श्रील राघव पण्डित गोस्वामी
गोवर्धन-वासी, व्रज के मार्गदर्शक
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परिचय
श्रील राघव पण्डित गोस्वामी दक्षिण भारत के एक वैष्णव सन्त थे, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपना घर बना लिया। वे वृन्दावन के बाद वाले गोस्वामियों के समय में रहे, और पुराने ग्रन्थ उन्हें तीन नामों से पुकारते हैं: राघव गोसाईं, राघव पण्डित और राघव गोस्वामी। वे गोवर्धन के दक्षिणी छोर पर एक गुफा में रहते थे, व्रज के वनों में घूमते रहते थे, और प्रायः राधा-कुण्ड पर अपने प्रिय मित्र रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ रहते थे। उन्हें सबसे अधिक उस मार्गदर्शक के रूप में याद किया जाता है, जिन्हें श्रील जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर के साथ भेजा, ताकि वे उन्हें व्रज-मण्डल के सब पवित्र स्थान दिखा सकें। नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने ग्रन्थ भक्ति-रत्नाकर की पंचम तरंग में, पृष्ठ पर पृष्ठ, उस महान परिक्रमा का वर्णन किया है। कवि कर्णपुर ने गौर-गणोद्देश-दीपिका में उन्हें चम्पकलता बताया है, जो श्रीमती राधारानी की आठ सबसे प्रिय सखियों में से एक हैं। कवि कर्णपुर उन्हें भक्ति-रत्न-प्रकाश का लेखक भी बताते हैं। यह कृष्ण की शुद्ध भक्ति पर संस्कृत में लिखा गया ग्रन्थ है, जो आज भी उपलब्ध है। वे पानिहाटी के राघव पण्डित से अलग व्यक्ति हैं, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के पार्षद थे, यद्यपि आज की बहुत-सी पुस्तकें इन दोनों को एक मान लेती हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| अन्य नाम | राघव गोसाईं, राघव पण्डित और श्री राघव (भक्ति-रत्नाकर); राघव गोस्वामी (गौर-गणोद्देश-दीपिका 162) |
| पहचान | चम्पकलता, श्रीमती राधारानी की आठ प्रमुख सखियों में से एक (गौर-गणोद्देश-दीपिका 162) |
| मूल | दक्षिण भारत के एक ब्राह्मण, बहुत सम्मानित कुल के (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150); बीसवीं शताब्दी का एक सन्दर्भ-ग्रन्थ उनका जन्म-स्थान रामनगर बताता है |
| निवास | गोवर्धन पर्वत के दक्षिणी छोर पर, अप्सरा-कुण्ड और पूँछरी के पास एक गुफा (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 203) |
| समय | जब 1576 में गौर-गणोद्देश-दीपिका पूरी हुई, तब तक वे गोवर्धन में रह रहे थे और अपना ग्रन्थ लिख चुके थे |
| सबसे निकट के साथी | राधा-कुण्ड के रघुनाथ दास गोस्वामी |
| विशेष पहचान | जीव गोस्वामी के कहने पर श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर को पूरे व्रज-मण्डल की परिक्रमा कराना |
| ग्रन्थ | श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश (भक्ति-रत्न-प्रकाश), संस्कृत ग्रन्थ, जिसके छह अध्यायों को "रत्न" कहा गया है |
| गुरु | किसी भी पुराने ग्रन्थ में नाम नहीं मिलता |
| मुख्य स्रोत | नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर का भक्ति-रत्नाकर, विशेष रूप से पंचम तरंग |
परिचय के शास्त्र प्रमाण (11)
प्रेमानन्दे सदा मत्त राघव-गोसाञि । राघवेर चरित्र कहिते अन्त नाञि
दाक्षिणात्य विप्र महा-कुलीन प्रचार । परम-वैष्णव क्रिया के वर्णिबे ताँर
दीन-हीने अनुग्रह-सीमा देखाइला । भक्ति-रत्न-प्रकाशादि ग्रन्थ ये वर्णिला
याहार सर्वस्व श्री-पर्वत-गोवर्धन । गोवर्धने वास सर्व-शास्त्रे विचक्षण
premānande sadā matta rāghava-gosāñi / rāghavera caritra kahite anta nāñi
dākṣiṇātya vipra mahā-kulīna pracāra / parama-vaiṣṇava kriyā ke varṇibe tāṅra
dīna-hīne anugraha-sīmā dekhāilā / bhakti-ratna-prakāśādi grantha ye varṇilā
yāhāra sarvasva śrī-parvata-govardhana / govardhane vāsa sarva-śāstre vicakṣaṇa
राघव गोसाईं सदा प्रेम के आनन्द में मतवाले रहते हैं; राघव के चरित्र का वर्णन करते-करते उसका अन्त नहीं आता। वे दक्षिण के ब्राह्मण के रूप में प्रसिद्ध हैं, बहुत ऊँचे कुल के। उस महान वैष्णव के आचरण का वर्णन कौन कर सकता है? उन्होंने दीन-दुखियों पर कृपा की सीमा दिखा दी, और भक्ति-रत्न-प्रकाश जैसे ग्रन्थ लिखे। श्री गोवर्धन पर्वत ही उनका सर्वस्व है; वे गोवर्धन में रहते हैं और सब शास्त्रों में निपुण हैं।
1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा।
एक-दिन श्री-जीव-गोस्वामी कैल मने । दोँहे पाठाइब शीघ्र सर्वत्र दर्शने
सङ्गे के या'बेन मने ऐछे विचारिते । राघव-गोसाञि आइला गोवर्धन हैते
श्री-जीव-गोस्वामी ताँरे देखि हर्ष हैया । जिज्ञासिल कुशल आसने वसाइया
तिँह कहे व्रजे आमि करिब भ्रमण । एइ हेतु हैल शीघ्र आमार गमन
श्री-जीव कहये भाल हैल सर्व-मते । श्रीनिवास नरोत्तम या'बेन सङ्गेते
eka-dina śrī-jīva-gosvāmī kaila mane / doṅhe pāṭhāiba śīghra sarvatra darśane
saṅge ke yā'bena mane aiche vicārite / rāghava-gosāñi āilā govardhana haite
śrī-jīva-gosvāmī tāṅre dekhi harṣa haiyā / jijñāsila kuśala āsane vasāiyā
tiṅha kahe vraje āmi kariba bhramaṇa / ei hetu haila śīghra āmāra gamana
śrī-jīva kahaye bhāla haila sarva-mate / śrīnivāsa narottama yā'bena saṅgete
एक दिन श्री जीव गोस्वामी ने मन में सोचा, ‘इन दोनों को मैं जल्दी ही सब तीर्थों के दर्शन के लिए भेजूँगा।’ जब वे सोच ही रहे थे कि इनके साथ कौन जाएगा, तभी राघव गोसाईं गोवर्धन से आ पहुँचे। उन्हें देखकर श्री जीव गोस्वामी बहुत प्रसन्न हुए; उन्होंने उन्हें आसन पर बिठाकर उनका कुशल-समाचार पूछा। राघव बोले, ‘मैं व्रज में भ्रमण करने जा रहा हूँ; इसीलिए मैं जल्दी-जल्दी आया हूँ।’ श्री जीव बोले, ‘यह हर प्रकार से अच्छा हुआ। श्रीनिवास और नरोत्तम आपके साथ जाएँगे।’
1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा।
अहे श्रीनिवास ए निश्चय जान चिते । राधा-कुण्ड वास रघुनाथ कृपा हैते
श्री-कुण्ड श्री-गोवर्धन शिला गुञ्जा-हार । श्री-रघुनाथेर एइ सेवा सुप्रचार
ahe śrīnivāsa e niścaya jāna cite / rādhā-kuṇḍa vāsa raghunātha kṛpā haite
śrī-kuṇḍa śrī-govardhana śilā guñjā-hāra / śrī-raghunāthera ei sevā supracāra
हे श्रीनिवास, मन में यह निश्चित जान लो: राधा-कुण्ड में रहना रघुनाथ की कृपा से ही मिलता है। श्री राधा-कुण्ड, गोवर्धन-शिला और गुंजा-माला, श्री रघुनाथ की यह सेवा सब जगह प्रसिद्ध है।
1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा।
एत कहि आगे चले मनेर उल्लासे । निज वास-स्थाने गिया कहे श्रीनिवासे
एइ मोर गोफा आमि रहिये एथाइ । देखि गोवर्धन शोभा महा-सुख पाइ
एइ गोवर्धन गुहा अति मनोहर । एथा राधा-कृष्ण विलसये निरन्तर
eta kahi āge cale manera ullāse / nija vāsa-sthāne giyā kahe śrīnivāse
ei mora gophā āmi rahiye ethāi / dekhi govardhana śobhā mahā-sukha pāi
ei govardhana guhā ati manohara / ethā rādhā-kṛṣṇa vilasaye nirantara
इतना कहकर वे मन के आनन्द में आगे चले। अपने निवास-स्थान पर पहुँचकर उन्होंने श्रीनिवास से कहा, ‘यह मेरी गुफा है; मैं यहीं रहता हूँ। गोवर्धन की शोभा देखकर मुझे बड़ा सुख मिलता है। गोवर्धन की यह गुफा बहुत मनोहर है; यहाँ राधा-कृष्ण निरन्तर लीला करते हैं।’
1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा।
ऐछे कत कहि धैर्य धरिते ना पारे । राघव-पण्डित नेत्र जलेइ साँतारे
श्रीनिवास नरोत्तम धूलाय लोटाय । छाडे दीर्घ-श्वास भासे नेत्रेर धाराय
कत क्षणे श्री-पण्डित सुस्थिर हैया । दोँहे स्थिर करि आगे चले दोँहे लैया
aiche kata kahi dhairya dharite nā pāre / rāghava-paṇḍita netra jalei sāṅtāre
śrīnivāsa narottama dhūlāya loṭāya / chāḍe dīrgha-śvāsa bhāse netrera dhārāya
kata kṣaṇe śrī-paṇḍita susthira haiyā / doṅhe sthira kari āge cale doṅhe laiyā
ऐसी बहुत-सी बातें कहते-कहते राघव पण्डित धैर्य न रख सके; वे अपने ही आँसुओं में तैरने लगे। श्रीनिवास और नरोत्तम धूल में लोटने लगे; वे लम्बी साँसें लेते हुए आँसुओं की धारा में बह रहे थे। कुछ समय बाद श्री पण्डित शान्त हुए, उन्होंने दोनों को सँभाला और उन्हें साथ लेकर आगे चल पड़े।
1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा।
ओहे श्रीनिवास वृन्दावनेर माधुरी । मने अभिलाष सदा राखि नेत्रे भरि'
तोमा दोँहा लैया महा आनन्दे भ्रमिनु । पुन ना ह-इबे हेन मने विचारिनु
जन्मे जन्मे तुमि दुइ प्रभुर किङ्कर । एत कहि' पण्डितेर अधैर्य अन्तर
ohe śrīnivāsa vṛndāvanera mādhurī / mane abhilāṣa sadā rākhi netre bhari'
tomā doṅhā laiyā mahā ānande bhraminu / puna nā ha-ibe hena mane vicārinu
janme janme tumi dui prabhura kiṅkara / eta kahi' paṇḍitera adhairya antara
‘हे श्रीनिवास, मेरे मन की एक ही अभिलाषा है कि वृन्दावन की मधुरता को सदा अपनी आँखों में भरकर रखूँ। तुम दोनों को साथ लेकर मैं बड़े आनन्द से घूमा हूँ, और मेरे मन में ऐसा लगता है कि अब फिर ऐसा नहीं होगा। जन्म-जन्म तक तुम दोनों प्रभु के सेवक हो।’ इतना कहते ही पण्डित का हृदय अधीर हो उठा।
1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा।
श्रीराधाप्राणरूपा या श्रीचम्पकलता व्रजे ।
साद्य राघवगोस्वामी गोवर्धनकृतस्थितिः ।
भक्तिरत्नप्रकाशाख्यग्रन्थो येन विनिर्मितः ॥
śrī-rādhā-prāṇa-rūpā yā śrī-campakalatā vraje
sādya rāghava-gosvāmī govardhana-kṛta-sthitiḥ
bhaktiratna-prakāśākhya-grantho yena vinirmitaḥ
श्रीमती चम्पकलता गोपी, जो श्रीमती राधारानी को अपने प्राणों के समान प्रिय मानती थीं, राघव गोस्वामी के रूप में प्रकट हुईं। वे गोवर्धन पर्वत पर रहते थे और उन्होंने भक्ति-रत्न-प्रकाश नाम का ग्रन्थ लिखा।
Translation as published at bvmlu.org.
धनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादाद्व्रजेऽमिताम् ।
सैव सम्प्रति गौराङ्गप्रियो राघवपण्डितः ॥
dhaniṣṭhā bhakṣya-sāmagrīṁ kṛṣṇāyādād vraje ’mitām
saiva sāmprataṁ gaurāṅga-priyo rāghava-paṇḍitaḥ
राघव पण्डित पहले व्रज में कृष्ण की लीलाओं के समय एक अन्तरंग गोपी थीं, और उनका पूर्व नाम धनिष्ठा था। यह गोपी धनिष्ठा सदैव कृष्ण के लिए भोजन बनाने में लगी रहती थीं।
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो ।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥
bhavad-vidhā bhāgavatās
tīrtha-bhūtāḥ svayaṁ vibho
tīrthī-kurvanti tīrthāni
svāntaḥ-sthena gadābhṛtā
हे प्रभु, आप जैसे भक्त स्वयं ही साक्षात् तीर्थ होते हैं। आप भगवान को अपने हृदय में धारण किए रहते हैं, इसलिए आप जहाँ भी जाते हैं, उस स्थान को तीर्थ बना देते हैं।
श्री-राघव पण्डित गोसाञि गोवर्धने । पाइला परमानन्द देखि नरोत्तमे
śrī-rāghava paṇḍita gosāñi govardhane / pāilā paramānanda dekhi narottame
गोवर्धन में रहने वाले श्री राघव पण्डित नरोत्तम को देखकर बहुत आनन्दित हुए।
नरहरि चक्रवर्ती का दूसरा जीवन-चरित, नरोत्तम-विलास, बताता है कि जब नरोत्तम पहली बार राधा-कुण्ड और गोवर्धन लाए गए, तब उन्हें देखकर राघव को परम आनन्द हुआ।
जय रघुनाथ-दास श्री-कुण्ड-निवासी । जय जय श्री-राघव गोवर्धन-वासी
jaya raghunātha-dāsa śrī-kuṇḍa-nivāsī / jaya jaya śrī-rāghava govardhana-vāsī
श्री राधा-कुण्ड में रहने वाले रघुनाथ दास की जय! गोवर्धन में रहने वाले श्री राघव की जय हो, जय हो!
तृतीय तरंग की आरम्भिक वन्दना में नरहरि राघव को रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ एक ही पद में स्मरण करते हैं।
अध्याय 1
गोवर्धन में दक्षिण के एक ब्राह्मण
पुराने ग्रन्थ क्या बताते हैं: वे कहाँ के थे, गोवर्धन में उनका जीवन प्रेम और वैराग्य से कैसे भरा था, और वृन्दावन के गोस्वामियों के बीच उनका क्या स्थान था।

श्रील राघव पण्डित गोस्वामी ने श्रील जीव गोस्वामी और रघुनाथ दास गोस्वामी के समय में गोवर्धन पर्वत को अपना घर बनाया। भक्त उन्हें सबसे अधिक उस मार्गदर्शक के रूप में याद करते हैं, जिनके साथ जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर को व्रज के पवित्र स्थानों के दर्शन के लिए भेजा था। नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने ग्रन्थ भक्ति-रत्नाकर की पंचम तरंग में, अर्थात् पाँचवें अध्याय में, इस यात्रा का वर्णन किया है। यात्रा की कथा पर पहुँचकर वे एक क्षण के लिए रुकते हैं, और हमें बताते हैं कि यह मार्गदर्शक कौन थे। किसी भी पुराने ग्रन्थ में राघव का इतना पूरा चित्र नहीं मिलता, जितना नरहरि की इन कुछ पंक्तियों में है:
प्रेमानन्दे सदा मत्त राघव-गोसाञि । राघवेर चरित्र कहिते अन्त नाञि
दाक्षिणात्य विप्र महा-कुलीन प्रचार । परम-वैष्णव क्रिया के वर्णिबे ताँर
दीन-हीने अनुग्रह-सीमा देखाइला । भक्ति-रत्न-प्रकाशादि ग्रन्थ ये वर्णिला
याहार सर्वस्व श्री-पर्वत-गोवर्धन । गोवर्धने वास सर्व-शास्त्रे विचक्षण
"राघव गोसाईं सदा प्रेम के आनन्द में मतवाले रहते हैं; राघव के चरित्र का वर्णन करते-करते उसका अन्त नहीं आता। वे दक्षिण के ब्राह्मण के रूप में प्रसिद्ध हैं, बहुत ऊँचे कुल के। उस महान वैष्णव के आचरण का वर्णन कौन कर सकता है? उन्होंने दीन-दुखियों पर कृपा की सीमा दिखा दी, और भक्ति-रत्न-प्रकाश जैसे ग्रन्थ लिखे। श्री गोवर्धन पर्वत ही उनका सर्वस्व है; वे गोवर्धन में रहते हैं और सब शास्त्रों में निपुण हैं।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
इसके बाद नरहरि कवि कर्णपुर का एक श्लोक उद्धृत करते हैं, जिसमें राघव को चम्पकलता बताया गया है। चम्पकलता श्रीमती राधारानी की आठ प्रमुख सखियों, अर्थात् उनकी सबसे निकट की संगिनियों, में से एक हैं (देखें चम्पकलता और श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश)। फिर नरहरि चार पद और जोड़ते हैं, जिनमें बताया गया है कि राघव कैसे रहते थे। व्रज-परिक्रमा की कथा और दूसरी जगहों पर मिलने वाले कुछ छोटे-छोटे उल्लेखों को छोड़ दें, तो पुराने ग्रन्थ उनके जीवन के बारे में लगभग इतना ही बताते हैं।
दक्षिण के एक ब्राह्मण #
राघव कहाँ के थे और किस कुल के थे, यह नरहरि केवल आधी पंक्ति में बता देते हैं। वे उन्हें दाक्षिणात्य विप्र कहते हैं, अर्थात् दक्षिण भारत के ब्राह्मण। वे उन्हें महा-कुलीन भी कहते हैं, अर्थात् बहुत ऊँचे कुल के व्यक्ति। वे इसे एक जानी-मानी बात के रूप में बताते हैं ("के रूप में प्रसिद्ध हैं"), और इससे आगे कुछ नहीं कहते। वे न राघव के गाँव का नाम बताते हैं, न उनके माता-पिता का, और न यह बताते हैं कि राघव कैसे और कब व्रज आए (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150)।
बीसवीं शताब्दी का एक गौड़ीय सन्दर्भ-ग्रन्थ, हरिदास दास का गौड़ीय वैष्णव अभिधान, इतना और जोड़ता है कि वे "दक्षिण के रामनगर के निवासी एक ब्राह्मण" थे (खण्ड 3, पृ. 1332)। यह ग्रन्थ इस बात का कोई स्रोत नहीं देता। यह भी नहीं बताता कि यहाँ किस रामनगर की बात है, जबकि दक्षिण भारत में इस नाम के कई स्थान हैं। यही ग्रन्थ साफ़ कहता है कि वे पानिहाटी के राघव पण्डित से अलग व्यक्ति हैं (खण्ड 4, पृ. 1939)। पानिहाटी के राघव श्री चैतन्य महाप्रभु के पार्षद थे, और भक्ति-रत्नाकर बताता है कि उनका जन्म बंगाल के पानिहाटी में हुआ था (अष्टम तरंग, पृ. 538)।
गोस्वामियों के समय के व्रज में दक्षिण से आए भक्त अकेले राघव ही नहीं थे: गोपाल भट्ट गोस्वामी भी वहीं से आए थे। नरहरि अपने ग्रन्थ की आरम्भिक वन्दना में इन दोनों को बस एक पद के अन्तर पर प्रणाम करते हैं (प्रथम तरंग, पृ. 3), पर ग्रन्थों में इन दोनों के बीच कोई और सम्बन्ध दिखाई नहीं देता।
नरहरि राघव के ऊँचे कुल की बात बस चलते-चलते कहते हैं, और तुरन्त पूछते हैं, "उस महान वैष्णव के आचरण का वर्णन कौन कर सकता है?" भक्ति में अच्छा कुल किसी को भक्त नहीं बनाता, और साधारण कुल किसी को भक्त बनने से नहीं रोकता। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से कहा था:
नीच-जाति नहे कृष्ण-भजने अयोग्य
सत्-कुल-विप्र नहे भजनेर योग्य
"“नीच कुल में जन्मा व्यक्ति भगवान कृष्ण की भक्ति करने के अयोग्य नहीं है, और केवल ब्राह्मणों के ऊँचे कुल में जन्म लेने से कोई भक्ति के योग्य नहीं हो जाता।" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 4.66)
इसीलिए नरहरि राघव के जन्म के बारे में केवल आधी पंक्ति कहते हैं, और अपने बाकी पूरे वर्णन में उनकी भक्ति का ही चित्र खींचते हैं।
गोवर्धन ही उनका सर्वस्व था #
राघव के विषय में नरहरि के सबसे प्रबल शब्द एक स्थान से जुड़े हैं: "श्री गोवर्धन पर्वत ही उनका सर्वस्व है; वे गोवर्धन में रहते हैं" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150)। यहाँ नरहरि ने जो बांग्ला शब्द लिखा है, वह है सर्वस्व। इसका अर्थ है "अपना सब कुछ", अर्थात् वह सब जो किसी व्यक्ति के पास होता है। राघव के लिए वह सब कुछ गोवर्धन था।

अपने ग्रन्थ की सबसे पहली वन्दना में ही नरहरि राघव को बस उस स्थान के नाम से याद करते हैं, जहाँ वे रहते थे:
जय रघुनाथ-भट्ट रघुनाथ-दास । जय श्री-राघव गोवर्धनारण्ये वास
"रघुनाथ भट्ट और रघुनाथ दास की जय! गोवर्धन के वन में रहने वाले श्री राघव की जय!" (भक्ति-रत्नाकर, प्रथम तरंग, पृ. 3, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
वहाँ उनका घर अप्सरा-कुण्ड के पास एक गुफा थी। भक्ति-रत्नाकर इस कुण्ड को "गोवर्धन के छोर पर" बताता है। व्रज-परिक्रमा के समय राघव श्रीनिवास को अपनी गुफा पर लाए और बोले, "यह मेरी गुफा है; मैं यहीं रहता हूँ" (पंचम तरंग, पृ. 203)। इस प्रसंग का वर्णन गोवर्धन की परिक्रमा और उनकी अपनी गुफा में है।
एक गौड़ीय वैष्णव के लिए गोवर्धन कोई साधारण पर्वत नहीं है। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने पहली बार इसे देखा, तो "प्रभु ने तुरन्त डण्डे की तरह धरती पर गिरकर दण्डवत् किया। उन्होंने गोवर्धन की एक शिला को गले लगाया और प्रेम में उन्मत्त हो गए" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.16)। वे इस पर्वत पर चढ़ने को भी तैयार नहीं थे (मध्य 18.23)। श्रील प्रभुपाद समझाते हैं कि रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी ने महाप्रभु के उदाहरण का पालन किया, और वे भी पर्वत पर नहीं चढ़े, "क्योंकि वे उसे परम भगवान कृष्ण से अभिन्न मानते थे" (मध्य 18.47, तात्पर्य)। पर्वत को देखकर नाचते हुए महाप्रभु ने श्रीमद्भागवत की वह स्तुति सुनाई, जो गोपियाँ, अर्थात् व्रज की ग्वालिनें, इस पर्वत की महिमा में गाती हैं:
हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो
यद्रामकृष्णचरणस्परशप्रमोदः ।
मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्
पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः ॥
"“‘सब भक्तों में यह गोवर्धन पर्वत श्रेष्ठ है! हे सखियो, यह पर्वत कृष्ण और बलराम को, और उनके बछड़ों, गायों और ग्वाल-बाल सखाओं को, सब आवश्यक वस्तुएँ देता है: पीने का जल, बहुत कोमल घास, गुफाएँ, फल, फूल और कन्द-मूल। इस प्रकार यह पर्वत भगवान का आदर करता है। कृष्ण और बलराम के चरण-कमलों का स्पर्श पाकर गोवर्धन पर्वत बहुत आनन्दित दिखता है।’”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.34)
गोवर्धन श्री कृष्ण और उनके सखाओं को वह सब कुछ देता है, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। जो भक्त गोवर्धन को अपना सर्वस्व बना लेता है, वह कृष्ण के सबसे श्रेष्ठ सेवक के पास रहना चुनता है।
प्रेम और वैराग्य का जीवन #
कवि कर्णपुर के श्लोक के ठीक बाद नरहरि बताते हैं कि राघव कैसे रहते थे। यह जीवन प्रेम से भरा है, अर्थात् कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम से, और इसमें कठोर वैराग्य भी है।

