तुमि सर्ब गुण जुत शक्ति तब बशी भूत
हेरि हे
भगवान के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की स्तुति करते आनन्द भरे भजन।
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हेरि हे
हरि हे
हरि हे
हरि हे
हरि हे
हरि हे
नमो ब्राह्मण-रूपाय
पषाण-धातु-मृद्-दारु-- सिकता-मणि-लेख-ज
सर्व-षस्त्राब्धि-पीयुष
देख शची-नन्दन, जगत जीबन धन, अनुखण प्रेम-धन
हरि हे
नदीया-आकाशे सङ्कीर्तन-मेघ साजे
नबद्वीपे शुनि सिंह-नाद
नाचत गौर नटन पण्डित-बर
नाचत गौर निखिल नट-पण्डित निरुपम भङ्गी मदन-मद हर-इ
नाचत गौर परम सुख-सदना
नाचत गौर पूरब रसे भोर
नाचत गौरचन्द्र नट-भूप
नाचत नट-बर गौर-किशोर
नाचत नीके गौर-बर रतन
नाचत शची-तनय गौर-माधुरी मन मोहे
नाचये गौराङ्ग पहुं सहचर सङ्ग
नाचये चैतन्य चिन्तामणि
नाचे गोरा गुण-मणि केबल प्रेमेर खनि
नाचे गौराङ्गचान्द बिभोर भाबेते
नाचे शचीर दुलाल रङ्गे
निज नामामृत पहुं मत्त अनुक्षण
नृत्यत गौरचन्द्र जन-रञ्जन, नित्यानन्द बिपद-भय-भञ्जन
हरि हे
बरज-बिपिने जमुना-कूले
बलि-कलि-मत्त-मतङ्गज-मरदन, गौर-सिंह नाचत नदीयाय
बहिर्मुख हो'ये मायारे भजिये
बाच्य ओ बाचक दुइ स्वरूप तोमार
बिरजर परे शुद्ध-परब्योम-धाम
हरि हे
भाद्र-कृष्ण-अष्टमीते देबकी-उदरे
भाबाबेशे गोराचान्द बिभोर ह-इया
भाबे भरल हेम तनु अनुपम रे, अहर्-निशि निज-रसे भोर
भुबन-मोहन गोराचान्द
हरि हे
महा-भुज नाचत चैतन्य राय
महाभाब-चिन्तामणि उद्भाबित-तनु-खानि
हरि हे
रसिक-नागरी- गण-शिरोमणि
राधा-भजने जदि मति नाहि भेला
राधिका-चरण-पद्म सकल-श्रेयेर सद्म
रो-इ रो-इ जपे गोरा कृष्ण-नाम-मधु
लीला-कारी जगन्नाथ