आत्म समर्पने गेला अभिमान्
आत्म-समर्पने गेला अभिमान्
भक्तिविनोद ठाकुर इस संग्रह के 316 भजनों के रचयिता हैं, जो इन ग्रन्थों से लिए गए हैं: गीतावली, शरणागति, कल्याण-कल्पतरु, गीतमाला, बाउल संगीत, वैष्णव आचार्यों के और भजन। 421 रिकॉर्डिंग सुनी जा सकती हैं।
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आत्म-समर्पने गेला अभिमान्
आमार एमोन भाग्य कोत दिने ह'बे
आमार समान हीन नाहि ए सोंसारे
आमि अति दिन-मति ब्रज-कुञ्जे निबसति
आमि अति पामर दुर्जन
हरि हे
हरि हे
आमि तो’ स्वानन्द-सुखद-बासी
आमि तोमार् दुःखेर् दुःखी सुखेर् सुखी,
हरि हे
हरि हे
आसलो कथा बोल्ते कि
एओ तो' एक कलिर् चेला
भाइ रे
एक्-बार् भाबो मने
एलो रे गौराङ्गचान्द प्रेमे एलोथेलो
एषा लीला विभोर् नित्या गोलोके शुद्ध-धामनि
ओरे मन कर्मेर कुहरे गेलो काल
ओरे मन कि बिपद होइलो आमार
ओरे मन क्लेश-ताप देखि जे अशेष
ओरे मन, बाड़िबार आशा केनो कोरो'?
ओरे मन बारिबार आशा केनो कोरो
ओरे मन बोलि शुनो तत्त्व-बिबरण
ओरे मन भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा कोरो दूर
हरि हे
ओहे भाइ, मन केनो ब्रह्म हो'ते चाय
ओहे हरिनाम, तव महिमा अपार
कबे आहा गौराङ्ग बोलिया
कबे मोर मूढ़ मन छाड़ि अन्य ध्यान
कबे मोर मूढ मन छारि' अन्य ध्यान
कबे मोर शुभ-दिन होइबे उदोय
कबे मोर शुभदिन होइबे उदोय
गुरुदेव्!
कर्म-काण्ड-स्वरूपो'यम् मागधः कंस-बान्धवः
कलि-युग-पाबन बिश्वम्भर
कि आर बोलिबो तोरे मन
कृष्ण कृष्ण-भक्त-गण गुण नाम सु-चरित
कृष्ण गोबिन्द हरे
कृष्ण-नाम धरे कोतो बल्
कृष्ण-बंशी-गीत शुनि' देखि' चित्र-पत-खनि
कृष्ण-भक्ति बिना कभु नाहि फलोदोय
कृष्णेर जतेक खेला तार मध्ये नर-लीला
केनो आर कोरो द्वेष बिदेषि-जन-भजने
केनो भेकेर् प्रयास्?
केनो मन कामेरे नचाओ प्रेम-प्राय
गाइते गाइते नाम कि दशा होइलो
गाइते गोविन्द-नाम्, उपजिलो भाव-ग्राम्,
गोद्रुम-धामे भजन-अनुकूले