नरहरि के शब्द ये हैं:
मध्ये मध्ये व्रजेते भ्रमण करे रङ्गे । मध्ये मध्ये रहे दास-गोस्वामिर सङ्गे
राधा-कृष्ण चैतन्य-चरित्र सदा गाय । ना धरे धैरय नेत्र-जले भासि याय
धूलाय धूसर स्पृहा नाइ भक्षणेते । प्रबल वैराग्य-चेष्टा के पारे बुझिते
"वे कभी-कभी आनन्द से व्रज में घूमते हैं, और कभी-कभी दास गोस्वामी के साथ रहते हैं। वे सदा राधा-कृष्ण और श्री चैतन्य के चरित्र का गान करते हैं; धैर्य नहीं रख पाते और आँसुओं में बह जाते हैं। व्रज की धूल से उनका शरीर धूसर रहता है और खाने की कोई इच्छा नहीं रहती। उनके प्रबल वैराग्य को कौन समझ सकता है?" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
"दास गोस्वामी" रघुनाथ दास गोस्वामी ही हैं, जो राधा-कुण्ड पर कठोर भजन करते हुए रहते थे। इन दोनों की मित्रता की कथा राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ में बताई गई है। एक और पद में, जो ऊपर छोड़ दिया गया है, नरहरि बताते हैं कि राघव कभी-कभी वृन्दावन आते थे और वहाँ के गोस्वामियों के दर्शन करके बहुत आनन्दित होते थे। इतने वैराग्य के साथ भी वे दया से भरे हुए थे: नरहरि के वर्णन की पहली पंक्तियाँ ही कहती हैं कि उन्होंने "दीन-दुखियों पर कृपा की सीमा दिखा दी"।
नरहरि जिन आँसुओं की बात करते हैं, वे व्रज-परिक्रमा में बार-बार दिखाई देते हैं। एक बार मथुरा में श्री चैतन्य के जीवन का स्मरण करते हुए राघव अपने को बिल्कुल सँभाल न सके, और श्रीनिवास तथा नरोत्तम रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़े (पंचम तरंग, पृ. 184; देखें जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास और नरोत्तम को उन्हें सौंपा)।
ऐसा जीवन हमें भक्ति के उन पाँच अंगों की याद दिलाता है, जिन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबसे श्रेष्ठ बताया। कृष्ण की भूमि में रहना उनमें से एक है:
साधु-सङ्ग, नाम-कीर्तन, भागवत-श्रवण
मथुरा-वास, श्री-मूर्तिर श्रद्धाय सेवन
"“मनुष्य को भक्तों का संग करना चाहिए, भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहिए, श्रीमद्भागवत सुनना चाहिए, मथुरा में निवास करना चाहिए, और श्रद्धा तथा आदर से श्रीविग्रह की पूजा करनी चाहिए।" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 22.128)
महाप्रभु आगे कहते हैं, "इन पाँचों का थोड़ा-सा पालन भी कृष्ण-प्रेम जगा देता है" (मध्य 22.129)। राघव के दिन इनमें से कई अंगों से भरे रहते थे: वे व्रज में रहते थे, रघुनाथ दास गोस्वामी और दूसरे गोस्वामियों का संग करते थे, और सदा राधा-कृष्ण तथा श्री चैतन्य का गान करते रहते थे।
गोस्वामियों के बीच उनका स्मरण #
नरहरि अपने ग्रन्थ की कई तरंगों का आरम्भ वन्दना से करते हैं, और इन वन्दनाओं में वे व्रज के महान वैष्णवों के बीच राघव को भी प्रणाम करते हैं। तृतीय तरंग के आरम्भ में वे वृन्दावन के गोस्वामियों के ठीक बाद राघव का नाम लेते हैं, और एक ही पद में उन्हें रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ जोड़ते हैं:
जय रघुनाथ-दास श्री-कुण्ड-निवासी । जय जय श्री-राघव गोवर्धन-वासी
"श्री राधा-कुण्ड में रहने वाले रघुनाथ दास की जय! गोवर्धन में रहने वाले श्री राघव की जय हो, जय हो!" (भक्ति-रत्नाकर, तृतीय तरंग, आरम्भ, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
उस वन्दना में इसके बाद श्रीनिवास, नरोत्तम और रामचन्द्र के नाम आते हैं। यह उचित ही है, क्योंकि पंचम तरंग में राघव ही श्रीनिवास और नरोत्तम को व्रज की परिक्रमा कराते हैं। सप्तम तरंग के आरम्भ में भूगर्भ और लोकनाथ के साथ एक "श्री राघव" को फिर से प्रणाम किया गया है, और द्वादश तरंग के आरम्भ में एक बार और। बहुत सम्भव है कि दोनों जगह यही राघव हों।
परिक्रमा से पहले, जब श्रीनिवास पहली बार राधा-कुण्ड आए थे, तब उन्हें आशीर्वाद देने वालों में नरहरि राघव का नाम कृष्णदास कविराज से भी पहले लेते हैं: "श्री राघव, कृष्णदास कविराज और दूसरे सब वैष्णवों ने श्रीनिवास पर बहुत अधिक कृपा की" (चतुर्थ तरंग, पृ. 145)। नरहरि का दूसरा ग्रन्थ, नरोत्तम-विलास, भी राघव को इन्हीं भक्तों के बीच याद करता है, जब नरोत्तम को रघुनाथ दास गोस्वामी से मिलाने के लिए राधा-कुण्ड लाया गया:
श्री-राघव पण्डित गोसाञि गोवर्धने । पाइला परमानन्द देखि नरोत्तमे
"गोवर्धन में रहने वाले श्री राघव पण्डित नरोत्तम को देखकर बहुत आनन्दित हुए।" (नरोत्तम-विलास, द्वितीय विलास, श्लोक 310, द्रविड़ दास के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)
बाद में, जब व्रज के वैष्णव गोस्वामियों के ग्रन्थ बंगाल भेजने के लिए इकट्ठे हुए, तब नरहरि उनमें "प्रेम-भक्ति के अधिकारी राघव पण्डित" का भी नाम लेते हैं (षष्ठ तरंग, पृ. 486)।
नरहरि के ग्रन्थों के बाहर, राधाकृष्ण गोस्वामी की साधन-दीपिका नाम का एक पुराना संस्कृत ग्रन्थ राघव के लेखन के द्वारा उनका सम्मान करता है। यह ग्रन्थ "श्री राघव-पण्डित गोस्वामि-पाद" के "श्री भक्ति-रत्न-प्रकाश आदि ग्रन्थों" को उन ग्रन्थों में गिनाता है, जिनके द्वारा भक्त आज भी भगवान की लीलाओं का रस ले सकते हैं (साधन-दीपिका, नवम कक्षा (अध्याय), पृ. 257)। इस सूची में विष्णु पुरी से लेकर नयनानन्द तक के नाम हैं। विष्णु पुरी महाप्रभु से पहले हुए थे और नयनानन्द उनके बाद, इसलिए इस सूची से यह पता नहीं चलता कि राघव कब हुए। पर इससे यह पता चलता है कि उनके ग्रन्थ की गिनती गौड़ीय वैष्णवों के विश्वसनीय ग्रन्थों में होती थी।
गोसाईं, पण्डित और गोस्वामी #
भक्ति-रत्नाकर एक ही तरंग में उन्हें राघव गोसाईं भी कहता है और राघव पण्डित भी। कवि कर्णपुर उन्हें राघव-गोस्वामी कहते हैं, और साधन-दीपिका इन उपाधियों को एक साथ जोड़ देती है: "श्री राघव-पण्डित गोस्वामि-पाद"। कोई भी स्रोत यह नहीं बताता कि ये उपाधियाँ उन्हें सबसे पहले किसने दीं, या कब दीं।
पण्डित का अर्थ है विद्वान व्यक्ति। नरहरि राघव को "सब शास्त्रों में निपुण" कहते हैं, और व्रज-परिक्रमा में यह बात दिखाई भी देती है: परिक्रमा की पहली ही सन्ध्या को राघव ने श्रीनिवास और नरोत्तम को पुराणों से मथुरा की महिमा सुनाई (पंचम तरंग, पृ. 151-165)।
गोसाईं, गोस्वामी शब्द का बांग्ला रूप है। श्रील प्रभुपाद इस शब्द का अर्थ समझाते हैं: "स्वामी का अर्थ है स्वामी या मालिक, और गोस्वामी का अर्थ है गो, अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी" (उपदेशामृत, श्लोक 1, तात्पर्य)। वे आगे बताते हैं कि गोस्वामी वह है, जो वाणी, मन, क्रोध, जीभ, पेट और जननेन्द्रिय के वेगों को वश में कर सकता है। नरहरि ने राघव का जो चित्र दिया है, कि वे व्रज की धूल से धूसर रहते थे और उन्हें खाने की कोई इच्छा नहीं थी, उससे पता चलता है कि यह नाम उन पर ठीक बैठता था।
स्रोत हमें क्या नहीं बताते #
राघव के बाहरी जीवन की बहुत-सी बातें कहीं दर्ज नहीं हैं। हमारे पास जो स्रोत हैं, उनमें से किसी में भी उनके गुरु का नाम नहीं मिलता। अपने ग्रन्थ में वे क्रम-दीपिका नाम के एक पुराने ग्रन्थ से लिया गया एक श्लोक देते हैं, और उसके द्वारा अपने गुरुदेव के चरण-कमलों में प्रणाम करते हैं, पर गुरु का नाम नहीं बताते (श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश 1.2)। उनके किसी शिष्य का नाम भी नहीं मिलता। श्रीनिवास और नरोत्तम, जिन्हें उन्होंने व्रज की परिक्रमा कराई, उनके शिष्य नहीं थे: श्रीनिवास ने गोपाल भट्ट गोस्वामी से दीक्षा ली थी, और नरोत्तम लोकनाथ गोस्वामी के शिष्य थे।
उनके जन्म का कोई वर्ष दर्ज नहीं है, और न ही उनके देह-त्याग का। हमारे पास जो स्रोत हैं, उनमें उनके तिरोभाव का दिन भी नहीं मिलता। उनका कोई प्रणाम-मन्त्र भी हम तक नहीं पहुँचा है। प्रणाम-मन्त्र वह छोटी प्रार्थना है, जिसे बोलकर भक्त दण्डवत् करते हैं। केवल एक पक्की तिथि मिलती है, और वह कवि कर्णपुर की गौर-गणोद्देश-दीपिका से मिलती है, जो 1576 में पूरी हुई। उस ग्रन्थ के श्लोक के शब्दों के अनुसार, तब तक राघव गोवर्धन में रह रहे थे और अपना ग्रन्थ लिख चुके थे। भक्ति-रत्नाकर उन्हें व्रज-परिक्रमा के वर्षों बाद भी सक्रिय दिखाता है, जब जाह्नवा माता वृन्दावन आईं (एकादश तरंग, पृ. 667)। गौड़ीय वैष्णव अभिधान कहता है कि "उनकी समाधि श्री वृन्दावन में है" (खण्ड 3, पृ. 1332), पर यह नहीं बताता कि वृन्दावन में कहाँ, और कोई दूसरा स्रोत भी यह स्थान नहीं बताता।
पुराने ग्रन्थों में एक और बात नहीं मिलती: राघव और श्री चैतन्य महाप्रभु की कोई भेंट। व्रज-परिक्रमा में राघव लगभग हर स्थान पर महाप्रभु की लीलाएँ सुनाते हैं, पर सदा अन्य पुरुष में, और कभी "मैंने देखा" कहकर नहीं। एक बार वे अपना स्रोत साफ़ शब्दों में बताते हैं: "यह कथा मैंने बड़े-बुज़ुर्गों के मुख से सुनी है; यह प्रसिद्ध है" (पंचम तरंग, पृ. 165)। कुछ आधुनिक तीर्थ-पुस्तिकाएँ उन्हें महाप्रभु का निकट पार्षद बताती हैं, पर ये पुस्तिकाएँ भूल से उन्हें पानिहाटी के राघव पण्डित समझ बैठी हैं (देखें श्रील राघव पण्डित गोस्वामी)।
पवित्र धाम में एक पवित्र सन्त #
नरहरि का वर्णन वहीं समाप्त होता है, जहाँ से राघव की सबसे प्रसिद्ध सेवा आरम्भ होती है: वे दो युवा भक्तों को अपने साथ ले गए और उन्हें व्रज दिखाया। वर्षों बाद, नवद्वीप में, श्रीनिवास तब भी उस यात्रा को "श्री राघव के साथ" किए गए व्रज-भ्रमण के रूप में याद करते थे (द्वादश तरंग, पृ. 716)। श्रीनिवास और नरोत्तम के लिए उस पवित्र भूमि का द्वार एक पवित्र सन्त थे। श्रीमद्भागवत ऐसे भक्तों के बारे में यह कहता है:
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो ।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥
"हे प्रभु, आप जैसे भक्त स्वयं ही साक्षात् तीर्थ होते हैं। आप भगवान को अपने हृदय में धारण किए रहते हैं, इसलिए आप जहाँ भी जाते हैं, उस स्थान को तीर्थ बना देते हैं।" (श्रीमद्भागवत 1.13.10)
श्रील प्रभुपाद समझाते हैं कि हर तीर्थयात्री के लिए इसका क्या अर्थ है: "जो कोई भी किसी तीर्थ में जाता है, उसे वहाँ रहने वाले शुद्ध भक्तों को खोजना चाहिए, उनसे शिक्षा लेनी चाहिए, उन शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करने का प्रयास करना चाहिए, और इस प्रकार धीरे-धीरे परम मुक्ति, अर्थात् भगवद्धाम लौटने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए" (श्रीमद्भागवत 1.13.10, तात्पर्य)। राघव ने गोवर्धन को अपना सर्वस्व बनाया, और श्रीनिवास तथा नरोत्तम के लिए वे ऐसे मार्गदर्शक बने, जिनके द्वारा उन्होंने पूरे व्रज के दर्शन किए। आज गोवर्धन जाने वाला तीर्थयात्री भी उनके उदाहरण पर चल सकता है: वह राघव के प्रिय पर्वत को प्रणाम कर सकता है, वहाँ रहने वाले भक्तों से कृष्ण-कथा सुन सकता है, और जैसे राघव सदा करते थे, वैसे ही राधा-कृष्ण और श्री चैतन्य का गान कर सकता है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (9)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 150 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Antya 4.66 ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, First Wave, p. 3 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.34 ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 150 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 22.128 ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Third Wave, opening (1912 ed.)
- Narottama-vilasa, Second Vilasa, verse 310
- Srimad-Bhagavatam 1.13.10 ऊपर देखें ↑
अध्याय 2
जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास और नरोत्तम को उन्हें सौंपा
व्रज-यात्रा कैसे आरम्भ हुई: राधा-कुण्ड पर पहली भेंट, जीव गोस्वामी द्वारा राघव का मार्गदर्शक के रूप में चुनाव, और दोनों युवा भक्तों के साथ मथुरा में पहले दिन।

गोवर्धन के श्रील राघव पण्डित गोस्वामी को सबसे अधिक उस सन्त के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर को व्रज की पवित्र भूमि की यात्रा कराई। (वे पानिहाटी के राघव पण्डित से अलग व्यक्ति हैं, जिनका नाम भी यही था।) उनकी यह यात्रा भक्ति-रत्नाकर की पूरी पंचम तरंग में फैली हुई है। भक्ति-रत्नाकर बांग्ला भाषा का एक महान इतिहास-ग्रन्थ है, जिसे नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर ने लिखा। लगभग हर पवित्र स्थान पर नरहरि राघव के मुख से बात कहलवाते हैं, और राघव की अधिकतर बातें एक प्रेम-भरी पुकार से आरम्भ होती हैं: "हे श्रीनिवास।"
भक्ति-रत्नाकर इस यात्रा की कोई तिथि नहीं देता, और यह भी नहीं बताता कि यात्रा कितने समय तक चली। पर यह बताता है कि यात्रा कैसे आरम्भ हुई: पहले राधा-कुण्ड पर एक भेंट हुई, फिर श्रील जीव गोस्वामी ने एक चुनाव किया, और फिर मथुरा में कुछ दिन बीते।
राधा-कुण्ड पर पहली भेंट #
भक्ति-रत्नाकर में राघव पहली बार इस यात्रा से थोड़ा पहले दिखाई देते हैं। श्रीनिवास ने अभी-अभी गोपाल भट्ट गोस्वामी से दीक्षा ली थी, और उन्हें जीव गोस्वामी की देख-रेख में सौंपा गया था (देखें जीव और गोपाल भट्ट गोस्वामी से शिक्षा)। अगले दिन जीव गोस्वामी ने उन्हें राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के पास भेजा, जिन्होंने उन पर अपार कृपा की (भक्ति-रत्नाकर, चतुर्थ तरंग, पृ. 145)। वहाँ राघव भी थे, और उनके साथ कृष्णदास कविराज गोस्वामी भी:
श्री-राघव कृष्णदास-कविराज आदि । श्रीनिवासे कैल सबे कृपार अवधि
तिन दिन रहि राधा-कुण्ड गोवर्धने । सबा' अनुमति लैया आइला वृन्दावने
"श्री राघव, कृष्णदास कविराज और दूसरे सब वैष्णवों ने श्रीनिवास पर बहुत अधिक कृपा की। राधा-कुण्ड और गोवर्धन में तीन दिन रहकर, सबसे अनुमति लेकर, श्रीनिवास वृन्दावन लौट आए।" (भक्ति-रत्नाकर, चतुर्थ तरंग, पृ. 145, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
इस प्रकार राघव श्रीनिवास से पहली बार रघुनाथ दास गोस्वामी की मण्डली में मिले। यह मण्डली राघव के हृदय के बहुत निकट थी (देखें राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ)। दूसरे युवा भक्त नरोत्तम लोकनाथ गोस्वामी के शिष्य थे (देखें लोकनाथ गोस्वामी का शिष्यत्व)। राघव नरोत्तम से पहली बार कब मिले, यह ग्रन्थ नहीं बताता। वर्षों बाद यही दोनों युवा भक्त गोस्वामियों के ग्रन्थ बंगाल ले गए (शास्त्रों को बंगाल ले जाना)।
जीव गोस्वामी ने मार्गदर्शक चुना #
नरहरि कहते हैं कि जीव गोस्वामी श्रीनिवास और नरोत्तम से कितना प्रेम करते थे, यह शब्दों में नहीं कहा जा सकता (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 149)। उस समय जीव गोस्वामी वृन्दावन के वैष्णवों का नेतृत्व कर रहे थे। फिर वह दिन आया, जब यह यात्रा आरम्भ हुई:

एक-दिन श्री-जीव-गोस्वामी कैल मने । दोँहे पाठाइब शीघ्र सर्वत्र दर्शने
सङ्गे के या'बेन मने ऐछे विचारिते । राघव-गोसाञि आइला गोवर्धन हैते
श्री-जीव-गोस्वामी ताँरे देखि हर्ष हैया । जिज्ञासिल कुशल आसने वसाइया
तिँह कहे व्रजे आमि करिब भ्रमण । एइ हेतु हैल शीघ्र आमार गमन
श्री-जीव कहये भाल हैल सर्व-मते । श्रीनिवास नरोत्तम या'बेन सङ्गेते
"एक दिन श्री जीव गोस्वामी ने मन में सोचा, ‘इन दोनों को मैं जल्दी ही सब तीर्थों के दर्शन के लिए भेजूँगा।’ जब वे सोच ही रहे थे कि इनके साथ कौन जाएगा, तभी राघव गोसाईं गोवर्धन से आ पहुँचे। उन्हें देखकर श्री जीव गोस्वामी बहुत प्रसन्न हुए; उन्होंने उन्हें आसन पर बिठाकर उनका कुशल-समाचार पूछा। राघव बोले, ‘मैं व्रज में भ्रमण करने जा रहा हूँ; इसीलिए मैं जल्दी-जल्दी आया हूँ।’ श्री जीव बोले, ‘यह हर प्रकार से अच्छा हुआ। श्रीनिवास और नरोत्तम आपके साथ जाएँगे।’" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 149, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
राघव बहुत प्रसन्न हुए। ठीक उसी समय दोनों युवा भक्त भीतर आए और उन्होंने दण्डवत् किया। राघव ने दोनों को गले लगा लिया, और जीव गोस्वामी ने बड़े आनन्द से उन्हें वनों की इस यात्रा के बारे में बताया (पृ. 149)। यह यात्रा राघव की अपनी योजना थी। जीव गोस्वामी ने दोनों युवा भक्तों को उसमें जोड़ दिया। उनके ये शब्द, "यह हर प्रकार से अच्छा हुआ", दिखाते हैं कि गोवर्धन के इस साधु पर उन्हें पूरा भरोसा था।
मथुरा में पहली रात #
दोनों युवा भक्तों ने उसी समय सबसे विदा ली, और जीव गोस्वामी ने बहुत सन्तुष्ट मन से उन्हें विदा किया (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 149-150)। राघव उन्हें सबसे पहले वनों में नहीं ले गए। वे उन्हें मथुरा नगरी ले गए, जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था।

श्री-राघव श्रीनिवास नरोत्तमे लैया । गेलेन मथुरा अति उल्लासित हैया
श्री-केशव-देवेर मन्दिर-सन्निधाने । रहिलेन श्री-सुबुद्धि छिलेन येखाने
श्री-सुबुद्धि-रायेर कहिया गुण-गण । सन्ध्या-समयेते कैला श्री-नाम-कीर्तन
"श्री राघव श्रीनिवास और नरोत्तम को लेकर बड़े आनन्द से मथुरा गए। वे श्री केशवदेव के मन्दिर के पास उसी स्थान पर ठहरे, जहाँ कभी श्री सुबुद्धि रहते थे। श्री सुबुद्धि राय के अनेक गुणों का वर्णन करके, सन्ध्या के समय उन्होंने श्रीनाम-कीर्तन किया।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
ग्रन्थ कहता है कि सुबुद्धि राय उस स्थान पर "कभी रहते थे" (देखें मथुरा और वृन्दावन में सेवा का जीवन)। ग्रन्थ यह नहीं बताता कि राघव ने उनके कौन-से गुणों की प्रशंसा की। फिर भी, यात्रा की पहली शिक्षा एक वैष्णव के बारे में थी, और पहली शाम कीर्तन के साथ पूरी हुई। कीर्तन का अर्थ है, सबके साथ मिलकर पवित्र नामों का गान। यहाँ नरहरि कथा को थोड़ी देर रोककर स्वयं राघव का वर्णन करते हैं (देखें गोवर्धन में दक्षिण के एक ब्राह्मण), और फिर कहते हैं:
श्रीनिवास नरोत्तम प्रेम-भक्ति-मय । दोँहे एक जानि स्नेह करे अतिशय
"श्रीनिवास और नरोत्तम प्रेम-भक्ति से भरे हुए थे। दोनों को एक ही मानकर वे उनसे बहुत स्नेह करते थे।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
दोनों में से एक ने गोपाल भट्ट गोस्वामी से दीक्षा ली थी और दूसरे ने लोकनाथ गोस्वामी से। पर राघव ने देखा कि दोनों में एक ही भक्ति है, और उन्होंने दोनों को एक मानकर प्रेम किया।
खोए हुए पवित्र स्थान कैसे मिले #
उसी शाम, कुछ देर बाद, राघव ने एकान्त में दोनों को मथुरा-मण्डल का, अर्थात् मथुरा के चारों ओर की पवित्र भूमि का, इतिहास सुनाया (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150-151)। उन्होंने बताया कि राजा वज्रनाभ ने कभी कृष्ण की लीलाओं के स्थानों को गाँवों, विग्रहों और कुण्डों से चिह्नित किया था। समय के साथ ये स्थान लगभग छिप गए। फिर श्री चैतन्य महाप्रभु, जिन्हें राघव "व्रजराज के पुत्र" कहते हैं, मथुरा आए। उन्होंने रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी के द्वारा सब कुछ प्रकट कर दिया।

