वन्दे कृष्ण नन्द कुमार
गोविन्द हरि गोपाल हरि
“व” अक्षर से शुरू होने वाले सारे वैष्णव भजन और कीर्तन, देवनागरी लिपि, हिन्दी अर्थ और ऑडियो के साथ।
33 भजन
गोविन्द हरि गोपाल हरि
वन्दे विश्वम्भर-पद-कमलम्
वन्दे वृन्दाटवी-चन्द्रं
वन्याश्रित मुरारिः कन्याः सन्यायम् उन्मादयन्
वंशी-धारी कृष्ण मुरारि
वसतु मनो मम मदन-गोपाले
वारय तूर्णम् इमं सखि कृष्णम्
वारय माधव-मुद-वदनाङ्गम्
विद्यार विलासे, काटाइनु काल,
विधि-वाक्यामृताब्धीन्दुर् गोप-बालक-वेश हे
विधुर् अयम् अगतवन् शरदं प्रति सम्प्रति
विभावरी शेष, आलोक-प्रवेश,
विरचय मयि दण्डं दीन-बन्धो दयां वा
अनिरुद्ध-बन्ध-विषयनुसन्ध गत-बण-धम विततत्म-धमहर-बद्ध-युद्ध-यशसति-शुद्ध तत-शस्त्र-जल-भव-वृन्द-कलभव-जृम्भकस्त्र-जित-लोक-शस्त्र मुहुर् अप्त-बण-जित-जैत्र-बणयुधि-मध्य-यतृ-बलि-पुत्र-मतृ-निभ-कोटरङ्ग-कलनति-सङ्ग-परिजत-लज्ज विमुखत्व-सज्ज रचित-ज्वरन्तर-पर-ज्वरन्त-कृत-तत्-प्रसद पृथु-कीर्ति-वद पुनर् अगतस्य बलि-दुः-सुतस्यभुज-वृन्द-लव-वलित-प्रभव शिव-सुक्त-तुष्ट कृपयभिजुष्ट-भव-पर्षदत्वम् अनु दत्त-सत्त्व बलि-सुनु-पल-कृपय विशलशर-पश-रुद्ध-सुतजनिरुद्ध-परिमोक्ष-दक्ष सुखित-स्व-पक्षस-वधुकम् एवम् अनिरुद्ध-देवम् उपनीय गेहम् अति-मनुषेहपुनर् अत्म-गोष्ठम् इत वेणुकोष्ठ सरिपुर्य सर्वम् अकृथ स-पर्वजय गोप-रज-कुलजधिरज. वीर.
जरसुतनुबन्धन-क्षितीश-वृन्द-बन्धन-श्रुतेर् अतीव सुरतः सुरर्षिणपि दुरतः
पर्थ-क्रतु-रज-प्रथ दिव्य-द्रव-सम्पद्-रथ-शब्द-प्लुत
यः श्रीमन्-व्रज-रज-सिन्धुज-विधुः स्वं कीर्ति-कन्तिं किरन्न्
विलसति दोलोपरि वन-माली
त्वं रूप-मञ्जरि सखि प्रथिता पुरे 'स्मिन्
विषय-विमूढ आर् मायावादी जन्
विहरति सह राधिकया रङ्गी
वृन्दावन रम्य-स्थान दिव्य-चिँतामणि-धाम
वृन्दावन-वासी जत वैष्णवेर गण
वृन्दावन-विहाराढ्यौ
वृषभ-दनुज-नाशान् नर्म-धर्मोक्ति-रङ्गैर्
वैकुण्ठ होइते श्रेष्ठ मथुरा नगरी,
वैष्णव ना देखिया बले वैष्णव निष्क्रिय
व्यासेन व्रज-लीलायां नित्य-तत्त्वं प्रकाशितम्
मुदिर-मदम् उदारं मर्दयन्न् अङ्ग-कान्त्या
अदुर्विध-विदग्धतास्पद-विमुग्ध-वेश-श्रियोर्
व्रज-मधुर-मधुरी-ह्रसित-पर-कमनम्
व्रजे प्रसिद्धं नवनीत-चौरं
व्रजेन्द्र-नन्दन, भजे जेइ जन, सफल जीवन ता’र,