-सह बिलसये शोज बासर घरे
गोराचन्देर बिबाह पर-दिने
गौर गोकुल-चन्द्र चलु निज गेहे निशि परभात
बिबाह करिया बिश्वम्भर
लक्ष्मी प्राय लक्ष्मी ठाकुराणी
नदीया-नगरे हैल ध्वनि
गोरा बिधु अधिबास सुखे केना बैसे प्रबेशिया भुबन माझे
होत शुभ अधिबास शुभ-क्षणे, गगने सुर-गण मगन गण सने
कि आनन्द शचीर भबने
सनातन मिश्रेर भबने
देखि पहुङ्क बिबाह माधुरी को-इ धर-इ ना थेह
देब-रमणी-बृन्द बिरचि बेश बिबिध भान्ति
आहा मरि मरि सुर-नारी-गण, नदीया-चान्देर बिबाह देखि
देब देब-रमणी उल्लासे
बरज-भूषण-गौर-बिधु-बर, करि बिबाह बिनोद-गति पर
गोराचान्द बिबाह करिया
गोरा गुण-मणि सुघड शेखर परम मुदित हियाय
नाचत भुबन-मोहन चम्पक कनक कण्ज जिनि बरण
गौराङ्ग नहिते तबे कि ह-इते
गोरा मोर शुधा-इ काँचा सोना
निमा-इ चञ्चल खेपा किछु-इ ना माने गो शुन एक दिबसेर कथा