यद्यपि से सब स्थान वेद्य से दोँहार । तथापि करिला शास्त्र-रीत अङ्गीकार
नाना शास्त्र प्रमाण करिया सङ्कलन । करिलेन व्रजेते भ्रमण दुइ जन
गुप्त-तीर्थ उद्धार करिल यत्न करि । व्यक्त कैल राधा-कृष्ण-रसेर माधुरी
"यद्यपि वे सब स्थान उन दोनों को पहले से ज्ञात थे, फिर भी उन्होंने शास्त्र की रीति को अपनाया। अनेक शास्त्रों से प्रमाण इकट्ठे करके वे दोनों पूरे व्रज में घूमे। बड़े यत्न से उन्होंने छिपे हुए तीर्थों का उद्धार किया और राधा-कृष्ण के रस की मधुरता को प्रकट किया।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 151, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
रूप और सनातन इन स्थानों को पहले से जानते थे, फिर भी उन्होंने हर एक स्थान को शास्त्रों से प्रमाणित किया। पवित्र ज्ञान की रक्षा भी इसी प्रकार होती है, जैसा भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
"यह परम विज्ञान इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त हुआ, और राजर्षियों ने इसे इसी रूप में समझा। पर समय के साथ यह परम्परा टूट गई, इसलिए यह विज्ञान अपने असली रूप में लुप्त-सा हो गया है।" (भगवद्गीता 4.2)
गीता की शिक्षा और व्रज के पवित्र स्थान, दोनों समय के साथ लुप्त हो गए थे। दोनों को भगवान और उनके शुद्ध भक्तों ने फिर से प्रकट किया, और दोनों आज भी इसीलिए जीवित हैं, क्योंकि उन्हें एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी को सौंपा जाता रहा है। उस शाम राघव व्रज की यही कथा दो युवा भक्तों को सौंप रहे थे।
इसके बाद राघव ने वराह, पद्म, स्कन्द, ब्रह्माण्ड और दूसरे पुराणों से मथुरा की महिमा सुनाई (पृ. 151-164)। श्रील रूप गोस्वामी ने उपदेशामृत लिखा, और श्रील प्रभुपाद ने उसका अनुवाद किया। उस अनुवाद में इस महिमा का मूल कारण बताया गया है: "मथुरा नाम का पवित्र स्थान आध्यात्मिक रूप से दिव्य जगत् वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि भगवान वहाँ प्रकट हुए" (उपदेशामृत, श्लोक 9)। मथुरा की ये महिमाएँ सुनाते-सुनाते राघव आनन्द के कारण स्थिर न रह सके (पृ. 165)।
यहाँ गौरचन्द्र ने नृत्य किया #
अगली सुबह राघव उन्हें सबसे पहले सनोड़िया ब्राह्मण के घर ले गए। ये ब्राह्मण माधवेन्द्र पुरी के शिष्य थे, और इन्हीं के घर में महाप्रभु ने भोजन किया था (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 165; और देखें चैतन्य-चरितामृत मध्य 17.167)। वहाँ राघव ने गौरचन्द्र की बात की। गौरचन्द्र का अर्थ है "सुनहरा चन्द्रमा", और महाप्रभु को प्रेम से इसी नाम से पुकारा जाता है:
श्री-राघव-पण्डित कहये श्रीनिवासे । एथा गौरचन्द्र नृत्य कैला प्रेमावेशे
आइल असङ्ख्य लोक प्रभुर दर्शने । सबे महा-मत्त हैला श्री-नाम-कीर्तने
…
एथाते अद्भुत गौरचन्द्रेर विलास । एत कहि श्री-राघव छाडे दीर्घ-श्वास
"श्री राघव पण्डित ने श्रीनिवास से कहा, ‘यहाँ गौरचन्द्र ने प्रेम के आवेश में नृत्य किया था। असंख्य लोग प्रभु के दर्शन को आए, और सब श्रीनाम-कीर्तन में मतवाले हो गए। ... यहीं गौरचन्द्र की अद्भुत लीला हुई थी।’ इतना कहकर श्री राघव ने लम्बी साँस ली।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 165, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
यह सुनकर श्रीनिवास और नरोत्तम रोने और विलाप करने लगे, यहाँ तक कि उस ब्राह्मण के आँगन में वे धूल से धूसर हो गए (पृ. 165)। राघव ने प्रभु के नृत्य की कथा उस स्थान की एक लीला के रूप में सुनाई, कभी ऐसी घटना के रूप में नहीं, जो उन्होंने स्वयं देखी हो।
यह मैंने बड़े-बुज़ुर्गों से सुना है #
इसके बाद राघव ने अद्वैत आचार्य की एक कथा सुनाई, जो अर्धचन्द्र नाम के स्थान पर घटी थी। कथा से पहले उन्होंने अपना स्रोत बताया:
श्रीनिवास प्रति कहे राघव-पण्डित । शुनिनु प्राचीन-मुखे ए कथा विदित
"राघव पण्डित ने श्रीनिवास से कहा, ‘यह कथा मैंने बड़े-बुज़ुर्गों के मुख से सुनी है; यह प्रसिद्ध है।’" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 165, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
उन्होंने बताया कि दूसरे प्रदेश का एक ब्राह्मण, जिसे अपनी विद्या का बड़ा घमण्ड था, मथुरा के वैष्णवों का अपमान किया करता था। एक दिन उसने अद्वैत के सामने भी ऐसा ही किया। अद्वैत उस समय तीर्थयात्रा करते हुए ठीक इसी स्थान पर ठहरे हुए थे। अद्वैत क्रोध से भड़क उठे, और उन्होंने हाथ में चक्र लिए अपना चार भुजाओं वाला रूप दिखाया। वह व्यक्ति काँपने लगा और दया की भीख माँगने लगा। तब अद्वैत का क्रोध पिघलकर करुणा बन गया। उन्होंने उससे कहा: सदा अपने को अपराधी समझो; सब कुछ छोड़कर नाम-संकीर्तन करो, अर्थात् सबके साथ मिलकर पवित्र नामों का कीर्तन करो; प्राण देकर भी वैष्णवों को सन्तुष्ट करो; उनके द्वार पर प्रतीक्षा करते रहो; भक्ति का अभ्यास करो; और जो रूप तुमने देखा है, उसे गुप्त रखो। वह व्यक्ति रोता हुआ मथुरा के वैष्णवों के घर-घर गया (पृ. 165-167)।
किसी वैष्णव के प्रति किया गया अपराध, जिसे वैष्णव-अपराध कहते हैं, इसी प्रकार दूर होता है: नम्रता से, पवित्र नाम से और वैष्णवों की सेवा से, ठीक वैसे ही जैसे अद्वैत ने सिखाया। फिर नरहरि कहते हैं:
एत कहि श्रीनिवासाचार्य करे धरि । मनेर आनन्दे पुनः कहे धीरि धीरि
"इतना कहकर उन्होंने श्रीनिवास आचार्य का हाथ पकड़ा और मन के आनन्द में फिर धीरे-धीरे बोलने लगे।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 167, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
केशव विग्रह के सामने #
राघव ने उन्हें वसुदेव और देवकी का वह घर दिखाया, जहाँ कृष्ण का जन्म हुआ था। इसके बाद वे उन्हें केशव के विग्रह के सामने ले आए (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 168)। उन्होंने कहा, "हे श्रीनिवास, केशव के दर्शन करो। यहाँ श्री चैतन्य ने अद्भुत नृत्य किया था।" उन्होंने यह भी बताया कि सब लोग प्रेम की बाढ़ में बह गए थे, और कहते थे कि श्री चैतन्य स्वयं केशव ही हैं।

कृष्ण की लीलाओं के हर स्थान पर राघव यह भी बताते थे कि महाप्रभु ने वहाँ क्या किया था। इस प्रकार दोनों युवा भक्तों ने व्रज को महाप्रभु की यात्रा के प्रकाश में जाना।
विश्रान्ति, घाट और उनके आँसू #
विश्रान्ति-तीर्थ वह स्थान है, जहाँ कंस को मारने के बाद कृष्ण ने विश्राम किया था। वहाँ राघव ने उस भीड़ का वर्णन किया, जो "सन्न्यासियों के शिरोमणि" के मथुरा आने पर आनन्द से मतवाली होकर दौड़ पड़ी थी, और जो गौरचन्द्र पर से अपनी आँखें नहीं हटा पा रही थी (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 170)। चौबीस घाटों पर, अर्थात् यमुना के किनारे बनी स्नान की सीढ़ियों पर, उन्होंने बताया कि महाप्रभु ने हर एक घाट पर स्नान किया था (पृ. 178-179)।

एक और स्थान पर उन्होंने बताया कि मथुरा के ब्राह्मण आपस में कहते थे कि यह सन्न्यासी निश्चय ही कृष्ण हैं, जो सुनहरे रूप में अपने को छिपाए हुए हैं (पृ. 183-184)। तब स्वयं राघव का धैर्य टूट गया:
ऐछे कत कहिते श्री-राघव-पण्डित । हैला अधैर्य चिन्ति चैतन्य-चरित
श्रीनिवास नरोत्तम धैर्य नाहि बान्धे । हा हा प्रभु बलिया भूमिते पडि कान्दे
श्री-राघव-पण्डितेर चरणे धरिया । दोँहे कत कहे शुनि विदरये हिया
श्री-पण्डित स्थिर हैया दोँहे स्थिर कैल । मथुरार आर ये तीर्थ देखाइल
"ऐसी बहुत-सी बातें कहते-कहते श्री राघव पण्डित श्री चैतन्य के चरित्र का स्मरण करके अधीर हो गए। श्रीनिवास और नरोत्तम भी धैर्य न रख सके; ‘हा हा प्रभु!’ कहकर वे धरती पर गिरकर रोने लगे। श्री राघव पण्डित के चरण पकड़कर दोनों ने ऐसी बातें कहीं कि सुनकर हृदय फट जाए। श्री पण्डित ने स्वयं को सँभाला, दोनों को शान्त किया, और मथुरा के दूसरे तीर्थ दिखाए।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 184, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
राघव के आँसू भी उस शिक्षा का एक भाग थे। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "तीर्थयात्राओं का उद्देश्य भगवान का निरन्तर स्मरण करना है, और इसीलिए भगवान तीर्थ-कीर्ति कहलाते हैं" (श्रीमद्भागवत 3.1.45, तात्पर्य)।
बारह वनों की ओर #
मथुरा छोड़ने से पहले राघव ने "बहुत मधुर शब्दों में" उस एक महीने की बात की, जब गोपाल विग्रह मथुरा में रहे थे। उस समय रूप गोस्वामी अपने साथियों के साथ आए थे, और गोपाल के दर्शन करके भाव-विभोर हो गए थे (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 184; चैतन्य-चरितामृत भी मध्य 18.47 में उस महीने के बारे में बताता है)। एक पुराने वृक्ष के पास राघव ने बताया कि नित्यानन्द प्रभु तीर्थयात्रा के समय वहाँ ठहरे थे। अपनी पहले की जन्मभूमि देखकर वे बहुत आनन्दित हुए, और इधर-उधर घूमते रहे, पर कोई उन्हें पहचान न सका (पृ. 184)। फिर राघव वनों की बात करने लगे:
राघव-पण्डित अति मनेर उल्लासे । श्रीनिवास प्रति किछु कहे मृदु भाषे
"राघव पण्डित ने बड़े आनन्द से, कोमल वाणी में, श्रीनिवास से कुछ बातें कहीं।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 184, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
उन्होंने कहा कि अपने बारह वनों के साथ मथुरा "पवित्र है, पापों को हरने वाली है, शुभ है, और उसकी मधुरता अनोखी है"। फिर उन्होंने पद्म और स्कन्द पुराणों के आधार पर इन वनों के बारे में समझाया (पृ. 184-186)। तीर्थयात्री पवित्र स्थानों के चारों ओर जिस रास्ते पर पैदल चलते हैं, उसे परिक्रमा-मार्ग कहते हैं। इसी मार्ग पर चलते हुए राघव के मन में आया कि दोनों युवा भक्तों को षष्ठीकराटवी दिखाएँ। वे सामान्य रास्ते से हट गए और श्रीनिवास से बोले, "पहले इसका नाम षष्ठीकराटवी था; अब लोग इसे षष्ठीघरा कहते हैं" (पृ. 187-188)। पूरी यात्रा में राघव पुराना नाम भी बताते रहे और नया नाम भी।
बहुलावन में राघव ने बड़े आनन्द से बताया कि कैसे लाखों गायें पूँछ उठाकर महाप्रभु की ओर दौड़ीं और उन्हें चारों ओर से घेर लिया, और कैसे महाप्रभु ने उन्हें अपने हाथ से छुआ, जैसे वे कभी उन्हें चराया करते थे (पृ. 189)। चैतन्य-चरितामृत भी यही कहता है: "जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन से होकर जा रहे थे, तब चरती हुई गायों के झुण्डों ने उन्हें जाते हुए देखा, और तुरन्त उन्हें घेरकर बहुत ज़ोर से रँभाने लगे" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 17.194)। वहाँ से मार्ग आगे राधा-कुण्ड और गोवर्धन तक गया, और बाद में व्रज के वनों तक (देखें व्रज के वनों में)।
पवित्र स्थान और पवित्र सन्त #
जीव गोस्वामी ने दोनों युवा भक्तों को अकेले नहीं भेजा। उन्होंने उन्हें एक ऐसे महान वैष्णव का साथ दिया, जो उसी पवित्र भूमि में रहते थे। यह बात क्यों महत्त्वपूर्ण है, यह श्रीमद्भागवत समझाता है:
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो ।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥
"हे प्रभु, आप जैसे भक्त स्वयं ही साक्षात् तीर्थ होते हैं। आप भगवान को अपने हृदय में धारण किए रहते हैं, इसलिए आप जहाँ भी जाते हैं, उस स्थान को तीर्थ बना देते हैं।" (श्रीमद्भागवत 1.13.10)
अपने तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "जो कोई भी किसी तीर्थ में जाता है, उसे वहाँ रहने वाले शुद्ध भक्तों को खोजना चाहिए, उनसे शिक्षा लेनी चाहिए, उन शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करने का प्रयास करना चाहिए, और इस प्रकार धीरे-धीरे परम मुक्ति, अर्थात् भगवद्धाम लौटने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए" (श्रीमद्भागवत 1.13.10, तात्पर्य)। श्रीनिवास और नरोत्तम के साथ ठीक ऐसे ही एक भक्त थे, जो श्रीनिवास का हाथ पकड़ते, हर स्थान को शास्त्रों से प्रमाणित करते, और श्री चैतन्य के लिए रोते थे। वर्षों बाद भी श्रीनिवास "श्री राघव के साथ" व्रज में किए अपने भ्रमण की बात करते थे (देखें वृन्दावन में अन्तिम शिक्षाएँ और विदाई)। जैसा श्रील प्रभुपाद ने कहा: "तीर्थ-स्थानों पर जाने का वास्तविक उद्देश्य है वहाँ किसी सन्त को खोजना और उनसे ज्ञान लेना। यही तीर्थ-यात्रा का सच्चा अर्थ है" (वार्तालाप, जिनेवा, 4 जून 1974)।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (12)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Bhakti-ratnakara, Fourth Wave, p. 145 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 149 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 150 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 150 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 151 (1912 ed.)
- Bhagavad-gita 4.2 ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 165 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 165 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 167 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 184 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 184 (1912 ed.)
- Srimad-Bhagavatam 1.13.10 ऊपर देखें ↑
अध्याय 3
राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ
राघव और रघुनाथ दास गोस्वामी का निकट सम्बन्ध: राधा-कुण्ड पर राघव की सुनाई कथाएँ, उनकी कराई हुई भेंट, और वर्षों बाद जाह्नवा माता तक पहुँचाया गया सन्देश।

श्रील राघव पण्डित गोस्वामी गोवर्धन की एक गुफा में रहते थे, पर समय-समय पर वे राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ भी रहते थे। राधा-कुण्ड उसी पर्वत की तलहटी में एक पवित्र सरोवर है। नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर अपने भक्ति-रत्नाकर में यही बताते हैं कि राघव "कभी-कभी दास गोस्वामी के साथ रहते हैं" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150)। एक छन्द में तो नरहरि इन दोनों सन्तों की एक साथ जय बोलते हैं: "श्री राधा-कुण्ड में रहने वाले रघुनाथ दास की जय! गोवर्धन में रहने वाले श्री राघव की जय हो, जय हो!" (तृतीय तरंग, आरम्भ)। (ये राघव पानिहाटी के राघव पण्डित से अलग व्यक्ति हैं।)
इसी कुण्ड पर राघव श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर को लेकर आए। श्रील जीव गोस्वामी ने इन दोनों को व्रज के पवित्र स्थानों के दर्शन के लिए राघव के साथ भेजा था (देखें जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास और नरोत्तम को उन्हें सौंपा)। यहाँ राघव ने उन्हें रघुनाथ के बारे में एक के बाद एक कथा सुनाई, और फिर उन्हें रघुनाथ के सामने ले गए। वर्षों बाद राघव रघुनाथ का सन्देश लेकर जाह्नवा माता के पास भी गए। पुराने ग्रन्थ इन दोनों सन्तों के बीच गहरा और प्रेम-भरा सम्बन्ध दिखाते हैं, पर वे राघव को कहीं भी रघुनाथ का शिष्य नहीं कहते।
कृष्ण का सबसे प्रिय कुण्ड #
गौड़ीय वैष्णवों के लिए राधा-कुण्ड सब पवित्र स्थानों में सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह श्रीमती राधारानी का अपना कुण्ड है। भगवान कृष्ण उस कुण्ड से वैसा ही प्रेम करते हैं, जैसा राधारानी से। श्रील रूप गोस्वामी अपने उपदेशामृत में यही शिक्षा देते हैं। यहाँ उनके शब्द श्रील प्रभुपाद के अनुवाद के अनुसार दिए गए हैं:
"व्रज-भूमि की प्रिय वस्तुओं और सब मनोहर व्रज-बालाओं में श्रीमती राधारानी ही निश्चय ही कृष्ण के प्रेम की सबसे बड़ी निधि हैं। और महान मुनियों ने उनके दिव्य कुण्ड को भी हर प्रकार से कृष्ण को उतना ही प्रिय बताया है। निःसन्देह राधा-कुण्ड महान भक्तों को भी बहुत कठिनाई से मिलता है; तो साधारण भक्तों के लिए वह और भी कठिन है। उसके पवित्र जल में केवल एक बार स्नान करने से भी कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम पूरी तरह जाग उठता है।" (उपदेशामृत, श्लोक 11)
तो फिर कोई इसके तट पर कैसे रह पाता है? इसका उत्तर राघव ने उसी कुण्ड पर श्रीनिवास को दिया।
दोनों कुण्ड कैसे प्रकट हुए और कैसे खोजे गए #
यात्रा का रास्ता आरिट से होकर राधा-कुण्ड पहुँचा। राघव ने बताया कि आरिट में कृष्ण ने अरिष्ट को मारा था, जो बैल के रूप में आया एक असुर था (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 190)। तब श्रीमती राधारानी ने मुस्कुराते हुए कृष्ण को छेड़ा कि इस वध से वे अपवित्र हो गए हैं, और अब सब तीर्थों में स्नान करने पर ही वे पवित्र होंगे। इसलिए कृष्ण ने अपने पैर से धरती पर प्रहार किया, और सब तीर्थों के जल से एक कुण्ड भर गया। राधा और उनकी सखियों ने भी जल्दी से अपना एक कुण्ड खोद लिया। सब तीर्थ राधा की स्तुति करते हुए श्याम-कुण्ड से उसमें आ गए, और दोनों कुण्ड पवित्र जल से भर गए (पृ. 190-191)।

