पञ्च तत्त्व महामन्त्र
(जय) श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु नित्यानन्द
“प” अक्षर से शुरू होने वाले सारे वैष्णव भजन और कीर्तन, देवनागरी लिपि, हिन्दी अर्थ और ऑडियो के साथ।
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(जय) श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु नित्यानन्द
पञ्च-सखी मध्ये चार नित्य-सिद्ध राधिकार
पतित-पाबन पर्भुर चरण
पतित हेरिया कान्दे थिर नाहिक बण्धे
पतिब्रता लक्ष्मी-देबी पति-गता प्राण
पद-तले भकत-कलप-तरु सिञ्चित पद-मकरन्द
हरि हे
हरि हे
आन कथा ना बलिब आन कथा ना शुनिब
परम कोरुण, पहू दुइ जन
परम चैतन्य हरि ताँर शक्ति बनेश्वरी
परम शुभ शची-गभे बिलसत गौर गोकुल नाह
परमानन्द हे माधव
परश-मणिर सङ्गे कि दिब तुलना
वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश् च
पश्य पश्य सखि होरी-युद्धम्
पश्य शची-सुतम् अनुप-रूपम्
पश्य सखी-जन सो 'यं कस्य
पहुं मोर नित्यानन्द राय
पापे पुरल पृथिबी परिसर पेखि परम दयाल
मध्वमानसपद्मभानुसमं स्मरप्रतिमं स्मर
पाल्य-दासी करि' ललिता सुन्दरी
पाशरा ना याय आमार गौरचान्देर लीला
पित-बरण कलि-पाबन गोरा
पिरीति मूरति अधिदेब
पीरिति सच्-चिद्-आनन्दे रूपबती नारी
पुत्रम् उदारम् असूत यशोदा
ओं सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्
पुलके चरित गाय सुखे गडागडि याय
पुलके बलित अति ललित हेम-तनु
पूरबे गोबर्धन धरल अनुज यार
पूरबे बान्धल चूडा एबे केष-हीन
पूरुबे गोबर्धन धरिल अनुज यार
पूर्ण-चिद्-आनन्द तुमि तोमार चित्-कण आमि
पूर्णिमा-प्रतिपद-सन्धि समय पा-इ राहु गरासल गगन-शशी
पूर्णिमा रजनी चाँद गगने उदय
पूर्बे ये-इ गोपीनाथ श्रीमती राधिका साथ
पद-तले भकत कल्प-तरु सिञ्चित
तोमार् चरण शरण कोरि
गोविन्दास्योत्तंसित-वंशी-क्वणितोद्यल्
सदोपास्यः श्रीमान् धृत-मनुज-कायैः प्रणयिताम्
इन्द्रनील-मणि-मञ्जुल-वर्णः
प्रथमे बन्दिया गाह गौराङ्ग गोसा-ई
प्रदोष-समये श्रीबास-अङ्गने
हरि हे!
प्रफुल्लित कनक-कमल मुख-मण्डल, नयन खण्जन ताहे साजे
प्रबेशिया अन्तः-पुरे नारी-गणे शान्त कोरे
प्रभु तब पद-जुगे मोर निबेदन