मङ्गलाचरण
अज्ञान-तिमिरान्धस्य
“म” अक्षर से शुरू होने वाले सारे वैष्णव भजन और कीर्तन, देवनागरी लिपि, हिन्दी अर्थ और ऑडियो के साथ।
68 भजन · पृष्ठ 1 / 2
अज्ञान-तिमिरान्धस्य
वन्दे 'हं श्री-गुरोः श्री-युत-पद-कमलं श्री-गुरुन् वैष्णवांश् च
प्रणमह नारायण अनादि निधन्
मणि-मलकृत-गो-गण-गणनपुरणम् अनु सनन्दम्
मण्डली रचिया सहचरे
वन-भुवि रविकन्या-स्वच्छ-कच्छालि-पाली-
मदन-मोहन तनु गौराङ्ग सुन्दर
मदन मोहन मणि, गौराङ्ग बदन खानि
मधुर मधुर गौर-किशोर, मधुर मधुर नाट
मधुरं मधुरेभ्यो 'पि
मधुरिपुर् अद्य वसन्ते
मधुरेर स्थायी भाब लभे जते अबिर्भाब
(मन आमार्) हुँसा'र् थेको, भूलो' नाको,
मन तुमि तीर्थे सदा रत
मन, तुमि पड़िले कि छार?
मन, तुमि बड़इ पामर
मन तुमि बोरोइ चञ्चल
मन तुमि भालबास कामेर तरङ्ग
मन तुमि सन्न्यासी साजिते केनो चाओ
मन तोरे बोलि ए बारता
मन रे धन-मद नितान्त असार
मन रे, केनो आर बर्ण अभिमान
मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब
मन रे, केनो मिछे भजिछो असार?
मन रे, तुमि बोरो सन्दिग्ध-अन्तर
मन रे! कह ना गौर कथा
मन, केनो ए संशोय
मन, जोगी हो'ते तोमार बासना
मन, तुमि पडिले कि छार?
मन, तुमि बोडै पामोर
मनेर् माला जप्बि जखन्, मन,
मन्दिर बाहिर कठिन कपाट
मम मन मन्दिरे रहो निशि-दिन्
मरकत-दरपण बरण उजोर
मरि ना लो नदीयार माझारे ओ ना रूप
मरि या-इ एमन निता-इ केन ना भजिनु
मरि या-इ एमन निता-इ केन ना भजिल
महा-भुज नाचत चैतन्य राय
स्वरूप भवतो भवत्व् अयम् इति स्मित-स्निग्धया
महाभाब-चिन्तामणि उद्भाबित-तनु-खानि
माघ सप्तमी शुक्ल-पक्ष शुभ-क्षण क्षण भूरि
माघे शुक्ला-तिथि सप्तमीते अति
माधब कि कहब दैब-बिपाक
माधब तोहे कि शिखायब आन
माधब नो अबिचार कुल-रामा
धूलि-धूसर धनि धैरय न धर
माधव परिहर पटिम-तरङ्गम्
माधव परिहर मे पटम् एतम्