कुण्ड पर पहुँचकर राघव ने कहा, "देखो श्रीनिवास, ये हैं दोनों कुण्ड, राधा-कुण्ड और श्याम-कुण्ड" (पृ. 194)। फिर उन्होंने बताया कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन कुण्डों को कैसे खोजा था। प्रभु "इस तमाल वृक्ष" के नीचे बैठे और उन्होंने गाँव के लोगों से इन दोनों कुण्डों के बारे में पूछा, पर कोई उन्हें कुछ न बता सका। तब सब कुछ जानने वाले प्रभु ने धान के दो खेतों में छिपे हुए कुण्डों को देख लिया। उन्होंने उन कुण्डों के थोड़े-से जल में बड़े आनन्द से स्नान किया, कुण्ड की महिमा गाई, और उसकी मिट्टी से अपने शरीर पर तिलक लगाया। गाँव के लोग यह सब चकित होकर देखते रहे (पृ. 194-195)। राघव ने यह कथा भी, सदा की तरह, उस स्थान की एक लीला के रूप में सुनाई, अपनी आँखों देखी घटना के रूप में नहीं। श्री चैतन्य-चरितामृत भी यही बताता है: "किन्तु सर्वज्ञ परम भगवान होने के कारण उन्होंने धान के दो खेतों में राधा-कुण्ड और श्याम-कुण्ड को खोज निकाला। वहाँ थोड़ा-सा ही जल था, पर उन्होंने वहीं स्नान किया" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.5)।
फिर राघव ने "संक्षेप में" बताया कि धान के वे खेत फिर से सरोवर कैसे बने (पृ. 195)। एक दिन रघुनाथ दास गोस्वामी के मन में आया कि यदि ये दोनों कुण्ड जल से भरे होते, तो कितना अच्छा होता। किन्तु उसी क्षण उन्होंने अपने आप को दोष दिया, क्योंकि ऐसी इच्छा में धन की कुछ कामना दिखाई देती थी। पर राघव ने कहा, "भक्त के हृदय में जो होता है, कृष्ण उसे पूरा करते हैं।" एक धनी व्यक्ति ने बदरिकाश्रम में बहुत-से सिक्के भेंट किए थे। नारायण ने स्वप्न में उससे कहा कि वह ये सिक्के आरिट में रघुनाथ के पास ले जाए, और यदि रघुनाथ इन्हें लेने से मना करें, तो उन्हें उनकी इच्छा याद दिलाए। भगवान का यह सन्देश सुनकर रघुनाथ स्तब्ध रह गए। उन्होंने दोनों कुण्डों से कीचड़ निकलवाया, और जब उन्होंने कुण्डों को निर्मल जल से भरा देखा, तो वे आनन्द से भर उठे (पृ. 195-196)। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "बाद में भगवान चैतन्य के भक्तों ने, जिनके अगुआ सबसे पहले रूप और रघुनाथ दास जैसे छह गोस्वामी थे, उस कुण्ड की खुदाई की" (उपदेशामृत, श्लोक 9, तात्पर्य)।
रघुनाथ के बारे में राघव की कथाएँ #
इसके बाद राघव ने राधा-कुण्ड पर रघुनाथ के अपने भजन-जीवन के बारे में बताया। रघुनाथ दिन-रात एक वृक्ष के नीचे रहा करते थे। एक दिन सनातन गोस्वामी कुण्ड पर गोपाल भट्ट गोस्वामी के निवास पर आए हुए थे। उन्होंने देखा कि रघुनाथ ध्यान में बैठे थे, तभी एक बाघ घाट पर पानी पीकर उनके बहुत पास से निकल गया। सनातन ने रघुनाथ को गले लगाया और कोमल स्वर में कहा, "अब से तुम वृक्ष के नीचे नहीं, एक कुटिया में रहोगे।" उस दिन से रघुनाथ दूसरों के हित के लिए कुटिया में रहने लगे (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 196-197)। राघव ने कहा, "हे श्रीनिवास, रघुनाथ के सब आचरणों का मैं एक मुख से कितना वर्णन करूँ?"
रघुनाथ ने अन्न खाना छोड़ दिया था, और उनका नियम था कि वे केवल एक दोना मट्ठा पीते थे। दास नाम के एक व्रजवासी से रघुनाथ बहुत स्नेह करते थे। एक बार दास को सखीस्थली में पलाश का एक बड़ा पत्ता मिला, और उससे उन्होंने एक बड़ा दोना बनाया, ताकि रघुनाथ थोड़ा अधिक मट्ठा ले लें। पर जब रघुनाथ ने सुना कि वह पत्ता कहाँ से आया है, तो उन्होंने दोना फेंक दिया और कहा, "वह चन्द्रावली का गाँव है; वहाँ मत जाना" (पृ. 197)। जैसा श्रील प्रभुपाद ने एक बार लिखा था, व्रज में "एक राधारानी का दल है और एक चन्द्रावली का दल है" (6 दिसम्बर 1974 का पत्र)। राघव ने कहा, "इन सब भक्तों के शरीर नित्य-सिद्ध हैं, अर्थात् सदा से पूर्ण हैं, और केवल कोई अधम ही इसमें सन्देह करता है।"
एक दूसरी बार रघुनाथ ने मन ही मन भगवान को अर्पित खीर खाई, और अपच से उनका शरीर भारी हो गया। वल्लभ भट्ट के पुत्र विट्ठलनाथ दो वैद्यों को ले आए। वैद्यों ने रघुनाथ की नाड़ी देखी और कहा कि इन्होंने खीर खाई है। विट्ठलनाथ चकित रह गए, क्योंकि रघुनाथ के लिए खीर खाना असम्भव था। तब रघुनाथ ने कहा, "यही पूरा सच है: मैंने मन में खीर खाई थी।" यह सुनकर सब आश्चर्य से भर गए (पृ. 197-198)। इन्हीं कथाओं से राघव का अपना एक दृढ़ विश्वास बना था, और उसे उन्होंने श्रीनिवास से एक निश्चित सत्य के रूप में कहा:
अहे श्रीनिवास ए निश्चय जान चिते । राधा-कुण्ड वास रघुनाथ कृपा हैते
श्री-कुण्ड श्री-गोवर्धन शिला गुञ्जा-हार । श्री-रघुनाथेर एइ सेवा सुप्रचार
"हे श्रीनिवास, मन में यह निश्चित जान लो: राधा-कुण्ड में रहना रघुनाथ की कृपा से ही मिलता है। श्री राधा-कुण्ड, गोवर्धन-शिला और गुंजा-माला, श्री रघुनाथ की यह सेवा सब जगह प्रसिद्ध है।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 198, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
गोवर्धन-शिला, अर्थात् गोवर्धन पर्वत का एक पत्थर, और गुंजा-माला रघुनाथ को स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु से मिली थीं। जब रघुनाथ जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु के निकट रहते थे, तब प्रभु ने उन्हें ये दोनों वस्तुएँ दीं और कहा, "यह शिला भगवान कृष्ण का दिव्य स्वरूप है। तुम बड़ी लगन से इस शिला की सेवा करो" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 6.294)। कृष्णदास कविराज गोस्वामी लिखते हैं कि रघुनाथ ने इस भेंट का क्या अर्थ समझा:
“शिला दिया गोसाञि समर्पिला ‘गोवर्धने’
गुञ्जा-माला दिया दिला ‘राधिका-चरणे’ ”
"“गोवर्धन-शिला देकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुझे गोवर्धन पर्वत के पास स्थान दे दिया है, और गुंजा-माला देकर उन्होंने मुझे श्रीमती राधारानी के चरण-कमलों का आश्रय दे दिया है।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 6.307)
महाप्रभु ने रघुनाथ को श्रीमती राधारानी के चरणों का आश्रय दिया; और राघव कहते हैं कि रघुनाथ की कृपा से ही कोई दूसरा भी राधारानी के कुण्ड पर रह पाता है।
राघव दोनों को रघुनाथ दास गोस्वामी के पास ले गए #
पहले राघव ने दोनों युवा भक्तों को पास के दूसरे कुण्ड दिखाए। एक था माल्यहारी-कुण्ड, जहाँ मोतियों के हार से जुड़ी एक लीला हुई थी। रघुनाथ ने अपने मुक्ता-चरित में उस लीला का वर्णन किया है। फिर राघव ने शिव-खोर और भानु-खोर नाम के कुण्ड दिखाए। "यह कहते हुए राघव का हृदय आनन्द से भर गया" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 198)। इसके बाद वे दोनों को रघुनाथ के पास ले गए:
श्री-राघव-पण्डित सकल निवेदिल । शुनि दास-गोस्वामिर चित्ते हर्ष हैल
श्रीनिवास नरोत्तम अति सावधाने । भूमे पडि प्रणमिला गोस्वामि-चरणे
गोस्वामिर शुष्क देह दुर्बलातिशय । तथापि उठिया दुइ बाहु पसारय
"श्री राघव पण्डित ने उन्हें सब बातें बताईं, और सुनकर दास गोस्वामी का हृदय आनन्द से भर गया। श्रीनिवास और नरोत्तम ने बड़े आदर से धरती पर गिरकर गोस्वामी के चरणों में दण्डवत् किया। गोस्वामी का शरीर सूखा हुआ और बहुत दुर्बल था, फिर भी वे उठे और दोनों भुजाएँ फैला दीं।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 198, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
राघव ने रघुनाथ को जो कुछ बताया, उसके लिए नरहरि "निवेदिल" शब्द लिखते हैं, जिसका अर्थ है "उन्होंने निवेदन किया"। यह आदर का शब्द है। इसका प्रयोग तब होता है, जब कोई अपने से बड़े के सामने विनम्रता से कोई बात रखता है। रघुनाथ ने दोनों को गले लगाया और श्रीनिवास से धीरे से कुछ कहा। कृष्णदास कविराज, जो श्रीनिवास को अपने प्राणों के समान प्रेम करते थे, उनसे मिलने आए। व्रजवासी दास और कुण्ड के तट पर रहने वाले दूसरे वैष्णव भी आए, और उन्होंने जल्दी से भोजन तैयार करवाया (पृ. 198)। फिर "जहाँ श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी की कुटिया है", वहाँ सबने महाप्रसाद, अर्थात् भगवान को अर्पित भोजन, पाया (पृ. 199)। यह कुटिया श्रीनिवास के अपने गुरु की थी।
श्रीनिवास यहाँ एक बार पहले भी आ चुके थे। तब उनकी दीक्षा को कुछ ही समय हुआ था, और "श्री राघव, कृष्णदास कविराज और दूसरे सब वैष्णवों ने श्रीनिवास पर बहुत अधिक कृपा की" (भक्ति-रत्नाकर, चतुर्थ तरंग, पृ. 145)। इस बार राघव स्वयं उन्हें लेकर आए थे। बड़े आनन्द में वह दिन बिताकर "पण्डित भोर होते ही दोनों को साथ लेकर चल पड़े" (पृ. 199)। वे गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने निकले (देखें गोवर्धन की परिक्रमा और उनकी अपनी गुफा)।
गोविन्द-घाट और कृष्ण-कथा की एक रात #
गोवर्धन की परिक्रमा के बाद पण्डित बड़े आनन्द से श्रीनिवास को फिर राधा-कुण्ड ले आए। वहाँ गोविन्द-घाट पर, जो "गोविन्द को बहुत प्रिय" है, उन्होंने स्नान किया और कहा, "हे श्रीनिवास, इस वृक्ष के नीचे जो लीला हुई थी, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 210)। उन्होंने बताया कि एक बार सनातन गोवर्धन से आए। सनातन ने रूप के एक श्लोक पर प्रश्न उठाया, जिसमें बालों की वेणी की तुलना सर्प से की गई है। फिर कुण्ड पर सनातन ने कुछ कन्याओं को उसी वृक्ष के नीचे खेलते देखा। उन्हें लगा कि एक कन्या की वेणी कोई सर्प है, जो उसके सिर की ओर चढ़ रहा है, और वे घबराकर पुकार उठे। कन्याएँ थोड़ा-सा मुस्कुराईं और अदृश्य हो गईं। तब सनातन रूप के पास गए और बोले, "तुमने जो लिखा है, वह सत्य है।"
रूप वहाँ रघुनाथ के लिए ही आए थे। रूप के नाटक ललित-माधव में विरह की पीड़ा अपनी चरम सीमा तक पहुँच जाती है। इस नाटक के कारण रघुनाथ दिन-रात पागल की तरह रोते रहते थे। तब रूप ने रघुनाथ के लिए औषधि के तौर पर दान-केलि-कौमुदी लिखी। राघव ने कहा, "दान-केलि पढ़कर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ रघुनाथ सदा के लिए आनन्द के सागर में डूब गए। हे श्रीनिवास, सनातन, रूप और रघुनाथ के सब आचरणों का मैं कितना वर्णन करूँ?" (पृ. 210-211)।
फिर राघव ने उन्हें कुण्ड के आस-पास के स्थान दिखाए। इनमें निमग्राम था, जहाँ गोपियों ने गोवर्धन से बाहर आकर कृष्ण का मुख निहारा था और उन पर भेंट की वस्तुएँ घुमाकर न्योछावर की थीं; इसे निर्मञ्छन कहते हैं। कुंजेरा था, जो राधा-कुण्ड के कुंजों के किनारे है। और सूर्य-कुण्ड था, जहाँ राधा अपनी सखियों के साथ सूर्य की पूजा करती हैं, और उस पूजा में स्वयं कृष्ण पुरोहित बनते हैं (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 211-212)। इसके बाद वे सब बड़े आनन्द से राधा-कुण्ड लौट आए:
से दिवस राधा-कुण्ड-तटेइ रहिला । कृष्ण-कथाय सेइ निशा प्रभात करिला
"उस दिन वे राधा-कुण्ड के तट पर ही ठहरे, और पूरी रात कृष्ण-कथा में बिताकर सवेरा कर दिया।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 212, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
गाँठोली और गोपाल की सेवा #
राधा-कुण्ड से वे गाँठोली गए, और राघव ने बताया कि इस स्थान का यह नाम कैसे पड़ा। होली खेलने के बाद राधा और कृष्ण एक सिंहासन पर बैठे थे, और एक सखी ने चुपके से दोनों के वस्त्रों को आपस में गाँठ बाँधकर जोड़ दिया (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 212-213)। वहाँ सबने गोपाल के दर्शन किए। ये वही विग्रह हैं, जिनकी सेवा कभी माधवेन्द्र पुरी ने की थी। गोपाल की सुन्दरता देखकर सब अपना धैर्य खो बैठे। वल्लभ भट्ट के पुत्र विट्ठलनाथ ने उन पर इतना प्रेम दिखाया कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता (पृ. 213)।
इसके बाद गोपाल का इतिहास आता है। भक्त के भाव में श्री चैतन्य महाप्रभु गोवर्धन पर्वत पर पैर नहीं रखते थे, फिर भी वे गोपाल के दर्शन करना चाहते थे। तब गोपाल "बहाना करके" गाँठोली आ गए। गोपाल को देखकर प्रभु नृत्य और गान में खो गए। उन दिनों बंगाल के दो ब्राह्मण, जो माधवेन्द्र पुरी के शिष्य थे, गोपाल की सेवा करते थे। उन दोनों के देह छोड़ने के बाद सेवा के लिए एक नया सेवक चुनना था। उस चुनाव के बारे में नरहरि की पंक्तियाँ श्रील प्रभुपाद ने अपने तात्पर्य में उद्धृत की हैं:
श्री-दास-गोस्वामी आदि परामर्श करि’
श्री-विठ्ठलेश्वरे कैला सेवा-अधिकारी
"“आपस में परामर्श करके श्री दास गोस्वामी आदि ने श्री विट्ठलेश्वर को सेवा का अधिकारी बनाया।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.47, तात्पर्य, भक्ति-रत्नाकर से उद्धृत; तात्पर्य में इनका अनुवाद नहीं दिया गया, हिन्दी अनुवाद हमारा)
विट्ठलेश्वर ही वल्लभ भट्ट के छोटे पुत्र विट्ठलनाथ हैं। उस समय वे सदा पूरे ध्यान से गोपाल की सेवा में लगे रहते थे (पृ. 213-214)। ग्रन्थ ठीक-ठीक यह नहीं बताता कि नरहरि का अपना वर्णन कहाँ समाप्त होता है और राघव के शब्द कहाँ से आरम्भ होते हैं। पर प्रसंग के अन्त में लिखा है: "गोपाल के गुणों का वर्णन करके राघव पण्डित बड़े आनन्द से गाँठोली से चल पड़े" (पृ. 214)। इससे पता चलता है कि यह इतिहास राघव ने सुनाया था, और इसमें जिस चुनाव की बात है, वह रघुनाथ और उनके आस-पास के भक्तों ने किया था। गाँठोली से राघव दोनों को आगे व्रज के वनों में ले गए।
जाह्नवा माता के लिए एक सन्देश #
परिक्रमा के वर्षों बाद भक्ति-रत्नाकर राघव को एक बार फिर रघुनाथ की सेवा में दिखाता है। खेतुरी के महान उत्सव के बाद नित्यानन्द प्रभु की पत्नी जाह्नवा माता वृन्दावन आईं। उनके आने का समाचार सुनकर रघुनाथ बहुत प्रसन्न हुए, पर उनमें यात्रा करने की शक्ति नहीं थी। श्री रूप के विरह में उनका हृदय सदा व्याकुल रहता था, और भोजन न करने से उनका शरीर बहुत ही दुबला हो गया था। इसलिए उन्होंने कृष्णदास कविराज और दूसरे बहुत-से भक्तों के द्वारा अपना विनम्र सन्देश भेजा (भक्ति-रत्नाकर, एकादश तरंग, पृ. 667):
गोपाल राघव पण्डितादि एक साथे । चले नन्दीश्वर गोवर्धनादि हैते
सबे वृन्दावने करि' ईश्वरी दर्शन । जानाइला दास-गोस्वामिर निवेदन
"गोपाल, राघव पण्डित और दूसरे भक्त एक साथ नन्दीश्वर, गोवर्धन और अन्य स्थानों से चले। सबने वृन्दावन में ईश्वरी (जाह्नवा देवी) के दर्शन किए और दास गोस्वामी का निवेदन उन तक पहुँचाया।" (भक्ति-रत्नाकर, एकादश तरंग, पृ. 667, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
जाह्नवा माता ने गोपाल भट्ट गोस्वामी और दूसरे गोस्वामियों से कहा कि वे सवेरे श्री-कुण्ड (राधा-कुण्ड) जाएँगी। वहाँ कुण्ड की शोभा देखकर उनका हृदय प्रेम से उमड़ पड़ा (पृ. 667)। उनकी इस यात्रा के वर्णन में राघव का नाम फिर नहीं आता। पर ये पंक्तियाँ दिखाती हैं कि परिक्रमा के बहुत समय बाद भी राघव गोवर्धन के पास ही रहते थे, और तब भी रघुनाथ के निकट थे।
वैष्णवों की कृपा #
रूप गोस्वामी कहते हैं कि राधा-कुण्ड "महान भक्तों को भी बहुत कठिनाई से मिलता है"। यह केवल विद्या या प्रयत्न से नहीं मिलता; यह तो वहाँ रहने वाले शुद्ध भक्तों की कृपा से मिलता है। राघव "सब शास्त्रों में निपुण" थे (पृ. 150), फिर भी उन्होंने श्रीनिवास से ठीक यही कहा: "राधा-कुण्ड में रहना रघुनाथ की कृपा से ही मिलता है।" स्वयं रघुनाथ को यह कृपा महाप्रभु से मिली थी। रघुनाथ ने महाप्रभु के बारे में कहा था, "उन्होंने मुझे श्रीमती राधारानी के चरण-कमलों का आश्रय दे दिया है।"
राघव का अपना जीवन दिखाता है कि ऐसी कृपा कैसे मिलती है। वे रघुनाथ के साथ रहे, उन्होंने प्रेम से रघुनाथ के जीवन की कथाएँ सुनाईं, दो युवा भक्तों को उनके चरणों में दण्डवत् करने के लिए ले गए, और वर्षों बाद रघुनाथ का विनम्र सन्देश जाह्नवा माता तक पहुँचाया। जिसके मन में राधा-कुण्ड की लालसा है, उसे राघव मार्ग दिखाते हैं: राधा-कुण्ड के अपने भक्तों की सेवा करो, और उनकी कृपा के लिए प्रार्थना करो।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (7)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Nectar of Instruction, verse 11 ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 198 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Antya 6.307 ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 198 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 212 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.47, purport ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Eleventh Wave, p. 667 (1912 ed.)
अध्याय 4
गोवर्धन की परिक्रमा और उनकी अपनी गुफा
गोवर्धन की परिक्रमा में राघव ने श्रीनिवास को कृष्ण, महाप्रभु और गोस्वामियों से जुड़े स्थान दिखाए, और फिर अपनी गुफा, जहाँ राधा-कृष्ण निरन्तर लीला करते हैं।

श्रील राघव पण्डित गोस्वामी अपने दो युवा साथियों, श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर, के साथ राधा-कुण्ड पर बड़े आनन्द का एक दिन बिता चुके थे। श्रील जीव गोस्वामी ने इन दोनों को उनके साथ व्रज के पवित्र स्थानों के दर्शन के लिए भेजा था (देखें जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास और नरोत्तम को उन्हें सौंपा)। वहाँ सबने गोपाल भट्ट गोस्वामी की कुटिया में महाप्रसाद, अर्थात् भगवान को अर्पित भोजन, पाया था। फिर "पण्डित भोर होते ही दोनों को साथ लेकर चल पड़े" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 199)। वे उस पर्वत की परिक्रमा करने निकले, जो उनका अपना घर था।
यह कथा नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर अपने भक्ति-रत्नाकर में सुनाते हैं। राघव के बारे में वे कहते हैं: "श्री गोवर्धन पर्वत ही उनका सर्वस्व है; वे गोवर्धन में रहते हैं" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 150)। इस परिक्रमा में राघव ने दोनों को कृष्ण की लीलाओं के स्थान दिखाए। उनमें से बहुत-से स्थानों पर उन्होंने यह भी बताया कि श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु और गोस्वामियों ने वहाँ क्या किया था। और रास्ते में वे उन्हें उस एक स्थान पर भी ले गए, जिसे वे अपना कहते थे: अप्सरा-कुण्ड के पास, "गोवर्धन के छोर पर", एक गुफा।
गौड़ीय वैष्णव की दृष्टि में गोवर्धन #
एक गौड़ीय वैष्णव के लिए गोवर्धन कोई साधारण पर्वत नहीं है। उपदेशामृत में श्रील रूप गोस्वामी उसे वृन्दावन के वन से भी श्रेष्ठ बताते हैं, "क्योंकि उसे श्री कृष्ण ने अपने दिव्य हाथ से उठाया था और वहाँ उनकी अनेक प्रेम-लीलाएँ हुईं" (उपदेशामृत, श्लोक 9)। उससे भी श्रेष्ठ केवल राधा-कुण्ड है, जो उसकी तलहटी में है। श्रील प्रभुपाद अपने तात्पर्य में समझाते हैं: "गोवर्धन पर्वत पर ही कृष्ण अपने ग्वाल-बाल सखाओं के साथ गायें भी चराते हैं, और वहीं वे अपनी परम प्रिय श्री राधा से मिले और उनके साथ प्रेम-लीलाएँ कीं।"

श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं अपने उदाहरण से दिखाया कि एक भक्त इस पर्वत को किस दृष्टि से देखता है:
गोवर्धन देखि’ प्रभु ह-इला दण्डवत्
‘एक शिला’ आलिङ्गिया ह-इला उन्मत्त
"“गोवर्धन पर्वत को देखते ही प्रभु ने तुरन्त डण्डे की तरह धरती पर गिरकर दण्डवत् किया। उन्होंने गोवर्धन की एक शिला को गले लगाया और प्रेम में उन्मत्त हो गए।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.16)
यही वह पर्वत था, जिसे राघव अपना सर्वस्व कहते थे। अब वे एक-एक स्थान करके इसे श्रीनिवास और नरोत्तम को दिखाने लगे।
कुसुम-सरोवर से गोविन्द-कुण्ड तक #
राधा-कुण्ड के दक्षिण में मुखराई गाँव है। वहाँ राघव ने श्रीनिवास से कहा कि गोवर्धन के चारों ओर लीला के बहुत-से स्थान हैं (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 199)। उन्होंने श्रीनिवास को "इस वन में" कुसुम-सरोवर दिखाया, जहाँ फूल चुनते समय राधा और कृष्ण ने अद्भुत लीला की थी। फिर उन्होंने नारद-कुण्ड दिखाया, जहाँ नारद मुनि ने तपस्या की थी, और वृन्दा के उपदेश से उनके हृदय की इच्छा पूरी हुई थी।

इसके बाद रत्न-सिंहासन आया, फिर परासौली, जहाँ वसन्त ऋतु का रास-नृत्य हुआ था, फिर पैठा और बहुत-से दूसरे स्थान आए। हर स्थान पर भक्ति-रत्नाकर रघुनाथ दास गोस्वामी के व्रज-विलास-स्तव, रूप गोस्वामी की उज्ज्वल-नीलमणि और पुराणों से श्लोक भी देता है (पृ. 199-202)। इन पृष्ठों में नरहरि मार्गदर्शक राघव के बारे में केवल एक बात लिखते हैं, और वह है उनका आनन्द: "पण्डित ने आनन्द से कहा, ‘देखो, श्रीनिवास’" (पृ. 201)। आन्यौर (आनियोर) में राघव ने श्रीनिवास से ऐसे शब्द कहे, जिन्हें श्रील प्रभुपाद श्री चैतन्य-चरितामृत में उद्धृत करते हैं:
गोप-गोपी भुञ्जायेन कौतुक अपार
एइ हेतु ‘आनियोर’ नाम से इहार
अन्नकूट-स्थान एइ देख श्रीनिवास
ए-स्थान दर्शने हय पूर्ण अभिलाष
"“यहाँ सब गोपियों और गोपों ने श्री कृष्ण के साथ अद्भुत लीलाओं का आनन्द लिया। इसीलिए इस स्थान का एक नाम आनियोर भी है। यहीं अन्नकूट का उत्सव हुआ था। हे श्रीनिवास, जो इस स्थान का दर्शन करता है, उसकी सब इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.26, तात्पर्य)
श्रील प्रभुपाद यहाँ बोलने वाले का नाम नहीं बताते, पर भक्ति-रत्नाकर में ये राघव के ही शब्द हैं। इस प्रकार इस परिक्रमा के कुछ वाक्य आज भी श्रील प्रभुपाद के ग्रन्थों के द्वारा भक्तों तक पहुँचते हैं। पास ही गोविन्द-कुण्ड है, जहाँ "गोविन्द से हारकर इन्द्र ने उनकी स्तुति की और उनका अभिषेक किया" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.37, तात्पर्य)। कुण्ड के पास राघव ने एक घने वन की ओर इशारा किया: "कुण्ड के पास यह घना वन देखो। यहीं गोपाल छिपकर रहे थे" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.26, तात्पर्य)। उन्होंने उन्हें एक वृक्ष के नीचे वह स्थान दिखाया, जहाँ माधवेन्द्र पुरी ठहरे थे (पृ. 202), और पर्वत पर गोपाल का स्थान भी दिखाया। साथ ही उन्होंने बताया कि गोपाल समय-समय पर गाँठोली में भी रहते हैं (पृ. 203)।
यह मेरी गुफा है #
आगे चलते हुए वे उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ गोवर्धन समाप्त होता है। वहाँ राघव ने जो कहा, उसे भक्ति-रत्नाकर कुछ ही पंक्तियों में लिखता है, और ये पंक्तियाँ उनकी पूरी कथा की सबसे अनमोल पंक्तियों में से हैं (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 203)।

