भज सखि वल्लव राज
यमुना-जल-कणिकाभिर् उपेते सङ्गतम् उज्ज्वल-कुञ्ज-निकेते
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यमुना-जल-कणिकाभिर् उपेते सङ्गतम् उज्ज्वल-कुञ्ज-निकेते
भामिनि पृच्छ न वारं वारम्
मधुरिपुर् अद्य वसन्ते
माधव परिहर पटिम-तरङ्गम्
माधव परिहर मे पटम् एतम्
मुक्तेर् गोविन्द-भक्तेर् वितरण-चतुरं सच्-चिद्-आनन्द-रूपं
राधा-माधवयोर् एतद् वक्ष्ये नाम-युगाष्टकम्
राधा सखि जल-केलिषु निपुणा
राधे कलय हृदयम् अनुकूलम्
प्रचुर-पुरन्दर-गोप-विनिन्दक-कान्ति-पटलम् अनुकूलं
राधे निज-कुण्ड-पयसि तुङ्गी-कुरु रङ्गम्
राधे पथि मुञ्च भूरि सम्भ्रमम् अभिसारे
राधा-मुकुन्द-पद-सम्भव-घर्म-बिन्दु
राधिका-हृदयोन्मादि वंशी-क्वण-मधु-च्छटः
वन्याश्रित मुरारिः कन्याः सन्यायम् उन्मादयन्
वारय तूर्णम् इमं सखि कृष्णम्
वारय माधव-मुद-वदनाङ्गम्
विरचय मयि दण्डं दीन-बन्धो दयां वा
विलसति दोलोपरि वन-माली
विहरति सह राधिकया रङ्गी
मुदिर-मदम् उदारं मर्दयन्न् अङ्ग-कान्त्या
अदुर्विध-विदग्धतास्पद-विमुग्ध-वेश-श्रियोर्
शारद-शशधर-वीक्षण-हृष्टः
मानसं मानसं त्यागाद् उत्कण्ठार्तं निरुन्धतीम्
कोमल-कुसुमावलि-कृत-चयनम्
सुन्दरि पश्य मिलति वन-माली
सुन्दरि माधवम् अवकलयालम्
न हि सङ्गोपय पर-धनम् अधुना त्वं विदिता कुल-पाली
सूनुर् अद्भुत-सुन्दरो ऽजनि नन्द-राज तवायम्
स्रस्तं स्रस्तम् उदञ्चयन्त्य् अधिशिरः श्यामं निचोलाञ्चलं
स्वप्ने सखि पुनर् अद्य मुकुन्दम्
श्यामल सुन्दर विविध-विशेषे
गति-गञ्जित-मत्ततर-द्विरदं
हरिम् अभिसर सुन्दरि सितवेशा