स त्वर प्रसर वत् त्व् असत्त्व धम हयिनी
स-त्वर-प्रसर-वत् त्व् असत्त्व-धम-हयिनी
“स” अक्षर से शुरू होने वाले सारे वैष्णव भजन और कीर्तन, देवनागरी लिपि, हिन्दी अर्थ और ऑडियो के साथ।
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स-त्वर-प्रसर-वत् त्व् असत्त्व-धम-हयिनी
सकल बैष्णब गोसा-इ दया कर मोरे
सखि गो, केमते धरिबो पराण
सखि दम्-पत्योर् अनयोर् युगलम्
सखी-गण मेलि ये करल पयान
सखे कलय गौरम् उदारम्
अनाराध्य राधा-पदाम्भोज-रेणुम्
सङ्कीर्तन छले गौर निता-इ
सङ्कीर्तने नित्यानन्द नाचे
हरि हे!
सजनि अब कि करबि उपदेश
सजनि एत दिने भङ्गल द्वन्द्व
सजनि कानु से बरज-भुजङ्ग
सजनि को कहे काम अनङ्ग
सजनि पेखलु बरज-किशोर
सजनि या-इते पेखलु कान
सजल जलद अङ्ग मनोहर
सजलि श्याम बिनोदिनी राधे
सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशं
सनकादि मुनि-गँए चाहि बुले देब-गँए
सनातन मिश्रेर भबने
सन्दर्शन संस्पर्शन जल्प बर्त्म-निरोधन
सप्ताहं मुरजित्-कराम्बुज-परिभ्राजत्-कनिष्ठाङ्गुली-
सबु मेलि' बालक-भाग बिचारि'
जयतां सुरतौ पङ्गोर् मम मन्द-मतेर् गती
सये किबा से-इ नयन चाहनि
सर्वस्व तोमार्, चरणे संपिया,
संसार-दावानल-लीढ-लोक
सह-भ्रतृ-वर्यं गुरोर् ग्रम-गमी
सहचर-अङ्गे गोरा अङ्ग हेल-इया
सहज-इ काञ्चन गोरा
सहज-इ काण्चन-कान्ति कलेबर हेर-इते जग-जन-मनो-मोहनिया
सहजे निताइचान्देर रीत
सहस्र सहस्र काँए लोलिया लोलिया पडे मुखे
साजिल अर्जुन येन मायाबद्ध नर
साधारणि समञ्जसा स्थायी लाभे भाब दशा
साधु-सङ्ग ना होइलो हाय
सिंह-द्वार त्यजि गोरा समुद्र आडे धाय
सीता-नाथ मोर अद्वैतचान्द
रघु पति राघव राजा राम
सु-रम्य मधुर-स्मित सर्ब-सल्-लखणान्वित
सु-रम्यादि गुण-गण होइयाछे बिभूषण
सुचारु-वक्त्र-मण्डलं सुकर्ण-रत्न-कुण्डलम्
प्रतिभटश्रेणी भीषण वरगुणस्तोम भूषण
सुन्दर कुण्डल नैन विशाल, गले सोहे वैजन्ती-माला
सुन्दर गौर नट-राज
सुन्दर-बाला शची-दुलाला
भजिबो तोमाइ मोर् मन छाइ