पहले उन्होंने उन्हें एक पवित्र कुण्ड और एक बहुत पुराना वृक्ष दिखाया:
देखह अप्सरा-कुण्ड गोवर्धन अन्ते । एथा स्नान करये परम भाग्यवन्ते
एइ देख पलाशेर वृक्ष पुरातन । श्याम-ढाक कहे लोके ए अति निर्जन
"‘गोवर्धन के छोर पर यह अप्सरा-कुण्ड देखो; बड़े भाग्यशाली लोग यहाँ स्नान करते हैं। और पलाश का यह पुराना वृक्ष देखो। लोग इस स्थान को श्याम-ढाक कहते हैं; यह बहुत एकान्त है।’" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 203, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
फिर वे उन्हें अपने घर ले आए:
एत कहि आगे चले मनेर उल्लासे । निज वास-स्थाने गिया कहे श्रीनिवासे
एइ मोर गोफा आमि रहिये एथाइ । देखि गोवर्धन शोभा महा-सुख पाइ
एइ गोवर्धन गुहा अति मनोहर । एथा राधा-कृष्ण विलसये निरन्तर
"इतना कहकर वे मन के आनन्द में आगे चले। अपने निवास-स्थान पर पहुँचकर उन्होंने श्रीनिवास से कहा, ‘यह मेरी गुफा है; मैं यहीं रहता हूँ। गोवर्धन की शोभा देखकर मुझे बड़ा सुख मिलता है। गोवर्धन की यह गुफा बहुत मनोहर है; यहाँ राधा-कृष्ण निरन्तर लीला करते हैं।’" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 203, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
पुराने ग्रन्थों में केवल यही पंक्तियाँ हैं, जिनमें हम राघव को अपने घर के बारे में बोलते हुए सुनते हैं। वे उसे गोफा, अर्थात् गुफा, कहते हैं। वे बताते हैं कि वे यहीं रहते हैं, गोवर्धन की शोभा उन्हें सुख से भर देती है, और यहाँ राधा-कृष्ण निरन्तर लीला करते हैं। अपने आराम या कष्ट के बारे में वे कुछ नहीं कहते, और ग्रन्थ भी यह नहीं बताता कि गुफा कैसी थी। राघव समय-समय पर राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ रहते थे, और नरहरि यहाँ तुरन्त उन्हीं का एक श्लोक जोड़ते हैं:
येषां क्वापि च माधवो विहरते स्निग्धैर्वयस्योत्करै-
स्तद्धातुद्रवपुञ्जचित्रिततरैस्तैस्तैः स्वयं चित्रितः ।
खेलाभिः किल पालनैरपि गवां कुत्रापि नर्मोत्सवैः
श्रीराधासहितो गुहासु रमते तान् शैलवर्यान् भजे ॥
"मैं उन श्रेष्ठ पर्वत-शिखरों की उपासना करता हूँ, जहाँ माधव कभी अपने प्रेमी सखाओं के झुण्ड के साथ खेलते हैं। वे सखा उन पर्वतों की रंगीन धातुओं से स्वयं रँगे होते हैं और उन्हें भी रँग देते हैं। वहीं वे खेलते हैं और गायें चराते हैं, और वहीं की गुफाओं में श्री राधा के साथ हास-परिहास की लीलाओं का आनन्द लेते हैं।" (व्रज-विलास-स्तव 65, भक्ति-रत्नाकर पृ. 203 में उद्धृत; हिन्दी अनुवाद हमारा)
यह श्लोक गोवर्धन की सब गुफाओं की बात करता है, और भक्ति-रत्नाकर इसे राघव की गुफा पर लागू करता है। राघव के लिए इस पर्वत की गुफा राधा-कृष्ण के निकट रहने का स्थान थी। इससे नरहरि का वह चित्र भी समझ में आता है, जो उन्होंने पहले राघव के बारे में दिया था: "व्रज की धूल से उनका शरीर धूसर रहता है और खाने की कोई इच्छा नहीं रहती। उनके प्रबल वैराग्य को कौन समझ सकता है?" (पृ. 150; देखें गोवर्धन में दक्षिण के एक ब्राह्मण)।
जहाँ महाप्रभु ने हरिदेव के सामने नृत्य किया #
गुफा से वे आगे चले। रास्ते में वे इन्द्र के हाथी ऐरावत के पदचिह्न के पास से गुज़रे, जहाँ "इन्द्र ने कृष्ण की अद्भुत कृपा का वर्णन किया", और फिर दान-घाटी पहुँचे (पृ. 203)। राघव ने बताया कि यहाँ रसिकों के राजा कृष्ण दूध-दही आदि का दान, अर्थात् कर, माँगते हैं। रसिक उन्हें कहते हैं, जो प्रेम के आदान-प्रदान का रस लेते हैं। फिर राघव ने सुनाया कि इसी स्थान पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्या किया था। प्रभु ने अपने साथ यात्रा कर रहे ब्राह्मण से धीरे से इस दान-लीला के बारे में पूछा, और सुनते-सुनते आनन्द से मन्द-मन्द मुस्कुराने लगे। फिर प्रेम के आवेश में उन्होंने हरिदेव विग्रह के दर्शन किए और ऐसा अद्भुत नृत्य किया कि लोग रोने लगे और कहने लगे, "ये हरिदेव के अवतार हैं।" अन्त में राघव ने कहा: "हे श्रीनिवास, प्रभु ने गोवर्धन में अपने आप को किस प्रकार प्रकट किया, इसका वर्णन करना कौन जानता है?" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 203)।
कृष्णदास कविराज गोस्वामी भी इसी नृत्य का वर्णन करते हैं: "प्रेम में उन्मत्त होकर श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदेव विग्रह के सामने नाचने लगे। प्रभु की अद्भुत लीलाओं के बारे में सुनकर सब लोग उनके दर्शन करने आए" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.19)। महाप्रभु के बारे में अपनी सब कथाओं की तरह राघव यह कथा भी अपने अनुभव के रूप में नहीं, बल्कि एक घटना के रूप में सुनाते हैं, और कहीं नहीं कहते कि उन्होंने इसे स्वयं देखा था। मथुरा में ऐसी ही एक कथा के बारे में उन्होंने साफ़ कहा था, "यह कथा मैंने बड़े-बुज़ुर्गों के मुख से सुनी है" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 165)। उन्होंने यह भी बताया कि श्री रूप ने कृष्ण की इस दान-लीला का वर्णन अपने ग्रन्थ दान-केलि-कौमुदी में किया है (पृ. 204)। फिर ब्रह्म-कुण्ड, मानसी-गंगा और हरिदेव के दर्शन के बाद उन्होंने "आनन्द से गोवर्धन की महिमा का वर्णन किया" (पृ. 204-205)।
गोवर्धन की दो शिलाएँ #
आगे चलकर राघव ने नित्यानन्द प्रभु की एक गुप्त लीला सुनाई। उन्होंने बताया कि गोवर्धन के पास एक धनी ब्राह्मण रहते थे। वे बलराम के प्रेम में सदा विह्वल रहते थे, और उन्हें पूरा विश्वास था कि बलराम उन्हें दर्शन देंगे। फिर नित्यानन्द प्रभु, जो स्वयं बलराम हैं, अपनी तीर्थ-यात्रा में गोवर्धन आए और अपने भक्त के लिए "यहीं" ठहरे। उन्होंने ब्राह्मण का दूध, मक्खन और दही स्वीकार किया, और स्वप्न में उन्हें बलदेव के रूप में दर्शन दिए। जब ब्राह्मण ने उन्हें आभूषण भेंट करने चाहे, तो नित्यानन्द ने आभूषणों के बदले सोने में जड़ी हुई गोवर्धन की एक शिला माँगी, और उसे अपने गले में धारण किया। राघव ने कहा कि यह लीला "ब्रह्मा और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है", और नित्यानन्द ने ब्राह्मण को इसे किसी को बताने से मना कर दिया था। राघव ने आगे कहा, "इस स्थान के दर्शन से दुर्लभ प्रेम मिलता है" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 206-208)।
इसके बाद उन्होंने चक्र-तीर्थ दिखाया, जो "गोवर्धन में बहुत प्रसिद्ध है" (पृ. 208)। यहाँ सनातन गोस्वामी बड़े आनन्द से रहे थे। राघव ने कहा, "वन के भीतर उनकी कुटिया देखो।" सनातन प्रतिदिन गोवर्धन की बारह कोस की परिक्रमा करते थे (कोस दूरी नापने का एक पुराना भारतीय माप है): "ऐसी शक्ति और किसमें है?" जब सनातन वृद्ध हो गए, तब गोपीनाथ, अर्थात् स्वयं कृष्ण, एक ग्वाल-बालक के रूप में उनके पास आए। उन्होंने सनातन को गोवर्धन की एक शिला दी, जिस पर कृष्ण के अपने चरण का चिह्न था, ताकि सनातन पर्वत के बदले उस शिला की परिक्रमा कर सकें। फिर वह बालक अदृश्य हो गया। सनातन को व्याकुल देखकर कृष्ण ने, बिना दिखाई दिए, बड़े स्नेह से उन्हें अपना परिचय दिया, और सनातन तब तक रोते रहे, जब तक उनके मन को धीरज नहीं मिला (पृ. 208-209)।
महाप्रभु गोवर्धन की जो शिला अपने पास रखते थे, उसके बारे में कृष्णदास कविराज लिखते हैं कि "श्री चैतन्य महाप्रभु कहा करते थे, ‘यह शिला साक्षात् भगवान कृष्ण का शरीर है।’" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 6.292)। राघव की इन दो कथाओं में भगवान स्वयं ऐसी शिला को अपना आभूषण बनाने के लिए माँगते हैं, और भगवान ही एक वृद्ध भक्त को ऐसी एक शिला देते हैं। इसके बाद राघव श्रीनिवास को साथ लेकर फिर राधा-कुण्ड लौट आए (पृ. 210)। वहाँ रूप, सनातन और रघुनाथ की कथाएँ सुनाई गईं, और फिर पूरी रात कृष्ण-कथा चलती रही (देखें राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ)।
गाँठोली, जहाँ गोपाल नीचे उतर आए #
उस रात के बाद, "इस प्रकार गोवर्धन होते हुए परिक्रमा करके", वे आनन्द से गाँठोली गए (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 212)। गोपाल विग्रह की सुन्दरता देखकर वे अपना धैर्य खो बैठे, और वल्लभ भट्ट के पुत्र विट्ठलनाथ ने उन पर इतना प्रेम दिखाया कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता। फिर राघव ने गोपाल का इतिहास सुनाया। भक्त के भाव में महाप्रभु गोवर्धन पर पैर नहीं रखते थे, इसलिए उनसे मिलने के लिए गोपाल "बहाना करके" गाँठोली आ गए। उन दिनों माधवेन्द्र पुरी के दो बंगाली शिष्य गोपाल की सेवा करते थे; उनके बाद "श्री दास गोस्वामी आदि" ने विट्ठलेश्वर को गोपाल की सेवा का अधिकारी बनाया (पृ. 213-214)। श्रील प्रभुपाद श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.47 के अपने तात्पर्य में ये पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं, और इस कथा का पूरा विवरण अलग से दिया गया है (देखें राधा-कुण्ड पर रघुनाथ दास गोस्वामी के साथ)। चैतन्य-चरितामृत महाप्रभु की ओर से भी यही विनम्रता दिखाता है:
‘गोवर्धन-उपरे आमि कभु ना चडिब
गोपाल-रायेर दरशन केमने पाइब?’
"“श्री चैतन्य महाप्रभु ने सोचा, ‘जब मैं कभी गोवर्धन पर्वत पर चढ़ूँगा ही नहीं, तो गोपाल राय के दर्शन कैसे पाऊँगा?’”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.23)
जैसा राघव ने गाँठोली में बताया, महाप्रभु की इस विनम्र इच्छा को स्वयं गोपाल ने पूरा किया। गाँठोली से राघव दोनों को पश्चिम के वनों की ओर ले गए (देखें व्रज के वनों में)।
राघव की गुफा आज #
भक्ति-रत्नाकर केवल इतना कहता है कि राघव की गुफा अप्सरा-कुण्ड, "गोवर्धन के छोर पर", और श्याम-ढाक के पुराने पलाश वृक्ष के आगे थी (पृ. 203)। हरिदास दास का गौड़ीय वैष्णव अभिधान बीसवीं शताब्दी का एक गौड़ीय सन्दर्भ-ग्रन्थ है। वह पुछरी, अर्थात् पूँछरी, को गोवर्धन के किनारे का एक स्थान बताता है, जो गोविन्द-कुण्ड से डेढ़ मील दक्षिण में है। उसके अनुसार गाँव के उत्तर में अप्सरा-कुण्ड और नवल-कुण्ड हैं; कुण्ड के उत्तर में श्री राघव पण्डित की गुफा है, और गुफा के सामने श्री कृष्ण के मुकुट का चिह्न है (गौड़ीय वैष्णव अभिधान, खण्ड 4, पृ. 1908)। राघव के अपने ग्रन्थ का 1955 का संस्करण उन्हें "श्री गोवर्धन पर्वत की तलहटी में ‘पुछरी’ नाम के कृष्ण-लीला स्थान के निवासी" कहता है (देखें चम्पकलता और श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश)।

आधुनिक तीर्थ-पुस्तिकाएँ बताती हैं कि गुफा अप्सरा-कुण्ड के निकट, सुतल-कुण्ड और पूँछरी के एक श्रीनाथजी मन्दिर के पास है। यह मन्दिर सौ वर्ष से भी कम पुराना है। वे यह भी कहती हैं कि अब गुफा का मुख बन्द कर दिया गया है। कुछ पुस्तिकाएँ इसे "मणि-कन्दली गुफा" कहती हैं, जबकि यह नाम किसी भी पुराने ग्रन्थ में नहीं मिलता। उनके अनुसार बाद में रामकृष्ण दास नाम के एक भक्त ने, जो पण्डित बाबा कहलाते थे, वहाँ भजन किया था। ये बातें उस स्थान की परम्पराएँ हैं। इन्हीं पुस्तिकाओं में से कई राघव को महाप्रभु का निकट पार्षद बताती हैं। यह भूल उन्हें पानिहाटी के राघव पण्डित के साथ एक मान लेने से हुई है, जो एक अलग भक्त थे। गोवर्धन की परिक्रमा करने वाले तीर्थयात्री पूँछरी से होकर जाते हैं, और ये पुस्तिकाएँ उन्हें अप्सरा-कुण्ड से पर्वत की ओर जाने वाला एक छोटा रास्ता बताती हैं। वहाँ दण्डवत् करके यह स्मरण किया जा सकता है कि इसी स्थान पर राघव ने श्रीनिवास से क्या कहा था।
भक्त वहीं क्यों रहता है, जहाँ कृष्ण लीला करते हैं #
जो ब्राह्मण "सब शास्त्रों में निपुण" थे (पृ. 150), उन्होंने गोवर्धन के किनारे एक गुफा को अपना घर क्यों बनाया? इसका एक उत्तर श्रीमद्भागवत में गोपियों के उन शब्दों में है, जिनका पाठ स्वयं महाप्रभु ने पर्वत को देखकर नाचते हुए किया था (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.33):
हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो
यद्रामकृष्णचरणस्परशप्रमोदः ।
मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्
पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः ॥
"“‘सब भक्तों में यह गोवर्धन पर्वत श्रेष्ठ है! हे सखियो, यह पर्वत कृष्ण और बलराम को, और उनके बछड़ों, गायों और ग्वाल-बाल सखाओं को, सब आवश्यक वस्तुएँ देता है: पीने का जल, बहुत कोमल घास, गुफाएँ, फल, फूल और कन्द-मूल। इस प्रकार यह पर्वत भगवान का आदर करता है। कृष्ण और बलराम के चरण-कमलों का स्पर्श पाकर गोवर्धन पर्वत बहुत आनन्दित दिखता है।’”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.34)
यह पर्वत कृष्ण और उनके सखाओं की सेवा करता है और उन्हें उनकी आवश्यकता की हर वस्तु देता है, यहाँ तक कि गुफाएँ भी। जो ऐसी गुफा में रहता है, वह कृष्ण की लीला के बीच में रहता है। वहाँ राघव के जीवन का आराम या किसी लाभ से कोई सम्बन्ध नहीं था। श्रील प्रभुपाद सावधान करते हैं: "किन्तु यदि कोई इन्द्रिय-तृप्ति के लिए या जीविका कमाने के लिए मथुरा-मण्डल-भूमि में जाता है, तो वह अपराध करता है और दोषी ठहराया जाता है" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 22.132, तात्पर्य)। राघव के अपने शब्द बताते हैं कि उन्हें वहाँ किस बात ने रोके रखा: "गोवर्धन की शोभा देखकर मुझे बड़ा सुख मिलता है।" और जो उन्होंने देखा, उसे उन्होंने प्रसन्नता से बाँटा, जैसे श्रीनिवास और नरोत्तम के साथ बाँटा। हम शायद गोवर्धन में न रह सकें, पर उनसे यह सीख सकते हैं कि उसे कैसे देखें: चट्टानों और तालाबों के रूप में नहीं, बल्कि उस स्थान के रूप में, जहाँ राधा-कृष्ण निरन्तर लीला करते हैं।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (7)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.16 ऊपर देखें ↑
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.26, purport ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 203 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 203 (1912 ed.)
- Vraja-vilasa-stava 65 (in Bhakti-ratnakara, p. 203)
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.23 ऊपर देखें ↑
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.34 ऊपर देखें ↑
अध्याय 5
व्रज के वनों में
काम्यवन और नन्दीश्वर से महावन और रावल तक: हर स्थान पर राघव की सुनाई कथाएँ, कृष्ण-कथा में बीती रातें, और वे आँसू जिन्हें वे रोक न सके।

गाँठोली से श्रील राघव पण्डित गोस्वामी श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर को गोवर्धन से आगे, व्रज के दूर-दूर तक फैले वनों में ले गए। श्रील जीव गोस्वामी ने इन दोनों युवा भक्तों को सब पवित्र स्थानों के दर्शन के लिए उनके साथ भेजा था (देखें जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास और नरोत्तम को उन्हें सौंपा)। वे मथुरा और राधा-कुण्ड के दर्शन कर चुके थे, और गोवर्धन की परिक्रमा भी पूरी कर चुके थे। अब नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर के भक्ति-रत्नाकर का पंचम तरंग उनकी आगे की यात्रा का वर्णन करता है। वे काम्यवन जाते हैं, बरसाना और नन्दीश्वर होते हुए यमुना के किनारे-किनारे चलते हैं, नदी पार करके महावन और गोकुल पहुँचते हैं, और फिर लौटकर मथुरा आते हैं। लगभग हर स्थान पर राघव श्रीनिवास की ओर मुड़कर कहते हैं, "हे श्रीनिवास, देखो," और बताते हैं कि वहाँ क्या हुआ था: कृष्ण की लीलाएँ, श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानन्द प्रभु के वहाँ आने की कथाएँ, और उन गोस्वामियों का जीवन, जो इन वनों में रहे थे।
ग्रन्थ यह नहीं बताता कि इस यात्रा में कितने दिन लगे। रास्ते के इस भाग में वह नन्दीश्वर में सनातन गोस्वामी की कुटिया पर, सुरुखुरु गाँव में और रावल में रात बिताने का उल्लेख करता है। पर मार्गदर्शक राघव कैसे थे, यह वह बहुत साफ़ दिखाता है। जहाँ गोस्वामी रहे थे, उन स्थानों पर वे रो पड़ते हैं। वन की सुन्दरता उन्हें इतना विभोर कर देती है कि वे धीरे-धीरे चलते हैं। चारों ओर का दृश्य देखने के लिए वे एक टीले पर चढ़ जाते हैं। और वे पूरी-पूरी रात कृष्ण की बातें करते हुए बिता देते हैं।
काम्यवन से नन्दीश्वर तक #
गाँठोली से आगे चलकर राघव एक के बाद एक गाँव दिखाते गए। वे प्रायः किसी गाँव का पुराना नाम भी बताते और वह नाम भी, जिससे उनके समय में लोग उसे पुकारते थे। जैसे प्रमोदना के बारे में उन्होंने कहा, "अब इसे परमादना कहते हैं" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 214)। फिर वे काम्यवन पहुँचे। इस वन में इतने पवित्र कुण्ड हैं कि ग्रन्थ उन सबको गिनाने का प्रयास ही छोड़ देता है। श्रील प्रभुपाद ग्रन्थ के ये शब्द उद्धृत करते हैं:
एइ काम्यवने कृष्ण-लीला मनोहर
करिबे दर्शन स्थान कुण्ड बहुतर
काम्यवने यत तीर्थ लेखा नाहि तार
"“इस काम्यवन में कृष्ण ने मनोहर लीलाएँ कीं। यहाँ तुम बहुत-से कुण्डों और दूसरे दिव्य स्थानों के दर्शन कर पाओगे। काम्यवन के सब पवित्र तीर्थों का वर्णन मैं लिखकर भी नहीं कर सकता।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.55, तात्पर्य)
काम्यवन से वे बरसाना गए, जो श्रीमती राधारानी के पिता राजा वृषभानु का नगर है। वहाँ से वे नन्दीश्वर पहुँचे (पृ. 215-221)। नन्दीश्वर में राघव ने पहाड़ी की चोटी की ओर इशारा करके कहा, "देखो, पहाड़ी के ऊपर एक अद्भुत गुफा में श्री नन्द और यशोदा अपने पुत्र के साथ शोभा पा रहे हैं।" फिर उन्होंने बताया कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ क्या किया था (पृ. 222)। प्रभु उस गुफा के भीतर गए। वहाँ उन्होंने नन्द और यशोदा को दोनों ओर और कृष्ण को बीच में देखा, और उनके नेत्र आनन्द से खिल उठे। उन्होंने नन्द और यशोदा के चरणों में प्रणाम किया, कृष्ण के सब अंगों का स्पर्श किया, और प्रेम के आवेश में नाचने और गाने लगे। जो लोग यह देख रहे थे, वे कहने लगे कि ऐसा लगता है, मानो नन्द के पुत्र फिर से प्रकट हो गए हों। अन्त में राघव ने विनम्रता से कहा, "सन्न्यासियों के शिरोमणि श्री कृष्ण-चैतन्य ने यहाँ जो प्रेम प्रकट किया, उसका वर्णन कैसे करूँ, यह मैं नहीं जानता।"
कृष्णदास कविराज गोस्वामी भी चैतन्य-चरितामृत में इसी दृश्य का वर्णन करते हैं: "श्री चैतन्य महाप्रभु ने नन्द महाराज और माता यशोदा को प्रणाम किया, और गहरे प्रेम के आवेश में भगवान कृष्ण के श्रीअंग का स्पर्श किया" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.62)। सदा की तरह, राघव यह कथा अन्य पुरुष में सुनाते हैं और कहीं नहीं कहते कि उन्होंने इसे स्वयं देखा था।
उमराव में लोकनाथ गोस्वामी #
नन्दीश्वर से वे यावट, कोकिलावन और राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़े बहुत-से दूसरे गाँवों से होकर गए (पृ. 223-247)। उमराव में किशोरी-कुण्ड है, जो "वृषभानु की पुत्री को अत्यन्त प्रिय" है। उसी के पास राघव ने बताया कि लोकनाथ गोस्वामी वहाँ कैसे रहते थे (पृ. 247)। उन्होंने कहा कि लोकनाथ के वैराग्य का वर्णन करते-करते उसका अन्त नहीं आता। फल, कन्द-मूल, साग या अन्न, जो कुछ भी उन्हें मिलता, उसे वे बड़े यत्न से अपने विग्रह श्री राधा-विनोद को अर्पित करते थे। बरसात और ठण्ड में वे एक वृक्ष के नीचे रहते थे, और उनके पास केवल एक फटी-पुरानी गुदड़ी और एक बहुत ही फटा-पुराना वस्त्र था। जब मूसलाधार वर्षा होती, तो वे स्वयं भीग जाते, पर विग्रह को उसी वृक्ष के खोखले भाग में सूखा रखते। दूसरे समय वे विग्रह को एक पुरानी झोली में रखकर अपनी छाती से लगाए रहते, और उनका हृदय आनन्द से भरा रहता। और श्री गौरचन्द्र की लीलाओं को याद करके वे वहाँ रोया करते थे। यह सब बताते-बताते राघव का अपना हृदय भी भर आया:
ऐछे कत कहि धैर्य धरिते ना पारे । राघव-पण्डित नेत्र जलेइ साँतारे
श्रीनिवास नरोत्तम धूलाय लोटाय । छाडे दीर्घ-श्वास भासे नेत्रेर धाराय
कत क्षणे श्री-पण्डित सुस्थिर हैया । दोँहे स्थिर करि आगे चले दोँहे लैया
"ऐसी बहुत-सी बातें कहते-कहते राघव पण्डित धैर्य न रख सके; वे अपने ही आँसुओं में तैरने लगे। श्रीनिवास और नरोत्तम धूल में लोटने लगे; वे लम्बी साँसें लेते हुए आँसुओं की धारा में बह रहे थे। कुछ समय बाद श्री पण्डित शान्त हुए, उन्होंने दोनों को सँभाला और उन्हें साथ लेकर आगे चल पड़े।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 248, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
उस दिन धूल में लोटने वाले नरोत्तम स्वयं लोकनाथ गोस्वामी के शिष्य थे (देखें लोकनाथ गोस्वामी के शिष्यत्व में)। वे अपने गुरु के वैराग्य की कथा ठीक उसी स्थान पर सुन रहे थे, जहाँ वह सब हुआ था, और वह भी एक ऐसे भक्त के मुख से, जो कथा सुनाते-सुनाते स्वयं रो रहे थे। थोड़ा आगे, खदिरवन में, राघव ने ऐसे शब्द कहे, जिन्हें श्रील प्रभुपाद भी उद्धृत करते हैं:
देखह खदिर-वन विदित जगते
विष्णु-लोक-प्राप्ति एथा गमन-मात्रेते
"“देखो, यह खदिरवन है, जो सारे संसार में प्रसिद्ध है। जो खदिरवन आता है, वह तुरन्त विष्णुलोक को प्राप्त हो सकता है।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.63, तात्पर्य)
वहाँ उन्होंने संगम-कुण्ड दिखाया। यह एक बहुत एकान्त स्थान है, जहाँ लोकनाथ कभी-कभी भूगर्भ गोस्वामी के साथ रहा करते थे (पृ. 249)।
सनातन गोस्वामी की कुटिया पर आँसू #
और भी बहुत-से स्थान दिखाने के बाद वे बड़े आनन्द से फिर नन्दीश्वर लौट आए। राघव ने श्रीनिवास को नन्द और उनके परिवार के जीवन के बारे में थोड़ा-सा बताया, और फिर पावन-सरोवर के पास रुक गए, जहाँ सनातन गोस्वामी रहे थे:
सनातन गोस्वामिर कुटीर दर्शने । हैला अधैर्य अश्रु झरये नयने
राघव पण्डित कहे श्रीनिवास प्रति । कहि किछु यैछे गोस्वामिर एथा स्थिति
"सनातन गोस्वामी की कुटिया देखकर वे अधीर हो गए और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। राघव पण्डित ने श्रीनिवास से कहा, ‘मैं तुम्हें थोड़ा बताता हूँ कि गोस्वामी यहाँ कैसे रहते थे।’" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 250, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
ग्रन्थ यह नहीं बताता कि कौन रोया था। पर अगली ही पंक्ति में राघव बोल रहे हैं, इसलिए सबसे अधिक सम्भावना यही है कि ये आँसू राघव के ही थे। राघव ने बताया कि सनातन वृन्दावन से इस एकान्त वन में आए थे और यहाँ छिपकर रहते थे। वे कृष्ण में इतने डूबे रहते थे कि भोजन पाने का कोई प्रयास नहीं करते थे। तब कृष्ण एक ग्वाल-बालक के रूप में उनके पास आए। उनके सिर पर पगड़ी थी और हाथों में दूध का एक पात्र था। बालक ने कहा, "तुम एकान्त में रहते हो और तुम्हें कोई नहीं जानता। यह दूध पी लो; पात्र मैं बाद में ले जाऊँगा। यदि तुम ऐसे ही रहोगे, तो व्रजवासियों को दुःख होगा।" सनातन ने दूध पिया और प्रेम से विह्वल हो गए। फिर प्रभु ने व्रज के लोगों से उनके लिए एक कुटिया बनवा दी (पृ. 250-251)। राघव ने यह भी बताया कि एक बार श्रीमती राधारानी एक ग्वाल-बाला के वेश में रूप गोस्वामी के पास खीर की सामग्री लेकर आईं, ताकि रूप सनातन को खीर खिला सकें। फिर उन्होंने बताया कि रूप का हृदय विरह की आग में जलता रहता था, पर बाहर कुछ भी दिखाई नहीं देता था। वह आग ऐसी थी कि उनकी साँस छू जाने से एक अन्य भक्त के शरीर पर छाले पड़ गए (पृ. 251-252)।
इसके बाद राघव सनातन की कुटिया पर गए। वहाँ उनकी भेंट गोपाल मिश्र से हुई, जो अच्छे चरित्र वाले एक ब्राह्मण थे। वे सनातन गोस्वामी के कुल-पुरोहित के पुत्र थे और स्वयं सनातन के शिष्य थे। उनके साथ उद्धव दास, माधव, गोपाल दास और दूसरे भक्त भी थे। सब लोग बड़े आनन्द से एक-दूसरे से मिले, व्रजवासी तुरन्त भोजन ले आए, और "उस दिन वहाँ एक बड़ा उत्सव हुआ" (पृ. 252)। 1912 के संस्करण में कोष्ठक में छपी एक पंक्ति यह भी बताती है कि सबने वह रात नाम-संकीर्तन में, अर्थात् मिलकर भगवान के पवित्र नाम गाते हुए, बिताई। नरहरि लिखते हैं: "जो कोई ऐसी अद्भुत कथा सुनता है, उसे शीघ्र ही कृष्ण-प्रेम का धन मिल जाता है।" भोर होने पर राघव ने विदा ली और उन दोनों को लेकर फिर परिक्रमा के मार्ग पर चल पड़े।
बैठान और शेषशायी #
रास्ते में पहला गाँव बैठान था। राघव ने बताया कि यहाँ सनातन "व्रजवासियों के प्रेम में बँधकर" रहे थे (पृ. 252-253)। फिर उन्होंने ग्रन्थ की सबसे प्रेम-भरी कथाओं में से एक सुनाई। सनातन व्रज के लोगों को अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करते थे। जब वे किसी गाँव से आगे बढ़ते, तो छोटे-बड़े सब रोते हुए उनके पीछे दौड़ पड़ते। तब सनातन सान्त्वना के शब्द कहकर, स्वयं भी आँसू बहाते हुए, उन्हें घर लौटा देते। और अगले गाँव के लोग उन्हें दूर से आते देखकर पुकार उठते, "देखो, रूप-सनातन!" वे उन्हें एक वृक्ष के नीचे बिठाकर दही, दूध और मक्खन खिलाते। सनातन हर परिवार से उनके बच्चों, उनकी गायों, उनकी फ़सलों और उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछते, और उनकी कठिनाइयाँ सुनकर दुःखी होते (पृ. 253-255)।
आगे चलकर वे शेषशायी पहुँचे। यह उन भगवान का मन्दिर है, जो शेषनाग पर शयन करते हैं (पृ. 257)। राघव ने बताया कि यहाँ श्री कृष्ण-चैतन्य इस विग्रह के दर्शन करने आए थे, और प्रेम में अधीर हो गए थे। जिन भाग्यशाली लोगों ने उनका तेज देखा, वे आनन्द से रो पड़े, और कुछ लोग बोले, "यह सन्न्यासी स्वयं यही शेषशायी भगवान हैं।" फिर राघव ने अपनी ओर से यह बात जोड़ी:
अहे श्रीनिवास प्रभु चरित्र अपार । प्रभु जानाइले से पारये जानिबार
"हे श्रीनिवास, प्रभु के चरित्र का कोई अन्त नहीं है। उसे वही जान सकता है, जिसे प्रभु स्वयं जनाएँ।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 257, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
ये शब्द एक शिक्षा भी हैं, और राघव की विनम्रता की एक झलक भी। महाप्रभु का जीवन उनकी कृपा से ही जाना जाता है, उन्हीं के द्वारा, जिन पर वे उसे प्रकट करते हैं। राघव कभी यह दावा नहीं करते कि जो कुछ वे बता रहे हैं, वह उन्होंने अपनी आँखों से देखा है। मथुरा में उन्होंने साफ़ कहा था कि ऐसी कथा उन्होंने "बड़े-बुज़ुर्गों के मुख से" सुनी है (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 165)।
यमुना के किनारे-किनारे नन्द-घाट तक #
यमुना के तट पर राम-घाट में राघव ने बताया कि वहाँ बलराम ने रास-नृत्य किया था, और यह भी कि नित्यानन्द, जो स्वयं बलराम हैं, अपनी तीर्थ-यात्रा में वहाँ ठहरे थे (पृ. 266-267)। नित्यानन्द सदा ग्वाल-बालों के साथ खेल में डूबे रहते थे, और दही, दूध, कन्द-मूल और फल खाकर रहते थे। बलदेव के भाव में वे स्वयं को छिपा नहीं पाते थे, और लोग कहते थे, "ये तो वही रोहिणी के पुत्र हैं, जो अवधूत के वेश में व्रज में घूम रहे हैं।" राघव ने उन्हें शाकट नाम का एक वृक्ष दिखाया और बताया कि वह नित्यानन्द की दातुन से उगा था। उसी वृक्ष के नीचे धूल की एक छोटी-सी वेदी पर लेटे हुए नित्यानन्द बार-बार पूछते थे, "नवद्वीप के नाथ कब प्रकट होंगे?" इसके बाद, जैसा ग्रन्थ कहता है, "पण्डित धीरे-धीरे आगे चले; वन की शोभा देखकर वे धैर्य न रख सके" (पृ. 267)। फिर वे भाण्डीर की ओर चले, जिसे लोग "अब अक्षय-वट कहते हैं"। उस मार्ग पर उन्होंने श्रीनिवास से "बड़े स्नेह से, बहुत मीठे शब्दों में" बात की। थोड़ा आगे एक ऐसा दृश्य आता है, जिससे पता चलता है कि वे उन दोनों का मार्गदर्शन कैसे करते थे:
एत कहि कृष्ण-कुण्ड-टीलाय चडिया । चतुर्दिके चाहे महा प्रफुल्लित हैया
… एत कहि कौतुके नामिया टीला हैते । श्रीनिवास प्रति कहे परम स्नेहेते
"इतना कहकर वे कृष्ण-कुण्ड के टीले पर चढ़ गए और बहुत प्रसन्न होकर चारों ओर देखने लगे। ... फिर इतना कहकर वे खेल-खेल में टीले से नीचे उतरे और बड़े स्नेह से श्रीनिवास से बोले।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 271, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
वापस नन्द-घाट पहुँचकर राघव ने कहा, "यहाँ, इस एकान्त स्थान में, श्री जीव बिलकुल अज्ञात रूप से रहे थे," और फिर पूरी कथा सुनाई (पृ. 271-274)। एक बार विद्वान वल्लभ भट्ट ने रूप गोस्वामी के ग्रन्थ भक्ति-रसामृत-सिन्धु के आरम्भिक श्लोक को सुधारने का प्रस्ताव रखा। तब युवा जीव उनके पीछे-पीछे यमुना तक गए और उनकी सब आपत्तियों का उत्तर दे दिया। इस पर रूप ने जीव को तब तक के लिए दूर भेज दिया, जब तक उनका मन स्थिर न हो जाए। तब जीव इस एकान्त वन में आ गए। वे पत्तों की एक कुटिया में रहते थे, प्रायः उपवास करते थे, और उनके मन में केवल प्रभु के चरण-कमलों की लालसा थी। अन्त में सनातन ने गाँव वालों से उनके बारे में सुना, उन्हें खोज निकाला, और रूप से कहकर उन्हें वापस बुलवाया। राघव ने कहा, "हे श्रीनिवास, यह उनकी कुटिया है।" वे दोनों युवकों को उन्हीं आचार्य की कुटिया दिखा रहे थे, जिन्होंने उन्हें इस यात्रा पर भेजा था। फिर वे यमुना पार करके सुरुखुरु गाँव गए और उस दिन वहीं ठहरे (पृ. 274)।
महावन, रावल और फिर मथुरा #
वनों की यात्रा का अन्तिम भाग उन्हें यमुना के दूसरे किनारे पर ले गया। महावन और रावल होते हुए वे घूमकर फिर मथुरा आ पहुँचे, जहाँ से यह यात्रा आरम्भ हुई थी।

