कृष्न वनं सखि भति स रङ्गम्
कृष्न-वनं सखि भति स-रङ्गम्
1,440 वैष्णव भजनों और कीर्तनों की पूरी सूची, देवनागरी लिपि, हिन्दी अर्थ और ऑडियो के साथ।
1,440 भजन · पृष्ठ 7 / 30
कृष्न-वनं सखि भति स-रङ्गम्
कृष्नम् अपश्यन् पीत-दुकुलम्
के गो अ-इ गौर-बरण बाङ्का भुरु बाङ्का नयन
के जाबि के जाबि भाइ भव-सिन्धु-पार
के याबे के याबे भा-इ भब-सिन्धु पार
केनो आर कोरो द्वेष बिदेषि-जन-भजने
केनो भेकेर् प्रयास्?
केनो मन कामेरे नचाओ प्रेम-प्राय
पखि ना जानि कोन् अपराधे
केशव! तुवा जगत विचित्र
नव-प्रियक-मञ्जरी-रचित-कर्ण-पूर-श्रियम्
केशेर बेशे भुलिल देशे
केशेर बेसे भुलिल देश, ताहे रसमय हासि
को कहे अपरूप प्रेम-सुधा-निधि
कोटि मनमथ-गरभ-भर-हर परम सुघर निता-इ हलधर
कोथाय आछिल गोरा एमन सुन्दर
कोथाय गो प्रेममयि राधे राधे
खञ्जन-गञ्जन चलन मनोरम
खेलत फागु बृन्दाबन-चन्द
गगनहि निमगन दिनमणि कान्ति
गजेन्द्र-गमने निता-इ चलये मन्थरे
गजेन्द्र-गमने याय स-करुण दिठे चाय
गतिं दृष्ट्वा यस्य प्रमद-गज-वर्ये 'खिल-जन
गम्भीरे भितरे गौर राय
नमः पन्नग नद्धाय वैकुण्ठ वशवर्तिने
तुमि देब निरञ्जन तुमि प्रजापति
गहन बिरहक लागि
गाइते गाइते नाम कि दशा होइलो
गाइते गोविन्द-नाम्, उपजिलो भाव-ग्राम्,
गाङ्गेय-चाम्पेय-तडिद्-विनिन्दि
परितोषित-गोपवधू-पटलम्
वृन्दावने विहरतोर् इह केलि-कुञ्जे
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
गिरि-पुजेयं विहित केन अरचि शक्र-पदम् अभयं येन
गिरिबर-कन्दरे सुन्दर श्याम
गीता-शास्त्रम् इदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान्
गुरु-जन-नयन बिधुन्तुद मन्द
जय प्रभुपाद
गुरु दुरु बञ्च उजोरल चन्द
गुरुदेव्!
गुरुदेव बलेछिल कनिष्ठ ए-सब
गुरुदेव्!
गुरुदेवे, व्रज-वने, व्रज-भूमि-वासी जने,
गुरौ गोष्ठे गोष्ठालयिषु सुजने भूसुर-गणे
गुरौ मन्त्रे नाम्नि प्रभुवर-शचीगर्भज-पदे
गो-रख जागाइ शिङ्ग-ध्वनि शुन-इते
गोउराङ्ग सुन्दर, प्रेम जलधर तप्त काञ्चन काय