`अहं मम’ शब्द अर्थे जाहा किछु होय्
`अहं मम’-शब्द-अर्थे जाहा किछु होय्
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`अहं मम’-शब्द-अर्थे जाहा किछु होय्
अक्रोध परमानन्द नित्यानन्द राय्
अखिल भुबन भरि हरि रस-बादर
अगतम् इव हरिम् अचिरम्
अगम अगोचर गोरा अखिल ब्रह्म-पार,
अगेयान-ध्वान्त दुरन्त निमगन
हरि हे
अग्रे कुरूणाम् अथ पाण्डवानां
अघरिर् अथ सभ्यैः सभन्तर् उपवेशी
अङ्ग-उपङ्ग-अस्त्र-पार्षद-सङ्गे
अङ्ग-श्यामलिम-छटाभिर् अभितो मन्दी-कृतेन्दीवरं
अछ्युतं केशवं रामनारायणं
अजि रसे बादर निशि
अञ्जन गञ्जन लोचन रञ्जन
अतएव ताण्र नहे ‘निर्जन-भजन’
अतएव ताँ’र नहे निर्जन भजन
अति-चिरम् अजनि रजनिर् अति-काली
अतुल अतुल गौराङ्गेर रूप, अतुल ताहार आभा
अत्यन्त सङ्ग्रहे यार सदा चित्त धाय
अत्रैव तत्त्व-विज्ञानं ज्ञातव्यं सततं बुधैः
अत्रैव व्रज-भावानां श्रैष्ठ्यम् उक्तम् अशेषतः
अदि-पुरुष इव वैभव-शलीअनुचर-वर्नित-वीर्य-समुन्नतिर् अयम् उदयति वन-मली
अदोष दरशि मोर प्रभु नित्यानन्द
अद्य समस्तं स-फलं जतम्
अद्वैत आचार्य गुण के कहिते पारे
अद्वैत आचार्य गौराङ्ग-शिरे
अद्वैत गुण-मणि अबनी करु धनि
अद्वैत-घरणी सीता ठाकुराणी केबल रसेर राशि
अद्वैत-प्रकटी-कृतो नरहरि-प्रेष्ठः स्वरूप-प्रियो
अधरं मधुरं वदनं मधुरं
अधिबास निशि पोहा-इले
अनादि' करम-फले, पडि' भवार्णर जले,
अनिरुद्ध-बन्ध-विषयानुसन्ध गत-बाण-धाम विततात्म-धाम
अनुपम गोर अबतार
साधन निताइ भजन निताइ निताइ नयन तारा
नव-अरुण-सम
साधन निताइ भजन निताइ निताइ नयन
हरि हे
अपराध-फले मम चित्त भेलो बज्र-सम
अपरूप चान्द उदय नदीया-पुरे
अपरूप गोरा नट-राज
अपरूप रथ आगे
अपरूप हेम-मणि भास
अपूर्ब बैष्णब-तत्त्व आत्मार आनन्द
अबतार कैल बड़ बड़
अबनीक माझे देख दोन भा-इ
हरि हे
दीव्यद्-वृन्दारण्य-कल्प-द्रुमाधः