राघव ने उन्हें भद्रवन, भाण्डीरवन और बिल्ववन दिखाए, और फिर लोहवन: "लोहवन में भगवान कृष्ण गायें चराया करते थे। लोहजंघ नाम का असुर इसी स्थान पर मारा गया था" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.67, तात्पर्य)। ग्रन्थ कहता है कि महावन में "श्री पण्डित ने प्रेम के आवेश में" दोनों से कोमल स्वर में बात की (पृ. 277), और उनके ये शब्द श्रील प्रभुपाद भी उद्धृत करते हैं:
देख नन्द-यशोदा-आलय महावने
एइ देख श्री-कृष्ण-चन्द्रेर जन्म स्थल
श्री-गोकुल, महावन — दुइ ‘एक’ हय
"“महावन में नन्द और यशोदा का घर देखो। भगवान कृष्ण का जन्म-स्थान देखो। महावन और गोकुल, जहाँ कृष्ण का बचपन बीता, एक ही हैं।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.67, तात्पर्य)
फिर उन्होंने बताया कि कृष्ण के जन्मोत्सव का स्थान देखकर महाप्रभु कैसे नाचने और गाने में डूब गए, और लोग चारों ओर से "हरि! हरि!" पुकारते हुए दौड़ पड़े। उन्होंने यह भी बताया कि मदन-गोपाल विग्रह के दर्शन करके महाप्रभु कैसे अधीर हो उठे। उन्होंने महावन में वह स्थान भी दिखाया, जहाँ सनातन गोस्वामी रहे थे। वहाँ के लोग उनसे इतना प्रेम करते थे कि "सनातन को देखते ही उन्हें लगता, मानो उनके प्राण लौट आए हों" (पृ. 283)। रावल श्रीमती राधारानी की बाल-लीलाओं का स्थान है। वहाँ उन्होंने बताया कि गौरचन्द्र गोकुल से यहाँ आए थे, और लोग उनके मुख की शोभा को आँखों से पीते हुए कहने लगे, "ये निश्चय ही कृष्ण हैं" (पृ. 286-287)। उस रात वे रावल में ही ठहरे:
ऐछे कत कहि' रात्रि रावले रहिल । कृष्ण-कथा-रसे निशी प्रभात हैल
श्री-राघव श्रीनिवास नरोत्तम सने । ये प्रेमे निमग्न ता वर्णिब कोन जने
"ऐसी बहुत-सी बातें करते हुए वे रात में रावल में ठहरे, और कृष्ण-कथा के रस में पूरी रात बीत गई और सवेरा हो गया। श्रीनिवास और नरोत्तम के साथ श्री राघव जिस प्रेम में डूबे थे, उसका वर्णन कौन कर सकता है?" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 287, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
सवेरे वे यमुना पार करके मथुरा आ गए। वहाँ राघव ने श्रीनिवास को उग्रसेन, वसुदेव और कंस के घर दिखाए। उन्होंने वह कारागार भी दिखाया, जहाँ वसुदेव बन्दी रखे गए थे, और वह मार्ग भी, जिससे वसुदेव नवजात कृष्ण को गोकुल ले गए थे। उन्होंने हर बात बहुत विस्तार से समझाई। फिर सबने आनन्द से विश्राम-तीर्थ में स्नान किया और आगे अम्बिका-वन गए। वहाँ राघव ने "दोनों से धीरे-धीरे कहा" कि कैसे एक बार इसी स्थान पर नन्द महाराज को एक सर्प ने पकड़ लिया था (पृ. 287-288)। वहाँ से मार्ग अक्रूर और वृन्दावन की ओर गया, जहाँ राघव ने अपनी अन्तिम शिक्षाएँ दीं। इसका वर्णन वृन्दावन में अन्तिम शिक्षाएँ और विदाई में है।
पवित्र स्थानों पर कथा-श्रवण #
इन सब वनों की यात्रा में राघव ने श्रीनिवास और नरोत्तम को जो सबसे बड़ा उपहार दिया, वह केवल पवित्र स्थानों का दर्शन नहीं था, बल्कि श्रवण था: वे कथाएँ और श्लोक, जिनके सहारे वे हर स्थान को समझ और प्रेम के साथ देख सके। भगवान कृष्ण भगवद्गीता में सिखाते हैं कि सच्चा ज्ञान ठीक इसी तरह मिलता है:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
"आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो। विनम्र होकर उनसे प्रश्न करो और उनकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त महात्मा तुम्हें ज्ञान दे सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है।" (भगवद्गीता 4.34)
सदियों बाद श्रील प्रभुपाद ने भी यही भाव दिखाया। एक बार उन्होंने गौड़ीय मठ की एक परिक्रमा-मण्डली को याद किया, जिसे देखने वे अपनी दीक्षा से पहले गए थे। एक शाम घोषणा हुई कि तीर्थयात्री परिक्रमा के लिए निकलेंगे, और उनके गुरु श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर भी प्रवचन देंगे, इसलिए जो चाहे, वह रुककर उन्हें सुन सकता है। लगभग एक दर्जन लोग रुके और बाकी सब चले गए। श्रील प्रभुपाद रुक गए: "मैंने परिक्रमा में जाने की अपेक्षा उनकी बात सुनना अधिक पसन्द किया।" (प्रातः भ्रमण, मायापुर, 10 फ़रवरी 1976) उन्होंने बताया कि उनके गुरुदेव ने इसकी बहुत सराहना की।
शेषशायी में राघव ने यही सिखाया था: प्रभु का जीवन तभी जाना जाता है, जब वे स्वयं उसे जनाते हैं, और वे उसे उन लोगों के द्वारा जनाते हैं, जो उनकी कथा कहते हैं। इस यात्रा में श्रीनिवास ने जो सुना, उसे वे कभी नहीं भूले। वर्षों बाद नवद्वीप में उन्होंने कहा कि "श्री राघव के साथ" व्रज में भ्रमण करने से उनके मन में नदिया में भी इसी प्रकार भ्रमण करने की इच्छा जागी थी (भक्ति-रत्नाकर, द्वादश तरंग, पृ. 716)।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (9)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.55, purport ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 248 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.63, purport ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 250 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 257 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 271 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.67, purport ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 287 (1912 ed.)
- Bhagavad-gita 4.34 ऊपर देखें ↑
अध्याय 6
वृन्दावन में अन्तिम शिक्षाएँ और विदाई
अक्रूर, भोजन-टीला और अद्वैत-वट पर राघव ने वृन्दावन, गोविन्द और गुरु-परम्परा की शिक्षा दी; फिर श्रीनिवास और नरोत्तम से उनकी आँसुओं भरी विदाई हुई।

श्रील राघव पण्डित गोस्वामी ने श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर के साथ व्रज की जो परिक्रमा की थी, वह अब पूरी होने को थी। श्रील जीव गोस्वामी ने इन दोनों युवा भक्तों को राघव की देखरेख में सौंपा था (जीव गोस्वामी ने श्रीनिवास और नरोत्तम को उन्हें सौंपा), और तीनों साथ-साथ व्रज-मण्डल के वनों में घूमे थे (व्रज के वनों में)। अब वे यमुना पार करके वापस मथुरा आए, विश्राम-तीर्थ में स्नान किया और वृन्दावन की ओर चल पड़े (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 287-288)। भक्ति-रत्नाकर यह नहीं बताता कि पूरी परिक्रमा में कितना समय लगा।
इन अन्तिम दिनों में राघव ने अपनी कुछ सबसे गहरी शिक्षाएँ दीं। फिर विदाई का समय आया। भक्ति-रत्नाकर में राघव का इससे अधिक कोमल दृश्य और कोई नहीं है।
अक्रूर से भोजन-टीला तक #
रास्ते में वे अक्रूर-तीर्थ पहुँचे। यह गाँव अक्रूर के नाम पर है, जो श्री कृष्ण और बलराम को रथ में बिठाकर व्रज से मथुरा ले गए थे। यहाँ राघव ने श्रीनिवास को बताया कि श्री चैतन्य महाप्रभु एक समय इसी शान्त स्थान पर रहे थे। श्रील प्रभुपाद चैतन्य-चरितामृत के एक तात्पर्य में राघव के ये शब्द उद्धृत करते हैं:
देख, श्रीनिवास, एइ अक्रूर ग्रामेते
श्री-कृष्ण-चैतन्य-प्रभु छिलेन निभृते
"“श्रीनिवास, अक्रूर के इस गाँव को देखो। यहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु एकान्त स्थान में रहे थे।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.70, तात्पर्य)
श्रील प्रभुपाद वक्ता का नाम नहीं लेते, पर भक्ति-रत्नाकर में ये राघव के ही शब्द हैं। 1912 के छपे संस्करण में यह पंक्ति "देख, श्रीनिवास" ("देखो, श्रीनिवास") से नहीं, बल्कि "अहे श्रीनिवास" ("हे श्रीनिवास") से आरम्भ होती है (पंचम तरंग, पृ. 289)। राघव ने यह भी बताया कि वृन्दावन में लोगों की भीड़ के कारण प्रभु यहाँ आकर प्रसन्न मन से भोजन किया करते थे। फिर उन्होंने पूछा, "उनके मन को कौन समझ सकता है?" परिक्रमा में हर जगह की तरह यहाँ भी वे प्रभु की लीलाओं को इतिहास के रूप में सुनाते हैं, और कभी नहीं कहते कि उन्होंने उन्हें स्वयं देखा था।
थोड़ा आगे भोजन-टीला नाम का एक टीला आया, जहाँ कभी मुनियों की पत्नियों ने कृष्ण को भोजन कराया था। वहाँ राघव रुक गए और श्रीनिवास को समझाने लगे कि वृन्दावन वास्तव में क्या है। शास्त्रों से एक के बाद एक श्लोक सुनाते हुए उन्होंने बताया कि यह वन स्वयं कृष्ण का शरीर है, और कृष्ण इसे कभी नहीं छोड़ते। उन्होंने यह भी बताया कि वृन्दावन में रहने वाला हर जीव, चाहे वह पशु हो, पक्षी हो, वृक्ष हो, कीड़ा हो या मनुष्य, अन्त में कृष्ण के धाम को प्राप्त करता है। पर यह वृन्दावन साधारण आँखों से छिपा रहता है (पृ. 290-301):
अहे श्रीनिवास सर्व शास्त्रे निरूपण । कृष्णेर परम प्रिय धाम वृन्दावन
… तेजोमय वृन्दावन अति मनोहर । प्रेम-नेत्र विना चर्म-चक्षु अगोचर
"हे श्रीनिवास, सब शास्त्र यही बताते हैं: वृन्दावन कृष्ण का परम प्रिय धाम है। ... वृन्दावन दिव्य प्रकाश से भरा हुआ और अत्यन्त मनोहर है, पर प्रेम के नेत्रों के बिना यह चमड़े की आँखों से दिखाई नहीं देता।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 291, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
गोविन्द के साक्षात् दर्शन #
वृन्दावन के बारे में बताने के बाद राघव उसके स्वामी, श्री गोविन्ददेव, के बारे में बोलने लगे। उन्होंने कहा कि गोविन्द कृष्ण के बदले रखी गई कोई मूर्ति नहीं हैं; वे स्वयं कृष्ण हैं (पृ. 293)।

श्री-गोविन्द-देव साक्षात् व्रजेन्द्र-तनय । विग्रहेर न्याय लीला करे इच्छामय
प्रापञ्चिक लोक देखे प्रतिमा आकार । स्वजन देखये श्री-गोविन्द साक्षात्कार
"श्री गोविन्ददेव साक्षात् व्रजराज के पुत्र हैं। जो चाहें वही करने वाले भगवान विग्रह के रूप में लीला करते हैं। सांसारिक लोग उनमें एक मूर्ति का आकार देखते हैं; उनके अपने भक्त श्री गोविन्द के साक्षात् दर्शन करते हैं।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 293, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
यही सत्य श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी सिखाया था। उन्होंने रघुनाथ दास गोस्वामी को, जिनके साथ राघव समय-समय पर रहते थे, गोवर्धन पर्वत की एक शिला दी थी:
प्रभु कहे, — “एइ शिला कृष्णेर विग्रह
इँहार सेवा कर तुमि करिया आग्रह
"“श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ दास को आदेश दिया, ‘यह शिला भगवान कृष्ण का दिव्य स्वरूप है। तुम बड़ी लगन से इस शिला की सेवा करो।’”" (श्री चैतन्य-चरितामृत अन्त्य 6.294)
चैतन्य-चरितामृत आगे बताता है कि उस शिला की पूजा करते हुए रघुनाथ दास ने "नन्द महाराज के पुत्र, परम भगवान कृष्ण को उस शिला में साक्षात् देखा" (अन्त्य 6.300)। भगवान नहीं बदलते; बदलती है केवल देखने वाले की आँख। भक्ति-रत्नाकर बताता है कि यह शिक्षा पूरी करके राघव प्रसन्न मन से भोजन-टीला से धीरे-धीरे आगे चल पड़े (पृ. 301)।
अद्वैत-वट पर गुरु-परम्परा #
वृन्दावन का रास्ता कालिय-ह्रद और प्रस्कन्दन से होकर जाता था। स्वयं महाप्रभु भी अक्रूर-तीर्थ से इन स्थानों पर स्नान करने गए थे (चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.71)। उस श्लोक के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद भक्ति-रत्नाकर की ये पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं:
ए कालीय-तीर्थ पाप विनाशय
कालीय-तीर्थ-स्थाने बहु-कार्य-सिद्धि हय
"“कालिय-ह्रद में स्नान करने से मनुष्य सब पापों के फल से मुक्त हो जाता है। कालिय-ह्रद में स्नान करके मनुष्य अपने कामों में भी सफल हो सकता है।”" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 18.71, तात्पर्य)
कालिय-ह्रद के पास द्वादशादित्य-टीला पर राघव ने बताया कि सनातन गोस्वामी महाप्रभु के आदेश से उस एकान्त स्थान पर रहे थे। उन्होंने यह भी बताया कि सनातन को चिन्तित देखकर महाप्रभु ने वहीं स्वप्न में उन्हें दर्शन दिए और गले लगा लिया (पृ. 303)।
अद्वैत-वट नाम के बरगद के पेड़ के पास राघव "प्रेम के आवेश में" बोले (पृ. 304)। उन्होंने अद्वैत आचार्य का जीवन सुनाया, जिन्होंने उसी पेड़ के नीचे कृष्ण की आराधना की थी। फिर उन्होंने महाप्रभु, अर्थात् श्री गौरसुन्दर, का जीवन सुनाया और कहा कि वे स्वयं कृष्ण हैं, व्रजराज के पुत्र। आगे वे उस प्रसंग पर आए, जब प्रभु ने ईश्वर पुरी से दीक्षा ली, अर्थात् उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार करके उनसे मन्त्र ग्रहण किया। यहाँ उन्होंने स्वयं ही एक प्रश्न उठाया: यदि प्रभु सारे जगत के गुरु हैं, तो उनका कोई गुरु कैसे हो सकता है? उत्तर भी उन्होंने स्वयं दिया: "लोगों को शिक्षा देने के लिए।" प्रभु धर्म की स्थापना करने के लिए स्वयं धर्म का आचरण करते हैं। इसीलिए उन्होंने माध्व सम्प्रदाय को, अर्थात् मध्वाचार्य की गुरु-शिष्य परम्परा को, गौरवशाली बना दिया। फिर राघव ने यह नियम बताया:
सम्प्रदा-निविष्ट हैले कार्य-सिद्धि हय । अन्यत्र दीक्षिते मन्त्र निष्फल निश्चय
श्री माध्व रुद्र सनक सम्प्रदाय चारि । कलिते विदित कहे पुराणे विस्तारि'
"जो किसी सम्प्रदाय में स्थित होता है, वही लक्ष्य तक पहुँचता है; सम्प्रदाय के बाहर ली गई दीक्षा का मन्त्र निश्चय ही निष्फल होता है। कलियुग में चार सम्प्रदाय प्रसिद्ध हैं: श्री, माध्व, रुद्र और सनक; पुराण इनका विस्तार से वर्णन करते हैं।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 308, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
भक्ति-रत्नाकर इस बात के प्रमाण में पद्म पुराण का एक श्लोक देता है। इसी श्लोक को समझाते हुए श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: "पद्म पुराण में भी कहा गया है, सम्प्रदाय-विहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मताः। चार सम्प्रदाय, अर्थात् गुरु-शिष्य परम्पराएँ हैं: ब्रह्म सम्प्रदाय, रुद्र सम्प्रदाय, श्री सम्प्रदाय और कुमार सम्प्रदाय। यदि कोई आध्यात्मिक शक्ति में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे इन्हीं प्रामाणिक सम्प्रदायों में से किसी एक से अपने मन्त्र प्राप्त करने चाहिए; अन्यथा वह आध्यात्मिक जीवन में कभी सफलतापूर्वक आगे नहीं बढ़ पाएगा।" (श्रीमद्भागवत 6.8.42, तात्पर्य)
इसलिए गुरु स्वयं को गुरु नहीं बनाता; उसका अधिकार परम्परा से आता है। वह केवल वही आगे देता है, जो उसे मिला है। इसके बाद राघव ने माध्व परम्परा के बीस नाम एक-एक करके, संख्या देते हुए, सुनाए। यह सूची नारायण, भगवान ब्रह्मा, नारद मुनि और व्यासदेव से आरम्भ होती है। फिर यह स्वयं मध्वाचार्य से होकर लक्ष्मीपति तीर्थ, माधवेन्द्र पुरी और ईश्वर पुरी तक आती है, और इन शब्दों पर पूरी होती है: "उनके शिष्य प्रभु गौरचन्द्र भगवान" (पृ. 310-311)। राघव ने कवि कर्णपुर की गौर-गणोद्देश-दीपिका से भी इसकी पुष्टि की। राघव के दोनों श्रोताओं ने इसी सम्प्रदाय में दीक्षा ली थी: श्रीनिवास ने गोपाल भट्ट गोस्वामी से, और नरोत्तम ने लोकनाथ गोस्वामी से। यही गुरु-परम्परा आगे श्रील प्रभुपाद तक आती है।
व्रज के बारे में उनकी अन्तिम शिक्षा #
इमली-तला पर राघव ने इमली का वह पेड़ दिखाया, जिसके नीचे महाप्रभु बैठा करते थे और अपने ही आनन्द के आँसुओं में बहते रहते थे। शृंगार-वट पर उन्होंने नित्यानन्द प्रभु का जीवन सुनाया। इसके बाद निधुवन, केशी-घाट, धीर-समीर और वंशीवट आए (पृ. 317-327)। वहाँ से आगे, रास-स्थली पर और एक कुंज से दूसरे कुंज तक, भक्ति-रत्नाकर राघव के मुख से अपना एक लम्बा प्रवचन कहलवाता है। इसमें रास-नृत्य का, संगीत और नृत्य का, तथा रस के नायकों और नायिकाओं का वर्णन है। यह प्रवचन लगभग एक सौ बीस छपे पृष्ठों में फैला है (पृ. 325-450)। ग्रन्थ के लेखक नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर स्वयं संगीतज्ञ थे, और यह विद्या निश्चय ही उनकी अपनी है; पर ग्रन्थ इसे श्रीनिवास को दी गई राघव की शिक्षा के रूप में प्रस्तुत करता है।
अन्त में ब्रह्म-कुण्ड और गोविन्दस्वामी-तीर्थ के पास राघव ने संक्षेप में बताया कि भक्त के मन में व्रज के प्रति कैसा भाव होना चाहिए। अपनी हर बात के प्रमाण में उन्होंने रघुनाथ दास गोस्वामी के व्रज-विलास-स्तव का एक श्लोक सुनाया:
ओहे श्रीनिवास भक्त सदा सम्प्रार्थये । अन्य प्रसङ्गेओ येन व्रजे वास हये
व्रज-भूमे वैसे ये से कृष्ण-प्रिय हन । ता सबारे वन्दे नित्य भाग्यवन्त-गण
व्रज-स्थित तृण-गुल्म कीटादिक यत । से सबे प्रणमे भाग्यवन्त अविरत
"हे श्रीनिवास, भक्त सदा यही प्रार्थना करता है कि किसी भी कारण से सही, उसे व्रज में रहने को मिल जाए। जो कोई व्रज-भूमि में रहता है, वह कृष्ण को प्रिय है; भाग्यशाली लोग सदा उन सबकी वन्दना करते हैं। व्रज में रहने वाली घास, झाड़ियाँ, कीड़े-मकोड़े और दूसरे सब जीवों को भी भाग्यशाली लोग बार-बार प्रणाम करते हैं।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 449, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
उन्होंने आगे कहा कि कुछ भक्त आँखों में आँसू भरकर राधा और कृष्ण के नाम पुकारते हैं, और चाहते हैं कि उन्हीं आँसुओं से कृष्ण के लीला-स्थानों को सींचें (पृ. 450)। ये शब्द राघव के अपने जीवन पर ठीक बैठते हैं। भक्ति-रत्नाकर ने उनका वर्णन ऐसा ही किया था: व्रज की धूल से धूसर, और अपने आँसुओं में बहते हुए। यह गोवर्धन में दक्षिण के एक ब्राह्मण में बताया गया है।
श्रीनिवास और नरोत्तम से विदाई #
फिर राघव उन दो युवकों की ओर मुड़े, जो पूरे व्रज में उनके साथ-साथ चले थे, और उन्होंने अपने हृदय की बात कही:
ओहे श्रीनिवास वृन्दावनेर माधुरी । मने अभिलाष सदा राखि नेत्रे भरि'
तोमा दोँहा लैया महा आनन्दे भ्रमिनु । पुन ना ह-इबे हेन मने विचारिनु
जन्मे जन्मे तुमि दुइ प्रभुर किङ्कर । एत कहि' पण्डितेर अधैर्य अन्तर
"‘हे श्रीनिवास, मेरे मन की एक ही अभिलाषा है कि वृन्दावन की मधुरता को सदा अपनी आँखों में भरकर रखूँ। तुम दोनों को साथ लेकर मैं बड़े आनन्द से घूमा हूँ, और मेरे मन में ऐसा लगता है कि अब फिर ऐसा नहीं होगा। जन्म-जन्म तक तुम दोनों प्रभु के सेवक हो।’ इतना कहते ही पण्डित का हृदय अधीर हो उठा।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 450, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
नरोत्तम और श्रीनिवास आँसुओं में बहने लगे, और उनका सारा धैर्य छूट गया।
पण्डितेर पद-तले पडे लोटाइया । पण्डित नयन-जले सिञ्चे कोले लैया
"वे दोनों पण्डित के चरणों में लोटने लगे, और पण्डित ने उन्हें गोद में लेकर अपने आँसुओं से नहला दिया।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 451, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
तीनों किसी एकान्त स्थान पर साथ बैठ गए। वे राधा-कृष्ण और श्री चैतन्य के चरित्र का गान करते रहे, यहाँ तक कि उन्हें बाहर की कोई सुध न रही। वृन्दावन की भूमि को बार-बार प्रणाम करते हुए उन्होंने ऐसी प्रार्थनाएँ कीं, जिन्हें ग्रन्थ के अनुसार शब्दों में कहा नहीं जा सकता। कुछ समय बाद ही वे फिर से सँभल पाए (पृ. 451)।
जीव गोस्वामी के पास, और फिर गोवर्धन #
इसके बाद तीनों श्री गोविन्ददेव के दर्शन करने गए। मन्दिर में श्री कृष्ण पण्डित ने बड़े आनन्द से उन्हें गोविन्द की माला और प्रसाद दिया, और राघव ने कृष्ण पण्डित को पूरी यात्रा का विवरण क्रम से सुनाया। वहाँ से वे जल्दी-जल्दी जीव गोस्वामी के निवास-स्थान पर गए, और उन्हें देखकर जीव गोस्वामी बहुत आनन्दित हुए (पृ. 451-452)।

श्री-राघव-पण्डित गोस्वामी श्री-जीवेरे । कहिल सकल शुनि' उल्लास अन्तरे
दुइ एक दिवस रहिया वृन्दावने । राघव-पण्डित शीघ्र गेला गोवर्धने
"श्री राघव पण्डित गोस्वामी ने श्री जीव को सब कुछ सुनाया, और सुनकर जीव का हृदय आनन्द से भर गया। एक-दो दिन वृन्दावन में रहकर राघव पण्डित जल्दी ही गोवर्धन लौट गए।" (भक्ति-रत्नाकर, पंचम तरंग, पृ. 452, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
जीव गोस्वामी ने ही इन दोनों युवकों को राघव की देखरेख में सौंपा था, इसलिए राघव ने जीव गोस्वामी को सारा हाल सुनाया। फिर केवल एक-दो दिन बाद वे जल्दी ही अपने घर गोवर्धन लौट गए। भक्ति-रत्नाकर इसी पर्वत को राघव का "सर्वस्व" कहता है (पृ. 150), जैसा कि गोवर्धन की परिक्रमा और उनकी अपनी गुफा में बताया गया है।
श्रीनिवास ने उन्हें कैसे याद रखा #
भक्ति-रत्नाकर एक बार और, आखिरी बार, राघव को इन दोनों भक्तों के साथ दिखाता है। जब श्रीनिवास गोस्वामियों के ग्रन्थ बंगाल ले जाने वाले थे, जैसा कि श्रीनिवास की अपनी जीवनी में बताया गया है, तब व्रज के महान वैष्णव गोविन्द के मन्दिर में इकट्ठे हुए। भक्ति-रत्नाकर उनमें राघव का नाम भी लेता है (षष्ठ तरंग, पृ. 486):
प्रेमी कृष्णदास कृष्णदास ब्रह्मचारी । राघव-पण्डित प्रेम-भक्ति अधिकारी
"... प्रेमी कृष्णदास, कृष्णदास ब्रह्मचारी, और प्रेम-भक्ति के अधिकारी राघव पण्डित ..." (भक्ति-रत्नाकर, षष्ठ तरंग, पृ. 486, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
गोस्वामियों के ये ग्रन्थ एक गाड़ी पर लादे गए, और जीव गोस्वामी तथा कुछ अन्य लोग गाड़ी के साथ मथुरा तक गए। वहाँ सबने वह दिन और रात कृष्ण-कथा में, अर्थात् कृष्ण की चर्चा में, बिताई। अगली सुबह विदाई के समय जो वैष्णव अपना दुःख नहीं रोक पाए, उनमें भक्ति-रत्नाकर कृष्णदास कविराज गोस्वामी के साथ राघव का नाम भी लेता है:
कृष्णदास कविराज पण्डित राघव । श्री-गोपाल माधवादि यतेक वैष्णव
सकले अधैर्य हैला विदायेर काले । श्रीनिवास आदि सिक्त हैला नेत्र-जले
"कृष्णदास कविराज, पण्डित राघव, श्री गोपाल, माधव और दूसरे सब वैष्णव विदाई के समय अधीर हो गए, और श्रीनिवास आदि आँसुओं से भीग गए।" (भक्ति-रत्नाकर, षष्ठ तरंग, पृ. 487, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
श्रीनिवास उस परिक्रमा को कभी नहीं भूले। बहुत समय बाद, जब वे नरोत्तम और रामचन्द्र कविराज के साथ नवद्वीप गए, तब उन्होंने संकोच के साथ महाप्रभु के पुराने सेवक ईशान ठाकुर को अपनी इच्छा बताई (द्वादश तरंग, पृ. 716):
श्री-राघव सङ्गे व्रजे भ्रमण करिते । मने हैल नदीया भ्रमिब एइ मते
"‘श्री राघव के साथ व्रज में भ्रमण करते समय मेरे मन में आया कि नदिया में भी इसी प्रकार भ्रमण करूँगा।’" (भक्ति-रत्नाकर, द्वादश तरंग, पृ. 716, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
ईशान ठाकुर ने उत्तर दिया, "तुमने मन में जो सोचा है, उसे श्री गौरसुन्दर पूरा करेंगे।" उसी यात्रा में एक रात श्रीनिवास महाप्रभु के घर के आँगन में सोए हुए थे। सपने में उन्होंने देखा कि श्री गौरसुन्दर अपने भक्तों के बीच शोभा पा रहे हैं। उन भक्तों में उन्होंने राघव को भी देखा, और भक्ति-रत्नाकर उनकी पहचान उनके निवास-स्थान से कराता है (पृ. 999):
भूगर्भ श्री-लोकनाथ रघुनाथ-दास । राघव-पण्डित गोवर्धने यार वास
"... भूगर्भ, श्री लोकनाथ, रघुनाथ दास, और राघव पण्डित, जिनका निवास गोवर्धन में है।" (भक्ति-रत्नाकर, द्वादश तरंग, पृ. 999, 1912 का बांग्ला संस्करण; हिन्दी अनुवाद हमारा)
यह स्वप्न प्रभु की नित्य सभा का दर्शन था, जिसमें जीव गोस्वामी और बाद की पीढ़ी के दूसरे भक्त भी दिखाई देते हैं। इसलिए इससे इस संसार में महाप्रभु से राघव की किसी भेंट के बारे में कुछ पता नहीं चलता। पर इससे यह अवश्य दिखता है कि भक्ति-रत्नाकर उन्हें कौन-सा स्थान देता है: प्रभु के अपने भक्तों के बीच।
जन्म-जन्म तक प्रभु के सेवक #
दोनों युवकों से विदाई के समय राघव की बात एक आशीर्वाद पर आकर पूरी हुई: "जन्म-जन्म तक तुम दोनों प्रभु के सेवक हो।" यही हर जीव का सत्य है, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को सिखाया था:
जीवेर ‘स्वरूप’ हय — कृष्णेर ‘नित्य-दास’
कृष्णेर ‘तटस्था-शक्ति’ ‘भेदाभेद-प्रकाश’
सूर्यांश-किरण, यैछे अग्नि-ज्वाला-चय
स्वाभाविक कृष्णेर तिन-प्रकार ‘शक्ति’ हय
"“जीव का स्वरूप है कृष्ण का नित्य दास होना, क्योंकि वह कृष्ण की तटस्था शक्ति है और भगवान से एक ही समय में अभिन्न और भिन्न प्रकाश है, जैसे सूर्य की किरण का कण या अग्नि की चिनगारी। कृष्ण की तीन प्रकार की शक्तियाँ हैं।" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 20.108-109)
कृष्ण की सेवा आत्मा का अपना स्वभाव है, इसलिए वह किसी एक यात्रा या एक जीवन के साथ समाप्त नहीं होती। राघव को लगा था कि ऐसे दिन फिर नहीं आएँगे, पर उन दिनों में उन्होंने जिस बात का आशीर्वाद दिया, उसका कभी अन्त नहीं होगा। इन अन्तिम दिनों में उन्होंने दोनों युवा भक्तों को शास्त्र की आँखों से पवित्र स्थान दिखाए थे। उन्होंने दिखाया था कि श्री विग्रह स्वयं कृष्ण हैं, मन्त्र किस परम्परा से होकर आता है, और व्रज में हर वस्तु को कैसे प्रणाम करना चाहिए। वर्षों बाद भी श्रीनिवास इस सबको बस "श्री राघव के साथ" व्रज में भ्रमण के रूप में याद करते थे।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (15)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.70, purport ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 291 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 293 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Antya 6.294 ऊपर देखें ↑
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 18.71, purport ऊपर देखें ↑
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 308 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 449 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 450 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 451 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Fifth Wave, p. 452 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Sixth Wave, p. 486 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Sixth Wave, p. 487 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Twelfth Wave, p. 716 (1912 ed.)
- Bhakti-ratnakara, Twelfth Wave, p. 999 (1912 ed.)
- Sri Chaitanya-charitamrita Madhya 20.108-109 ऊपर देखें ↑
अध्याय 7
चम्पकलता और श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश
कवि कर्णपुर की गौर-गणोद्देश-दीपिका में चम्पकलता के रूप में उनकी पहचान, और छह रत्नों वाला उनका संस्कृत ग्रन्थ: वह क्या सिखाता है, और उसकी प्रतियाँ और अनुवाद कैसे बने।

पुराने ग्रन्थों में श्रील राघव पण्डित गोस्वामी के बारे में जो कुछ मिलता है, उसमें से अधिकतर भक्ति-रत्नाकर से आता है। यह ग्रन्थ उन्हें गोवर्धन में दिखाता है, और श्रीनिवास आचार्य तथा नरोत्तम दास ठाकुर के साथ उनकी व्रज-परिक्रमा में भी। उनके बारे में दो बातें और याद की जाती हैं, और ये दोनों एक ही श्लोक में मिलती हैं। यह श्लोक कवि कर्णपुर के उस ग्रन्थ का है, जिसे उन्होंने 1576 में पूरा किया। वह श्लोक कहता है कि राघव चम्पकलता हैं, जो श्री कृष्ण की लीलाओं में श्रीमती राधारानी की एक प्रिय सखी हैं। वह यह भी कहता है कि राघव ने भक्ति-रत्न-प्रकाश नाम का एक ग्रन्थ लिखा।
यह ग्रन्थ खो नहीं गया। यह आज भी संस्कृत में श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश के नाम से उपलब्ध है। इस नाम का अर्थ है, "कृष्ण-भक्ति के रत्न का प्रकाश"। इसके पन्नों में हम आज भी राघव की अपनी वाणी सुन सकते हैं। यह एक विद्वान भक्त की वाणी है, जो अपने पाठकों से बार-बार विनती करते हैं कि वे हर दूसरा आश्रय छोड़ दें और केवल कृष्ण के चरण-कमलों का भजन करें।
चम्पकलता, श्रीमती राधारानी की प्रिय सखी #
व्रज में श्रीमती राधारानी अपनी सखियों से घिरी रहती हैं। ये सखियाँ गोपियों में से उनकी सहेलियाँ हैं, और गोपियाँ व्रज की वे ग्वालिनें हैं, जो कृष्ण से प्रेम करती हैं। इन सखियों में से आठ सबसे निकट हैं, और उन्हें अष्ट-सखी, अर्थात् "आठ सखियाँ", कहा जाता है। श्रील प्रभुपाद ने एक बार अपने एक शिष्य के लिए प्रमुख गोपियों की सूची लिखी, और समझाया कि इनमें "पहली आठ अष्ट-सखी कहलाती हैं"। उनकी सूची में चौथा नाम चम्पकलता का है (तमाल कृष्ण को पत्र, 27 मई 1970)।
इन आठ सखियों की सेवा क्या है? चैतन्य-चरितामृत में कृष्णदास कविराज गोस्वामी कहते हैं कि गोपियाँ "राधारानी के साथ कृष्ण की लीलाओं का आनन्द बढ़ाने में सहायता करती हैं"। श्रील प्रभुपाद अपने तात्पर्य में समझाते हैं: "परम-प्रेष्ठ-सखियाँ संख्या में आठ हैं"। ये सबसे प्रिय सखियाँ हैं। दिव्य युगल के प्रेम-व्यवहार में "वे कभी कृष्ण का पक्ष लेती हैं और कभी राधारानी का", जिससे प्रेम का आदान-प्रदान और भी मधुर हो जाता है (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 4.217, तात्पर्य)। चम्पकलता इन्हीं आठ सखियों में से एक हैं।
गौर-गणोद्देश-दीपिका क्या कहती है #
कवि कर्णपुर ने अपनी गौर-गणोद्देश-दीपिका 1576 में पूरी की। इसमें वे श्री चैतन्य महाप्रभु के बहुत-से अनुयायियों के नाम लेते हैं, और बताते हैं कि कृष्ण की नित्य लीलाओं में उनमें से हर एक कौन है। एक श्लोक में वे गोवर्धन के राघव के बारे में कहते हैं:
श्रीराधाप्राणरूपा या श्रीचम्पकलता व्रजे ।
साद्य राघवगोस्वामी गोवर्धनकृतस्थितिः ।
भक्तिरत्नप्रकाशाख्यग्रन्थो येन विनिर्मितः ॥
"श्रीमती चम्पकलता गोपी, जो श्रीमती राधारानी को अपने प्राणों के समान प्रिय मानती थीं, राघव गोस्वामी के रूप में प्रकट हुईं। वे गोवर्धन पर्वत पर रहते थे और उन्होंने भक्ति-रत्न-प्रकाश नाम का ग्रन्थ लिखा।" (गौर-गणोद्देश-दीपिका 162)
यह श्लोक हमें तीन बातें बताता है। पहली, कृष्ण की लीलाओं में राघव चम्पकलता हैं, जो श्रीमती राधारानी को अपने प्राणों के समान प्रिय मानती हैं। दूसरी, इस संसार में वे गोवर्धन में रहते हैं। तीसरी, वे भक्ति-रत्न-प्रकाश के लेखक हैं। राघव की कथा में जो एकमात्र पक्की तिथि मिलती है, वह भी इसी श्लोक से मिलती है। श्लोक के शब्दों के अनुसार, 1576 तक वे गोवर्धन में रह रहे थे, और उनका ग्रन्थ लिखा जा चुका था।
भक्ति-रत्नाकर में नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर पहले अपने शब्दों में राघव का चित्र खींचते हैं, और उसके ठीक बाद यही श्लोक उद्धृत करते हैं (पंचम तरंग, पृ. 150)। वहाँ श्लोक का अन्तिम शब्द विनिर्मितः ("रचा गया") नहीं, बल्कि प्रकाशितः ("प्रकट किया गया") है। केवल चार श्लोक बाद गौर-गणोद्देश-दीपिका एक दूसरे भक्त, पानिहाटी के राघव पण्डित, को धनिष्ठा गोपी बताती है (श्री चैतन्य-चरितामृत आदि 10.24, तात्पर्य)। इस प्रकार कवि कर्णपुर ने स्वयं ही दोनों राघवों को अलग-अलग रखा।
ऐसी पहचान को कैसे समझें #
आठ सखियाँ साधारण भक्त नहीं हैं। श्रील प्रभुपाद ने एक बार इसी बात पर अपने एक शिष्य की भूल सुधारी थी: "वास्तविक बात यह है कि आठ गोपियाँ कृष्ण और राधारानी के समान ही हैं। इसलिए कोई भी वैष्णव स्वयं को आठ गोपियों में से एक होने का दावा नहीं करेगा" (गर्गमुनि को पत्र, 5 फ़रवरी 1969)। उसी पत्र में वे श्री चैतन्य महाप्रभु का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने "स्वयं को कृष्ण के दास के दास का दास कहा"।
इससे हम समझ सकते हैं कि कवि कर्णपुर के श्लोक को कैसे पढ़ें। जब यह श्लोक राघव को चम्पकलता कहता है, तो यह राघव के बारे में कवि कर्णपुर का कथन है। यह कोई ऐसा दावा नहीं है, जो राघव ने अपने लिए किया हो। अपने ग्रन्थ में राघव कहीं भी चम्पकलता का नाम तक नहीं लेते। अपने श्लोकों में जहाँ वे अपना नाम लेते हैं, वहाँ वे बस राघव नाम के एक कवि हैं, जो अपने पाठकों से विनती करते हैं कि वे उनकी बात सुनें और कृष्ण का भजन करें। चम्पकलता वाले शब्द एक दूसरे महान वैष्णव के हैं, जिन्होंने राघव की महानता को पहचाना। हमारे लिए ये शब्द राघव का और भी अधिक सम्मान करने का कारण हैं।
राघव की पहचान के बारे में सबसे पुराना कथन भी कवि कर्णपुर का यही श्लोक है। बहुत बाद की एक सूची कुछ और कहती है। इस सूची में चौंसठ महन्तों, अर्थात् महान भक्तों, के नाम हैं। यह सूची बृहद्-भक्ति-तत्त्व-सार नाम के एक बाद के संकलन से है, और गौड़ीय वैष्णव अभिधान में छपी है। गौड़ीय वैष्णव अभिधान बीसवीं शताब्दी का एक गौड़ीय सन्दर्भ-ग्रन्थ है। यह सूची स्वरूप दामोदर गोस्वामी के अनुयायियों में एक "राघव गोस्वामी" को सुमुखी सखी बताती है (खण्ड 3, पृ. 1232)। यह सूची बाद की है, यह कवि कर्णपुर से मेल नहीं खाती, और हो सकता है कि इसमें किसी दूसरे राघव की बात हो। स्वयं अभिधान में गोवर्धन के राघव का जो परिचय दिया गया है, वह गौर-गणोद्देश-दीपिका के अनुसार ही है, और उन्हें चम्पकलता बताता है (खण्ड 3, पृ. 1332)।
उनका ग्रन्थ, श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश #
राघव का ग्रन्थ तीन नामों से जाना जाता है। कवि कर्णपुर, भक्ति-रत्नाकर और साधन-दीपिका इसे भक्ति-रत्न-प्रकाश कहते हैं। 1955 का छपा हुआ संस्करण और अभिधान इसे श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश कहते हैं। एक अंग्रेज़ी अनुवाद में इसे हरि-भक्ति-रत्न-प्रकाश कहा गया है। भक्ति-रत्नाकर कहता है कि उन्होंने "भक्ति-रत्न-प्रकाश जैसे ग्रन्थ" लिखे, पर उनके किसी दूसरे ग्रन्थ का नाम हम तक नहीं पहुँचा। यह ग्रन्थ संस्कृत में लिखा गया है और छह अध्यायों में बँटा है। हर अध्याय को प्रकाश, अर्थात् "चमक", कहा गया है। हर अध्याय के अन्त में राघव उस अध्याय को अपने पाठक को एक रत्न के रूप में भेंट करते हैं।

ग्रन्थ का आरम्भ क्रम-दीपिका नाम के एक पुराने ग्रन्थ के आठ श्लोकों से होता है। इनमें से दूसरे श्लोक में राघव अपने गुरु के चरण-कमलों में प्रणाम करते हैं, पर गुरु का नाम नहीं बताते (श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश 1.2; देखें गोवर्धन में दक्षिण के एक ब्राह्मण)। फिर वे बताते हैं कि उन्होंने यह ग्रन्थ क्यों लिखा। वे कहते हैं कि शास्त्र तो पहले से हैं, पर उन्हें सचमुच समझने वाले बहुत कम हैं। कुछ लोग रूखा तर्क करते रहते हैं, कुछ के मन में सन्देह भरा है, कुछ कर्म के मार्ग पर चलते हैं, अर्थात् फल पाने के लिए काम करते हैं, कुछ अनेक देवताओं की पूजा करते हैं, और कुछ सिखाते हैं कि सब देवता बराबर हैं। इसलिए वे कृष्ण को नहीं जानते, जो परमेश्वर हैं और सबकी आत्मा हैं। इसी कारण राघव अनेक शास्त्रों के श्लोक एक ग्रन्थ में इकट्ठे करते हैं, और उसे संग्रह, अर्थात् "संकलन", कहते हैं। ग्रन्थ में बार-बार कोई सन्देह करने वाला व्यक्ति प्रश्न उठाता है, और कृष्ण के भक्त शास्त्रों के श्लोकों से उसका उत्तर देते हैं।
छह अध्याय और उनके विषय ये हैं:
- श्रीकृष्ण-भजनोद्देश: केवल कृष्ण का ही भजन क्यों करना चाहिए
- नानोपासन-वर्जन: अनेक देवताओं की उपासना छोड़ना
- कृष्ण-पूर्णतमत्व: भगवान का सबसे पूर्ण स्वरूप कृष्ण हैं
- वृन्दावन-नित्य-प्रकाश: कृष्ण वृन्दावन में सदा उपस्थित रहते हैं
- श्री नन्दकिशोर-स्वरूप: नन्द के किशोर पुत्र के रूप में कृष्ण का अपना स्वरूप
- भक्ति-विरचन: स्वयं भक्ति, अर्थात् कृष्ण के चरण-कमलों की सेवा
वे किसी भी दूसरे ग्रन्थ से कहीं अधिक श्रीमद्भागवत को उद्धृत करते हैं, और उसके साथ भगवद्गीता, ब्रह्म-संहिता और कई पुराणों को भी। वे कुछ कम प्रसिद्ध पंचरात्र ग्रन्थों का भी बहुत उपयोग करते हैं। ये उपासना के बारे में पुराने वैष्णव ग्रन्थ हैं: गोविन्द-वृन्दावन (जो बृहद्-गौतमीय-तन्त्र का एक भाग है), सम्मोहन-तन्त्र, कृष्ण-यामल, नारद-पंचरात्र और वराह-संहिता (गौड़ीय ग्रन्थ मन्दिर; अभिधान, खण्ड 3, पृ. 1514)।
वे रूप गोस्वामी के ग्रन्थों का भी सहारा लेते हैं। पाँचवें अध्याय में (5.2-3) वे ग्रन्थ का नाम लिए बिना रूप गोस्वामी के भक्ति-रसामृत-सिन्धु (2.1.221-222) के दो श्लोक देते हैं। ये श्लोक सिखाते हैं कि भगवान अपने गुणों को जितनी पूर्णता से प्रकट करते हैं, उसी के अनुसार उन्हें पूर्ण, पूर्णतर (अधिक पूर्ण) या पूर्णतम (सबसे पूर्ण) कहा जाता है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी भी चैतन्य-चरितामृत में यही दो श्लोक उद्धृत करते हैं, और श्रील प्रभुपाद इनमें से दूसरे श्लोक का अनुवाद इस प्रकार करते हैं: "जब वे अपने सब गुणों को पूर्ण रूप से प्रकट करते हैं, तब उन्हें पूर्णतम कहा जाता है" (श्री चैतन्य-चरितामृत मध्य 20.400)। इन श्लोकों से राघव अपना निष्कर्ष निकालते हैं: वृन्दावन में कृष्ण पूर्णतम हैं, और दूसरे स्थानों पर वे स्वयं को कम प्रकट करते हैं। इस प्रकार यह ग्रन्थ दिखाता है कि राघव रूप गोस्वामी के ग्रन्थों को जानते थे, और उन्होंने उन्हीं के आधार पर अपनी बात आगे बढ़ाई।
पाठक के लिए छह रत्न #
हर अध्याय एक ऐसे श्लोक से समाप्त होता है, जिसमें राघव अपना नाम लेते हैं और उस अध्याय को पहनने के एक रत्न के रूप में भेंट करते हैं। पहला अध्याय कान के लिए हीरा है, दूसरा गले के लिए मोती, तीसरा माथे के लिए नीलम, चौथा हृदय पर पहनने के लिए माणिक्य, और पाँचवाँ मुकुट के लिए पन्ना। बिल्कुल अन्त में पूरे ग्रन्थ को कृष्ण-भजन के लिए चिन्तामणि कहा गया है, अर्थात् मनोकामना पूरी करने वाला रत्न। अभिधान कहता है कि ये छह रत्न ऐसी सीढ़ियों की ओर संकेत करते हैं, जो एक के बाद एक ऊँची होती जाती हैं (खण्ड 3, पृ. 1468)। इनमें से पहला श्लोक यह है:
एतच्छ्रीहरिपादपद्मभजनोद्देशोज्ज्वलं निर्मलं
वज्रं रत्नमिदं समस्ततनुभृद्धृद्ध्वान्तविध्वंसनम् ।
ज्ञात्वानेन कुरुष्व सादरतया कर्णावतंसं सुधी-
र्धीरस्यापि निवेदनं शृणु मम श्रीराघवस्यासकृत् ॥
"हरि के चरण-कमलों की भक्ति का वर्णन करने वाला यह ग्रन्थ एक उज्ज्वल, निर्मल हीरा है, जो सब देहधारियों के हृदय का अन्धकार नष्ट कर देता है। हे बुद्धिमान पाठक, इस हीरे को अपने कान का आभूषण बना लो। हे धीर पाठक, मैं राघव गोस्वामी इस ग्रन्थ में जो निवेदन कर रहा हूँ, उसे बार-बार सुनो।" (श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश 1.32, 1955 का संस्कृत संस्करण, पृ. 4; कुशक्रथ दास के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)
दूसरे अध्याय के अन्त में वे स्वयं को श्री कविराज राघव कहते हैं (2.72)। कविराज एक विद्वान कवि की उपाधि है। ग्रन्थ के अन्त के पास दो श्लोकों में (6.73-74) वे एक बार फिर अपने बारे में कहते हैं, और स्वयं को राधा-कृष्ण के प्रेम में डूबा हुआ एक कवि बताते हैं। वहीं वे उस स्थान का नाम भी लेते हैं, जहाँ उन्होंने यह ग्रन्थ लिखा। पर वहाँ वे गोवर्धन का नाम नहीं लेते, और कोई भी स्रोत यह नहीं बताता कि वह स्थान कौन-सा है। इसलिए हम नहीं जानते कि यह ग्रन्थ कहाँ लिखा गया।
ग्रन्थ की आगे की यात्रा #
बाद के गौड़ीय वैष्णवों ने राघव के ग्रन्थ का आदर किया। राधाकृष्ण गोस्वामी की साधन-दीपिका भी एक संस्कृत ग्रन्थ है। वह "श्री राघव-पण्डित गोस्वामि-पाद" के "श्री भक्ति-रत्न-प्रकाश आदि ग्रन्थों" को उन ग्रन्थों में गिनाती है, जिनके द्वारा भक्त आज भी भगवान की लीलाओं का रस ले सकते हैं (साधन-दीपिका, नवम कक्षा (अध्याय), पृ. 257)। राघव के ग्रन्थ की हाथ से लिखी एक प्रति शक 1606 में, अर्थात् 1684-85 ईसवी में, बनाई गई थी। यह प्रति नवद्वीप के हरिबोल कुटीर में, हरिदास दास के संग्रह में रखी हुई थी। हरिदास दास ने ही गौड़ीय वैष्णव अभिधान संकलित किया था (खण्ड 3, पृ. 1467)।
शक 1661 (1739-40 ईसवी) में, जब बंगाल के वन-विष्णुपुर में राजा गोपाल सिंह का राज्य था, उसी नगर के उत्तम दास नाम के एक कवि ने राघव के ग्रन्थ के पहले चार रत्नों का बांग्ला पद्य में रूपान्तर किया। उनके इस अनुवाद की एक हस्तलिखित प्रति एशियाटिक सोसाइटी के संग्रह में है, और उसकी संख्या 3572 है (अभिधान, खण्ड 3, पृ. 1468)। विष्णुपुर वही नगर है, जहाँ कभी श्रीनिवास आचार्य के शिष्य राजा वीर हम्बीर राज्य करते थे, और यही श्रीनिवास व्रज-परिक्रमा में राघव के साथी रहे थे। कोई भी स्रोत यह नहीं बताता कि राघव का ग्रन्थ विष्णुपुर कैसे पहुँचा। बाद में घनश्याम नाम के एक दूसरे भक्त ने राघव के ग्रन्थ को आदर्श मानकर भक्ति-सिद्धान्त-रत्न नाम का एक संस्कृत ग्रन्थ लिखा, और उसके पहले अध्याय में राघव का नाम लिया (अभिधान, खण्ड 3, पृ. 1703)।
संस्कृत मूल पाठ 1955 में कलकत्ता में बांग्ला लिपि में छपा। यह गौर-जयन्ती के दिन छपा, जो श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य-दिवस है। इसका सम्पादन पुरीदास महाशय ने किया, और इसे वृन्दावन के हरिदास शर्मा ने प्रकाशित किया। इसके मुख-पृष्ठ पर लेखक को "श्रील राघव पण्डित गोस्वामी, श्री गोवर्धन पर्वत की तलहटी में ‘पुछरी’ नाम के कृष्ण-लीला स्थान के निवासी" कहा गया है (1955 का संस्करण)। पुछरी वही स्थान है, जिसे आज प्रायः पूँछरी कहा जाता है, और जहाँ तीर्थयात्री आज भी उनकी गुफा के दर्शन करने जाते हैं (देखें गोवर्धन की परिक्रमा और उनकी अपनी गुफा)। बाद में वृन्दावन के हरिदास शास्त्री ने यह ग्रन्थ देवनागरी लिपि में प्रकाशित किया। गौड़ीय ग्रन्थ मन्दिर का संस्कृत पाठ, जो इंटरनेट पर निःशुल्क मिलता है, उन्हीं के संस्करण पर आधारित है।
अंग्रेज़ी में इसके कम से कम तीन अनुवाद हैं: कुशक्रथ दास का The Splendor of the Jewel of Hari Bhakti (2009), गोल्डन एज मीडिया का एक संस्करण (2018), और भानु स्वामी का एक अनुवाद (2023)। पर ग्रन्थ की कुछ आधुनिक भूमिकाएँ इसके लेखक को भूल से पानिहाटी के राघव पण्डित समझ लेती हैं, जो बंगाल और पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के साथी थे। ये भूमिकाएँ पानिहाटी के राघव की कथाएँ, जैसे हर वर्ष पुरी में महाप्रभु के लिए भोजन-सामग्री के थैले भेजने की कथा, ऐसे सुनाती हैं मानो वे इस ग्रन्थ के लेखक की कथाएँ हों। गौर-गणोद्देश-दीपिका स्वयं दिखाती है कि ये दो अलग-अलग भक्त हैं (देखें श्रील राघव पण्डित गोस्वामी)।
केवल कृष्ण: उनके ग्रन्थ की विनती #
किसी अध्याय का विषय कुछ भी हो, राघव बार-बार एक ही निष्कर्ष पर लौट आते हैं। ग्रन्थ के अन्त के पास वे इसे एक ही विनती में समेट देते हैं:
नानादेवनिषेवणं परिहर प्राणादिसंरोधनं
धर्मं कर्म च दानतीर्थनियमब्रह्मादिकोपासनम् ।
सर्वेषां परमेश्वरस्य परमानन्दप्रदस्यात्मनः
श्रीकृष्णस्य सदाव्ययस्य चरणद्वन्द्वारविन्दं भज ॥
"अनेक देवताओं की उपासना, प्राणायाम आदि, धर्म और सकाम कर्म, दान, तीर्थ, व्रत-नियम और ब्रह्म आदि की उपासना, इन सबको छोड़ दो। सबके परमेश्वर, परम आनन्द देने वाले, सबकी आत्मा, सदा अविनाशी श्री कृष्ण के दोनों चरण-कमलों का भजन करो।" (श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश 6.72, हिन्दी अनुवाद हमारा)
यह वही उपदेश है, जो भगवान कृष्ण भगवद्गीता के अन्त में देते हैं। राघव स्वयं इसी अध्याय में थोड़ा पहले वह श्लोक उद्धृत करते हैं (6.62):
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
"सब प्रकार के धर्मों को त्याग दो और केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा। डरो मत।" (भगवद्गीता 18.66)
इसका अर्थ यह नहीं है कि राघव को तीर्थों या अच्छे कर्मों की कोई परवाह नहीं थी, क्योंकि वे स्वयं व्रज की पवित्र भूमि में रहते थे। उनकी विनती यह है कि कृष्ण से अलग किसी भी चीज़ को लक्ष्य मानकर उसका पालन न किया जाए। श्रील प्रभुपाद इस श्लोक के तात्पर्य में यही बात समझाते हैं: "मनुष्य समाज में अपनी स्थिति के अनुसार कोई विशेष कर्तव्य कर सकता है, पर यदि अपना कर्तव्य करते हुए वह कृष्णभावनामृत तक नहीं पहुँचता, तो उसके सारे कार्य व्यर्थ हैं" (भगवद्गीता 18.66, तात्पर्य)।
राघव यह भी कहते हैं कि उनका ग्रन्थ केवल योग्य पाठक को ही दिया जाए। यह अभिमानी, श्रद्धाहीन या भक्ति के विरोधी व्यक्ति को न दिया जाए, बल्कि ऐसे शुद्ध मन वाले व्यक्ति को दिया जाए, जो कृष्ण के चरण-कमलों की सेवा करता हो, गुरु के प्रति समर्पित हो, शान्त हो और सदा सत्य बोलता हो (6.77-80)। फिर वे भगवद्गीता के चार श्लोकों से ग्रन्थ समाप्त करते हैं। इनमें से अन्तिम श्लोक उन भगवान की बात करता है, जो हर हृदय में रहते हैं: "पूरी तरह उनकी शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम दिव्य शान्ति और परम तथा नित्य धाम प्राप्त करोगे" (भगवद्गीता 18.62)। उनका अपना अन्तिम वाक्य इसका निष्कर्ष बताता है: यह सब जानकर मनुष्य को केवल श्री कृष्ण के चरण-कमलों की शरण लेनी चाहिए (1955 का संस्करण, पृ. 43)।
राघव ने जो लिखा, वही जिया। भक्ति-रत्नाकर बताता है कि वे व्रज की धूल से धूसर रहते थे, उन्हें खाने की कोई इच्छा नहीं थी, और वे सदा राधा-कृष्ण तथा श्री चैतन्य का गान करते रहते थे (पंचम तरंग, पृ. 150)। उन्होंने गोवर्धन को अपना सर्वस्व बनाया, और अपने ग्रन्थ में वे हर पाठक से विनती करते हैं कि वह कृष्ण के चरण-कमलों को अपना सर्वस्व बनाए। कवि कर्णपुर ने उनमें श्रीमती राधारानी की एक प्रिय सखी को देखा, पर राघव ने स्वयं केवल इतना चाहा कि उनकी बात सुनी जाए। जो बात वे हमें सुनाना चाहते हैं, वह सरल है: हर दूसरा आश्रय छोड़ दो, और केवल कृष्ण की शरण लो।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (4)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
उपसंहार
क्या वे पानिहाटी के राघव पण्डित ही हैं? #
नहीं। गौड़ीय वैष्णव इतिहास में राघव पण्डित नाम के दो महान भक्त हैं, और गौर-गणोद्देश-दीपिका स्वयं उन्हें अलग-अलग बताती है, चम्पकलता वाले श्लोक के केवल चार श्लोक बाद। पानिहाटी के राघव पण्डित के बारे में लिखते हुए श्रील प्रभुपाद वही दूसरा श्लोक उद्धृत करते हैं:

धनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादाद्व्रजेऽमिताम् ।
सैव सम्प्रति गौराङ्गप्रियो राघवपण्डितः ॥
"राघव पण्डित पहले व्रज में कृष्ण की लीलाओं के समय एक अन्तरंग गोपी थीं, और उनका पूर्व नाम धनिष्ठा था। यह गोपी धनिष्ठा सदैव कृष्ण के लिए भोजन बनाने में लगी रहती थीं।" (चैतन्य-चरितामृत आदि 10.24 तात्पर्य)
इसलिए दोनों स्पष्ट रूप से अलग हैं:
- पानिहाटी के राघव पण्डित: बंगाल में श्री चैतन्य महाप्रभु के पार्षद, कृष्ण-लीला में धनिष्ठा गोपी, जो हर वर्ष पुरी में महाप्रभु के लिए भोजन-सामग्री के थैले (राघवेर झाली) भेजने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका घर और समाधि गंगा तट पर पानिहाटी में हैं।
- गोवर्धन के राघव पण्डित गोस्वामी: दक्षिण के एक ब्राह्मण, जिनका पता महाप्रभु के बाद के वर्षों से मिलता है, जब वे गोस्वामियों के साथ व्रज में रहते थे; चम्पकलता गोपी, भक्ति-रत्न-प्रकाश के लेखक, और श्रीनिवास तथा नरोत्तम के मार्गदर्शक। उनका घर गोवर्धन की एक गुफा थी।
आज की बहुत-सी तीर्थ-पुस्तिकाएँ और वेबसाइटें गोवर्धन की गुफा वाले राघव को "श्री चैतन्य महाप्रभु के निकट पार्षद" बताती हैं। यह दोनों को एक मान लेने से हुआ है, और किसी भी पुराने ग्रन्थ से इसका समर्थन नहीं होता।
उनके बारे में सामान्य प्रश्न #
क्या राघव पण्डित गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले थे? #
किसी पुराने ग्रन्थ में ऐसा नहीं लिखा। भक्ति-रत्नाकर में वे मथुरा और व्रज में लगभग हर स्थान पर महाप्रभु की लीलाएँ सुनाते हैं, पर सदा ऐसी घटना के रूप में जो वहाँ हुई थी, कभी ऐसी घटना के रूप में नहीं जो उन्होंने देखी हो। एक बार वे अपना स्रोत भी बताते हैं: बड़े-बुज़ुर्ग, जिन्होंने उन्हें यह सुनाया। लिखे हुए प्रमाण उन्हें महाप्रभु के अन्तर्धान के बाद के वर्षों में वृन्दावन और राधा-कुण्ड के गोस्वामियों के बीच व्रज में दिखाते हैं; कोई भी प्रमाण उन्हें महाप्रभु के संग में नहीं दिखाता।

उनके गुरु कौन थे? #
पुराने ग्रन्थों में उनके गुरु का नाम नहीं मिलता। उनका अपना ग्रन्थ क्रम-दीपिका के श्लोकों से आरम्भ होता है, और उनमें से दूसरे श्लोक में वे अपने गुरुदेव के चरण-कमलों में प्रणाम करते हैं, पर नाम नहीं बताते। भक्ति-रत्नाकर उन्हें रघुनाथ दास गोस्वामी, जीव गोस्वामी और कृष्णदास कविराज गोस्वामी के निकट और उनके द्वारा सम्मानित दिखाता है, पर यह नहीं कहता कि इनमें से कोई उनके गुरु थे।
राघव पण्डित की गुफा कहाँ है? #
यह गोवर्धन पर्वत के दक्षिणी छोर पूँछरी में, अप्सरा-कुण्ड और नवल-कुण्ड के पास, गोवर्धन परिक्रमा के मार्ग पर है। भक्ति-रत्नाकर में राघव श्रीनिवास को "गोवर्धन के छोर पर" स्थित अप्सरा-कुण्ड और श्याम-ढाक का पुराना पलाश वृक्ष दिखाकर अपनी गुफा पर ले आते हैं, और उनके ग्रन्थ का 1955 का एक संस्करण उन्हें "श्री गोवर्धन पर्वत की तलहटी में ‘पुछरी’ नाम के कृष्ण-लीला स्थान के निवासी" कहता है।
उनकी समाधि कहाँ है, और उन्होंने यह संसार कब छोड़ा? #
पुराने स्रोत यह नहीं बताते कि उन्होंने यह संसार कब और कहाँ छोड़ा। गौड़ीय वैष्णव अभिधान केवल इतना कहता है कि उनकी समाधि वृन्दावन में है, पर स्थान का नाम नहीं बताता। गौड़ीय पंचांगों में उनके तिरोभाव दिवस की कोई तिथि नहीं मिली।
उन्होंने क्या लिखा? #
श्रीकृष्ण-भक्ति-रत्न-प्रकाश, जिसे भक्ति-रत्न-प्रकाश भी कहते हैं। यह कृष्ण की अनन्य भक्ति पर छह अध्यायों का संस्कृत ग्रन्थ है। भक्ति-रत्नाकर कहता है कि उन्होंने "इस जैसे ग्रन्थ" लिखे, इसलिए हो सकता है कि दूसरे ग्रन्थ भी रहे हों, पर किसी दूसरे ग्रन्थ का नाम हम तक नहीं पहुँचा।
वे कब हुए? #
उनकी सही तिथियाँ ज्ञात नहीं हैं। जब 1576 में गौर-गणोद्देश-दीपिका पूरी हुई, तब तक वे गोवर्धन में रह रहे थे और अपना ग्रन्थ लिख चुके थे। वे रघुनाथ दास गोस्वामी के मित्र थे, जीव गोस्वामी उनका सम्मान करते थे, और जब जाह्नवा माता वृन्दावन आईं, तब भी वे गोवर्धन के पास ही रह रहे थे।
उनका जीवन हमें क्या सिखाता है #
राघव पण्डित गोस्वामी ने संसार से कुछ नहीं माँगा। वे एक गुफा में रहे, बहुत कम खाया, और अपने दिन उन स्थानों में बिताए जहाँ कृष्ण ने लीलाएँ कीं, राधा-कृष्ण और श्री चैतन्य का गान करते हुए। फिर भी जब दो युवा भक्तों को मार्गदर्शक की आवश्यकता हुई, तो उन्होंने बड़ों से सुना हुआ अपना सब कुछ उन्हें दे दिया, और पवित्र स्थानों को उनके लिए जीवन्त कर दिया। शास्त्र ठीक यही बताते हैं कि एक शुद्ध भक्त क्या करता है:
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो ।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥
"हे प्रभु, आप जैसे भक्त स्वयं ही साक्षात् तीर्थ होते हैं। आप भगवान को अपने हृदय में धारण किए रहते हैं, इसलिए आप जहाँ भी जाते हैं, उस स्थान को तीर्थ बना देते हैं।" (श्रीमद्भागवत 1.13.10)
अपने तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद समझाते हैं: "जो कोई भी किसी तीर्थ में जाता है, उसे वहाँ रहने वाले शुद्ध भक्तों को खोजना चाहिए, उनसे शिक्षा लेनी चाहिए, उन शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करने का प्रयास करना चाहिए, और इस प्रकार धीरे-धीरे परम मुक्ति, अर्थात् भगवद्धाम लौटने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए।" श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम दास ठाकुर ने ठीक यही किया। उन्होंने राघव की आँखों से व्रज को देखा, और फिर वे गोस्वामियों के ग्रन्थ और उनका भाव बंगाल ले गए, जहाँ आज भी भक्त नरोत्तम के गीत गाते हैं।
प्राथमिक शास्त्रीय स्रोत
- Bhakti-ratnakara of Narahari Chakravarti (Bengali, 2nd edition, Murshidabad 1912) - archive.org
- Gaura-ganoddesha-dipika of Kavi Karnapura, Sanskrit with diacritics (verse 162)
- Narottama-vilasa of Narahari Chakravarti (Bengali, 1907 edition) - archive.org
- Krishna-bhakti-ratna-prakasha of Raghava Pandita Goswami (Sanskrit, 1955 edition) - archive.org
- Krishna-bhakti-ratna-prakasha, Sanskrit e-text - Gaudiya Grantha Mandira
